संभावित गठबंधन की खबर सामने आने के बाद पंजाब में सियासी हलचल तेज! बीजेपी ने दोनों दरवाजे खुले रखे- सोलो फाइट भी, अपनी शर्तों पर अलायन्स भी!

आरके सेठी
चंडीगढ़, 25 अगस्त.
पंजाब में अकेले चुनाव लड़ने के बीजेपी के दावों के दौरान ही आज यह बात भी सामने आई कि बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल में गठबंधन को लेकर बातचीत नतीजे के करीब आ पहुंची है! मंगलवार को सामने आई ANI की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों दलों के बीच गठबंधन को दोबारा आकार देने की बातचीत “फाइनल स्टेज” में पहुंच चुकी है. लेकिन इस बार कहानी सिर्फ साथ आने की नहीं है. असली सवाल यह है कि अगर दोनों फिर साथ आते हैं तो ‘बड़ा भाई’ कौन होगा? हालांकि मौजूदा संकेत बीजेपी के ‘बड़े भाई’ बनने की सम्भावना की ओर ज्यादा इशारा कर रहे हैं.
पुराने गठबंधन में यह भूमिका अकाली दल की थी. बीजेपी मुख्य रूप से शहरी सीटों पर चुनाव लड़ती थी और ग्रामीण पंजाब में अकाली दल गठबंधन की बड़ी ताकत था. 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर 24 साल पुराना यह रिश्ता टूट गया. अब करीब छह साल बाद अगर दोनों दल फिर साथ आते हैं तो समीकरण पुराने नहीं होंगे. संकेत यह है कि इस बार BJP ज्यादा सीटों और ज्यादा राजनीतिक हिस्सेदारी के साथ गठबंधन की मेज पर बैठना चाहती है.
इस बदलाव का सबसे बड़ा संकेत BJP की 117 विधानसभा सीटों पर तैयारी और अकाली दल की ग्रामीण सीटों को लेकर कथित तौर पर तैयारी सीमित करने की खबर से मिलता है. यानी बीजेपी एक तरफ पूरे पंजाब में अपना संगठन और चुनावी मशीनरी खड़ी कर रही है, तो दूसरी तरफ संभावित गठबंधन में सीटों के बंटवारे के लिए अपनी बारगेनिंग पोजीशन भी मजबूत करती दिखाई दे रही है.
यहीं बीजेपी की रणनीति का असली खेल समझ आता है. अगर गठबंधन नहीं होता तो 117 सीटों की तैयारी बीजेपी को अकेले चुनाव लड़ने के लिए तैयार रखती है. और अगर गठबंधन होता है तो यही तैयारी बीजेपी को ज्यादा सीटों का दावा करने का आधार देती है. दूसरे शब्दों में, बीजेपी ने दोनों दरवाजे खुले रखे हैं- सोलो फाइट भी और अपनी शर्तों पर अलायन्स भी.
लेकिन बीजेपी की सार्वजनिक लाइन अभी गठबंधन वाली नहीं है. बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोष ने पंजाब में पार्टी कार्यकर्ताओं से सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने और सरकार बनाने के लक्ष्य के साथ काम करने को कहा है. यानी पार्टी की घोषित रणनीति फिलहाल अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी है, जबकि गठबंधन को लेकर राजनीतिक संकेत अलग कहानी बता रहे हैं.
इसी विरोधाभास ने पंजाब की सियासत को और दिलचस्प बना दिया है. अगर बीजेपी और अकाली दल के बीच सचमुच बातचीत अंतिम दौर में है, तो 117 सीटों की तैयारी को केवल सोलो कांटेस्ट की तैयारी मानना अधूरी तस्वीर होगी. यह संभावित गठबंधन में बीजेपी की ताकत दिखाने और सीटों के बंटवारे में बेहतर स्थिति हासिल करने की रणनीति भी हो सकती है.
अकाली दल की तरफ से गठबंधन की संभावना को लेकर रुख अपेक्षाकृत सकारात्मक है. पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष संजीव तलवार ने कहा कि अंतिम फैसला सुखबीर सिंह बादल और पार्टी नेतृत्व को करना है, लेकिन उनका मानना है कि पंजाब के लोग मौजूदा सरकार को हटाने के लिए बीजेपी और अकाली दल को साथ देखना चाहते हैं. हालांकि ‘बड़े भाई’ के सवाल पर उन्होंने संकेत दिया कि अगर दोनों साथ आते हैं तो मुद्दा बड़े या छोटे साझेदार का नहीं, बल्कि साझा एजेंडे का होना चाहिए.
यानी अकाली दल फिलहाल रिश्ते की वापसी के दरवाजे खुले रखना चाहता है, लेकिन बीजेपी के संभावित ‘बड़े भाई’ वाले दावे को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने से बच रहा है. यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि सीटों का असली बंटवारा ही तय करेगा कि 2027 में यह गठबंधन पुराने BJP-SAD मॉडल की वापसी होगा या बिल्कुल नया राजनीतिक समझौता.
दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी ने संभावित गठबंधन को लेकर सीधे बीजेपी पर हमला बोला है. पंजाब के मंत्री तरुणप्रीत सिंह ने कहा कि बीजेपी ‘बड़े भाई’ बने या ‘छोटे भाई’, 117 सीटों पर लड़े या कम सीटों पर, उसका चुनावी प्रदर्शन पंजाब में शून्य रहेगा. आप नेता बलतेज पन्नू ने अकाली दल पर निशाना साधते हुए कहा कि राजनीति में बड़ा और छोटा भाई जनता तय करती है, पार्टियां नहीं.
कांग्रेस की प्रतिक्रिया भी इस गठबंधन को हल्के में लेने वाली है. पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने कहा कि बीजेपी समर्थक अकाली दल को वोट नहीं देते और अकाली समर्थक बीजेपी को वोट नहीं देते, इसलिए दोनों के साथ आने से कांग्रेस को खास फर्क नहीं पड़ेगा.
लेकिन कांग्रेस और आप की प्रतिक्रियाओं के पीछे एक बात साफ दिखाई देती है- दोनों पार्टियां इस संभावित गठबंधन को लेकर अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रही हैं. क्योंकि BJP-SAD की वापसी सिर्फ दो पार्टियों का मिलना नहीं होगी. इससे आप विरोधी वोटों का संभावित ध्रुवीकरण, कांग्रेस की रणनीति और पंजाब की ग्रामीण-शहरी राजनीतिक धुरी- तीनों प्रभावित हो सकते हैं.
शिरोमणि अकाली दल के नेता बिक्रम सिंह मजीठिया पहले ही कह चुके हैं कि पंजाब के लोग बीजेपी और अकाली दल को फिर साथ देखना चाहते हैं. उन्होंने पंजाब के सीमावर्ती राज्य होने और सामाजिक ताने-बाने जैसे मुद्दों का भी हवाला दिया था. पिछले दिनों से अकाली दल की तरफ से ऐसे संकेत लगातार आते रहे हैं, जबकि बीजेपी अपनी तरफ से अभी तक कार्ड पूरी तरह खोलने से बचती रही है.
यही वजह है कि इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि बीजेपी और अकाली दल साथ आएंगे या नहीं. बड़ा सवाल यह है कि अगर साथ आए तो पुराना हिसाब चलेगा या नया समीकरण बनेगा?
2027 में बीजेपी अगर ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने और गठबंधन में ‘बड़े भाई’ की भूमिका हासिल करने में सफल रहती है, तो यह पंजाब की राजनीति में बड़ा बदलाव होगा. क्योंकि पुराने गठबंधन में अकाली दल ही सीनियर पार्टनर था. अब बीजेपी उसी गठबंधन में अपनी बढ़ी हुई राजनीतिक ताकत के हिसाब से हिस्सा मांगती दिखाई दे रही है.
और यहीं से 117 सीटों वाली बीजेपी की तैयारी का मतलब और साफ होता है. बीजेपी शायद सिर्फ चुनाव लड़ने की तैयारी नहीं कर रही. वह गठबंधन हुआ तो सीटों की बातचीत किस ताकत से होगी, उसकी भी तैयारी कर रही है.
गठबंधन की आधिकारिक घोषणा और सीटों के बंटवारे तक इसे अंतिम फैसला मानना जल्दबाजी होगी. लेकिन इतना जरूर है कि BJP-SAD के पुराने रिश्ते की संभावित वापसी ने पंजाब के 2027 चुनाव की तस्वीर में एक नया सवाल जोड़ दिया है- इस बार ‘बड़ा भाई’ अकाली दल होगा या बीजेपी?

