HomePunjabपंजाब में AAP के खिलाफ असंतोष, लेकिन विपक्ष अभी भी बिखरा हुआ!

पंजाब में AAP के खिलाफ असंतोष, लेकिन विपक्ष अभी भी बिखरा हुआ!

कर्मचारी, किसान और कानून-व्यवस्था के सवालों से घिरी मान सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि बिखरे असंतोष को एक राजनीतिक विकल्प में बदलने की है!

आरके सेठी
चंडीगढ़, 30 अगस्त.

पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव की जमीन तैयार होने लगी है. भगवंत मान सरकार के सामने एक साथ कई मोर्चे खुलते दिखाई दे रहे हैं. सरकारी कर्मचारी सड़कों पर हैं, किसान फिर आंदोलन की तैयारी में हैं और कानून-व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. यानी सरकार के खिलाफ असंतोष अब अलग-अलग वर्गों की नाराजगी तक सीमित नहीं रह गया है. कई मोर्चों पर उसकी मौजूदगी दिखाई देने लगी है. लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है- इस असंतोष को एक राजनीतिक दिशा देने वाला विपक्ष अभी दिखाई नहीं दे रहा.

महाबंद ने सरकार को बड़ा राजनीतिक संकेत दिया

27 अगस्त का कर्मचारी महाबंद इस बदलती तस्वीर का सबसे बड़ा संकेत है. पंजाब के 150 से ज्यादा कर्मचारी संगठनों के साझा मंच के तहत तीन लाख से ज्यादा कर्मचारियों ने सामूहिक छुट्टी लेकर विरोध दर्ज कराया, जबकि करीब 3.5 लाख पेंशनरों ने भी आंदोलन को समर्थन दिया. सरकारी दफ्तरों से लेकर अस्पतालों और दूसरी सार्वजनिक सेवाओं तक इसका असर दिखाई दिया. यह सिर्फ डीए या पेंशन का मामला नहीं रह गया. यह उस बड़े कर्मचारी-पेंशनर वर्ग की नाराजगी का सार्वजनिक प्रदर्शन था, जिसे किसी भी सरकार के लिए चुनावी नजरिए से नजरअंदाज करना आसान नहीं होता.

सरकार और कर्मचारियों के बीच बातचीत भी टूट गई

टकराव उस समय और बढ़ गया जब मुख्यमंत्री भगवंत मान की कर्मचारियों के साथ प्रस्तावित बैठक रद्द हो गई. सरकार का तर्क था कि हड़ताल जारी रहते हुए बातचीत नहीं हो सकती, जबकि कर्मचारी संगठनों ने बिना शर्त बातचीत की मांग रखी. यानी जिस जगह बातचीत से रास्ता निकल सकता था, वहां अब शर्तों और जवाबी दबाव की राजनीति खड़ी हो गई है.

अब नोटिस ने विवाद को और गहरा कर दिया

महाबंद के बाद सरकार ने ड्यूटी से अनुपस्थित कर्मचारियों के खिलाफ शो-कॉज नोटिस और अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए हैं. करीब 2,500 कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होने की रिपोर्ट है. कर्मचारी संगठनों ने इसे दबाव बनाने की कोशिश बताया है और चेतावनी दी है कि सरकार की यह रणनीति उलटी भी पड़ सकती है.

कर्मचारी आंदोलन की अगली पारी बाकी है

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कर्मचारी आंदोलन 27 अगस्त पर खत्म नहीं हुआ. 150 से ज्यादा कर्मचारी और पेंशनर संगठनों की बैठक अब अगली रणनीति तय करने वाली है. यानी सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच टकराव आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है. मांगें भी स्पष्ट हैं—लंबित 18 फीसदी डीए, ओल्ड पेंशन स्कीम की बहाली, कॉन्ट्रैक्चुअल कर्मचारियों का नियमितीकरण और दूसरी सेवा संबंधी मांगें.

अब किसानों ने भी मोर्चा खोल दिया है

कर्मचारियों के बाद किसान संगठनों ने भी सरकार पर दबाव बढ़ाने की तैयारी कर ली है. संयुक्त किसान मोर्चा 1 से 7 सितंबर तक चंडीगढ़-मोहाली में सप्ताहभर का धरना करने जा रहा है. इसके लिए पंजाब के अलग-अलग हिस्सों से ट्रैक्टर-ट्रॉलियां और दूसरे वाहन चंडीगढ़-मोहाली की ओर आने की तैयारी में हैं. प्रशासन के साथ धरना स्थल, पार्किंग, पानी, सफाई और ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर भी बातचीत हो चुकी है.

किसानों की मांगें भी छोटी नहीं हैं

एसकेएम के एजेंडे में पंजाब के नदी जल से जुड़े पुराने समझौतों पर विशेष विधानसभा सत्र, किसानों और कृषि मजदूरों की पूर्ण कर्जमाफी, सभी फसलों पर एमएसपी, डैम सेफ्टी एक्ट और दूसरे कृषि कानूनों से जुड़े सवाल शामिल हैं. यानी सितंबर का किसान आंदोलन सिर्फ किसी एक मांग तक सीमित नहीं है. यह पंजाब के पानी, खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े बड़े सवालों को एक साथ राजनीतिक मंच पर लाने की कोशिश है.

आंदोलन से पहले ही पुलिस कार्रवाई का संदेश

29 अगस्त को फरीदकोट में बीकेयू एकता सिधूपुर के कार्यकर्ताओं को पंजाब स्टेट कोऑपरेटिव एग्रीकल्चर डेवलपमेंट बैंक के बाहर प्रदर्शन के लिए इकट्ठा होने से रोका गया और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया. संगठन की मांगों में कर्ज से जुड़े मामलों में वन टाइम सेटलमेंट और बैंक द्वारा लिए गए ब्लैंक चेक लौटाने जैसे मुद्दे शामिल थे. सितंबर के बड़े किसान मोर्चे से ठीक पहले हुई यह कार्रवाई सरकार और किसान संगठनों के बीच बढ़ते तनाव का संकेत देती है.

कानून-व्यवस्था ने तीसरा सवाल जोड़ दिया

इसी बीच कानून-व्यवस्था का मुद्दा भी सरकार की परेशानी बढ़ा रहा है. फिरोजपुर के ममदोट में AAP नेता गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी की गोली मारकर हत्या ने स्थानीय राजनीतिक हिंसा और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए हैं. पुलिस पुराने विवाद और चुनावी रंजिश जैसे एंगल से जांच कर रही है. इसलिए अभी इसे सीधे राजनीतिक हत्या कहना जल्दबाजी होगी. लेकिन चुनाव से पहले सत्तारूढ़ दल के एक स्थानीय नेता की हत्या विपक्ष को सरकार पर हमला करने का एक और मुद्दा जरूर देती है.

लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है

इतने सारे मुद्दों के बावजूद AAP के लिए सबसे बड़ी राहत यह है कि सरकार के खिलाफ बनता असंतोष अभी किसी एक राजनीतिक विकल्प के पीछे खड़ा नहीं है. यही पंजाब की मौजूदा राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है. सरकार पर सवाल बढ़ रहे हैं, लेकिन विपक्ष के पास इन सवालों को एक साथ जोड़कर जनता के सामने रखने वाला साझा राजनीतिक नैरेटिव अभी नहीं है.

कांग्रेस के सामने मौका भी है और चुनौती भी

कांग्रेस सबसे बड़ी विपक्षी ताकत है. कर्मचारी आंदोलन के दौरान पार्टी ने सरकार पर हमला भी किया है. लेकिन सिर्फ AAP की आलोचना से यह नाराजगी कांग्रेस के पक्ष में वोट नहीं बदलने वाली. कांग्रेस को यह बताना होगा कि वह सत्ता में लौटकर क्या अलग करेगी. उसे सरकार विरोधी असंतोष को अपने पक्ष में राजनीतिक ऊर्जा में बदलने के लिए संगठन, नेतृत्व और स्पष्ट राजनीतिक विकल्प—तीनों को मजबूत करना होगा.

अकाली दल ने भी जमीन पर सक्रियता बढ़ाई

शिरोमणि अकाली दल के लिए 2027 का चुनाव अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस हासिल करने की लड़ाई है. पार्टी ने ‘पंजाब बचाओ’ अभियान के दूसरे चरण को फिर सक्रिय किया है और लगातार रैलियां कर रही है. इसका मतलब साफ है कि अकाली दल सिर्फ किसी संभावित गठबंधन की प्रतीक्षा नहीं कर रहा, बल्कि अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन को भी फिर से मजबूत करने की कोशिश में है.

BJP-SAD ने चुनावी गणित को और उलझा दिया

अब सबसे दिलचस्प राजनीतिक पेच BJP और SAD को लेकर है. BJP के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि पार्टी पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ेगी. BJP ने अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने की तैयारी भी शुरू कर दी है.
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. सार्वजनिक रूप से अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी के बावजूद BJP और SAD के बीच पर्दे के पीछे सीट-शेयरिंग को लेकर बातचीत जारी होने की रिपोर्टें सामने आ रही हैं. यानी पंजाब BJP के लिए एक साथ दो राजनीतिक स्क्रिप्ट चलती दिखाई दे रही हैं—कैडर को अकेले लड़ने के लिए तैयार करना और संभावित गठबंधन का रास्ता खुला रखना.

साथ आए तो AAP के सामने नई चुनौती

अगर BJP और SAD के बीच समझ बनती है, तो 2027 का चुनावी गणित निश्चित रूप से बदल सकता है. दोनों दलों का सामाजिक और राजनीतिक आधार अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभाव रखता है. 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों के विधानसभा क्षेत्रवार विश्लेषण को देखें तो BJP और SAD मिलकर कई सीटों पर मजबूत स्थिति में थे. यही गणित दोनों दलों को फिर से बातचीत की मेज तक ला सकता है.

अलग रहे तो विपक्षी वोट और बंट सकता है

लेकिन अगर BJP और SAD अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं, तो सरकार विरोधी वोट के बंटने की संभावना और बढ़ जाएगी. पंजाब का चुनाव पहले ही बहुकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ रहा है. कांग्रेस, BJP, SAD, BSP और AAP के अलग-अलग मैदान में होने की स्थिति में कुछ हजार वोटों का अंतर कई सीटों का परिणाम बदल सकता है.

BSP ने भी अपना रास्ता अलग चुना

BSP ने पंजाब में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है. पंजाब में दलित आबादी का बड़ा सामाजिक आधार है और कुछ क्षेत्रों में BSP की पारंपरिक मौजूदगी रही है. उसका फैसला पूरे राज्य में सत्ता का समीकरण अकेले बदल दे, यह कहना जल्दबाजी होगी. लेकिन कई सीटों पर वह मुकाबले को प्रभावित करने की क्षमता रखती है. खासकर तब, जब मुकाबला कुछ हजार वोटों के अंतर तक सिमट जाए.

विपक्ष के पास मुद्दे हैं, लेकिन एक मंच नहीं

यानी आज पंजाब में विपक्ष के पास सरकार को घेरने के लिए मुद्दों की कमी नहीं है. कर्मचारी असंतुष्ट हैं. किसान आंदोलित हैं. कानून-व्यवस्था पर सवाल हैं. ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार के मुद्दे हैं. कांग्रेस सरकार को घेर रही है. अकाली दल अपनी राजनीतिक जमीन फिर तैयार कर रहा है. BJP विस्तार की तैयारी कर रही है. BSP अपना अलग रास्ता चुन चुकी है. लेकिन इन सभी को जोड़ने वाला एक साझा विपक्षी मंच अभी नजर नहीं आता.

यही AAP की सबसे बड़ी राजनीतिक राहत है

AAP सरकार के खिलाफ असंतोष जितना दिखाई दे रहा है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह अभी बिखरा हुआ है. कर्मचारी अपने संगठन के साथ हैं. किसान अपने मंच के साथ हैं. कांग्रेस अपनी रणनीति बना रही है. अकाली दल अपनी जमीन तलाश रहा है. BJP विस्तार की तैयारी में है और BSP अलग रास्ते पर है. इन सबके बीच सरकार विरोधी वोट का एक जगह जमा होना अभी दूर की बात दिखाई देती है.

लेकिन यही राहत खतरे में भी बदल सकती है

राजनीति में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं. अगर कर्मचारी आंदोलन लंबा चलता है, किसान आंदोलन सितंबर के बाद भी असर बनाए रखता है, कानून-व्यवस्था के सवाल बने रहते हैं और विपक्षी दल इन मुद्दों को एक साझा चुनावी नैरेटिव में बदलने में सफल होते हैं, तो आज का बिखरा असंतोष कल एक राजनीतिक लहर बन सकता है.

2027 का असली सवाल यही है

इसलिए पंजाब की राजनीति में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि AAP के खिलाफ असंतोष है या नहीं. असंतोष है और उसके संकेत अब कई मोर्चों पर दिखाई दे रहे हैं. असली सवाल यह है कि क्या कोई राजनीतिक ताकत इस असंतोष को अपने पक्ष में वोट में बदल पाएगी?
क्योंकि चुनाव सिर्फ सरकार के खिलाफ नाराजगी से नहीं जीते जाते. चुनाव जीतने के लिए नाराजगी को दिशा देनी पड़ती है, उसे संगठन देना पड़ता है और जनता के सामने एक भरोसेमंद विकल्प रखना पड़ता है.

पंजाब की लड़ाई अभी खुली है

फिलहाल AAP के खिलाफ हवा के कई झोंके दिखाई दे रहे हैं, लेकिन वे अभी एक तूफान नहीं बने हैं. सरकार के सामने चुनौतियां पहले से ज्यादा दिखाई दे रही हैं, लेकिन विपक्ष अभी भी अपने-अपने खेमों, सामाजिक आधार और राजनीतिक हितों में बंटा हुआ है.
2027 तक पंजाब की राजनीति में सबसे बड़ा खेल इसी बात का होगा कि कौन पहले समझता है कि असंतोष सिर्फ खबर नहीं होता—उसे वोट में बदलने के लिए एक कहानी, एक चेहरा और एक संगठन चाहिए.

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