1984 के सिख विरोधी दंगों के दोषी सज्जन कुमार की मौत के बाद सियासत गरमाई, पहले दीपेंद्र हुड्डा की टिप्पणी पर कांग्रेस को सफाई देनी पड़ी, अब परिवार से मिलने पहुंचे बीजेपी के तीन सांसदों पर पार्टी ने कार्रवाई शुरू की

आरके सेठी
चंडीगढ़, 29 अगस्त.
1984 के सिख विरोधी दंगों का जख्म पंजाब की राजनीति में एक बार फिर हरा होता दिखाई दे रहा है. सज्जन कुमार की मौत के बाद शुरू हुआ विवाद पहले कांग्रेस के दरवाजे तक पहुंचा, जहां दीपेंद्र सिंह हुड्डा की टिप्पणी को लेकर पार्टी को पंजाब में सफाई देनी पड़ी. अब यही विवाद बीजेपी के लिए सिरदर्द बन गया है. सज्जन कुमार के परिवार से मिलने पहुंचे बीजेपी के तीन सांसदों को पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन ने तलब कर फटकार लगाई है. बीजेपी के भीतर से एच.एस. फूलका ने विरोध किया, दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने कार्रवाई की मांग की और पंजाब बीजेपी ने भी इस दौरे से खुद को अलग कर लिया. सवाल इसलिए बड़ा है कि 2027 के चुनाव से पहले क्या 1984 एक बार फिर पंजाब की सियासत के केंद्र में लौट रहा है?
कांग्रेस की टिप्पणी से शुरू हुआ विवाद
सज्जन कुमार का निधन 20 अगस्त को हुआ था. 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में दोषी ठहराए गए सज्जन कुमार उम्रकैद की सजा काट रहे थे. दिल्ली हाईकोर्ट ने 2018 में पांच सिखों की हत्या से जुड़े मामले में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी. 2025 में एक दूसरे 1984 मामले में भी उन्हें दोषी ठहराया गया था.
उनकी मौत के बाद कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा की श्रद्धांजलि को लेकर विवाद खड़ा हुआ. हुड्डा ने सज्जन कुमार के राजनीतिक जीवन और दिल्ली के विकास में उनके योगदान का उल्लेख करते हुए उनके निधन को राजनीतिक क्षेत्र के लिए नुकसान बताया. इसके बाद उनकी टिप्पणी को इस रूप में प्रचारित किया गया कि उन्होंने सज्जन कुमार को “रोल मॉडल” कहा है.
हुड्डा ने बाद में इसका खंडन किया. उन्होंने कहा कि उन्होंने “रोल मॉडल” शब्द का इस्तेमाल नहीं किया और उनकी बात को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया. उन्होंने यह भी कहा कि अगर उनकी टिप्पणी से किसी की भावना आहत हुई है तो उन्हें इसका खेद है. लेकिन तब तक विवाद पंजाब पहुंच चुका था.
चन्नी से वड़िंग तक कांग्रेस में विरोध
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने हुड्डा की टिप्पणी पर कड़ा विरोध जताया और सज्जन कुमार को लेकर कांग्रेस की किसी भी सकारात्मक टिप्पणी से दूरी बनाई. पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने भी पार्टी को हुड्डा की टिप्पणी से अलग किया.
हरियाणा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कुलदीप शर्मा ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखकर हुड्डा को कांग्रेस कार्यसमिति से हटाने तक की मांग कर दी. 1984 के पीड़ित परिवारों और सिख संगठनों की ओर से भी कांग्रेस के खिलाफ विरोध सामने आया.
यानी कांग्रेस को यह बताना पड़ा कि सज्जन कुमार की न्यायिक विरासत और पार्टी की वर्तमान राजनीतिक लाइन को एक साथ नहीं देखा जाना चाहिए.
बीजेपी ने कांग्रेस को घेरा था, लेकिन फिर खुद फंस गई
कांग्रेस के इस विवाद के दौरान बीजेपी के पास हमला करने का मौका था. पार्टी ने सवाल उठाया कि 1984 के दंगों के दोषी ठहराए गए सज्जन कुमार को लेकर कांग्रेस नेता सकारात्मक भाषा का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं. लेकिन कुछ ही समय बाद कहानी बीजेपी के सामने आ खड़ी हुई.
दिल्ली से बीजेपी के तीन लोकसभा सांसद रामवीर सिंह बिधूड़ी, योगेंद्र चंदोलिया और कमलजीत सहरावत सज्जन कुमार के परिवार से मिलने पहुंचे और उनके निधन पर संवेदना जताई. बीजेपी की ओर से सफाई दी गई कि तीनों सांसद पार्टी प्रतिनिधि के तौर पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत हैसियत में परिवार से मिलने गए थे. लेकिन 1984 की संवेदनशीलता और सज्जन कुमार की न्यायिक स्थिति को देखते हुए यह दौरा राजनीतिक विवाद में बदल गया.
फूलका ने उठाया सवाल, बीजेपी के भीतर से आया विरोध
इस विवाद में सबसे महत्वपूर्ण आवाज बीजेपी के वरिष्ठ नेता एच.एस. फूलका की रही. 1984 के पीड़ित परिवारों की लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़ने वाले फूलका अप्रैल 2026 में बीजेपी में शामिल हुए थे. फूलका ने तीनों बीजेपी सांसदों के सज्जन कुमार के घर जाने की कड़ी निंदा की. उनका सवाल सीधा था कि संवेदना उन लोगों के परिवारों के साथ होनी चाहिए जो 1984 की हिंसा के पीड़ित रहे, न कि उस व्यक्ति के परिवार के साथ जिसे उन मामलों में दोषी ठहराया गया था. फूलका ने तीनों सांसदों के बहिष्कार की मांग तक कर दी. यह बीजेपी के लिए इसलिए असहज करने वाला था क्योंकि विरोध विपक्ष की तरफ से नहीं, पार्टी के भीतर से आया था.
नितिन नबीन ने तीनों सांसदों को तलब किया
फूलका की आपत्ति के बाद बीजेपी नेतृत्व ने मामले को हल्के में नहीं लिया. बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने रामवीर सिंह बिधूड़ी, योगेंद्र चंदोलिया और कमलजीत सहरावत को तलब किया. पार्टी सूत्रों के मुताबिक नबीन ने तीनों सांसदों को फटकार लगाते हुए कहा कि उन्हें सज्जन कुमार के घर नहीं जाना चाहिए था. सांसदों से उनके इस कदम पर स्पष्टीकरण भी मांगा गया.
बीजेपी प्रवक्ता आर.पी. सिंह ने सफाई दी कि तीनों सांसद निजी हैसियत में गए थे और यह पार्टी का आधिकारिक कार्यक्रम नहीं था.
लेकिन राजनीतिक संदेश इससे कहीं बड़ा निकलता है. बीजेपी ने सिर्फ यह कहकर मामला खत्म नहीं किया कि सांसद निजी तौर पर गए थे. पार्टी अध्यक्ष के स्तर पर हस्तक्षेप करके यह संकेत दिया गया कि सज्जन कुमार और 1984 के मुद्दे पर पार्टी अपनी घोषित राजनीतिक लाइन से कोई भ्रम पैदा नहीं होने देना चाहती.
पंजाब बीजेपी ने भी बनाई दूरी
विवाद बढ़ने के बाद पंजाब बीजेपी ने भी तीनों सांसदों के दौरे से दूरी बना ली. पंजाब बीजेपी अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने इसे बेहद पीड़ादायक और दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए 1984 के पीड़ित परिवारों की भावनाओं का हवाला दिया.
यह प्रतिक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे विवाद दिल्ली बीजेपी तक सीमित नहीं रहा. पंजाब बीजेपी को भी यह महसूस हुआ कि इस मामले का असर सीधे पंजाब की राजनीतिक जमीन पर पड़ सकता है.
तीनों सांसदों का पुराना राजनीतिक कनेक्शन
इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. रामवीर सिंह बिधूड़ी, कमलजीत सहरावत और योगेंद्र चंदोलिया जिन दक्षिण दिल्ली, पश्चिम दिल्ली और उत्तर-पश्चिम दिल्ली क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे पुराने बाहरी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र के पुनर्गठन के बाद बने क्षेत्र हैं. सज्जन कुमार लंबे समय तक बाहरी दिल्ली से कांग्रेस सांसद रहे थे.
