‘अकाली दल वारिस पंजाब दे’ को राजनीतिक पार्टी का दर्जा मिलने में अड़चनें, दिल्ली हाई कोर्ट में चुनाव आयोग ने कहा-‘राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित कुछ आशंकाएं’; पूर्व ईडी अफसर निरंजन सिंह का संगठन से किनारा करना भी बढ़ा सकता है मुश्किलें!

आरके सेठी
चंडीगढ़, 29 सितंबर।
‘अकाली दल वारिस पंजाब दे’ को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा पर चुनाव आयोग की आपत्ति, पंजीकरण का मामला हाई कोर्ट में और पूर्व ईडी अधिकारी निरंजन सिंह का चार दिन में संगठन से किनारा करना- 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सांसद अमृतपाल सिंह की राजनीतिक टीम के सामने एक साथ कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे ‘अकाली दल वारिस पंजाब दे’ को अभी चुनाव आयोग से राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण नहीं मिला है। इसी बीच निरंजन सिंह के अलग होने से संगठन के संवैधानिक और राजनीतिक रुख पर भी सार्वजनिक बहस शुरू हो गई है। संगठन की राजनीति में पंथक मुद्दों और खालिस्तान समर्थक विचारधारा को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट में चुनाव आयोग ने क्या कहा?
दिल्ली हाई कोर्ट में 29 सितंबर 2026 को जस्टिस सौरभ बनर्जी के सामने सुनवाई के दौरान भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) ने कहा कि ‘अकाली दल वारिस पंजाब दे’ को राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत करने को लेकर उसे “certain apprehensions pertaining to national security” यानी राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित कुछ आशंकाएं हैं। आयोग ने संगठन की गतिविधियों और उससे जुड़े लोगों की संबद्धताओं का भी उल्लेख किया। राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा ऐसे समय सामने आया है, जब संगठन का पंजीकरण मामला हाई कोर्ट में लंबित है और पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां कर रही है।
पंजीकरण आवेदन के बाद हाई कोर्ट पहुंचा मामला
‘अकाली दल वारिस पंजाब दे’ का गठन जनवरी 2025 में माघी मेले के दौरान तरसेम सिंह की अगुवाई में हुआ था। दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल याचिका के मुताबिक, संगठन ने राजनीतिक दल के पंजीकरण के लिए चुनाव आयोग में 22 जनवरी 2025 को आवेदन किया था। पंजीकरण की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ने पर संगठन ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया। मामला 2026 में अदालत के सामने आया। संगठन ने चुनाव आयोग को प्रस्तावित नाम ‘AKALI DAL (WARIS PUNJAB DE)’ मंजूर करने और राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण करने का निर्देश देने की मांग की है।
नाम की मंजूरी और पंजीकरण की मांग पर दिल्ली हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था
दिल्ली हाई कोर्ट ने 1 जुलाई 2026 को याचिका पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था। आयोग की ओर से नोटिस स्वीकार किया गया। अदालत ने आयोग को छह सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने और याचिकाकर्ता को उसके बाद तीन सप्ताह में प्रत्युत्तर दाखिल करने का समय दिया था। मामले को 15 सितंबर 2026 को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया था। 29 सितंबर की सुनवाई में आयोग की राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी आशंकाएं सामने आईं।
‘अकाली’ नाम पर भी उठे थे सवाल, धार्मिक अर्थ को लेकर आयोग ने मांगा था स्पष्टीकरण
