राहुल गांधी से मुलाकात के बाद वड़िंग ने कहा- साढ़े चार साल काम किया, अब कुछ दिन ब्रेक चाहिए; साथ ही साफ किया, पार्टी को जब और जहां जरूरत होगी, खड़े रहेंगे

आरके सेठी
चंडीगढ़, 2 अक्टूबर।
पंजाब कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी बदल गई है, लेकिन इस बदलाव की सबसे अहम कहानी कुर्सी पर बैठने वाले अगले चेहरे की नहीं, बल्कि राजा वड़िंग के अगले कदम की है। साढ़े चार साल तक प्रदेश संगठन की कमान संभालने के बाद वड़िंग ने राहुल गांधी से मुलाकात की, इस्तीफा सौंपा और कहा कि अब उन्हें कुछ दिन आराम चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी साफ किया कि पार्टी को जब और जहां उनकी जरूरत होगी, वह उपलब्ध रहेंगे। 2027 के चुनाव की तैयारी के बीच इन दो बातों ने कांग्रेस के सामने एक सीधा सवाल खड़ा कर दिया है- अगर यह आराम चुनावी दौर में राजनीतिक चुप्पी बन गया, तो उस खाली जगह का डैमेज कंट्रोल कौन करेगा?
राहुल के सामने वड़िंग ने रखा पंजाब का हिसाब
राहुल गांधी से करीब एक घंटे की मुलाकात में पंजाब की राजनीतिक स्थिति और कांग्रेस की चुनौतियों पर चर्चा हुई। वड़िंग ने अपने साढ़े चार साल के प्रदेश अध्यक्ष कार्यकाल का अनुभव साझा किया और पंजाब में पार्टी की स्थिति को लेकर राहुल गांधी को फीडबैक दिया। इस मुलाकात की टाइमिंग महत्वपूर्ण है। प्रदेश अध्यक्ष का पद छोड़ने के तुरंत बाद भी पंजाब की चुनावी जमीन को समझने के लिए वड़िंग से बातचीत हुई। यानी संगठनात्मक जिम्मेदारी खत्म हुई है, लेकिन पंजाब की राजनीति को लेकर उनकी भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
“अब कुछ दिन आराम चाहिए”
वड़िंग ने कहा कि उन्होंने साढ़े चार साल काम किया है और अब उन्हें कुछ दिन आराम करना चाहिए। इसी के साथ उन्होंने पार्टी के लिए उपलब्ध रहने की बात कही। प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए वड़िंग कांग्रेस के सबसे सक्रिय सार्वजनिक चेहरों में रहे। सरकार के खिलाफ मुद्दों से लेकर पार्टी के संगठनात्मक कार्यक्रमों तक उनकी भूमिका लगातार दिखाई देती रही। अब प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी उनके पास नहीं है और उनकी अगली सार्वजनिक भूमिका कांग्रेस के चुनावी कैंपेन में किस रूप में तय होती है, यही आगे की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
ब्रेक छोटा रहा तो बात अलग, लंबा हुआ तो सवाल बड़ा
वड़िंग के बयान में फिलहाल कांग्रेस से दूरी का संकेत नहीं है। उन्होंने नए प्रदेश अध्यक्ष के साथ काम करने और पार्टी को जरूरत पड़ने पर उपलब्ध रहने की बात कही है। लेकिन चुनाव से पहले संगठन में सक्रिय चेहरों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। वड़िंग के पास लुधियाना से सांसद होने के साथ पंजाब कांग्रेस को साढ़े चार साल तक चलाने का अनुभव और संगठनात्मक संपर्क हैं। ऐसे में अगर उनका ब्रेक छोटा रहता है और वह चुनावी कैंपेन में सक्रिय लौटते हैं तो तस्वीर अलग होगी। अगर उनकी सार्वजनिक सक्रियता लंबे समय तक कम रहती है तो कांग्रेस को उस राजनीतिक स्पेस का विकल्प तैयार करना होगा।
वड़िंग ने भविष्य को खुला छोड़ा
अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर वड़िंग ने कहा कि पॉलिटिक्स में आगे क्या होगा, यह निश्चित नहीं होता। उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी ने जब जरूरत थी तब उन्हें जिम्मेदारी दी और अब नेतृत्व किसी दूसरे व्यक्ति को मौका देना चाहता है तो वह इसे स्वीकार कर रहे हैं। यानी प्रदेश अध्यक्ष पद से हटने के बाद भी वड़िंग ने अपने अगले राजनीतिक कदम की कोई अंतिम तस्वीर नहीं दी है। उनकी मौजूदा भूमिका सांसद की है, जबकि पंजाब कांग्रेस में उनका संगठनात्मक प्रभाव भी बना हुआ है।
इस्तीफा किसका फैसला था?
