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बीजेपी पंजाब में आखिर किस खेल की तैयारी कर रही है?

117 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी पुरानी बात है, लेकिन अब संगठन विस्तार, अकाली दल से रिश्तों को लेकर चल रही चर्चा, अमृतपाल की पार्टी से जुड़े दावे और चुनाव बाद के संभावित गणित को साथ रखकर देखें तो बीजेपी की रणनीति कहीं बड़ी दिखाई देती है!

आरके सेठी
चंडीगढ़, 25 अगस्त.

पंजाब की राजनीति में बीजेपी ने 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर फिर बड़ा मेसेज दिया है. बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोष ने कल पटियाला में पार्टी की बैठक के दौरान कहा कि बीजेपी पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ेगी और जीतकर सरकार बनाएगी. पंजाब बीजेपी अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों भी इससे पहले गठबंधन की अटकलों को खारिज करते हुए सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी की बात कह चुके हैं. पहली नजर में यह उसी बात की पुनरावृत्ति लगता है जो बीजेपी पहले भी कई बार कह चुकी है. लेकिन आज की कहानी 117 सीटों पर अकेले लड़ने की घोषणा नहीं है. असली कहानी उस घोषणा के पीछे चल रही राजनीति और रणनीति है. क्योंकि बीजेपी एक तरफ पूरे पंजाब में अपना स्वतंत्र संगठन खड़ा करने की तैयारी कर रही है, वहीं पार्टी के भीतर गठबंधन की संभावना तलाशना भी एक संगठनात्मक चुनौती के रूप में सामने आया है. यही वह बिंदु है जहां सवाल उठता है – बीजेपी पंजाब में आखिर किस खेल की तैयारी कर रही है?

बात राजनीतिक ब्यान की नहीं, उसके पीछे की रणनीति की है !

बीजेपी का 117 सीटों पर लड़ने का फैसला नया नहीं है. मार्च 2026 में मोगा की रैली में अमित शाह ने संकेत दिया था कि बीजेपी अब पंजाब में जूनियर पार्टनर की भूमिका में नहीं रहेगी और 2027 में अपनी सरकार बनाने के लक्ष्य के साथ चुनाव लड़ेगी. जून में पार्टी की केंद्रीय रणनीतिक बैठक में पंजाब नेतृत्व को सभी 117 सीटों पर तैयारी करने को कहा गया. इसके बाद बीजेपी के प्रदेश और राष्ट्रीय नेताओं की तरफ से लगातार यही लाइन सामने आती रही है. इसलिए बीएल संतोष का ताजा बयान अपने आप में कोई नया राजनीतिक मोड़ नहीं है.
नया सवाल यह है कि बीजेपी इस तैयारी को सिर्फ चुनाव लड़ने की रणनीति के रूप में देख रही है या पूरे पंजाब में अपनी ऐसी ताकत खड़ी करना चाहती है जो चुनाव से पहले और चुनाव के बाद दोनों परिस्थितियों में उसके काम आए.
117 सीटों पर अकेले लड़ना बीजेपी की घोषित रणनीति है. लेकिन इस रणनीति का राजनीतिक इस्तेमाल क्या होगा, यह सवाल अभी खुला हुआ है. बीजेपी के भीतर भी गठबंधन का सवाल पूरी तरह पूरी तरह से गायब नहीं है. मीडिया रिपोर्टों में एक वरिष्ठ बीजेपी नेता के हवाले से संगठन के सामने दो बड़ी चुनौतियों का उल्लेख किया गया. पहली चुनौती पुराने बीजेपी नेताओं और उनके समर्थकों को दूसरे दलों से बीजेपी में आए नए नेताओं के साथ लेकर चलने की है. दूसरी चुनौती के रूप में गठबंधन की संभावना तलाशने का भी जिक्र किया गया.
इस बयान को बीजेपी की आधिकारिक गठबंधन नीति नहीं माना जा सकता. आधिकारिक तौर पर पार्टी फिलहाल अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी की बात कर रही है. लेकिन यह राजनीतिक संकेत जरूर महत्वपूर्ण है कि संगठनात्मक स्तर पर गठबंधन की संभावना को एक टास्क के रूप में देखा जा रहा है. यानी बाहर का संदेश साफ है – बीजेपी 117 सीटों पर तैयार है. लेकिन पंजाब की राजनीति में संभावित सहयोगियों और चुनावी समीकरणों को पूरी तरह नजरअंदाज करने की स्थिति भी अभी नहीं बनी है.
यहीं से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संभावना निकलती है. बीजेपी शायद इस समय किसी गठबंधन पर निर्भर होने के बजाय पहले अपनी स्वतंत्र ताकत खड़ी करना चाहती है. अगर गठबंधन नहीं हुआ तो उसके पास अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी होगी और अगर भविष्य में किसी राजनीतिक समझौते की जरूरत पड़ी तो बातचीत उसके अपने संगठन और चुनावी ताकत के आधार पर होगी.