पंजीकरण प्रक्रिया के दौरान प्रस्तावित नाम में ‘अकाली’ शब्द के धार्मिक अर्थ को लेकर भी चुनाव आयोग ने सवाल उठाए थे। पार्टी के वकील हरजोत सिंह मान के मुताबिक, संगठन ने आयोग को बताया कि ‘अकाल’ का अर्थ कालातीत या समय से परे है और इस स्पष्टीकरण के बाद आयोग इस पहलू पर संतुष्ट दिखाई दिया। नाम संबंधी सवाल और 29 सितंबर को सामने आई राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी आशंकाएं पंजीकरण प्रक्रिया के अलग-अलग पहलू हैं। आयोग की राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी आपत्तियों का विस्तृत आधार अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है।
117 सीटों की तैयारी, दो सांसदों और विधायक का जुड़ाव
2027 के चुनाव में सभी सीटों पर उतरने की तैयारी: संगठन ने 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव में 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बनाई है और कुछ उम्मीदवारों के नाम भी घोषित किए हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में अमृतपाल सिंह खडूर साहिब और सरबजीत सिंह खालसा फरीदकोट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुए थे। दाखा के विधायक मनप्रीत सिंह अयाली भी संगठन से राजनीतिक रूप से जुड़े हैं। पार्टी का औपचारिक पंजीकरण और चुनाव चिह्न अभी लंबित है। उम्मीदवारों की घोषणा और चुनावी तैयारियों के बावजूद संगठन को राजनीतिक दल के रूप में आयोग की औपचारिक मंजूरी नहीं मिली है।
पूर्व ईडी अधिकारी निरंजन सिंह और पूर्व डीएसपी सेखों जुड़े
नशा, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर समर्थन: पूर्व ईडी डिप्टी डायरेक्टर निरंजन सिंह 23 सितंबर को ‘अकाली दल वारिस पंजाब दे’ में शामिल हुए थे। उनके साथ पंजाब पुलिस के पूर्व डीएसपी बलविंदर सिंह सेखों भी संगठन में आए थे। निरंजन सिंह जगदीश भोला ड्रग रैकेट और राजा कंडोला समेत चर्चित मामलों की जांच से जुड़े रहे हैं। संगठन में शामिल होते समय निरंजन सिंह ने पंजाब में नशे, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था की स्थिति पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि यदि अकाली दल वारिस पंजाब दे की सरकार बनती है तो नशे और भ्रष्टाचार के माफिया को खत्म किया जाएगा। उन्होंने उस समय खुद को राजनीतिक व्यक्ति नहीं बताया था और चुनाव लड़ने की इच्छा से भी इनकार किया था।
निरंजन सिंह ने चार दिन में संगठन छोड़ा, कहा- “कुछ मुद्दों पर मतभेद गैर-समझौता योग्य”
27 सितंबर को निरंजन सिंह ने सोशल मीडिया पर संगठन से अलग होने की घोषणा की। अपने बयान में उन्होंने लिखा, “मैं अकाली दल वारिस पंजाब दे से खुद को अलग करता हूं। मैंने पंजाब में नशे की समस्या, बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, गैंगस्टरों, फिरौती और नशे की तस्करी में पुलिस कर्मियों की संलिप्तता जैसे मुद्दों पर पार्टी को अपना समर्थन दिया था। हालांकि, कुछ ऐसे मुद्दों पर मतभेद हैं, जिन पर समझौता नहीं किया जा सकता। सार्वजनिक जीवन में लोगों का आचरण भारत के संविधान के दायरे में होना चाहिए। मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं।”
यानी निरंजन सिंह ने नशे, भ्रष्टाचार, गैंगस्टरवाद, जबरन वसूली और पुलिसकर्मियों की नशा तस्करी में कथित संलिप्तता जैसे मुद्दों पर समर्थन देने की बात कही, लेकिन कुछ मुद्दों पर गैर-समझौता योग्य मतभेदों और संविधान के दायरे में सार्वजनिक जीवन के आचरण को अपने अलग होने का आधार बताया।
मीडिया से बातचीत में निरंजन सिंह ने कहा, “मैंने पार्टी जॉइन नहीं की थी। खुद को अलग करने का मेरा फैसला जल्दबाजी में लिया गया निर्णय नहीं है। मैंने पूरी तरह सोच-समझकर यह फैसला लिया है। भारत के संविधान की वैधता पर उनका रुख स्पष्ट नहीं है, जबकि मुझे संविधान में पूरा विश्वास है। इसलिए मैंने अलग होने का फैसला किया।”
उन्होंने बाद में यह भी कहा कि संगठन के कुछ समर्थकों के बयान उन्हें ठीक नहीं लगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी ने उन पर दबाव नहीं डाला और वह संगठन से अलग होने के अपने फैसले पर कायम हैं।
मनप्रीत अयाली ने कहा- “क्यों कोई चार दिन में पार्टी छोड़ देगा?”
निरंजन सिंह के अलग होने के बाद दाखा विधायक और पार्टी नेता मनप्रीत सिंह अयाली ने कहा कि संगठन को उनके जाने के कारणों के संबंध में कोई औपचारिक सूचना नहीं मिली थी। अयाली के मुताबिक, निरंजन सिंह ने पार्टी छोड़ने से पहले उनसे बात नहीं की थी। अयाली ने कहा, “आखिर कोई व्यक्ति किसी पार्टी में शामिल क्यों होगा, मीडिया को ब्रीफ करेगा, पार्टी की तारीफ करेगा और फिर चार दिन के भीतर उसे छोड़ने का फैसला कर लेगा?”
अयाली ने निरंजन सिंह के फैसले को उनका निजी निर्णय बताते हुए दबाव की संभावना भी जताई। उन्होंने यह भी कहा कि निरंजन सिंह के अलग होने से पार्टी को कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा और उन्हें कुछ मुद्दों पर परेशानी हो सकती थी। दूसरी ओर, निरंजन सिंह ने खुद किसी दबाव से इनकार किया।
मनदीप सिंह सिद्धू ने कहा- “हम लोकतांत्रिक चुनावी लड़ाई लड़ रहे हैं”
पार्टी ने संविधान पर अस्पष्ट रुख का आरोप खारिज किया: संगठन के महासचिव मनदीप सिंह सिद्धू ने निरंजन सिंह के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि वह एजेंसियों के इशारे पर पार्टी को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। सिद्धू ने संगठन के संविधान संबंधी रुख पर सवालों को खारिज किया। उन्होंने कहा, “हम लोकतांत्रिक चुनावी लड़ाई लड़ रहे हैं। यही इस बात का प्रमाण है कि हम संविधान में विश्वास करते हैं। हमारे नेता और खडूर साहिब के सांसद अमृतपाल सिंह ने चुनाव जीतने के बाद संविधान के तहत शपथ ली थी। सभी उम्मीदवारों को हलफनामे देने होते हैं और संविधान के प्रति शपथ लेनी होती है।” सिद्धू ने कहा कि संविधान पर पार्टी का रुख अस्पष्ट होने का तर्क भ्रामक और दुर्भावनापूर्ण है तथा पार्टी की छवि खराब करने के उद्देश्य से दिया जा रहा है।
अजनाला मामला: अमृतपाल के खिलाफ अलग आपराधिक कार्यवाही
अमृतपाल सिंह के खिलाफ अजनाला पुलिस स्टेशन पर हुए हमले से संबंधित आपराधिक मामला भी अलग कानूनी प्रक्रिया के तहत चल रहा है। मई 2026 की रिपोर्टिंग के मुताबिक, सेशन कोर्ट ने इस मामले में उनके खिलाफ आरोप तय किए थे। रिपोर्ट में हत्या के प्रयास, गंभीर चोट पहुंचाने, सरकारी कर्मचारियों को रोकने और आपराधिक साजिश सहित आरोपों का उल्लेख किया गया था। ध्यान रहे कि अमृतपाल के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों और राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत उनकी हिरासत की कानूनी स्थिति अलग है, जबकि ‘अकाली दल वारिस पंजाब दे’ का पंजीकरण चुनाव आयोग और दिल्ली हाई कोर्ट के समक्ष अलग मामला है।
2027 से पहले संगठन के सामने पंजीकरण और राजनीतिक एकजुटता के सवाल
चुनाव आयोग की राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी आशंकाएं, हाई कोर्ट में लंबित पंजीकरण और निरंजन सिंह के चार दिन में अलग होने से संगठन की चुनावी तैयारी के बीच कई घटनाक्रम एक साथ सामने आए हैं। एक ओर पार्टी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है, दूसरी ओर उसके पंजीकरण और चुनाव चिह्न की प्रक्रिया लंबित है। अब चुनाव आयोग का विस्तृत जवाबी हलफनामा और दिल्ली हाई कोर्ट की अगली कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।