रिपोर्टों के मुताबिक तीनों बीजेपी सांसद उसी प्रभावशाली समुदाय से आते हैं जिसका कभी सज्जन कुमार प्रतिनिधित्व करते थे.
इससे उनके “व्यक्तिगत हैसियत” में परिवार से मिलने की सफाई को एक सामाजिक और स्थानीय राजनीतिक संदर्भ मिलता है. लेकिन यही सवाल भी पैदा करता है कि क्या पुराना सामाजिक-राजनीतिक संबंध 1984 की न्यायिक विरासत से अलग करके देखा जा सकता है?
बीजेपी की अपनी 1984 वाली लाइन भी सवालों में
यह विवाद बीजेपी के लिए इसलिए भी गंभीर है क्योंकि 1984 के सिख विरोधी दंगों और पीड़ितों के न्याय का मुद्दा लंबे समय से कांग्रेस के खिलाफ बीजेपी के राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहा है. दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन को पत्र लिखकर तीनों सांसदों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है. कमेटी ने बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और राजनाथ सिंह की 1984 के पीड़ितों के न्याय की लड़ाई में भूमिका का भी उल्लेख किया.
डीएसजीएमसी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 1984 की पीड़िता जगदीश कौर से मुलाकात और पुराने मामलों की जांच दोबारा शुरू होने का भी हवाला दिया.
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि तीन सांसद सज्जन कुमार के परिवार से मिलने क्यों गए. सवाल यह भी है कि क्या उनका कदम बीजेपी की उस राजनीतिक विरासत के विपरीत संदेश देता है, जिसके आधार पर पार्टी कांग्रेस को 1984 के मुद्दे पर घेरती रही है?
AAP को मिला दोनों राष्ट्रीय दलों पर हमला करने का मौका
इस पूरे विवाद का तत्काल राजनीतिक फायदा आम आदमी पार्टी उठाने की कोशिश कर रही है. AAP पंजाब के मीडिया प्रभारी बलतेज पन्नू ने कांग्रेस और बीजेपी दोनों के मामलों को जोड़ते हुए सवाल उठाया कि जब कांग्रेस नेता की सज्जन कुमार को लेकर टिप्पणी पर बीजेपी ने कांग्रेस को घेरा था, तो अब उसके अपने सांसद सज्जन कुमार के परिवार से मिलने कैसे पहुंच गए? AAP के लिए यह कांग्रेस और बीजेपी दोनों को एक साथ कठघरे में खड़ा करने का मौका है.
अकाली दल के सामने भी नई चुनौती
1984 का मुद्दा अकाली दल की पारंपरिक पंथक राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. इसलिए बीजेपी सांसदों के इस दौरे पर अकाली दल की प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है. लेकिन यहां बीजेपी और अकाली दल के संभावित राजनीतिक समीकरण की एक दूसरी परत भी है. 2027 से पहले दोनों दलों के बीच नजदीकी और संभावित गठबंधन की चर्चाएं चल रही हैं. ऐसे में अकाली दल के सामने एक तरफ 1984 जैसे पंथक मुद्दे पर बीजेपी पर दबाव बनाने की जरूरत है, तो दूसरी तरफ संभावित गठबंधन की राजनीतिक जमीन बचाए रखने की चुनौती भी है. यही वजह है कि सज्जन कुमार प्रकरण आने वाले दिनों में बीजेपी-अकाली संबंधों की संवेदनशीलता का भी परीक्षण कर सकता है.
क्या 1984 फिर 2027 की सियासत में लौट रहा है?
सज्जन कुमार प्रकरण को अगर पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम के साथ जोड़कर देखें तो एक राजनीतिक पैटर्न दिखाई देता है. पहले कांग्रेस नेता की टिप्पणी पर विवाद हुआ. पंजाब कांग्रेस को उससे दूरी बनानी पड़ी. चन्नी और दूसरे नेताओं ने विरोध किया. हुड्डा को सफाई देनी पड़ी.
फिर बीजेपी के तीन सांसद सज्जन कुमार के परिवार से मिलने पहुंचे. बीजेपी के भीतर से एच.एस. फूलका ने विरोध किया. डीएसजीएमसी ने कार्रवाई की मांग की. पंजाब बीजेपी ने दौरे से दूरी बनाई और बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने तीनों सांसदों को तलब कर फटकार लगाई.
