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कैप्टन ने BJP को आईना दिखाया?

‘दिमागी नक्सल’ की सीमा पूछकर किसान-युवा की राजनीति को छुआ; 2027 से पहले पंजाब में संदेश के मायने गहरे!

आरके सेठी
चंडीगढ़, 4 सितम्बर।

BJP में फिलहाल वरिष्ठ नेता के तौर पर सक्रिय कैप्टन अमरिंदर सिंह पंजाब की सियासत का ऐसा नाम हैं, जिनका राजनीतिक वजन सिर्फ दो बार मुख्यमंत्री रहने तक सीमित नहीं है। कांग्रेस में लंबी राजनीतिक पारी, पार्टी नेतृत्व से टकराव और फिर BJP में आने तक कैप्टन ने कई ऐसे फैसले लिए, जिन पर अपने स्टैंड पर कायम रहने की उनकी छवि बनी। ऐसे में BJP में रहते हुए अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ जैसे संवेदनशील राजनीतिक शब्द की सीमा पर सवाल उठाना अपने आप में बड़ा संकेत है।

और यह सवाल पंजाब के लिए खास मायने रखता है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले BJP राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन बढ़ाने की कोशिश कर रही है। किसान, युवा और सरकार से असहमति पंजाब की राजनीति के बेहद संवेदनशील मुद्दे हैं। ऐसे में कैप्टन का सवाल BJP की राष्ट्रीय राजनीतिक भाषा और पंजाब के राजनीतिक मिजाज के बीच एक अहम दूरी को सामने लाता है।

कैप्टन ने सवाल उठाया, लेकिन निशाना नक्सलवाद नहीं है

कैप्टन ने अपने लेख की शुरुआत ही इस लाइन से की-“Let’s not be too casual about the Naxal label.” उनका कहना है कि हिंसक नक्सली नेटवर्क, उनकी फंडिंग, भर्ती, पनाह और मदद करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन इसी के साथ उन्होंने ‘दिमागी नक्सल’ जैसे राजनीतिक लेबल की सीमा तय करने की जरूरत बताई है। उनके मुताबिक “Dimagi Naxal” is a political expression, not a legal category. यानी किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी उसके वास्तविक आचरण, इरादे, साजिश, हिंसा के लिए उकसाने या जानबूझकर सहायता देने जैसे आधार पर तय होनी चाहिए, केवल उसके विचार या सरकार की आलोचना के आधार पर नहीं।

किसान और युवा का उदाहरण देकर कैप्टन ने बहस को पंजाब तक पहुंचा दिया

कैप्टन ने अपनी बात को सीधे छात्र, युवा, किसान और पत्रकार के उदाहरणों से जोड़ा। उन्होंने लिखा- “A student protesting an examination, a college graduate demanding jobs, a farmer questioning policy, a tribal activist opposing displacement, or a journalist scrutinising a security operation does not become an extremist merely because the criticism is inconvenient.”
इसके बाद उन्होंने एक और सीधी लाइन लिखी- “But dissent alone cannot make loyalty to India suspect.” यानी सरकार से असहमति को देश के प्रति निष्ठा पर सवाल में बदलना उचित नहीं। पंजाब में यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसान आंदोलन, युवाओं के सवाल और सरकार की नीतियों के खिलाफ विरोध यहां सिर्फ सामाजिक मुद्दे नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति के भी बड़े कारक रहे हैं।

मोदी के शब्दों पर कैप्टन की चिंता असल में राजनीतिक लेबल को लेकर है

कैप्टन ने लिखा- “Once repeated by parties, television studios and social media, their boundaries can expand quickly. That is why clarity matters.” यही इस पूरे लेख का सबसे अहम राजनीतिक संकेत है। चिंता यह है कि किसी एक संदर्भ में इस्तेमाल हुआ राजनीतिक शब्द बाद में इतना व्यापक न हो जाए कि सरकार के तीखे आलोचक, प्रदर्शनकारी या असहमति रखने वाले लोग भी उसी दायरे में आने लगें।

लाल किले से निकले शब्दों की ताकत भी कैप्टन ने याद दिलाई

कैप्टन ने प्रधानमंत्री के पद और लाल किले से दिए गए संदेश की गंभीरता पर जोर देते हुए लिखा- “Words spoken from the Red Fort carry exceptional authority.”
इसके बाद उनका सवाल है कि यदि सरकार किसी वर्ग की पहचान कर उसे अलग-थलग करने की बात करती है तो नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि वैध असहमति और उस राजनीतिक श्रेणी के बीच सीमा आखिर कहां है।
कैप्टन ने इसी संदर्भ में लिखा- “If the expression refers to those knowingly enabling Maoist violence, the distinction should be stated clearly, and the law applied firmly.”

