HomePunjab“महाबंद” के प्रेशर में नहीं आई सरकार, CM ने बात करने से...

“महाबंद” के प्रेशर में नहीं आई सरकार, CM ने बात करने से ही कर दिया इनकार!

सीएम भगवंत मान ने कहा- “गल्लबात ते हड़ताल दोवें इकट्ठियां नहीं चल सकदियां”

दबाव के सामने सरकार की सख्ती, लेकिन जालंधर में भड़का कर्मचारियों का गुस्सा. क्या भगवंत मान का यह दांव 2027 से पहले AAP के लिए राजनीतिक जोखिम बन सकता है?

आरके सेठी
चंडीगढ़, 27 अगस्त.

पंजाब में सरकारी कर्मचारियों के “महाबंद” के दबाव में मुख्यमंत्री भगवंत मान सरकार ने झुकने के बजाय बातचीत की शर्त ही बदल दी. जिस बैठक के लिए कर्मचारी प्रतिनिधियों को खुद सरकार ने बुलाया था, उसी बैठक से ठीक पहले मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया कि हड़ताल और बातचीत एक साथ नहीं चल सकतीं. मुख्यमंत्री का कहना था, “मुलाजम साडे परिवार दा अहम हिस्सा ने… पर गल्लबात ते हड़ताल दोवें इकट्ठियां नहीं चल सकदियां… गल्लबात उदों ही होवेगी जदों हड़ताल खत्म कीती जावेगी.” यानी कर्मचारी पहले हड़ताल खत्म करें, उसके बाद सरकार बातचीत करेगी. नतीजा यह हुआ कि प्रस्तावित बैठक नहीं हो सकी, कर्मचारी भड़क गए और जालंधर में मामला पुलिस के साथ टकराव तक पहुंच गया. अब सवाल सिर्फ कर्मचारियों की मांगों का नहीं है. सवाल यह है कि महाबंद के दबाव के सामने सख्ती दिखाने का भगवंत मान सरकार का दांव राजनीतिक रूप से कितना महंगा पड़ सकता है?

बातचीत की मेज से टकराव की सड़क तक

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए एक दिन पीछे जाना जरूरी है. 26 अगस्त को वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कर्मचारी संगठनों के साथ करीब तीन घंटे बैठक की थी. सरकार की ओर से जारी जानकारी में चीमा ने कहा था कि भगवंत मान सरकार कर्मचारियों की मांगों के प्रति “डीपली सिम्पेथेटिक” है और कई प्रमुख मांगों पर कार्रवाई पहले से प्रक्रिया में है. विभागों को मांगों पर तेजी से काम करने के निर्देश भी दिए गए थे. इसके बाद 27 अगस्त को मुख्यमंत्री के साथ बैठक से उम्मीद बनी थी कि कोई रास्ता निकलेगा. लेकिन अगले ही दिन मुख्यमंत्री ने हड़ताल खत्म किए बिना बातचीत से इनकार कर दिया. यही वह बिंदु है जहां सरकार का संदेश बदलता हुआ दिखाई देता है- चीमा की बातचीत वाला नरम रुख और मुख्यमंत्री का शर्त वाला सख्त रुख, दोनों एक ही समय में सरकार की रणनीति का हिस्सा बन गए.

सरकार का नजरिया : दबाव में बातचीत नहीं

भगवंत मान के रुख को सिर्फ कर्मचारियों की अनदेखी के तौर पर देखना भी पूरी तस्वीर नहीं होगी. सरकार के लिए यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि अगर कोई संगठन हड़ताल करके बातचीत की मेज पर आता है और सरकार उसी दबाव में शर्तें मान लेती है, तो आगे हर बड़ा कर्मचारी संगठन इसी रास्ते को अपना सकता है. मुख्यमंत्री शायद यह संदेश देना चाहते हैं कि सरकार बातचीत से भाग नहीं रही, लेकिन सरकार को हड़ताल के दबाव में बातचीत के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. यही वजह है कि उन्होंने एक तरफ कर्मचारियों को “परिवार का अहम हिस्सा” बताया और दूसरी तरफ बातचीत की पूर्व शर्त हड़ताल खत्म करना रख दी. राजनीतिक भाषा में यह स्पष्ट रूप से एक अग्रेसिव और कंट्रोल बनाए रखने वाली रणनीति है.

लेकिन कर्मचारियों ने इसे क्या माना?

कर्मचारियों के लिए कहानी बिल्कुल दूसरी है. उनके प्रतिनिधि पहले से तय बैठक के लिए जालंधर पहुंचे थे. कर्मचारी पक्ष को लगा कि जब बैठक सरकार ने बुलाई है, तो बातचीत के लिए पहुंचने के बाद शर्त बदलना “गोलपोस्ट बदलने” जैसा है. इसी नाराजगी ने जालंधर में आंदोलन को अचानक ज्यादा उग्र रूप दे दिया. कर्मचारी नेताओं ने मुख्यमंत्री से सीधे बातचीत की मांग की और सरकार के इस रुख के खिलाफ सड़क पर उतरने का ऐलान कर दिया.

