‘जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) एक्ट, 2026’ में बदलाव की मांग; अकाल तख्त की आपत्तियों के बीच सीएम आवास पर कल चर्चा प्रस्तावित, कस्टोडियन, स्वरूपों के रिकॉर्ड और धार्मिक शब्दावली पर सहमति की चुनौती

आरके सेठी
चंडीगढ़, 27 सितम्बर।
पंजाब में विधानसभा चुनाव से पहले श्री गुरु ग्रंथ साहिब के सत्कार और बेअदबी से जुड़े कानून पर विवाद मान सरकार के लिए एक संवेदनशील राजनीतिक और पंथक चुनौती बन गया है। पंजाब विधानसभा से सर्वसम्मति से पारित ‘जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) एक्ट, 2026’ को लेकर अकाल तख्त की आपत्तियों के बाद सरकार ने सात सदस्यीय तालमेल कमेटी गठित की है। कल चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री आवास पर कानून के प्रावधानों और उनके क्रियान्वयन पर चर्चा प्रस्तावित है। सवाल यह है कि क्या सरकार और अकाल तख्त के बीच विवादित प्रावधानों पर कोई सहमति बन पाएगी, या कानून को लेकर पंथक और राजनीतिक टकराव आगे भी जारी रहेगा।
सर्वसम्मति से पास कानून, बाद में उठे गंभीर सवाल
13 अप्रैल 2026 को पंजाब विधानसभा ने इस संशोधन कानून को सर्वसम्मति से पारित किया था। राज्यपाल की मंजूरी के बाद अप्रैल में इसे अधिसूचित किया गया। यह 2008 के मूल कानून में संशोधन है। कानून का उद्देश्य बेअदबी के मामलों में सख्त कानूनी कार्रवाई और श्री गुरु ग्रंथ साहिब के स्वरूपों की संभाल, रिकॉर्ड तथा जवाबदेही की व्यवस्था करना है। हालांकि, कानून पारित होने के बाद इसकी प्रक्रिया और कुछ प्रावधानों को लेकर सवाल उठने लगे। अकाल तख्त की ओर से कहा गया कि कानून बनाने से पहले अकाल तख्त, एसजीपीसी और पंथक संस्थाओं से पर्याप्त सलाह-मशविरा नहीं किया गया। विपक्षी दलों ने भी सरकार पर जल्दबाजी और धार्मिक संस्थाओं से विचार-विमर्श नहीं करने के आरोप लगाए। इस तरह सर्वसम्मति से पारित कानून बाद में राजनीतिक और पंथक बहस का विषय बन गया।
कस्टोडियन, केंद्रीय रिकॉर्ड और धार्मिक शब्दावली पर आपत्ति
कानून के विवाद के तीन प्रमुख केंद्र हैं। पहला, कस्टोडियन की परिभाषा और उसकी जिम्मेदारी। अकाल तख्त की आपत्ति है कि इस व्यवस्था से ग्रंथियों, सेवादारों और गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटियों पर कानूनी जिम्मेदारी और जोखिम बढ़ सकता है। दूसरा, एसजीपीसी के पास केंद्रीय रजिस्टर, यूनिक आईडी तथा स्वरूपों की छपाई, भंडारण और वितरण का रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था है। स्वरूपों के स्थान और अन्य विवरणों को दर्ज करने की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं। तीसरा, कानून में ‘बीर’ या ‘बीड़’ की जगह ‘स्वरूप’ शब्द का इस्तेमाल है। अकाल तख्त का रुख है कि धार्मिक शब्दावली और मर्यादा से जुड़े फैसले पंथक संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। तख्त की आपत्तियों का केंद्र बेअदबी के लिए सख्त सजा का विरोध नहीं, बल्कि धार्मिक मर्यादा और संस्थागत अधिकारों से जुड़े प्रावधान बताए गए हैं।
जून में विधायकों की पेशी से जुलाई के जवाब तक
कानून पर विवाद जून में और गहरा गया। अकाल तख्त के सामने सिख विधायकों और मंत्रियों की पेशी का घटनाक्रम भी इसी विवाद का हिस्सा बना। मुख्यमंत्री भगवंत मान इस बैठक से अलग रहे। अकाल तख्त की ओर से कानून पर पुनर्विचार और संशोधन की मांग उठाई गई। 29 जून की बैठक के बाद सरकार को आपत्तियों पर विचार कर जवाब देने के लिए एक महीने का समय दिए जाने की बात सामने आई। जुलाई में सरकार की ओर से जवाब दिया गया, लेकिन अकाल तख्त ने उसे असंतोषजनक बताया। तख्त की ओर से यह भी कहा गया कि उसकी आपत्तियों का सीमित हिस्सा ही स्वीकार किया गया है। इसके बाद अकाल तख्त ने अपनी पांच सदस्यीय कमेटी गठित की। इस घटनाक्रम से स्पष्ट हुआ कि विवाद केवल कानून की धाराओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सरकार और पंथक संस्थाओं के बीच संवाद तथा भरोसे का प्रश्न भी बन गया।
