HomePunjabसुप्रीम कोर्ट में हत्या केस की फाइनल सुनवाई से पहले राम रहीम...

सुप्रीम कोर्ट में हत्या केस की फाइनल सुनवाई से पहले राम रहीम का ‘साजिश’ नैरेटिव: द हिंदू और भास्कर में फुल-पेज भ्रामक विज्ञापन

डेरा सच्चा सौदा की तरफ से 12 सितंबर को दोनों अखबारों में राम रहीम के पक्ष में ‘फैक्ट्स वर्सेज फिक्शन’ कैंपेन; विज्ञापन में ‘झूठे गवाह’ और ‘झूठे केस’ का दावा, पैरोल को वीआईपी ट्रीटमेंट मानने से इनकार- लेकिन हकीकत में छत्रपति हत्याकांड में 10 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने अपील को नवंबर में फाइनल सुनवाई के लिए लगाया, जबकि रणजीत सिंह हत्याकांड और कथित कैस्ट्रेशन मामला भी अभी अदालतों में चल रहा है।

अंशुल छत्रपति का पलटवार: विज्ञापन को पत्रकारिता पर कलंक बताया, ‘साजिश’ और ‘झूठे गवाह’ के नैरेटिव पर सवाल, ‘मानव भलाई’ के दावों के बीच कानून और जवाबदेही की याद दिलाई

आरके सेठी
चंडीगढ़, 12 सितम्बर।

12 सितंबर 2026 को देश के दो बड़े अखबारों- द हिंदू और दैनिक भास्कर, में डेरा सच्चा सौदा और उसके प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के पक्ष में फुल-पेज पेड विज्ञापन प्रकाशित हुआ। विज्ञापन का शीर्षक था- “व्हाट इज़ डेरा सच्चा सौदा?- फैक्ट्स वर्सेज फिक्शन”। सवाल-जवाब के अंदाज में तैयार इस पूरे पेज में डेरा की छवि, राम रहीम के खिलाफ लगे आरोपों और उनकी पैरोल-फर्लो को लेकर डेरा का पक्ष रखा गया। दोनों अखबारों ने नीचे डिस्क्लेमर देकर साफ किया कि विज्ञापन की सामग्री में उनका संपादकीय या पत्रकारिता संबंधी हस्तक्षेप नहीं है। डेरा सच्चा सौदा की ओर से शुरू की गई इस कैंपेन को लेकर नैतिक और कानूनी पहलुओं पर बहस छिड़ गई है। कोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच इस तरह की एकतरफा कैंपेन को लेकर जहां न्यायिक अवरोध बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, वहीं मीडिया एथिक्स को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

सवाल-जवाब पहले से तय, जवाब भी पहले से तैयार

विज्ञापन की सबसे महत्वपूर्ण लाइन वह है जहां पूछा गया-“क्या गुरु जी के खिलाफ साजिश थी?” जवाब आता है-“यस, एब्सोल्यूटली।” आगे विज्ञापन में दावा किया गया कि झूठे गवाह तैयार किए गए, झूठे मुकदमे बनाए गए और डेरा की नशामुक्ति मुहिम से परेशान “ड्रग माफिया” और दूसरी ताकतों ने राम रहीम को निशाना बनाया। यानी सवाल रखने के साथ ही विज्ञापन उसका निष्कर्ष भी खुद तय कर देता है- साजिश थी और मुकदमे उस साजिश का हिस्सा थे।

लेकिन ‘साजिश’ के दावे के सामने कोर्ट रिकॉर्ड क्या कहता है?

यहीं से फैक्ट्स वर्सेज फिक्शन की असली जांच शुरू होती है। राम रहीम को 2019 में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में विशेष सीबीआई अदालत ने दोषी ठहराकर उम्रकैद की सजा दी थी। 7 मार्च 2026 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने उस फैसले को पलटते हुए राम रहीम को बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने मुख्य गवाह खट्टा सिंह की गवाही और सीबीआई की जांच से जुड़े कई पहलुओं पर गंभीर सवाल उठाए। लेकिन इस फैसले का अर्थ यह नहीं था कि अदालत ने राम रहीम के खिलाफ सभी मुकदमों को “झूठा” या किसी व्यापक साजिश का परिणाम घोषित कर दिया।

