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भगवंत मान सरकार के खिलाफ लाखों कर्मचारी!

पंजाब में कल का ‘महाबंद’ क्या 2027 के चुनाव में AAP सरकार के लिए खतरे का संकेत है?

आरके सेठी
चंडीगढ़, 26 अगस्त.
चुनाव सिर पर और लाखों कर्मचारी भगवंत सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरने को तैयार! जाहिर है, ये हालात सरकार की सेहत के लिए ठीक तो नहीं. एक तरफ सरकार हाईकोर्ट के ऑर्डर के बावजूद कर्मचारियों को पूरा बकाया दे नहीं पा रही है और दूसरी तरफ खबरें सामने आ रही हैं कि सरकार दो हजार करोड़ का कर्ज और लेने की तैयारी कर रही है. पंजाब का कर्ज मार्च तक चार लाख करोड़ पार कर चुका था. इसके बाद अप्रैल से अगस्त के बीच करीब 98,00 करोड़ रुपये की नई बाजार उधारी का सिलसिला सामने आया, जिसमें अब प्रस्तावित दो हजार करोड़ की उधारी भी शामिल है. कर्ज में डूबी सरकार और लाखों कर्मचारी खिलाफ- भगवंत मान की सरकार फिक्रमंद तो जरूर होगी!

पंजाब के करीब सात लाख कर्मचारी और पेंशनर्स 27 अगस्त को महाबंद की तैयारी में हैं. लंबित डीए, पुरानी पेंशन स्कीम, पे-कमीशन के बकाये, एसीपी और कांट्रैक्चुअल कर्मचारियों को नियमित करने जैसी मांगों ने सरकार के खिलाफ असंतोष को सड़क तक पहुंचा दिया है. इसी बीच राज्य की वित्तीय तस्वीर भी सरकार के लिए राहत देने वाली नहीं है. AAP सरकार के सत्ता संभालने के बाद पंजाब का सार्वजनिक कर्ज लगातार बढ़ा है और अब करीब दो हजार करोड़ की एक और नई उधारी की खबर सामने आई है. सवाल इसलिए सिर्फ कर्मचारियों के बकाये का नहीं है. सवाल यह भी है कि बढ़ते कर्ज के बीच सरकार की वित्तीय प्राथमिकताएं क्या हैं.

मामला अब सिर्फ महंगाई भत्ते का नहीं रह गया है. यह भगवंत मान सरकार और उसके कर्मचारी-पेंशनर वर्ग के बीच बनते जा रहे भरोसे के संकट का मामला है. 27 अगस्त का महाबंद इसी संकट की अगली बड़ी परीक्षा है. कर्मचारी संगठनों ने लंबित 18 फीसदी डीए, पुरानी पेंशन स्कीम की बहाली, 4-9-14 एसीपी, कांट्रैक्चुअल कर्मचारियों को नियमित करने और वेतन से जुड़े दूसरे बकायों समेत कई मांगों को लेकर राज्यव्यापी आंदोलन का ऐलान किया है. 7 अगस्त को चंडीगढ़ में कर्मचारी और पेंशनर्स बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे थे और विधानसभा की ओर बढ़ने की कोशिश के दौरान पुलिस ने वाटर कैनन का इस्तेमाल किया था. इसके बाद 27 अगस्त के महाबंद का ऐलान किया गया.

सात लाख का कर्मचारी-पेंशनर वर्ग, सामने चुनावी साल

पंजाब में करीब सात लाख सरकारी कर्मचारी और पेंशनर इस पूरे विवाद से प्रभावित हैं. यही वह संख्या है जो इस आंदोलन को सामान्य कर्मचारी आंदोलन से अलग बनाती है. कर्मचारी संगठनों की लामबंदी को सिर्फ सरकारी दफ्तरों की नाराजगी मानना बड़ी राजनीतिक भूल होगी. कर्मचारी पंजाब के लगभग हर जिले, शहर, कस्बे और गांव में मौजूद हैं. उनके परिवार हैं, सामाजिक संपर्क हैं और स्थानीय स्तर पर प्रभाव है. पेंशनर्स का अपना नेटवर्क है. ऐसे में कर्मचारी असंतोष का राजनीतिक असर उनकी संख्या से कहीं आगे जा सकता है.
सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच टकराव गंभीर स्तर तक पहुंच चुका है. जब कर्मचारी अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरें, विधानसभा की ओर मार्च करें और फिर राज्यव्यापी महाबंद का ऐलान करें, तो इसे महज वेतन संबंधी विवाद मानकर आगे बढ़ जाना सरकार के लिए राजनीतिक जोखिम को नजरअंदाज करना होगा.