सीएम पर अलग पंथक फैसला, विवाद की व्यापक पृष्ठभूमि
कानून पर विवाद के साथ मुख्यमंत्री भगवंत मान और अकाल तख्त के बीच पहले से चल रहे टकराव का संदर्भ भी महत्वपूर्ण है। जून 2026 में एक वीडियो से जुड़े मामले में अकाल तख्त की ओर से मुख्यमंत्री के खिलाफ अलग पंथक फैसला सुनाए जाने की खबरें आई थीं। इस घटनाक्रम ने सरकार और अकाल तख्त के संबंधों को और संवेदनशील बनाया। इसलिए कानून में संशोधन की मांग को केवल एक विधायी विवाद के रूप में देखना पूरी पृष्ठभूमि को सामने नहीं लाता। हालांकि, कानून पर उठाई गई आपत्तियों और मुख्यमंत्री से जुड़े अलग पंथक मामले को एक ही कार्रवाई या एक ही फैसले के रूप में प्रस्तुत करना भी उचित नहीं होगा। दोनों घटनाक्रमों का अपना अलग संदर्भ और प्रक्रिया है।
सात सदस्यीय कमेटी के बाद कल सीएम आवास पर चर्चा
पंजाब सरकार ने 16 सितम्बर को गृह एवं न्याय विभाग के माध्यम से सात सदस्यीय तालमेल कमेटी गठित की। इसमें पूर्व जत्थेदार ज्ञानी रघबीर सिंह, दमदमी टकसाल के संत ज्ञानी हरनाम सिंह खालसा, संत बाबा सेवा सिंह रामपुर खेड़ा, दो सेवानिवृत्त न्यायाधीश, पूर्व आईपीएस अधिकारी जतिंदर सिंह औलख और एडवोकेट प्रीत इंदर पाल सिंह सहित प्रतिनिधियों के शामिल होने की जानकारी सामने आई है। कमेटी का उद्देश्य कानून के प्रावधानों और क्रियान्वयन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करना है। कल 27 सितम्बर को दोपहर एक बजे चंडीगढ़ के सेक्टर-2 स्थित मुख्यमंत्री आवास पर बैठक प्रस्तावित है। बैठक में किन प्रावधानों पर चर्चा होती है और क्या आगे कोई लिखित संशोधन प्रस्ताव सामने आता है, यह आगे की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण होगा।
बेअदबी पर सख्त सजा और कानून की संवैधानिक बहस
संशोधन कानून में बेअदबी के मामलों के लिए कठोर दंड का प्रावधान किया गया है। सामान्य बेअदबी के मामलों में सात से बीस वर्ष तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान बताया गया है, जबकि सांप्रदायिक सद्भाव भंग करने के इरादे से की गई साजिश के लिए दस वर्ष से आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती बनाए जाने की बात भी कानून के संदर्भ में सामने आई है। सरकार का तर्क रहा है कि बेअदबी के मामलों में प्रभावी कानूनी कार्रवाई के लिए सख्त कानून जरूरी है। वहीं, कानून के दायरे, धार्मिक संस्थाओं की भूमिका और प्रावधानों के क्रियान्वयन पर सवाल उठाए जा रहे हैं। केंद्र की ओर से पहले बेअदबी से जुड़े कानूनों के कुछ प्रयासों पर संवैधानिक और विधायी सवाल उठाए जाने का संदर्भ भी इस बहस को व्यापक बनाता है। ऐसे में कानून में किसी भी बदलाव का आकलन केवल राजनीतिक सहमति से नहीं, बल्कि उसके विधायी और संवैधानिक पहलुओं से भी करना होगा।
2027 से पहले सरकार के लिए राजनीतिक और पंथक चुनौती
पंजाब में बेअदबी का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक और धार्मिक विमर्श का हिस्सा रहा है। बरगाड़ी सहित पुराने मामलों के कारण इस विषय पर सरकारों की जवाबदेही और कार्रवाई को लेकर जनता तथा धार्मिक संस्थाओं की अपेक्षाएं बनी रही हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मान सरकार के सामने एक तरफ बेअदबी के मामलों में सख्त कार्रवाई और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन का सवाल है, तो दूसरी तरफ अकाल तख्त और पंथक संस्थाओं की आपत्तियों पर सहमति बनाने की चुनौती है। कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और भाजपा सहित विपक्षी दल इस मुद्दे पर सरकार की प्रक्रिया और फैसलों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन सरकार पंथक दबाव में झुकी है या बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की कोशिश कर रही है, इसका अंतिम आकलन बैठक के नतीजों, आधिकारिक फैसलों और कानून में प्रस्तावित संशोधनों के सामने आने के बाद ही किया जा सकेगा।