10 अगस्त का सुप्रीम कोर्ट आदेश- कहानी यहीं फिर खुलती है

हाईकोर्ट के बरी करने के बाद मामला खत्म नहीं हुआ। छत्रपति के बेटे अरीदमन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और 10 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील को फाइनल हियरिंग के लिए सूचीबद्ध कर दिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मामले को विचार योग्य माना और इसे 16 नवंबर से शुरू होने वाले सप्ताह में फाइनल हियरिंग के लिए लगाया। यानी हाईकोर्ट का फैसला अंतिम न्यायिक अध्याय नहीं है।

25 अगस्त से 16 नवंबर- तीन तारीखें, एक बड़ा सवाल

यहां टाइमिंग पर गौर करना जरूरी है। 25 अगस्त 2026 को राम रहीम को 21 दिन की फर्लो मिली- यह उसकी 17वीं अस्थायी रिहाई थी। 12 सितंबर को दो बड़े अखबारों में “फैक्ट्स वर्सेज फिक्शन” वाला फुल-पेज कैंपेन सामने आया। और 16 नवंबर से शुरू होने वाले सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट छत्रपति हत्याकांड में हाईकोर्ट से मिली बरी होने की चुनौती पर फाइनल हियरिंग करने वाला है। इन तीन तारीखों को एक साथ रखकर देखने पर विज्ञापन की टाइमिंग कम से कम एक गंभीर सार्वजनिक और कानूनी सवाल जरूर खड़ा करती है।

नवंबर में अदालत फिर खोलेगी हत्या का यह अध्याय

एक तरफ सुप्रीम कोर्ट में छत्रपति हत्याकांड में हाईकोर्ट से हुई बरी होने की कार्रवाई की फाइनल हियरिंग तय है, दूसरी तरफ उसी से कुछ सप्ताह पहले अखबारों के फुल-पेज विज्ञापन में जनता को बताया जा रहा है कि राम रहीम के खिलाफ “झूठे गवाह” और “झूठे केस” की साजिश हुई। अदालत ने अभी इस अपील पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। इसलिए विज्ञापन का निष्कर्ष और न्यायिक प्रक्रिया- दोनों को एक ही चीज मानना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। जाहिर है, यह एक ऐसा नैरेटिव तैयार करने की नजर आती है, जिसमें डेरा प्रमुख को पब्लिक की नजर में ‘मसीहा’ साबित किया जाए!

रणजीत सिंह हत्याकांड भी पूरी तरह बंद नहीं हुआ

दूसरा बड़ा हत्या मामला डेरा के पूर्व मैनेजर रणजीत सिंह की 2002 में हुई हत्या का है। मई 2024 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने राम रहीम और चार अन्य आरोपियों को बरी कर दिया था और सीबीआई जांच को “टेंटेड एंड स्केची” बताया था। लेकिन इस फैसले के खिलाफ सीबीआई की अपील पर जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया। इस मामले में भी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी बाकी है।

करीब 400 अनुयायियों की कथित जबरन कैस्ट्रेशन का मामला भी जारी

तीसरा मामला करीब 400 डेरा अनुयायियों की कथित जबरन कैस्ट्रेशन से जुड़ा है। सीबीआई ने जांच के बाद इस मामले में चार्जशीट दाखिल की थी। मामला विशेष सीबीआई अदालत में न्यायिक प्रक्रिया में है। 2026 की रिपोर्टिंग में यह मुकदमा गवाही और क्रॉस-एग्जामिनेशन के अंतिम चरण की ओर बढ़ता बताया गया था। ऐसे में अदालत के अंतिम फैसले से पहले इसे भी “झूठा केस साबित हो चुका” बताना न्यायिक रिकॉर्ड से आगे जाना होगा।

बरगाड़ी और 2015 के बेअदबी मामलों का अध्याय भी बाकी

पंजाब के 2015 के बेअदबी मामलों में भी कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। तीन मामलों की ट्रायल प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण रुकी हुई है। राम रहीम से जुड़ी याचिका में पंजाब सरकार के सीबीआई जांच से संबंधित फैसले को चुनौती दी गई है और 29 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर आगे के आदेश तक रोक लगाई थी। यानी पंजाब के सबसे संवेदनशील धार्मिक-राजनीतिक मामलों में से एक का अध्याय भी अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।

