पंजाब बीजेपी में दो खेमे, तीन सर्वे के भरोसे फैसला- 2027 से पहले अंदर की असली लड़ाई क्या है?

आरके सेठी
चंडीगढ़, 27 सितम्बर।
पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के संभावित गठबंधन को लेकर सियासी हलचल तेज है। 27 सितंबर को सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब बीजेपी में अकाली दल के साथ दोबारा हाथ मिलाने पर आम सहमति नहीं बन पाई है। सूत्रों के हवाले से दावा है कि पार्टी ने तीन सर्वे एजेंसियों को लगाया है, ताकि यह आकलन किया जा सके कि बीजेपी को सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ना चाहिए या अकाली दल के साथ गठबंधन करना चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक, पुराने बीजेपी नेता गठबंधन के पक्ष में नहीं हैं, जबकि कांग्रेस और अकाली दल से बीजेपी में आए नेताओं का एक वर्ग गठबंधन का समर्थन कर रहा है। हालांकि, सर्वे एजेंसियों के नाम, नमूने, प्रश्नावली और निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं हैं। बीजेपी ने भी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है,लेकिन अकाली दल और बीजेपी के गठबंधन में आ रही अडचनों पर बहुत कोणों से बहुत स्तर पर मंथन चल रहा है!
बीजेपी का सार्वजनिक रुख अब तक गठबंधन के खिलाफ
बीजेपी का सार्वजनिक रुख अब तक गठबंधन के खिलाफ रहा है। पंजाब बीजेपी के प्रभारी सतीश पूनिया ने एक सितंबर को कहा था कि पार्टी किसी दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी और सभी 117 सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुखबीर सिंह बादल की मुलाकात को गठबंधन का संकेत मानने से भी इनकार किया था। 14 सितंबर को भी पूनिया ने सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात दोहराई। 26 सितंबर को हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी गठबंधन की संभावना खारिज करते हुए कहा कि बीजेपी का गठबंधन पंजाब के लोगों के साथ है। सार्वजनिक बयानों और सर्वे की रिपोर्ट के बीच अंतर समझना जरूरी है। पार्टी मंचों से अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी बता रही है, जबकि सूत्रों की रिपोर्ट बताती है कि गठबंधन का विकल्प अंदरूनी चर्चाओं से पूरी तरह बाहर नहीं हुआ है। अभी न गठबंधन की आधिकारिक घोषणा हुई है और न सर्वे के नतीजे सामने आए हैं।
पुराने बनाम नए नेताओं की रणनीतिक लड़ाई
गठबंधन पर मतभेद केवल अकाली दल के साथ रिश्तों का सवाल नहीं, बल्कि पंजाब में बीजेपी के राजनीतिक विस्तार का रास्ता भी है। ताजा रिपोर्ट में पुराने बीजेपी नेताओं और कांग्रेस-अकाली दल से आए नेताओं के अलग-अलग रुख का जिक्र है। बीजेपी लंबे समय तक अकाली दल की सहयोगी रही और गठबंधन के तहत पार्टी को शहरी तथा हिंदू मतदाताओं के बीच अपना आधार बनाने का अवसर मिला। अकाली दल का ग्रामीण सिख और पंथक आधार गठबंधन की दूसरी धुरी था। अब बीजेपी पंजाब में अपना स्वतंत्र संगठन मजबूत करने, बूथ स्तर तक पहुंच बढ़ाने और नए नेताओं के जरिए राजनीतिक विस्तार की कोशिश कर रही है। दूसरी पार्टियों से आए नेताओं के अनुभव और स्थानीय संपर्क इस विस्तार में उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन गठबंधन की स्थिति में सीटों के बंटवारे और टिकट वितरण को लेकर पुराने कार्यकर्ताओं तथा नए नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। यही वजह है कि गठबंधन का फैसला पार्टी के संगठनात्मक भविष्य से भी जुड़ा हुआ है।
2020 में टूटा था पुराना रिश्ता
बीजेपी और अकाली दल का गठबंधन कृषि कानूनों के विरोध के दौरान 2020 में टूट गया था। इसके बाद दोनों पार्टियों ने अलग-अलग चुनावी रास्ता अपनाया। 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 117 में से 92 सीटें जीतकर सरकार बनाई, कांग्रेस को 18, अकाली दल को 3 और बीजेपी को 2 सीटें मिलीं। ये नतीजे उस चुनाव के राजनीतिक समीकरण को दिखाते हैं। हालांकि, केवल सीटों के आंकड़ों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि गठबंधन होने पर दोनों दलों को कितनी सीटें मिलतीं। इसके लिए विधानसभा क्षेत्रवार वोट, उम्मीदवारों की स्थिति, मतदाता हस्तांतरण और स्थानीय परिस्थितियों का अलग आकलन जरूरी है। बीजेपी के लिए अकेले चुनाव लड़ने का सवाल अपने संगठन के दम पर विस्तार का है, जबकि अकाली दल के लिए गठबंधन अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी और पंथक आधार को सुरक्षित रखने से जुड़ा है।
पंथक राजनीति का बदला समीकरण