हाईकोर्ट का आदेश, फिर भी बकाये का सवाल कायम

इस पूरे विवाद में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का 3 अगस्त का आदेश निर्णायक मोड़ है. हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार और PSPCL को कर्मचारियों और पेंशनर्स के लंबित डीए/डीआर बकाये को तय समयसीमा में जारी करने का निर्देश दिया था. अदालत के आदेश में करीब 14 हजार 191 करोड़ की वित्तीय देनदारी का उल्लेख है. अदालत ने भुगतान में चूक की स्थिति में 6 फीसदी सालाना ब्याज की बात कही और बकाया साफ होने तक सरकार के गैर-जरूरी विज्ञापन खर्च पर भी रोक लगाई. हालांकि, कोर्ट के तीन अगस्त के आदेश की समयसीमा ख़त्म हो चुकी है और 21 अगस्त को अनुपालना न होने पर अवमानना याचिका भी दाखिल हो चुकी है.
सरकार की ओर से इस मामले में वित्तीय बोझ और पिछली सरकारों से चली आ रही देनदारियों का हवाला दिया गया है. वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा है कि सरकार ने पहले से स्वीकृत लिक्विडेशन प्लान के तहत करीब 6,000 करोड़ की देनदारी चुका दी है और बाकी भुगतान को लेकर कानूनी विकल्पों पर विचार किया जा रहा है. सरकार का तर्क अपनी जगह है, लेकिन कर्मचारी संगठनों के लिए सवाल सीधा है- उनका बाकी बकाया कब मिलेगा? यही सवाल अब राजनीतिक बन गया है.

पहले भारी कर्ज, अब 2,000 करोड़ और उधार

पंजाब की वित्तीय स्थिति इस पूरे विवाद को और गंभीर बना देती है. AAP सरकार के सत्ता संभालने के बाद राज्य के कर्ज में लगातार बढ़ोतरी हुई है. 2025-26 की शुरुआत तक राज्य का बकाया कर्ज 4 लाख करोड़ के आसपास पहुंच चुका था और मार्च 2026 तक इसके और बढ़ने का अनुमान सामने आया. मई 2026 में पंजाब सरकार ने 2,500 करोड़ की ताजा उधारी की थी, जो उससे पहले अप्रैल में उठाए गए 2,800 करोड़ के कर्ज के बाद आई थी. अब 26 अगस्त को करीब 2,000 करोड़ की एक और नई उधारी की खबर सामने आई है.
यानी तस्वीर सिर्फ एक नई कर्ज की किश्त की नहीं है. पिछले कुछ महीनों में लगातार नई बाजार उधारी सामने आई है और राज्य का कर्ज AAP सरकार के कार्यकाल में काफी ऊपर पहुंच चुका है. अब सवाल और सीधा है. एक तरफ करीब 14,191 करोड़ के लंबित डीए/डीआर का मामला अदालत तक पहुंच चुका है. दूसरी तरफ राज्य सरकार नई उधारी कर रही है. और इसी बीच कर्मचारी अपने बकाये और दूसरी मांगों के लिए सड़क पर हैं.
सरकार की इस नई उधारी की रकम किस मद में इस्तेमाल होगी, इसका विस्तृत ब्योरा अभी सार्वजनिक नहीं किया है. लेकिन राजनीतिक सवाल इससे खत्म नहीं होता. सवाल यह है कि जब राज्य पहले से भारी कर्ज के दबाव में है और कर्मचारियों के हजारों करोड़ रुपये के बकाये का विवाद अदालत तक पहुंच चुका है, तब सरकार अपनी वित्तीय प्राथमिकताएं किस तरह तय कर रही है. यही सवाल 2027 में विपक्ष के लिए एक बड़ा चुनावी हथियार बन सकता है.