बीजेपी का असली लक्ष्य सिर्फ 117 उम्मीदवार नहीं, पूरा पंजाब है

किसी पार्टी का 117 सीटों पर चुनाव लड़ना और 117 सीटों पर गंभीर मुकाबला करने की स्थिति में पहुंचना दो अलग बातें हैं. बीजेपी अब इसी दूसरे चरण में जाने की कोशिश कर रही है. पार्टी की चुनौती सिर्फ उम्मीदवार ढूंढना नहीं है. उसे ग्रामीण पंजाब में संगठन खड़ा करना है, स्थानीय प्रभावशाली चेहरे तैयार करने हैं, पुराने कार्यकर्ताओं और दूसरे दलों से आए नेताओं के बीच संतुलन बनाना है और अपने पारंपरिक वोट आधार से बाहर जाकर नए सोशल ग्रुप्स तक पहुंच बनानी है.
बीजेपी लंबे समय तक पंजाब में शहरी हिंदू, व्यापारी और कुछ दलित वोट के आधार पर अकाली दल के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ती रही. 2020 में कृषि कानूनों के विवाद के बाद अकाली दल से रिश्ता टूटने के बाद पार्टी के सामने पहली बार पूरे पंजाब में अपना स्वतंत्र राजनीतिक आधार बनाने की चुनौती आई. अब 2027 की तैयारी उसी लंबी प्रक्रिया का अगला चरण है.
यानी 117 सीटों की तैयारी को सिर्फ सोलो कंटेस्ट कहना बीजेपी के विस्तार अभियान को छोटा कर देगा. पार्टी वास्तव में पंजाब में अपने लिए नया राजनीतिक सामाजिक आधार बनाने की कोशिश कर रही है.

18.56 प्रतिशत वोट: बीजेपी की ताकत भी, सबसे बड़ी परीक्षा भी

2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब में बीजेपी का वोट शेयर 18.56 प्रतिशत रहा. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह 9.63 प्रतिशत था और 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 6.60 प्रतिशत वोट मिले थे. 2024 में बीजेपी ने पंजाब की सभी 13 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी. यहीं बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी एक साथ दिखाई देती है. वोट शेयर तेजी से बढ़ा, लेकिन वह वोट सीटों में पर्याप्त रूप से तब्दील नहीं हुआ.
2024 के लोकसभा चुनाव के विधानसभा सेगमेंट विश्लेषण में बीजेपी 117 में से 24 विधानसभा क्षेत्रों में सबसे आगे रही. यह आंकड़ा महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि बीजेपी का वोट सिर्फ पूरे राज्य में फैला हुआ नहीं था, बल्कि कई विधानसभा क्षेत्रों में वह मुकाबले की स्थिति में पहुंच चुकी थी.
लेकिन विधानसभा चुनाव में लोकसभा जैसी परिस्थितियां नहीं होतीं. यहां स्थानीय उम्मीदवार, गांव का संगठन, क्षेत्रीय समीकरण, सरकार के प्रति नाराजगी, जातीय-सामाजिक समीकरण और स्थानीय मुद्दे ज्यादा निर्णायक हो सकते हैं.
इसलिए 2027 में बीजेपी की असली परीक्षा यह नहीं होगी कि उसका वोट शेयर 18.56 से 20 या 22 प्रतिशत होता है या नहीं. असली सवाल होगा – वह वोट किन सीटों पर केंद्रित होता है और कितनी सीटों में जीत में बदलता है.

2022 से 2027 तक बीजेपी ने क्या बदला है?

2022 में बीजेपी ने 73 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था. उसे सिर्फ दो सीटों पर जीत मिली और उसका वोट शेयर 6.60 प्रतिशत रहा. आम आदमी पार्टी ने 92 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, कांग्रेस को 18 और शिरोमणि अकाली दल को तीन सीटें मिली थीं. बीजेपी सिर्फ दो सीटों तक सीमित रही. 2027 के लिए बीजेपी का दावा है कि वह अब 2022 वाली स्थिति में नहीं है.
2024 के लोकसभा चुनाव ने उसे बड़ा वोट आधार दिया. इसके बाद दूसरे दलों से नेताओं के बीजेपी में आने का सिलसिला भी जारी रहा. पार्टी ग्रामीण पंजाब, सिख समाज और दूसरे सामाजिक समूहों में अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है. लेकिन यहां भी वही सवाल है – क्या संगठन का विस्तार वोट में बदलेगा और क्या वोट सीटों में बदलेगा?
यही वह जगह है जहां 117 सीटों का असली अर्थ सामने आता है. बीजेपी को हर सीट पर सिर्फ उम्मीदवार खड़ा नहीं करना है. उसे हर सीट पर राजनीतिक उपस्थिति और मुकाबले की क्षमता बनानी है.

अकाली दल का दरवाजा बंद है या बीजेपी कार्ड अपने हाथ में रख रही है?

बीजेपी की रणनीति समझने के लिए अकाली दल को अलग करके नहीं देखा जा सकता. 2026 में दोनों दलों के बीच संभावित राजनीतिक नजदीकी को लेकर कई बार चर्चा हुई है. जून में सुखबीर सिंह बादल और बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के बीच संपर्क की खबरों के बाद गठबंधन की अटकलें तेज हुई थीं. अगस्त में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुखबीर बादल की मुलाकात तथा उसके बाद बिक्रम सिंह मजीठिया के बयानों ने इस चर्चा को फिर हवा दी.
दूसरी तरफ बीजेपी की मौजूदा आधिकारिक लाइन अकेले चुनाव लड़ने की है. 24 अगस्त को बीएल संतोष ने 117 सीटों पर लड़ने की बात दोहराई और उसी दिन तरुण चुघ ने भी सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने तथा अधिकतम सीटें जीतने का दावा किया. यानी आज की तारीख में बीजेपी का आधिकारिक रास्ता अकेले चुनाव का है. लेकिन अकाली दल के साथ संभावित राजनीतिक बातचीत को पूरी तरह खत्म मान लेना भी अभी जल्दबाजी होगी.
यही वह जगह है जहां बीजेपी की रणनीति को पढ़ना जरूरी है. अगर पार्टी पहले से पूरे राज्य में अपनी तैयारी करती है तो किसी भी संभावित सीट शेयरिंग में उसकी स्थिति पहले से कहीं ज्यादा मजबूत होगी.

क्या बीजेपी को चुनाव से पहले गठबंधन चाहिए भी?