अब आते हैं विज्ञापन के दूसरे बड़े दावे- ‘पैरोल कोई वीआईपी ट्रीटमेंट नहीं’

विज्ञापन में पूछा गया- क्या राम रहीम को मिली पैरोल और फर्लो “वीआईपी ट्रीटमेंट” है? जवाब है- “नो, नॉट एट ऑल।” इसके समर्थन में विज्ञापन पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देता है। यह सही है कि इन अस्थायी रिहाइयों को लेकर अदालतों में मामले पहुंचे और आदेश हुए। लेकिन उन आदेशों को राम रहीम की हर पैरोल-फर्लो के लिए व्यापक न्यायिक क्लीन चिट के रूप में पेश करना अलग बात है।

हाईकोर्ट ने हर पैरोल को ‘क्लीन चिट’ नहीं दी थी

अगस्त 2024 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एसजीपीसी की उस याचिका पर फैसला दिया जिसमें राम रहीम को दी गई 40 दिन की पैरोल को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने संबंधित 2022 कानून के तहत प्रक्रिया को देखा, लेकिन उस विशेष पैरोल की वैधता या औचित्य पर अंतिम मेरिट फैसला देने से इसलिए परहेज किया क्योंकि तब तक पैरोल की अवधि समाप्त हो चुकी थी। साथ ही भविष्य की अस्थायी रिहाई के मामलों में कानून के मुताबिक निर्णय लेने और मनमानी, पक्षपात या भेदभाव से बचने की बात कही गई।

सुप्रीम कोर्ट ने भी ‘हर पैरोल सही है’ ऐसा नहीं कहा

फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एसजीपीसी की याचिका खारिज की थी। लेकिन उस आदेश को यह कहने के लिए इस्तेमाल करना कि सुप्रीम कोर्ट ने राम रहीम की सभी पैरोल-फर्लो को न्यायिक रूप से सही ठहरा दिया है, आदेश की सीमा से आगे जाना होगा। विज्ञापन में इस कानूनी बारीकी का कोई विस्तृत संदर्भ नहीं दिया गया है। इसे सिर्फ अपनी सहूलियत के लिहाज से इस्तेमाल किया।

16 पैरोल का दावा-अगस्त में संख्या 17 हो चुकी थी

विज्ञापन में राम रहीम की 16 पैरोल का जिक्र किया गया, लेकिन अगस्त 2026 की 21 दिन की फर्लो के बाद उनकी अस्थायी रिहाई का यह 17वां मौका था। यानी 12 सितंबर को विज्ञापन प्रकाशित होने तक यह आंकड़ा अपडेटेड नहीं था। यह छोटी बात दिख सकती है, लेकिन जब पूरे पेज का शीर्षक ही “फैक्ट्स वर्सेज फिक्शन” हो, तो ऐसे आंकड़े भी जांच के दायरे में आते हैं।

कानून में पैरोल और फर्लो का रास्ता मौजूद है- सवाल उसके इस्तेमाल का है

हरियाणा का 2022 का गुड कंडक्ट प्रिजनर्स टेम्परेरी रिलीज एक्ट कैदियों की अस्थायी रिहाई का कानूनी ढांचा देता है। इसलिए सिर्फ यह तथ्य कि राम रहीम को पैरोल या फर्लो मिली, अपने आप में कानून तोड़े जाने का प्रमाण नहीं है। असली सवाल हर रिलीज के समय लागू पात्रता, प्रक्रिया, प्रशासनिक आदेश और समान परिस्थितियों वाले दूसरे कैदियों के साथ व्यवहार का है। यही वह बारीकी है जिसे विज्ञापन के “नो, नॉट एट ऑल” जैसे निर्णायक जवाब में समेट दिया गया है।

‘फैक्ट्स वर्सेज फिक्शन’ में फैक्ट्स किसके हैं?

विज्ञापन में डेरा की सामाजिक गतिविधियों के बड़े आंकड़े भी दिए गए हैं- 35.40 करोड़ पेड़ लगाने, 33.85 लाख यूनिट रक्तदान, 36 मेट्रो शहरों में सफाई अभियान, 2,368 जरूरतमंद परिवारों को मुफ्त मकान और 22 गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड जैसे दावे। 7.5 करोड़ लोगों को नशे से मुक्त कराने का दावा भी किया गया है। लेकिन ये आंकड़े विज्ञापन में डेरा के दावों के रूप में पेश किए गए हैं; विज्ञापन स्वयं इनके लिए स्वतंत्र सत्यापन उपलब्ध नहीं कराता।

सबसे बड़ा गैप- विज्ञापन में कौन-से तथ्य गायब हैं?

फैक्ट्स वर्सेज फिक्शन के नाम से प्रकाशित इस पेज में राम रहीम की दो महिला अनुयायियों के बलात्कार के मामले में हुई दोषसिद्धि और 20 साल की सजा का कोई प्रमुख संदर्भ नहीं है। हत्या के मामलों में हाईकोर्ट से मिली राहत का नैरेटिव सामने है, लेकिन उन फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लंबित न्यायिक प्रक्रिया और कथित कैस्ट्रेशन मामले की पूरी तस्वीर विज्ञापन में उसी वजन के साथ दिखाई नहीं देती। यही चयन इस विज्ञापन को महज डेरा के परिचयात्मक प्रचार से आगे इमेज-बिल्डिंग कैंपेन के रूप में देखने का आधार देता है।

रामपाल वाला पैटर्न- क्या अदालत से पहले पब्लिक इमेज तैयार करना भी रणनीति है?

हरियाणा में इससे पहले रामपाल का उदाहरण भी सामने है। अप्रैल 2026 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद करीब 11 साल से जेल में बंद रामपाल बाहर आया। उसकी रिहाई के बाद उसके समर्थकों के बीच उनकी वापसी को लेकर जोरदार सोशल मीडिया नैरेटिव देखने को मिला। इसके बाद अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े नेताओं का उनके आश्रम पहुंचना भी रिपोर्ट हुआ। यानी, सोशल इमेज बिल्डिंग कैंपेन को हल्का मान लेना, वो भी तब जब केस कोर्ट में चल रहा हो, तो यक़ीनन ये वाजिब नहीं।

जमानत और इमेज-बिल्डिंग दो अलग चीजें, लेकिन पब्लिक नैरेटिव के इस पैटर्न को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता!

रामपाल और राम रहीम के मामलों को कानूनी तौर पर एक जैसा बताना गलत होगा। लेकिन पब्लिक नैरेटिव के स्तर पर सवाल जरूर बनता है- क्या प्रभावशाली धार्मिक नेताओं के संगठन अदालत की लड़ाई के समानांतर उनकी सार्वजनिक छवि को लगातार मैनेज करते हैं? राम रहीम के मामले में 12 सितंबर का फुल-पेज विज्ञापन इस सवाल को कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर सामने लाता है।

क्या पब्लिक नैरेटिव अब कानूनी लड़ाई का समानांतर मैदान बन रहा है?

यही इस पूरी कहानी का बड़ा सवाल है। अदालत में आरोप, गवाही, सबूत और कानून के आधार पर लड़ाई चलती है। लेकिन उसी समय बाहर एक दूसरा मैदान भी तैयार किया जा सकता है- जहां व्यक्ति को पीड़ित, सामाजिक सुधारक या साजिश का शिकार बताकर जनता के बीच एक वैकल्पिक कहानी बनाई जाए। क्या इमेज मैनेजमेंट अब कानूनी लड़ाई की समानांतर रणनीति बनता जा रहा है? राम रहीम का मौजूदा फुल-पेज कैंपेन इस सवाल को गंभीरता से पूछने का पर्याप्त आधार देता है।

वरिष्ठ वकील ने रविंद्र सिंह ढुल उठाया कंटेम्प्ट का सवाल

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के अधिवक्ता वकील रविंद्र सिंह ढुल ने विज्ञापन की टाइमिंग और उसके कंटेंट पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि “माननीय न्यायालय में लंबित बहुत से मामलों के बावजूद भी जिस प्रकार की एडवरटाइजमेंट का आज इस्तेमाल किया गया है, वह पूरी तरह से न्यायपालिका को न केवल प्रभावित करने का प्रयास है, अपितु इसे न्यायपालिका की अवमानना के रूप में देखा जा सकता है।”

कंटेम्प्ट का सवाल इसलिए गंभीर है

कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971 के तहत ऐसा प्रकाशन जो किसी न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करे, उसमें हस्तक्षेप करे या न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप की प्रवृत्ति रखता हो, क्रिमिनल कंटेम्प्ट के दायरे में आ सकता है। इसलिए सवाल यह नहीं कि “यह विज्ञापन कंटेम्प्ट है”- उसका फैसला सक्षम न्यायिक मंच करेगा। असली सवाल यह है कि क्या विज्ञापन की भाषा, उसके दावे और उसकी टाइमिंग ऐसी हैं कि उनकी कानूनी जांच की जरूरत पैदा होती है।

अखबार का डिस्क्लेमर एक सवाल खत्म करता है, कई सवाल छोड़ जाता है

द हिंदू और दैनिक भास्कर ने विज्ञापन के नीचे साफ लिखा है कि उनकी कोई संपादकीय या पत्रकारिता संबंधी भागीदारी नहीं है और वे प्रकाशित सामग्री की जिम्मेदारी नहीं लेते। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह संपादकीय खबर नहीं बल्कि पेड विज्ञापन है। लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता- क्या डिस्क्लेमर लगा देने से किसी एक पक्ष का नैरेटिव “फैक्ट्स” बन जाता है?

मीडिया एथिक्स का सवाल यहीं सबसे ज्यादा तीखा होता है

बलात्कार के मामले में सजायाफ्ता व्यक्ति और हत्या, बेअदबी तथा कथित जबरन कैस्ट्रेशन से जुड़े मामलों की न्यायिक प्रक्रिया के बीच उसके पक्ष में फ्रंट पेज पर इतना बड़ा पेड विज्ञापन प्रकाशित होना मीडिया एथिक्स का गंभीर सवाल पैदा करता है। खासकर तब, जब विज्ञापन में मामलों को “झूठा”, गवाहों को “झूठा” और पूरे घटनाक्रम को “साजिश” के रूप में पेश किया जा रहा हो। फैक्ट्स वर्सेज फिक्शन लिख देने भर से किसी पक्ष का दावा फैक्ट्स नहीं बन जाता।

अंशुल छत्रपति ने विज्ञापन को बताया ‘पत्रकारिता को शर्मसार करने वाला’

शहीद पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के बेटे अंशुल छत्रपति ने कहा, “राष्ट्रीय मीडिया समूहों द्वारा भारतीय पत्रकारिता को कलंकित करने वाले कृत्य की पुरजोर भर्त्सना की जानी चाहिए।” उन्होंने कहा कि “न्यायपालिका द्वारा घोषित बलात्कारी एवं सजायाफ्ता डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम” के खिलाफ हत्या, साधुओं को नपुंसक बनाने और बेअदबी जैसे गंभीर मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हैं, ऐसे में उसकी छवि चमकाने और इन मामलों को निराधार बताते हुए विज्ञापन प्रकाशित करना “पत्रकारिता को शर्मसार करने वाला” है।

‘साजिश’ के दावे पर अंशुल का सवाल

अंशुल ने विज्ञापन में राम रहीम को साजिश के तहत फंसाया गया बताए जाने पर कहा, “सीबीआई की जांच में आरोपी पाए गए और अदालत के ट्रायल में दोषी पाए गए गुरमीत राम रहीम को जिस तरीके से विज्ञापन द्वारा साजिश के तहत फसाया हुआ बताया गया है, यह सीबीआई, न्यायपालिका और पूरे सिस्टम पर उंगली उठाने जैसा है।” हालांकि, मौजूदा न्यायिक स्थिति यह है कि छत्रपति हत्याकांड में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट राम रहीम को बरी कर चुका है और इस फैसले के खिलाफ अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

‘माफिया के इशारे पर गवाह’ वाले दावे पर पलटवार

अंशुल ने विज्ञापन में गवाहों को कथित रूप से माफिया के इशारे पर काम करने वाला बताए जाने पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा, “जिन गवाहों को विज्ञापनदाता माफिया के इशारे पर काम करने वाले बता रहा है, उनमें से अधिकतर, खासकर बलात्कार पीड़िताएं, साध्वी, यह नपुंसक साधु और अन्य कई गवाह डेरा के ही श्रद्धालु हैं।”

‘मानव भलाई’ के दावों पर संविधान और कानून का सवाल

डेरा की सामाजिक सेवा और मानवता की भलाई से जुड़े दावों पर अंशुल ने सवाल उठाते हुए कहा, “क्या भारतीय संविधान या कानून में कोई प्रावधान है कि आप मानवता की भलाई के कार्य करें और आपको हत्याएं, बलात्कार जैसी संगीन अपराध करने का लाइसेंस दे दिया जाए?” उन्होंने अगस्त 2017 की हिंसा का उल्लेख करते हुए कहा कि डेरा का “मानव भलाई वाला चेहरा” देश ने उस समय भी देखा था, जब राम रहीम को सजा सुनाए जाने के बाद हिंसा का भयावह दौर सामने आया था।

पंजाब 2027- इमेज-बिल्डिंग का राजनीतिक संदर्भ भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

राम रहीम और डेरा सच्चा सौदा का पंजाब की राजनीति से जुड़ाव कोई नया विषय नहीं है। 2027 का पंजाब विधानसभा चुनाव सामने है और डेरा की सामाजिक पहुंच तथा अनुयायियों का राजनीतिक महत्व लंबे समय से चर्चा में रहा है। अगस्त की 17वीं रिहाई भी पंजाब के चुनावी संदर्भ में राजनीतिक विवाद का विषय बनी थी। ऐसे समय में राम रहीम को साजिश का शिकार और डेरा को बड़े पैमाने पर सामाजिक सेवा करने वाली संस्था के रूप में पेश करने वाला इतना बड़ा मीडिया कैंपेन स्वाभाविक रूप से राजनीतिक नजरिए से भी सवाल पैदा करता है।

असली सवाल- अदालत में लड़ाई या पब्लिक नैरेटिव की लड़ाई?

12 सितंबर का यह फुल-पेज विज्ञापन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ डेरा की सामाजिक गतिविधियों का प्रचार नहीं करता। यह राम रहीम के खिलाफ लगे गंभीर आरोपों और मुकदमों की एक वैकल्पिक व्याख्या पेश करता है- “साजिश”, “झूठे गवाह”, “झूठे केस” और “वीआईपी ट्रीटमेंट नहीं”। दूसरी तरफ न्यायिक रिकॉर्ड बताता है कि कुछ मामलों में उन्हें हाईकोर्ट से राहत मिली है, लेकिन कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट में अपील लंबित है, एक कथित कैस्ट्रेशन मामला न्यायिक प्रक्रिया में है और पंजाब के बेअदबी मामलों की प्रक्रिया भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

नवंबर की सुनवाई से पहले यह विज्ञापन क्यों महत्वपूर्ण है?

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि छत्रपति हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट की फाइनल हियरिंग नवंबर में तय है। ऐसे समय में राम रहीम के पक्ष में यह कहना कि उनके खिलाफ “झूठे केस” और “झूठे गवाहों” की साजिश हुई, एक सामान्य पीआर लाइन भर नहीं रह जाता। यह एक ऐसा सार्वजनिक नैरेटिव है जिसे अब उसी अदालत के रिकॉर्ड के साथ पढ़ना होगा, जहां नवंबर में इसी हत्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करने वाला है।

‘फैक्ट्स वर्सेज फिक्शन’ की असली परीक्षा अब शुरू

इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यह नहीं कि विज्ञापन में राम रहीम का पक्ष क्यों रखा गया। अहम बात यह है कि फैक्ट्स वर्सेज फिक्शन के नाम से पेश किए गए इस नैरेटिव में कौन-से फैक्ट्स चुने गए, कौन-से छोड़े गए और किन न्यायिक टिप्पणियों को किस बड़े निष्कर्ष में बदला गया। अदालत अपना फैसला कोर्ट रिकॉर्ड पर करेगी। विज्ञापन अपना नैरेटिव अखबार के पन्ने पर रख चुका है।
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि विज्ञापन किसने छपवाया। सवाल यह भी है कि क्या अदालत में चल रही लड़ाई का एक समानांतर फैसला पब्लिक ओपिनियन के पन्नों पर लिखने की कोशिश की जा रही है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments