कौमी इंसाफ मोर्चा का चंडीगढ़ कूच, पुलिस से टकराव, आंसू गैस के गोले छोड़े; पानी की बौछार

चंडीगढ़/मोहाली, 15 अगस्त। पंजाब इलेक्शन ब्यूरो
बंदी सिंहों की रिहाई की मांग को लेकर लंबे समय से मोहाली में डटे कौमी इंसाफ मोर्चा ने शनिवार को चंडीगढ़ की ओर कूच कर दिया। मोर्चा की योजना पंजाब के गवर्नर हाउस तक पहुँचने की है। मार्च के बीच शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के अध्यक्ष सिमरनजीत सिंह मान को हिरासत में ले लिया गया है। मोहाली-चंडीगढ़ सीमा और चंडीगढ़ में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। इसी बीच, मोर्चा में शामिल लोग मोहाली की वाईपीएस चौक पर जमा हुए और फिर चंडीगढ़ की और बढ़े. इन्हें रोकने के लिए पुलिस को वाटर कैनन से पानी की बौछारें छोड़नी पड़ी और आंसू गैस के गोले दागे. प्रदर्शन वाले जगहों पर धारा 143 लागू है और अफसर प्रदर्शनकारियों से बातचीत करने की कोशिश कर रहा है. प्रदर्शनकारी 1980 और 1990 के दशक से देशभर की जेलों में बंद सिख कैदियों की रिहाई की मांग कर रहे हैं
यह मार्च ऐसे समय हो रहा है जब इसके ठीक एक दिन पहले पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कौमी इंसाफ मोर्चा के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। अदालत ने साफ कहा था कि लोकतंत्र में नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होकर अपने विचार व्यक्त करने का मौलिक अधिकार है। लेकिन यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण नहीं रहता, हिंसक हो जाता है या सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करता है तो संबंधित प्रशासन को कानून के तहत जरूरी निवारक और सुधारात्मक कदम उठाने होंगे।
हाईकोर्ट की यह टिप्पणी उस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें 15 अगस्त को चंडीगढ़ में कौमी इंसाफ मोर्चा के प्रस्तावित प्रदर्शन के कारण कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता जताई गई थी। अदालत ने पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ प्रशासन से स्थिति पर रिपोर्ट भी मांगी है और मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को होगी।
अदालत की टिप्पणी के बीच सड़क पर मोर्चा
हाईकोर्ट की टिप्पणी के अगले ही दिन कौमी इंसाफ मोर्चा ने अपना मार्च निकाला है। मोर्चा लंबे समय से जेलों में बंद सिंहों की रिहाई की मांग कर रहा है। उसकी मांगों में ऐसे बंदियों की रिहाई शामिल है, जिनके बारे में मोर्चे का कहना है कि वे लंबे समय से जेल में हैं और कई मामलों में निर्धारित सजा पूरी कर चुके हैं।
15 अगस्त के मार्च को लेकर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी ने भी मोर्चे को समर्थन दिया है। उन्होंने बंदी सिंहों की लंबे समय तक जेल में मौजूदगी पर सवाल उठाते हुए सरकार से मानवीय और संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाने की अपील की है। मोर्चे की इस मुहिम में बलवंत सिंह राजोआणा, जगतार सिंह हवारा, जगतार सिंह तारा, परमजीत सिंह भ्योरा, प्रो. देविंदरपाल सिंह भुल्लर और गुरदीप सिंह खेड़ा जैसे नाम लगातार प्रमुखता से उठते रहे हैं।

हवारा ने भी किया शांतिपूर्ण मार्च का आह्वान
आज के मार्च से पहले जगतार सिंह हवारा का जेल से वीडियो संदेश भी सामने आया। हवारा ने समर्थकों से मार्च को शांतिपूर्ण रखने और नेताओं के निर्देशों का पालन करने की अपील की। यानी एक तरफ हाईकोर्ट ने शांतिपूर्ण विरोध को लोकतांत्रिक अधिकार माना है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था और आम लोगों की आवाजाही प्रभावित न हो।
हवारा की पैरोल ने पूरे मुद्दे को नया राजनीतिक आयाम दिया
कौमी इंसाफ मोर्चा के आज के मार्च की पृष्ठभूमि में जगतार सिंह हवारा की पैरोल का मुद्दा भी बेहद महत्वपूर्ण है। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने हाल ही में राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से मुलाकात कर हवारा को 10 दिन की पैरोल दिए जाने के लिए हस्तक्षेप की मांग की थी। मुख्यमंत्री ने हवारा की बुजुर्ग और बीमार मां की स्थिति का हवाला देते हुए इसे मानवीय मामला बताया था।
इसके बाद राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया ने भी कहा कि उन्होंने हवारा को मानवीय आधार पर पैरोल दिए जाने की सिफारिश की है, ताकि वह अपनी बीमार मां से मिल सके। दिलचस्प यह है कि जिस मुद्दे को लेकर कौमी इंसाफ मोर्चा लंबे समय से आंदोलन कर रहा है, उसी मुद्दे पर अब पंजाब सरकार खुद पैरवी करती दिखाई दे रही है।

लेकिन मोर्चे की मांग सिर्फ हवारा तक सीमित नहीं
हवारा की पैरोल का मामला आंदोलन की व्यापक मांग का सिर्फ एक हिस्सा है। कौमी इंसाफ मोर्चा बंदी सिंहों की रिहाई का सवाल उठा रहा है और उसका कहना है कि लंबे समय से जेल में बंद ऐसे कैदियों के मामलों पर सरकार को मानवीय और संवैधानिक दृष्टि से फैसला लेना चाहिए। यही वजह है कि भगवंत मान सरकार की ओर से हवारा की पैरोल की पैरवी के बावजूद आंदोलन खत्म नहीं हुआ है।
SGPC भी इस मुद्दे पर सरकार से व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की मांग कर चुकी है। एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी ने कहा है कि बंदी सिंहों के मामलों को केवल कानूनी प्रक्रिया के नजरिये से नहीं, बल्कि उनके मानवीय और संवैधानिक पहलुओं को ध्यान में रखकर भी देखा जाना चाहिए।
इस बीच चंडीगढ़ में सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद कड़ी है। 15 अगस्त और प्रस्तावित मार्च दोनों को देखते हुए शहर में बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है। रिपोर्टों के मुताबिक चंडीगढ़ में करीब 3,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है।
हाईकोर्ट की नजर अब 20 अगस्त पर
आज का मार्च केवल सड़क पर होने वाला एक प्रदर्शन नहीं है। इसके साथ अब एक न्यायिक पृष्ठभूमि भी जुड़ गई है। हाईकोर्ट ने एक तरफ शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को स्वीकार किया है, दूसरी तरफ प्रशासन को सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी याद दिलाई है। अदालत ने पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ से रिपोर्ट मांगी है और अगली सुनवाई 20 अगस्त को होगी।
इसलिए आज मोहाली-चंडीगढ़ सीमा पर होने वाला घटनाक्रम महत्वपूर्ण है—क्या मार्च शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ता है, क्या प्रदर्शनकारियों को चंडीगढ़ में प्रवेश मिलता है, क्या उन्हें राज्यपाल आवास तक जाने दिया जाता है और प्रशासन किस बिंदु पर हस्तक्षेप करता है?
इन सवालों के जवाब आने वाले कुछ घंटे तय करेंगे कि कौमी इंसाफ मोर्चा का आज का चंडीगढ़ कूच पंजाब की राजनीति में सिर्फ एक और प्रदर्शन बनकर रह जाता है या बंदी सिंहों के मुद्दे को एक बार फिर बड़े राजनीतिक केंद्र में ले आता है।
और इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि सड़क पर कौमी इंसाफ मोर्चा बंदी सिंहों की रिहाई के लिए संघर्ष कर रहा है, हाईकोर्ट शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन की बात कर रहा है और इसी बीच पंजाब के मुख्यमंत्री खुद जगतार सिंह हवारा को पैरोल दिलाने के लिए राज्यपाल से सिफारिश कर चुके हैं।