यह शायद सबसे महत्वपूर्ण सवाल है. अगर बीजेपी 2024 के 18.56 प्रतिशत वोट को मजबूत विधानसभा संगठन में बदल देती है, तो उसे किसी गठबंधन में जाने की जरूरत कम हो सकती है. उल्टा, अगर उसे लगता है कि अकेले लड़ने पर उसका वोट कई सीटों पर बिखर जाएगा और गठबंधन से कुछ खास सीटों पर जीत की संभावना काफी बढ़ सकती है, तो चुनाव के करीब राजनीतिक रणनीति बदलने का विकल्प मौजूद रहेगा. इसलिए आज की तारीख में बीजेपी की सबसे मजबूत स्थिति शायद यही है कि वह गठबंधन पर निर्भर हुए बिना अकेले चुनाव की तैयारी कर रही है. यानी पहले मैदान तैयार करो, फिर परिस्थितियों को देखो.
117 सीटों पर तैयारी का एक फायदा यह भी है कि बीजेपी के पास बाद में हर सीट का अपना आकलन होगा. कहां पार्टी मजबूत है, कहां दूसरे स्थान पर है, कहां सहयोगी की जरूरत पड़ सकती है और कहां अकेले जीत की संभावना है – इन सबका आंकड़ा उसके पास होगा. यही चुनावी बार्गेनिंग की ताकत बन सकती है.

अमृतपाल की पार्टी: इग्नोर करना सबके लिए मुश्किल होगा!

अब इस समीकरण में अमृतपाल सिंह की अगुवाई वाली अकाली दल वारिस पंजाब दे का जिक जरुरी है, लेकिन इसमें ज्यादातर चीजें वक़्त तय करेगा. जून 2026 में बीजेपी नेता जगमोहन सिंह राजू ने दावा किया था कि अमृतपाल सिंह के प्रतिनिधि उनसे कई बार मिले थे और बीजेपी के साथ संभावित गठबंधन तलाश रहे थे. लेकिन उसी समय वारिस पंजाब दे के लीडर मनप्रीत सिंह अयाली और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष तरसेम सिंह ने बीजेपी या किसी केंद्रीय दल के साथ गठबंधन की संभावना से इनकार किया था. तरसेम सिंह ने ऐसे किसी संपर्क से ही इनकार कर दिया था. लेकिन सवाल फिर भी महत्वपूर्ण है. अगर 2027 का चुनाव बहुकोणीय रहा और किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, तो कुछ सीटों पर केंद्रित प्रदर्शन करने वाली छोटी पार्टियां भी चुनाव बाद के गणित में महत्वपूर्ण हो सकती हैं.
अमृतपाल सिंह ने 2024 में खडूर साहिब लोकसभा सीट निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीती थी. अब वारिस पंजाब दे विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रही है. इसलिए उसकी भूमिका सिर्फ राज्यव्यापी वोट शेयर से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होगी कि वह कितनी सीटों पर प्रभावी मुकाबला खड़ा कर पाती है.
लेकिन बीजेपी और वारिस पंजाब दे के बीच किसी संभावित प्री-पोल गठबंधन की राह में राजनीतिक और वैचारिक बाधाएं बहुत बड़ी हैं. इसलिए फिलहाल इसे गठबंधन की संभावनाओं नहीं, बल्कि 2027 के संभावित चुनाव बाद के गणित में एक सवाल के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा.

हरियाणा 2019: चुनाव से पहले साथी नहीं था, नतीजे के बाद सरकार बनी

2019 में हरियाणा की 90 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी 40 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बहुमत का आंकड़ा 46 था. कांग्रेस को 31 और जननायक जनता पार्टी को 10 सीटें मिलीं. चुनाव से पहले बीजेपी और जेजेपी का गठबंधन नहीं था. नतीजे आने के बाद बीजेपी ने जेजेपी के साथ सरकार बनाई. दुष्यंत चौटाला उपमुख्यमंत्री बने और सात निर्दलीय विधायकों ने भी सरकार को समर्थन दिया. पंजाब में ऐसा होगा, यह कहना अभी पूरी तरह अटकल होगी. लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि चुनाव के बाद गठबंधन का कोई सवाल ही नहीं रहेगा. यही वजह है कि बीजेपी के लिए 117 सीटों पर तैयारी करना जरूरी नहीं कि चुनाव के बाद भी उसी राजनीतिक स्थिति को अंतिम बनाए रखे.

बीजेपी के लिए सबसे बड़ा सवाल: कितनी सीटें जीत सकती है?

पंजाब विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 59 है. बीजेपी अगर 117 सीटों पर अकेले लड़ती है तो उसका घोषित लक्ष्य सरकार बनाना है, लेकिन सरकार बनाने की वास्तविक संभावना उसके वोट शेयर से ज्यादा सीटों की संख्या तय करेगी. मान लीजिए बीजेपी 10-15 सीटों तक पहुंचती है. तब वह सरकार बनाने वाली पार्टी नहीं होगी, लेकिन कई सीटों पर निर्णायक राजनीतिक शक्ति बन सकती है. अगर वह 20-25 सीटों तक पहुंचती है तो पंजाब का चुनावी गणित गंभीर रूप से बदल जाएगा. अगर वह उससे भी आगे निकलती है तो सवाल और बड़ा हो जाएगा – क्या बीजेपी को सरकार बनाने के लिए किसी की जरूरत होगी या दूसरे दलों को बीजेपी की जरूरत पड़ेगी? यही अंतर है अकेले चुनाव लड़ने वाली पार्टी और निर्णायक राजनीतिक शक्ति बनने वाली पार्टी के बीच.

बीजेपी की असली परीक्षा 117 उम्मीदवार नहीं, 117 मजबूत सीटें हैं

बीजेपी के लिए आने वाले महीनों में सबसे महत्वपूर्ण काम भाषण और घोषणाएं नहीं, बल्कि सीट-दर-सीट संगठन होगा. कहां बीजेपी दूसरे स्थान पर रही? कहां उसका वोट तेजी से बढ़ा? कहां स्थानीय नेता मजबूत हैं? कहां दूसरे दलों से आए नेता चुनाव जिताने की क्षमता रखते हैं? कहां किसान, युवा, व्यापारी या दलित वोट उसके पक्ष में खिसक सकता है? कहां सिख चेहरा पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ा सकता है? और सबसे महत्वपूर्ण – किन सीटों पर तीन या चार कोणों वाले मुकाबले में 18-20 प्रतिशत वोट भी जीत की स्थिति बना सकता है? अगर बीजेपी इन सवालों के जवाब तलाश लेती है तो 117 सीटों पर चुनाव लड़ना उसके लिए केवल विस्तार नहीं, वास्तविक चुनावी रणनीति बन जाएगा.
क्या बीजेपी विरोधी वोटों को भी बांट सकती है? इस रणनीति का दूसरा पहलू बीजेपी के विरोधियों के लिए चिंता का कारण है. अगर बीजेपी अकेले लड़ती है और उसका वोट शेयर बढ़ता है, तो कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, अकाली दल और पंथक दलों के बीच वोटों का बंटवारा कई सीटों पर निर्णायक हो सकता है.
यानी बीजेपी को हर सीट जीतने की जरूरत नहीं होगी. कुछ सीटों पर मजबूत प्रदर्शन और दूसरे दलों के वोटों का बंटवारा भी उसे अपेक्षा से ज्यादा सीटें दिला सकता है. लेकिन इसका उल्टा भी संभव है. अगर बीजेपी का वोट बढ़ता है लेकिन किसी भी इलाके में पर्याप्त रूप से केंद्रित नहीं होता, तो 18-20 प्रतिशत वोट भी सीटों में बहुत कम बदल सकता है. इसलिए 2027 में बीजेपी का असली आंकड़ा राज्यव्यापी वोट शेयर नहीं, सीटवार वोट कंसंट्रेशन होगा.

तो फिर बीजेपी पंजाब में आखिर किस खेल की तैयारी कर रही है?

पूरी तस्वीर को जोड़ें तो बीजेपी की रणनीति का पहला हिस्सा साफ दिखाई देता है – पार्टी खुद को पूरे पंजाब के चुनाव में एक स्वतंत्र दावेदार के रूप में स्थापित करना चाहती है. दूसरा हिस्सा भी साफ है – वह अपने पारंपरिक आधार से बाहर निकलकर ग्रामीण पंजाब और सिख समाज में राजनीतिक जगह बनाने की कोशिश कर रही है. तीसरा हिस्सा यह है कि पार्टी 2024 के 18.56 प्रतिशत वोट को विधानसभा सीटों में बदलने की तैयारी कर रही है. 2024 में 24 विधानसभा सेगमेंट में सबसे आगे रहना इस दिशा में उसके लिए एक महत्वपूर्ण आधार है.
चौथा हिस्सा सबसे दिलचस्प है – गठबंधन की चर्चा को लेकर राजनीतिक हलचल पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, हालांकि बीजेपी की आधिकारिक मौजूदा लाइन अकेले चुनाव लड़ने की है. और पांचवां हिस्सा चुनाव के बाद का है. अगर विधानसभा का फैसला किसी एक दल के पक्ष में साफ नहीं जाता तो हरियाणा 2019 जैसे पोस्ट-पोल समीकरण को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता.
इसलिए शायद बीजेपी का लक्ष्य इस समय किसी एक गठबंधन को चुनना नहीं है. उसका पहला लक्ष्य इतनी स्वतंत्र ताकत बनाना है कि चुनाव से पहले गठबंधन करना पड़े तो भी बातचीत में उसकी स्थिति मजबूत हो और चुनाव के बाद गठबंधन की जरूरत पड़े तो भी उसकी सीटें उसे निर्णायक स्थिति में रखें.

बीजेपी ने अभी पत्ते खोले हैं या सिर्फ मैदान सजाया है?

बीजेपी का 117 सीटों पर लड़ने का ऐलान उसकी पुरानी लाइन का सिर्फ नया संस्करण है. बीजेपी पूरे पंजाब में अपनी ताकत खड़ी कर रही है, जबकि राजनीतिक समीकरण अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हैं. इसलिए 2027 के पंजाब चुनाव की इस समय सबसे दिलचस्प तस्वीर यह है कि बीजेपी शायद सिर्फ यह तय नहीं कर रही कि किसके साथ चुनाव लड़ना है. वह पहले यह तय कर रही है कि चुनाव में अपनी ऐसी ताकत कैसे बनाई जाए कि किसी भी समीकरण में उसकी जरूरत पड़े.
अगर वह 2024 के 18.56 प्रतिशत वोट को सीटों में बदल पाती है, ग्रामीण पंजाब में संगठन खड़ा कर पाती है और मजबूत स्थानीय चेहरे तैयार करती है, तो 2027 का चुनाव पंजाब की पारंपरिक राजनीतिक धुरी को बदल सकता है. और अगर वह ऐसा नहीं कर पाती, तो 117 सीटों पर अकेले लड़ने की रणनीति सिर्फ वोट बढ़ाने और दूसरे दलों के बीच मुकाबला त्रिकोणीय बनाने तक सीमित रह सकती है. इसलिए आज का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि बीजेपी 117 सीटों पर लड़ेगी या नहीं. वह बात बीजेपी कई बार कह चुकी है.

असली सवाल यह है कि बीजेपी उन 117 सीटों पर अपने लिए कितनी राजनीतिक ताकत बना पाएगी, और उस ताकत का इस्तेमाल चुनाव से पहले करेगी, चुनाव के दौरान करेगी या चुनाव के बाद? शायद इसी सवाल का जवाब बताएगा कि बीजेपी पंजाब में आखिर किस खेल की तैयारी कर रही है.

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