इसका मतलब यह नहीं कि 2027 का चुनाव सिर्फ 1984 के मुद्दे पर लड़ा जाएगा. पंजाब की राजनीति में किसान, कर्मचारी, नशा, बेरोजगारी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, शासन और स्थानीय नेतृत्व जैसे मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण रहेंगे.
लेकिन 1984 ऐसा मुद्दा है जिस पर किसी भी राजनीतिक दल की एक छोटी-सी चूक भी सामान्य चुनावी बयान से कहीं बड़ा राजनीतिक असर पैदा कर सकती है.
बीजेपी के लिए यह सिर्फ तीन सांसदों की गलती नहीं
नितिन नबीन की कार्रवाई को केवल तीन सांसदों को डांटने के रूप में देखना अधूरा होगा. इसे एक तरह के प्री-एम्प्टिव डैमेज कंट्रोल के रूप में भी देखा जा सकता है.
बीजेपी पंजाब में अपना राजनीतिक आधार बढ़ाना चाहती है. ऐसे में सिख मतदाताओं के बीच 1984 को लेकर गलत संदेश जाने देना पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है. खासकर तब, जब पार्टी के भीतर ही एच.एस. फूलका जैसे नेता मौजूद हैं, जिनकी पहचान 1984 पीड़ितों के न्याय की लड़ाई से जुड़ी रही है.
इसलिए बीजेपी ने तेजी से यह संदेश देने की कोशिश की है कि तीन सांसदों का निजी फैसला पार्टी की आधिकारिक लाइन नहीं है.
कांग्रेस और बीजेपी बैकफुट पर, लेकिन दोनों की स्थिति अलग
इस पूरे प्रकरण में कांग्रेस और बीजेपी दोनों बैकफुट पर जरूर दिखाई दे रही हैं, लेकिन दोनों की परिस्थितियां समान नहीं हैं. कांग्रेस के मामले में विवाद उसके एक नेता की टिप्पणी से शुरू हुआ. पार्टी के पंजाब नेताओं को उससे दूरी बनानी पड़ी और संबंधित नेता को सफाई देनी पड़ी.
बीजेपी के मामले में उसके तीन मौजूदा सांसद सज्जन कुमार के परिवार से मिलने पहुंचे. पार्टी ने पहले इसे व्यक्तिगत दौरा बताया और फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष ने खुद हस्तक्षेप कर उन्हें फटकार लगाई.
इसलिए दोनों मामलों को एक जैसा बताने के बजाय यह समझना जरूरी है कि दोनों राष्ट्रीय दलों को 1984 के मुद्दे पर अपने-अपने तरीके से डैमेज कंट्रोल करना पड़ा है. और यही पंजाब के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत है.
1984 बीता हुआ अध्याय नहीं
सज्जन कुमार की मौत के बाद पैदा हुआ विवाद एक बार फिर यह सवाल सामने ला रहा है कि 1984 पंजाब की राजनीति में आखिर कितना पीछे छूटा है. शायद जवाब साफ है—इतना नहीं, जितना राष्ट्रीय राजनीति कभी-कभी मान लेती है.
पंजाब में 1984 सिर्फ एक पुरानी घटना नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की स्मृति, न्याय की लंबी लड़ाई और सिख राजनीतिक चेतना से जुड़ा विषय है. यही वजह है कि कांग्रेस की एक टिप्पणी हो या बीजेपी के तीन सांसदों का एक निजी दौरा- राजनीतिक प्रतिक्रिया तत्काल और तीखी हो जाती है.
2027 से पहले यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि पंजाब में सत्ता के लिए मुकाबला अब धीरे-धीरे तेज हो रहा है. AAP सत्ता बचाने की कोशिश में है, कांग्रेस वापसी का रास्ता तलाश रही है, बीजेपी अपना आधार बढ़ा रही है और अकाली दल अपनी पंथक जमीन को फिर मजबूत करने की कोशिश में है. ऐसे में सज्जन कुमार प्रकरण ने सभी दलों को एक चेतावनी दे दी है.

