पंजाब की सियासत में इन दिनों पूरा उबाल है. अपने ही फैसले से पलटी मारते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान भी हवारा को पैरोल दिलवाने के लिए ‘चिट्ठी पत्री’ लिख रहे हैं, गवर्नर ने भी पैरोल की सिफारिश की है और बीजेपी को भी एतराज नहीं!

आरके सेठी
चंडीगढ़, 14 अगस्त.
इलेक्शन सिर पर हैं और पंजाब की सियासत उबलने लगी है. पंथक राजनीति सभी को खूब सुहाती है, बेशक कोई सत्ता में हो या विपक्ष में. पंजाब में सिखों का एक धड़ा कट्टरपंथियों का है. जाहिर है, पंजाब इलेक्शन में बचे महज छह महीने में हर पार्टी हर उस खेल को खेल लेना चाहती है, जिससे सत्ता बची रहे या हासिल हो जाये. इसी कड़ी का हिस्सा है जगतार सिंह हवारा की हिमायत. पंजाब की आप सरकार कुछ महीने पहले तक हवारा की पैरोल को विरोध कर रही थी और अब अचानक यु टर्न लेते हुए हवारा को जेल से बाहर लाने के लिए पुरजोर कोशिशें कर रही है.
करीब 31 साल पहले पंजाब के चीफ मिनिस्टर बेअंत सिंह की मानव बम धमाके में हुई हत्या की साजिश रचने के इल्जाम में उम्रकैद की सजा काट रहे जगतार सिंह हवारा को कट्टरपंथियों की सहानुभूति हमेशा से हासिल रही है. तमाम उठापटक के बीच अब कुछ दिनों से हवारा को पैरोल पर जेल से बाहर लाने के लिए सभी और से कोशिशें हो रही हैं. चीफ मिनिस्टर भगवंत सिंह मान खुद गवर्नर से मिल कर पैरोल की इल्तिजा कर चुके हैं, इससे पहले सरकार में केंद्रीय गृह मंत्रालय को चिठ्ठी भी लिखी और कहा था की हवारा के जेल से बाहर आने से कानून व्यवस्था नहीं बिगड़ेगी और हर हालत के लिए सरकार जिम्मेदारी लेती है. हालांकि इसी साल मार्च में भगवंत सरकार ने हवारा की पैरोल देने का विरोध किया था. हवारा को पैरोल की हिमायत में गवर्नर गुलाब चाँद कटारिया भी हैं. उन्होंने भी सेंटर को सिफारिशी चिठ्ठी लिखी है. इतना ही नहीं, पूर्व केंद्रीय मंत्री एंव बीजेपी के सीनियर लीडर रवनीत सिंह बिट्टू ने भी इस मसले में अपनी सहमति व्यक्त की है. वो भी गवर्नर से मिले और पैरोल की सिफारिश की.
माना जा रहा है कि हवारा की पैरोल दस दिनों के लिए मांगी जा रही है और उम्मीद एक या दो दिनों की पैरोल मिलने की है. कुछ सूत्र बताते हैं की पैरोल सिर्फ कुछ घंटों के लिए मिलने की भी बात सामने आई है. इस हालत में गतिरोध बढ़ सकता है. ऐसे में, यह देखना दिलचस्प रहेगा कि कट्टरपंथियों की नज़र में किस पार्टी की क्या इमेज बनती है. चूंकि, हवारा को जेल से बाहर लाने की जो यह कवायद है, पंजाब की जनता उसे अलग-अलग नजरिये से देख रही है. क्योंकि, पैरोल का आधार हवारा की माता की तबियत ख़राब होना बताया गया है तो एक तबका यह मानता है कि ये सब मानवीय पहलु है, लेकिन वहीँ दूसरी और एक तबका ये भी मानता है की इलेक्शन के वक़्त कट्टरपंथियों को अपने हक में करने की कोशिशों में सब लगे हैं.
जगतार सिंह हवारा की पैरोल अब सिर्फ एक कैदी को कुछ समय के लिए जेल से बाहर लाने का सवाल नहीं रह गया है। यह पंजाब की राजनीति, पंथक भावनाओं और आने वाले चुनाव के बीच खड़े एक बड़े राजनीतिक सवाल में बदल चुका है।
आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि हवारा की पैरोल सिर्फ एक मां-बेटे की मुलाकात तक सीमित रहती है या पंजाब की चुनावी सियासत में इसका असर उससे कहीं ज्यादा दूर तक जाता है।