वड़िंग का कहना है कि उनसे इस्तीफा नहीं मांगा गया और उन्होंने परिस्थितियों को भांपकर खुद कदम पीछे किया। उनका कहना है कि वह केंद्रीय नेतृत्व पर अतिरिक्त दबाव नहीं डालना चाहते थे। दूसरी तरफ कांग्रेस सूत्रों पर आधारित रिपोर्टों में कहा गया है कि हाईकमान ने उन्हें हटाने का फैसला किया था और इसके बाद इस्तीफे की प्रक्रिया हुई। सचिन पायलट के पंजाब प्रभारी बनने के बाद पार्टी के नेताओं और सांसदों से मिले फीडबैक को इस फैसले से जोड़ा गया है। दोनों तस्वीरें एक बात जरूर साफ करती हैं- कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन का फैसला अचानक पैदा हुई घटना नहीं था।
सचिन पायलट का नाम क्यों आया?
ड़िंग ने सचिन पायलट को लेकर कहा कि उन्हें लगा कि शायद पायलट उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाना चाहते थे। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास इसका ठोस प्रमाण नहीं है। पार्टी सूत्रों पर आधारित रिपोर्टों में हालांकि पायलट की ओर से तैयार संगठनात्मक रिपोर्ट और पंजाब कांग्रेस में जारी गुटबाजी के आकलन को नेतृत्व परिवर्तन से जोड़ा गया है। पायलट के सामने अब सिर्फ नया प्रदेश अध्यक्ष चुनने की जिम्मेदारी नहीं है। नए नेतृत्व के जरिए कांग्रेस के अलग-अलग पावर सेंटरों को एक चुनावी ढांचे में लाना भी उनकी बड़ी चुनौती होगी।
चन्नी खेमे की जीत का सवाल
वड़िंग के हटने की पृष्ठभूमि में चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व वाले समूह की ओर से लंबे समय से उठती रही आपत्तियां भी महत्वपूर्ण हैं। कांग्रेस के भीतर वड़िंग के कामकाज को लेकर असंतोष और उन्हें बदलने की मांग कई महीनों से सामने आती रही थी। वड़िंग ने शुक्रवार को अपने एक इंटरव्यू में यहां तक कहा कि चन्नी खेमे की जीत हुई है। उन्होंने चन्नी को बधाई भी दी, लेकिन साथ ही उनके प्रति सम्मान की बात कही। यह बयान पंजाब कांग्रेस के भीतर चल रहे पावर बैलेंस को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। अध्यक्ष बदल गया है, लेकिन जिन राजनीतिक समीकरणों के बीच बदलाव हुआ, वे अभी भी संगठन के भीतर मौजूद हैं।
अब नया अध्यक्ष सिर्फ चेहरा नहीं होगा
कांग्रेस के सामने अगला प्रदेश अध्यक्ष चुनना पहला काम है। उसके बाद असली चुनौती शुरू होगी। नए अध्यक्ष को वड़िंग के समर्थक नेताओं, चन्नी खेमे, प्रताप सिंह बाजवा, सुखजिंदर सिंह रंधावा और दूसरे वरिष्ठ नेताओं के बीच तालमेल बनाना होगा। साथ ही जिला इकाइयों और कार्यकर्ताओं को चुनावी कैंपेन के लिए एक दिशा में लगाना होगा। रिपोर्टों में विजय इंदर सिंगला समेत कई नामों की चर्चा है, लेकिन अंतिम फैसला कांग्रेस हाईकमान को करना है।
पंजाब में कांग्रेस के सामने समय भी कम है
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के पास संगठन को व्यवस्थित करने के लिए सीमित समय है। 2022 के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 117 में से 92 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस 18 सीटों पर रह गई थी। पांच साल बाद कांग्रेस के सामने सत्ता में वापसी का अभियान है, लेकिन उसके लिए पहले संगठन के भीतर की खींचतान को चुनावी मशीनरी में बदलना होगा। अध्यक्ष बदलना इस प्रक्रिया की शुरुआत है। असली परीक्षा उसके बाद होगी।
वड़िंग की राजनीतिक जगह कौन भरेगा?