BNS की धारा 152 का हवाला देकर कैप्टन ने कानूनी सीमा भी बताई

कैप्टन ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 का उल्लेख करते हुए वैध असहमति और ऐसे कृत्यों के बीच फर्क रखा है जो भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालते हैं। उनका तर्क है कि सरकार के किसी कदम से असहमति जताना और हिंसक गतिविधियों को जानबूझकर सक्षम करना एक बात नहीं है।
इसी फर्क को उन्होंने बेहद साफ शब्दों में लिखा- “The dividing line is not left versus right, government versus Opposition, or nationalist versus critic. It is between lawful dissent and conduct that knowingly enables violence.”

BJP के भीतर से उठी यह आवाज इसलिए राजनीतिक है

कैप्टन BJP से बाहर खड़े होकर यह सवाल नहीं उठा रहे। वह उसी पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं, जिसकी केंद्र सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद को अपनी राजनीति के महत्वपूर्ण आधारों में रखती है। इसलिए उनका सवाल सीधे पार्टी की नीति पर हमला भले न हो, लेकिन उस नीति की राजनीतिक भाषा की सीमा जरूर तय करता है। कैप्टन का संदेश साफ है- राष्ट्रीय सुरक्षा पर सख्ती हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक असहमति की जगह खत्म नहीं होनी चाहिए।

पंजाब में BJP के लिए असली चुनौती यहीं है

BJP 2027 में पंजाब में अपना आधार बढ़ाना चाहती है। उसके सामने एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद की अपनी मजबूत राजनीतिक पहचान है, दूसरी तरफ पंजाब का वह मतदाता है जिसने किसान आंदोलन, रोजगार, केंद्र की नीतियों और राजनीतिक असहमति को बेहद गंभीरता से लिया है। यही वह जगह है जहां कैप्टन की टिप्पणी का चुनावी महत्व बढ़ जाता है। क्या पंजाब में BJP अपनी राष्ट्रीय लाइन को उसी तीखेपन के साथ रखेगी, या कैप्टन जैसे नेता के जरिए उसे पंजाब के राजनीतिक मिजाज के मुताबिक एक अलग भाषा भी मिलेगी?

क्या कैप्टन BJP में इसी पुल की भूमिका निभा रहे हैं?

कैप्टन की राजनीतिक पृष्ठभूमि उन्हें इस बहस में खास बनाती है। वह पंजाब की सत्ता और विपक्ष दोनों को लंबे समय तक देख चुके हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा के सवालों पर भी उनकी स्पष्ट राजनीतिक पहचान रही है। अब BJP में रहते हुए उनका किसान, युवा और लोकतांत्रिक असहमति को लेकर यह हस्तक्षेप एक अलग भूमिका की संभावना पैदा करता है। क्या कैप्टन BJP की राष्ट्रीय राजनीति और पंजाब की आंदोलनकारी राजनीतिक जमीन के बीच पुल बनने की भूमिका निभा सकते हैं? 2027 से पहले यह सवाल उनकी टिप्पणी से कहीं ज्यादा बड़ा है।

कैप्टन ने सवाल उठाया है, अब BJP के जवाब की बारी है

कैप्टन ने बहस को मोदी विरोध तक सीमित नहीं किया। उन्होंने नक्सली हिंसा के खिलाफ सख्ती का समर्थन करते हुए सिर्फ इतना पूछा है कि ‘दिमागी नक्सल’ की लक्ष्मण रेखा कहां है। और पंजाब के चुनावी मैदान में यही सवाल महत्वपूर्ण है- क्या सरकार की आलोचना करने वाला किसान, रोजगार मांगने वाला युवा या विरोध करने वाला छात्र सिर्फ इसलिए संदिग्ध हो जाएगा क्योंकि उसकी आवाज सत्ता को असहज करती है?
कैप्टन ने यह सवाल BJP के भीतर से उठाया है। अब 2027 से पहले देखना यही है कि पंजाब की राजनीति में इस सवाल का जवाब कौन और किस भाषा में देता है।

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