2027 का चुनाव पुराने गठबंधन के दौर जैसी परिस्थितियों में नहीं होगा। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के अलावा पंथक राजनीति में भी नए केंद्र उभरे हैं। वारिस पंजाब दे और अमृतपाल सिंह की राजनीतिक मौजूदगी, अकाली दल के भीतर अलग-अलग धड़ों की सक्रियता और पंथक मतदाताओं के बीच प्रतिस्पर्धा ने पुराने समीकरण को जटिल बनाया है। बीजेपी और अकाली दल का पारंपरिक सामाजिक आधार एक-दूसरे का पूरक रहा है, लेकिन यह मान लेना सही नहीं होगा कि दोनों दलों के मतदाता गठबंधन की स्थिति में स्वतः एक-दूसरे के उम्मीदवारों को वोट देंगे। अकाली दल के लिए बीजेपी के साथ समझौते में अपनी स्वतंत्र पंथक पहचान और समर्थकों की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी। वहीं बीजेपी को यह आकलन करना होगा कि गठबंधन उसके पारंपरिक समर्थकों के साथ नए मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाएगा या स्वतंत्र विस्तार की रणनीति पर असर डालेगा।
सीटों का बंटवारा सबसे बड़ी बाधा
गठबंधन पर सहमति बन भी जाए, तो सबसे बड़ा सवाल सीटों की हिस्सेदारी का होगा। अकाली दल ग्रामीण और पंथक क्षेत्रों में अपने राजनीतिक आधार के मुताबिक सीटों पर दावा कर सकता है, जबकि बीजेपी सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषित रणनीति और संगठनात्मक विस्तार को देखते हुए अधिक सीटों की अपेक्षा रख सकती है। इसके साथ उम्मीदवारों का चयन, पुराने कार्यकर्ताओं और दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को टिकट देने का संतुलन तथा चुनावी अभियान का नेतृत्व भी तय करना होगा। सरकार बनने की स्थिति में मुख्यमंत्री पद के चेहरे और दोनों दलों की भूमिका पर सहमति एक अलग चुनौती होगी। अगस्त में सामने आई एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से दावा किया गया था कि दोनों दलों के बीच पर्दे के पीछे बातचीत जारी है और बीजेपी गठबंधन में बड़ी भूमिका चाहती है।
तीन सर्वे किन सवालों का जवाब देंगे?
यदि तीन सर्वे एजेंसियों को गठबंधन पर राय जानने के लिए लगाया गया है, तो उनका महत्व केवल लोकप्रियता मापने तक सीमित नहीं होगा। विधानसभा क्षेत्रवार बीजेपी का स्वतंत्र समर्थन, अकाली दल के साथ संभावित वोट हस्तांतरण, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में संगठन की स्थिति, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और गठबंधन के प्रति मतदाताओं की प्रतिक्रिया ऐसे मुद्दे हो सकते हैं जिनका आकलन किया जाए। लेकिन यह सर्वे की सार्वजनिक प्रश्नावली नहीं है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि सर्वे मतदाताओं के बीच हो रहे हैं या इसमें पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं का फीडबैक भी शामिल है। एजेंसियों के नाम, नमूने, सवालों और निष्कर्षों की पुष्टि के बिना सर्वे के आधार पर किसी राजनीतिक नतीजे का दावा नहीं किया जा सकता। सर्वे में दर्ज पसंद और वास्तविक चुनावी परिणाम भी अलग चीजें हैं; उम्मीदवारों की घोषणा, स्थानीय मुद्दे और चुनावी अभियान अंतिम स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं।
अकाली दल के लिए भी आसान नहीं वापसी
बीजेपी के साथ गठबंधन अकाली दल को उन क्षेत्रों में राजनीतिक सहयोग दे सकता है जहां बीजेपी का स्वतंत्र संगठन सीमित रहा है। लेकिन अकाली दल को अपने समर्थकों की प्रतिक्रिया, सीटों की हिस्सेदारी और पंथक पहचान को लेकर भी फैसला करना होगा। अकाली दल पुनरजीत और सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व वाले अकाली दल से जुड़ी राजनीतिक गतिविधियाँ फिलहाल अलग-अलग हैं, ऐसी सूरत में कुछ ऐसा भी हो सकता है जो अप्रत्याशित हो!
फैसले पर अब केंद्रीय नेतृत्व की नजर
27 सितंबर तक उपलब्ध सार्वजनिक बयानों और रिपोर्टों से तीन बातें स्पष्ट हैं। बीजेपी के अधिकृत नेताओं का सार्वजनिक रुख सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का है। दूसरी ओर, सूत्रों पर आधारित रिपोर्ट पंजाब बीजेपी के भीतर मतभेद और तीन सर्वे एजेंसियों से फीडबैक लेने का दावा करती है, जिसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। वहीं, बीजेपी-अकाली दल के बीच संभावित गठबंधन को लेकर राजनीतिक संपर्कों और बातचीत की खबरें पहले भी सामने आई हैं, लेकिन सीटों के बंटवारे या साझा चुनावी अभियान पर कोई औपचारिक समझौता सार्वजनिक नहीं है। 2027 से पहले असली सवाल यही है कि बीजेपी स्वतंत्र संगठनात्मक विस्तार की रणनीति पर आगे बढ़ेगी या चुनावी समीकरण और अंदरूनी फीडबैक के आधार पर अकाली दल के साथ किसी नए समझौते का रास्ता खुलेगा। इसका जवाब तीन सर्वे के निष्कर्षों, बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के फैसले और दोनों दलों के बीच बातचीत के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा।