कर्ज का दबाव और सीमित वित्तीय गुंजाइश

2026-27 के पंजाब बजट की तस्वीर भी राज्य की वित्तीय चुनौती दिखाती है. बजट विश्लेषण के मुताबिक राज्य ने 2026-27 में 21,955 करोड़ का राजस्व घाटा अनुमानित किया है, जबकि राजकोषीय घाटा 39,971 करोड़ रहने का अनुमान है. इसी वित्तीय वर्ष में राज्य को कर्ज अदायगी के अलावा अपने खर्च पूरे करने के लिए 38,471 करोड़ की नेट उधारी पर निर्भर रहना है.
यानी सरकार के सामने एक तरफ वेतन, पेंशन, विकास योजनाओं और दूसरी प्रतिबद्धताओं का खर्च है, दूसरी तरफ पुराने कर्ज और ब्याज का बोझ. इसी दबाव के बीच कर्मचारी अपने बकाये के लिए आंदोलन कर रहे हैं और नई उधारी भी जारी है. कर्मचारियों का सवाल है- हमारा बकाया कब मिलेगा? सरकार का सवाल है- इतने बड़े वित्तीय बोझ को एक साथ कैसे उठाया जाए? और विपक्ष का सवाल है- अगर वित्तीय गुंजाइश इतनी सीमित है तो नई उधारी का बोझ क्यों बढ़ रहा है और अगर उधारी की गुंजाइश है तो कर्मचारियों के बकाये का समाधान क्यों नहीं? यही तीन सवाल अब पंजाब की राजनीति में आमने-सामने खड़े हैं.

7 अगस्त ने दे दिया था खतरे का संकेत

27 अगस्त का महाबंद अचानक पैदा हुआ आंदोलन नहीं है. 7 अगस्त को चंडीगढ़ में कर्मचारी और पेंशनर्स बड़ी संख्या में जुटे थे. प्रदर्शनकारियों ने विधानसभा की ओर बढ़ने की कोशिश की और पुलिस ने वाटर कैनन का इस्तेमाल किया. कर्मचारी संगठनों ने उसी समय चेतावनी दी थी कि मांगों का समाधान नहीं हुआ तो 27 अगस्त को राज्यव्यापी महाबंद किया जाएगा.
इस घटना ने साफ कर दिया था कि विवाद अब सरकारी बैठकों और ज्ञापनों तक सीमित नहीं है. कर्मचारी संगठन सरकार पर सीधे दबाव बनाने की रणनीति पर आ चुके हैं. अब 27 अगस्त को उसी आंदोलन की अगली परीक्षा है.

सरकार के सामने दोहरा संकट

भगवंत मान सरकार की मुश्किल यह है कि उसके सामने कोई आसान विकल्प नहीं है. कर्मचारियों की मांगों पर बड़ा भुगतान करने का मतलब खजाने पर अतिरिक्त दबाव है. मांगों को टालने का मतलब आंदोलन को और लंबा खिंचने देना है. बातचीत से समाधान निकलता है तो सरकार को राहत मिल सकती है, लेकिन अगर बातचीत सिर्फ आश्वासन तक सीमित रही तो कर्मचारी आंदोलन और मजबूत हो सकता है.
यही कारण है कि 27 अगस्त को होने वाला महाबंद सिर्फ सरकारी कामकाज प्रभावित करने वाला आंदोलन नहीं है. यह सरकार के लिए राजनीतिक तापमान मापने का दिन भी है.
अगर कर्मचारी और पेंशनर्स बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरते हैं, सरकारी विभागों में कामकाज प्रभावित होता है और आंदोलन के साथ ज्यादा से ज्यादा कर्मचारी संगठन जुड़ते हैं, तो AAP सरकार के खिलाफ कर्मचारी असंतोष का नैरेटिव और मजबूत होगा.

विपक्ष ने पकड़ लिया कर्मचारी असंतोष का मुद्दा

कर्मचारी आंदोलन को कांग्रेस, BJP और अकाली दल समेत विपक्षी दलों का समर्थन मिलना भी सरकार के लिए महत्वपूर्ण है. अब यह विवाद सरकार और कर्मचारियों के बीच बातचीत तक सीमित नहीं है. विपक्ष इसे AAP सरकार की वित्तीय प्राथमिकताओं, कर्मचारी नीति और शासन की क्षमता से जोड़कर चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है.
अकाली दल ने 2,000 करोड़ की नई उधारी पर भी सरकार को घेरा है. कांग्रेस और BJP कर्मचारी बकाये और आंदोलन को सरकार की कथित विफलता से जोड़ रहे हैं. इस तरह दो अलग-अलग मुद्दे एक ही राजनीतिक नैरेटिव में जुड़ रहे हैं- कर्मचारी अपने बकाये के लिए सड़क पर हैं और सरकार नई उधारी कर रही है. यही वह नैरेटिव है जिसे विपक्ष 2027 तक खींचना चाहेगा. सरकार के लिए इसका जवाब आसान नहीं होगा.

क्या कर्मचारी AAP से छिटक रहे हैं?

यह कहना अभी भी जल्दबाजी होगी कि लाखों कर्मचारी AAP से राजनीतिक रूप से छिटक चुके हैं. लेकिन यह कहना पूरी तरह उचित है कि AAP सरकार और कर्मचारी-पेंशनर वर्ग के बीच राजनीतिक दूरी बढ़ रही है. कर्मचारी संगठनों के आंदोलन ने सरकार के सामने लंबित वादों और बकायों का सवाल खड़ा कर दिया है. 2022 में AAP बदलाव और आम आदमी की सरकार के वादे के साथ पंजाब में सत्ता में आई थी. 2027 में अगर उसी सरकार के कार्यकाल के आखिरी चरण में कर्मचारी-पेंशनर वर्ग उसके खिलाफ सबसे बड़े संगठित आंदोलनों में से एक खड़ा करता है, तो यह अपने आप में राजनीतिक संकेत है. और अगर कर्मचारी असंतोष आने वाले महीनों में दूसरे असंतुष्ट वर्गों से जुड़ता है, तो इसका असर और बड़ा हो सकता है.

असली परीक्षा 27 अगस्त नहीं, उसके बाद होगी

27 अगस्त का महाबंद बड़ा है, लेकिन इसकी असली राजनीतिक अहमियत उसके बाद तय होगी. अगर सरकार बातचीत के जरिए कर्मचारियों को ठोस आश्वासन देती है, भुगतान की स्पष्ट राह बनाती है और लंबित मुद्दों पर समयबद्ध समाधान निकालती है, तो नुकसान को नियंत्रित किया जा सकता है. लेकिन अगर महाबंद के बाद भी वही मुद्दे कायम रहते हैं, कर्मचारी संगठन दोबारा सड़क पर उतरते हैं और सरकार के खिलाफ नाराजगी लगातार बढ़ती है, तो कर्मचारी-पेंशनर असंतोष 2027 के चुनाव का बड़ा मुद्दा बन सकता है.

तब नई उधारी भी इसी बहस का हिस्सा बनेगी

14,191 करोड़ का लंबित डीए/डीआर बकाया. पिछले महीनों में हजारों करोड़ की नई उधारी. अब 2,000 करोड़ और. करीब सात लाख कर्मचारी-पेंशनर वर्ग. और सामने 2027 का चुनाव. इन आंकड़ों को अलग-अलग देखने से तस्वीर अधूरी रहती है. एक साथ देखने पर पंजाब की मौजूदा राजनीति का बड़ा सवाल सामने आता है- बढ़ते कर्ज, भारी वित्तीय दबाव और चुनाव से कुछ महीने पहले भगवंत मान सरकार कर्मचारी-पेंशनर वर्ग का भरोसा कैसे वापस हासिल करेगी? 27 अगस्त को पंजाब की सड़कों पर इसका पहला बड़ा संकेत मिलेगा. अगर महाबंद उम्मीद से बड़ा हुआ, तो यह सिर्फ कर्मचारियों की ताकत का प्रदर्शन नहीं होगा. यह भगवंत मान सरकार के लिए 2027 का बड़ा राजनीतिक अलार्म होगा.

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