जालंधर में गुस्सा सड़क पर उतरा

सुबह कर्मचारी डीसी कार्यालय परिसर में जुटे थे. मुख्यमंत्री से मिलने के लिए प्रतिनिधिमंडल अलग गया था और बाकी कर्मचारी परिणाम का इंतजार कर रहे थे. जैसे ही मुख्यमंत्री की बातचीत से इनकार वाली पोस्ट सामने आई, माहौल बदल गया. सरकार के खिलाफ नारे लगे, कर्मचारियों ने बीएमसी चौक को अनिश्चितकाल के लिए ब्लॉक करने का आह्वान किया और बाहर निकलने की कोशिश की. पुलिस ने मुख्य गेट बंद कर दिए और बैरिकेडिंग की. स्थिति यहां तक पहुंची कि कुछ कर्मचारियों ने परिसर की दीवारें फांदकर बाहर निकलने की कोशिश की. पुलिस ने उन्हें करीब 50 मीटर आगे रोक दिया.

मुख्यमंत्री से सीधा टकराव टला, लेकिन तनाव बढ़ गया

स्थिति बिगड़ने के बीच मुख्यमंत्री को पीएपी चौक से ओल्ड बारादरी स्थित अपने आवास की ओर ले जाया गया. कर्मचारी प्रतिनिधि पीएपी परिसर में ही बातचीत की मांग करते रहे. पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव के बीच कर्मचारी नेताओं की गतिविधियों पर भी पुलिस की नजर रही. बाद में पुलिस की ओर से कहा गया कि मुख्यमंत्री ने बातचीत अगले सप्ताह तक टालने की बात कही है, लेकिन कर्मचारी प्रतिनिधियों ने वित्त मंत्री हरपाल चीमा या वित्त सचिव के साथ बातचीत करने से इनकार कर दिया.

महाबंद कितना असरदार रहा?

बंद का असर सिर्फ नारों और रैलियों तक सीमित नहीं रहा. चार लाख से ज्यादा सरकारी कर्मचारियों और लाखों पेंशनरों की भागीदारी का उल्लेख किया गया है, जबकि कुछ रिपोर्टों में तीन लाख से ज्यादा कर्मचारियों के सामूहिक आकस्मिक अवकाश और चार लाख से ज्यादा पेंशनरों के आंदोलन में शामिल होने की बात सामने आई है. यानी आंकड़ों में अंतर है, लेकिन तस्वीर साफ है- सरकारी मशीनरी का बड़ा हिस्सा आज आंदोलन के साथ खड़ा दिखाई दिया. जिला, तहसील और ब्लॉक स्तर के कार्यालयों में कामकाज प्रभावित हुआ और कई जगह सरकारी परिसरों में कर्मचारी धरने पर बैठे.

अस्पतालों तक पहुंचा आंदोलन

पंजाब के सरकारी अस्पतालों में ओपीडी सेवाएं प्रभावित हुईं. अमृतसर के सरकारी मेडिकल कॉलेज से जुड़े कर्मचारी नेताओं ने भी ओपीडी सेवाओं पर असर की पुष्टि की. सरकारी ओपीडी और ओओएटी क्लीनिकों के बंद रहने की स्थिति बनी. यानी महाबंद का असर सरकारी दफ्तरों से निकलकर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच गया, और यही वह बिंदु है जहां कर्मचारी आंदोलन सरकार के लिए प्रशासनिक समस्या से बढ़कर जनसेवा और राजनीतिक जवाबदेही का सवाल बन जाता है. लेकिन एक फर्क भी समझना जरूरी है. कर्मचारी संगठनों ने यह आंदोलन आम पंजाब बंद के रूप में नहीं रखा था. उनकी घोषणा थी कि सरकारी कर्मचारी सामूहिक अवकाश लेकर सरकारी संस्थानों में कामकाज प्रभावित करेंगे, जबकि निजी बाजार, सड़कें और सामान्य कारोबारी गतिविधियां बंद नहीं की जाएंगी. यानी आंदोलन का निशाना आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था और सरकार पर राजनीतिक दबाव था.