वड़िंग के पास लुधियाना की लोकसभा सीट है। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उन्होंने पार्टी के जिला और विधानसभा स्तर के नेताओं के साथ लंबा समय बिताया है। अगर वह नए प्रदेश अध्यक्ष के साथ सक्रिय रूप से कैंपेन करते हैं तो उनकी भूमिका पुराने और नए नेतृत्व के बीच एक राजनीतिक पुल की हो सकती है। अगर वह कुछ समय के लिए पीछे रहते हैं तो कांग्रेस को अपने संगठन में उस जगह की भरपाई करनी होगी। यही वह बिंदु है जहां “आराम” सिर्फ निजी विराम नहीं रह जाता।
कांग्रेस के लिए असली डैमेज कंट्रोल
पंजाब कांग्रेस का डैमेज कंट्रोल सिर्फ वड़िंग को साथ रखने का मामला नहीं है। चुनौती यह है कि नेतृत्व परिवर्तन के बाद पार्टी के भीतर किसी नए धड़े या नई दूरी को जन्म लेने से रोका जाए। वड़िंग की सक्रियता, चन्नी की भूमिका, बाजवा और रंधावा जैसे वरिष्ठ नेताओं का इस्तेमाल और नए प्रदेश अध्यक्ष की स्वीकार्यता- इन सभी को एक ही चुनावी कमान में जोड़ना होगा। यही व्यवस्था आने वाले महीनों में बताएगी कि कांग्रेस का संगठन नेतृत्व परिवर्तन के बाद मजबूत हुआ या सिर्फ उसका चेहरा बदला।
वड़िंग ने दरवाजा बंद नहीं किया
राहुल गांधी से मुलाकात के बाद वड़िंग ने अपने नेता के प्रति सम्मान और पार्टी के साथ बने रहने की बात कही। उन्होंने कहा कि चुनाव राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा और नए प्रदेश अध्यक्ष के साथ भी वह काम करेंगे। इसलिए फिलहाल तस्वीर किसी खुले टकराव की नहीं है। लेकिन वड़िंग ने यह भी संकेत दिया है कि राजनीति में आगे की भूमिका को लेकर कोई अंतिम रेखा तय नहीं है। उनका “ब्रेक” कितना लंबा रहता है, वह कितनी जल्दी चुनावी कैंपेन में लौटते हैं और नया प्रदेश नेतृत्व उन्हें किस भूमिका में रखता है- इन तीनों सवालों के जवाब कांग्रेस की अगली रणनीति को प्रभावित करेंगे।
अब असली सवाल कुर्सी का नहीं, कैंपेन का है
राजा वड़िंग ने प्रदेश कांग्रेस की कुर्सी छोड़ दी है। कांग्रेस नया अध्यक्ष चुन लेगी। संगठन में नए समीकरण भी बनेंगे। लेकिन चुनावी राजनीति में पुराने समीकरण सिर्फ पद बदलने से खत्म नहीं होते। वड़िंग अगर सक्रिय रहते हैं तो नए नेतृत्व के साथ उनका तालमेल कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण होगा। अगर “आराम” लंबा होता है और उनकी सार्वजनिक सक्रियता घटती है, तो 2027 के कैंपेन में उनके हिस्से की राजनीतिक जगह कौन भरेगा- यही कांग्रेस के लिए असली डैमेज कंट्रोल का सवाल होगा। क्योंकि वड़िंग ने फिलहाल कांग्रेस से दूरी नहीं बनाई है; उन्होंने सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी छोड़ी है। अब पंजाब कांग्रेस की अगली परीक्षा यह होगी कि इस बदलाव को संगठन की कमजोरी बनने से रोककर चुनावी ताकत में कैसे बदला जाता है।