मुद्दा सिर्फ डीए का नहीं है

लंबित महंगाई भत्ते की किस्तें इस आंदोलन का सबसे बड़ा तत्काल मुद्दा हैं, लेकिन इसके साथ पुरानी पेंशन योजना की बहाली, वेतन और सेवा संबंधी दूसरे मुद्दे भी जुड़े हैं. पंजाब के कर्मचारी केंद्र के कर्मचारियों की तुलना में कम डीए पाने का मुद्दा उठा रहे हैं. कर्मचारियों का दावा है कि कई छमाही किस्तों का अंतर बन चुका है. दूसरी तरफ 3 अगस्त को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने लंबित डीए देने का निर्देश दिया था, जिसे राज्य सरकार ने डिवीजन बेंच में चुनौती दी. इसलिए आंदोलन को केवल “वेतन बढ़ाने की मांग” कहकर खारिज करना राजनीतिक रूप से आसान नहीं होगा.

यहीं सरकार की मुश्किल शुरू होती है

अगर मुद्दा सिर्फ कर्मचारियों की मांग होता, तो सरकार इसे प्रशासनिक स्तर पर संभाल सकती थी. लेकिन अब इसके तीन राजनीतिक आयाम बन चुके हैं- हाईकोर्ट का आदेश, कर्मचारियों का बड़ा संगठित आंदोलन और विपक्ष का खुला समर्थन. कांग्रेस, बीजेपी और अकाली दल पहले ही इस आंदोलन के समर्थन में आ चुके हैं. यानी कर्मचारी आंदोलन अब सरकार के खिलाफ राजनीतिक विपक्ष के लिए भी एक तैयार मुद्दा बन गया है.

कांग्रेस का हमला

नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने इस आंदोलन को AAP सरकार के खिलाफ कर्मचारियों की बढ़ती निराशा बताया. उनका राजनीतिक तर्क बेहद सीधा है- जब भगवंत मान पहली बार मुख्यमंत्री बनकर सिविल सचिवालय पहुंचे थे, तब कर्मचारियों ने उनका स्वागत फूलों से किया था, और आज वही कर्मचारी अपने अधिकारों के लिए सड़क और अदालत दोनों का रास्ता अपना रहे हैं. बाजवा ने ओल्ड पेंशन स्कीम का भी मुद्दा उठाया और कहा कि 2022 में इसकी बहाली का नोटिफिकेशन होने के बावजूद इसे लागू नहीं किया गया. यह बयान सिर्फ कर्मचारी मुद्दे पर हमला नहीं है; कांग्रेस इसे “वादा बनाम अमल” की चुनावी कहानी में बदलना चाहती है.

बीजेपी ने भी तेवर और तेज कर दिए

बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने सीधे मुख्यमंत्री भगवंत मान को निशाने पर लिया. उन्होंने बैठक का स्थान बदलने और फिर बैठक रद्द करने को लेकर सरकार पर सवाल उठाए और मुख्यमंत्री को “अहंकार” से बचने की चेतावनी दी. जाखड़ का हमला सिर्फ डीए भुगतान तक सीमित नहीं रहा; उन्होंने सरकार पर चुनावी लाभ के लिए घोषणाएं करने और दूसरी तरफ कर्मचारियों के बकाये को लेकर टालमटोल करने का आरोप लगाया.

बीजेपी का दूसरा संदेश: यह अब वित्तीय नहीं, राजनीतिक मुद्दा है

बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने कहा कि कर्मचारियों और पेंशनरों को लंबे समय से अपने जायज बकाये से वंचित रहने के कारण आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ा है. बीजेपी ने हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए सरकार पर जिम्मेदारी से बचने का आरोप लगाया है. इस तरह बीजेपी कोशिश कर रही है कि कर्मचारी आंदोलन को केवल कर्मचारी-सरकार विवाद न रहने दिया जाए, बल्कि इसे “AAP सरकार की संवेदनहीनता और वित्तीय कुप्रबंधन” के बड़े नैरेटिव से जोड़ा जाए.

अकाली दल भी मैदान में है

बिक्रम सिंह मजीठिया ने डीए और डीआर के मुद्दे पर सरकार को घेरा है. उन्होंने और हरसिमरत कौर बादल ने वित्त विभाग के उस आदेश पर सवाल उठाए थे, जिसमें अदालत के निर्देशों से जुड़े भुगतान को लागू करने से पहले वित्त विभाग की सहमति की बात सामने आई थी. मजीठिया ने इसे कर्मचारियों के साथ “धोखा” और न्यायपालिका के आदेशों के प्रति अनादर बताया था. अब जब आंदोलन सड़क पर है, अकाली दल के लिए यह मौका AAP सरकार के खिलाफ कर्मचारी वर्ग में जगह बनाने का भी है.

सरकार के लिए सबसे बड़ा खतरा आंदोलन नहीं, उसका नैरेटिव बनना है

आज महाबंद हुआ, सरकारी दफ्तर प्रभावित हुए, ओपीडी पर असर पड़ा और जालंधर में कर्मचारी पुलिस से भिड़ने की स्थिति तक पहुंचे. अगर कुछ दिनों बाद बातचीत होती है और समाधान निकल जाता है, तो सरकार कह सकती है कि उसने दबाव में आए बिना समस्या सुलझाई. लेकिन अगर बातचीत फिर टलती रही, आंदोलन अनिश्चितकालीन हुआ और हर दिन कर्मचारी सड़क पर आते रहे, तो कहानी बदल जाएगी. तब विपक्ष के पास एक सीधी राजनीतिक लाइन होगी- “सरकार ने कर्मचारियों को सुना नहीं, इसलिए कर्मचारी सड़क पर उतरे.”
और यही वजह है कि आज का मुख्यमंत्री का फैसला राजनीतिक रूप से दोधारी तलवार है. एक तरफ भगवंत मान ने सरकार की प्रशासनिक अथॉरिटी बचाने की कोशिश की है. उन्होंने यह संदेश दिया है कि हड़ताल के दबाव में सरकार बातचीत की शर्तें नहीं बदलेगी. दूसरी तरफ, बातचीत रद्द होने से आंदोलन कमजोर होने के बजाय जालंधर में ज्यादा उग्र हुआ. कर्मचारी नेताओं ने अगले कदम के रूप में अनिश्चितकालीन आंदोलन की चेतावनी दी है. अगर यह चेतावनी जमीन पर उतरती है, तो सरकार को रोजाना सरकारी सेवाओं, कर्मचारियों और विपक्ष- तीनों मोर्चों पर जवाब देना पड़ेगा.

क्या भगवंत मान पीछे हटेंगे?

अभी इसका जवाब साफ नहीं है. सरकार के लिए पीछे हटना भी आसान नहीं है, क्योंकि इससे यह संदेश जा सकता है कि सामूहिक अवकाश और सड़क का दबाव सरकार को बातचीत की मेज पर ले आया. लेकिन बहुत ज्यादा सख्ती भी जोखिम भरी है, क्योंकि कर्मचारी आंदोलन को अगर राजनीतिक दलों का खुला समर्थन मिलता गया और यह आंदोलन लंबे समय तक खिंच गया, तो AAP सरकार के खिलाफ एक नया संगठित वोट-बैंक नैरेटिव तैयार हो सकता है.
2027 में असली सवाल यही होगा. पंजाब विधानसभा चुनाव में AAP को सिर्फ कांग्रेस, बीजेपी या अकाली दल से मुकाबला नहीं करना है. उसे अपने पांच साल के शासन का हिसाब भी देना है. ऐसे में कर्मचारी-पेंशनर वर्ग का आंदोलन सरकार के लिए सिर्फ बकाया डीए का मामला नहीं रह जाता. यह सवाल बन सकता है कि जिस सरकार ने कर्मचारियों को अपने साथ जोड़कर सत्ता हासिल की थी, क्या वही सरकार सत्ता में आने के बाद उनसे दूर हो गई?

आज का फैसला सरकार की ताकत भी है और जोखिम भी. भगवंत मान ने महाबंद के दबाव में बातचीत करने से इनकार कर दिया. सरकार ने कहा- पहले हड़ताल खत्म करो, फिर बात होगी. कर्मचारियों ने कहा- पहले मुख्यमंत्री बात करें, फिर आंदोलन पर फैसला होगा. जालंधर में यह मतभेद पुलिस बैरिकेड और कर्मचारियों के गुस्से तक पहुंच गया. पंजाब सचिवालय में भी विरोध तेज हुआ. यानी दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी सीमा तय कर दी है.

अब असली परीक्षा शुरू हुई है

अगर सरकार की सख्ती से कर्मचारी पीछे हटते हैं, तो भगवंत मान इसे अपनी राजनीतिक मजबूती के रूप में पेश कर सकते हैं. लेकिन अगर कर्मचारी और ज्यादा संगठित होकर लौटते हैं, सरकारी सेवाएं लगातार प्रभावित होती हैं और विपक्ष इस आंदोलन को 2027 के चुनावी मुद्दे में बदल देता है, तो आज का यही फैसला सरकार के लिए परेशानी का कारण बन सकता है.
महाबंद सरकार को झुका नहीं पाया है. लेकिन महाबंद के बाद जालंधर में कर्मचारियों का उग्र होना यह संकेत जरूर दे रहा है कि दबाव खत्म नहीं हुआ है. अब गेंद मुख्यमंत्री भगवंत मान के पाले में नहीं, बल्कि दोनों पक्षों के बीच है- सरकार अपनी शर्त से पीछे हटेगी या कर्मचारी अपनी हड़ताल से?
क्योंकि पंजाब की राजनीति में कई बार असली संकट उस दिन शुरू नहीं होता, जब आंदोलन होता है. असली संकट तब शुरू होता है, जब आंदोलन को यह भरोसा हो जाता है कि सरकार उसे सुन ही नहीं रही.

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments