हाईकोर्ट के CBI जांच आदेश से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची लड़ाई अब अहम मोड़ पर, जस्टिस शील नागू ने खुद को सुनवाई से अलग किया; नई बेंच के सामने मान सरकार की चुनौती और 2027 से पहले सरकार की छवि पर सवाल!

आरके सेठी
चंडीगढ़, 9 अक्टूबर।
पंजाब में चुनाव से पहले भगवंत मान सरकार के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा हो गया है, जिसका जवाब सिर्फ बयानों से नहीं, अब अदालत में देना होगा! एक तरफ ईमानदार सरकार का दावा, दूसरी तरफ सीएम ऑफिस से जुड़े कथित भ्रष्टाचार की CBI जांच- और इस जांच को चुनौती देने सुप्रीम कोर्ट पहुंची मान सरकार। हाईकोर्ट के आदेश से शुरू हुई कानूनी लड़ाई अब नए मोड़ पर है। आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस शील नागू सुनवाई से अलग हो चुके हैं और अब निगाहें नई बेंच पर हैं। सवाल सीधा है- क्या मान सरकार CBI जांच पर रोक लगवा पाएगी, या जांच आगे बढ़ेगी? और 2027 से पहले इस पूरे मामले का सरकार की छवि पर क्या असर पड़ेगा? यही है इस वक्त पंजाब की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल।
2027 से पहले मान सरकार की साख की परीक्षा!
पंजाब की राजनीति में यह मामला अब सिर्फ सीबीआई जांच को रोकने या जारी रखने की कानूनी लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि भगवंत मान सरकार की राजनीतिक साख और उसके ‘ईमानदार सरकार’ के दावे की भी परीक्षा बनता जा रहा है। हाईकोर्ट के सीएम ऑफिस से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई जांच के आदेश के बाद सरकार का सुप्रीम कोर्ट पहुंचना इस विवाद की गंभीरता को दर्शाता है। असली सवाल यह है कि क्या मान सरकार सुप्रीम कोर्ट से जांच पर रोक हासिल कर पाएगी, या सीबीआई को आगे बढ़ने का रास्ता मिलेगा? अगर जांच आगे बढ़ती है, तो सरकार को आरोपों का जवाब राजनीतिक बयानों के बजाय जांच और कानूनी प्रक्रिया के सामने देना पड़ सकता है। वहीं, अगर सरकार को राहत मिलती है, तो वह इसे अपनी कानूनी जीत के रूप में पेश कर सकती है। लेकिन किसी भी स्थिति में यह मामला विपक्ष को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सरकार के भ्रष्टाचार-विरोधी दावों पर सवाल उठाने का अवसर देता है।
हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश क्यों दिया?
इस मामले की पृष्ठभूमि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से पंजाब के पुलिस महानिदेशक को भेजे गए तीन पत्रों से जुड़ी है। इनमें मुख्यमंत्री के विशेष कार्य अधिकारी (ओएसडी) राजबीर सिंह घुम्मन और कुछ अन्य लोगों से संबंधित कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाया गया था। आरोपों में सरकारी अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग, टेंडर, कथित तौर पर अनुकूल नीतिगत फैसले करवाने और गोपनीय सरकारी दस्तावेजों तक अनुचित पहुंच जैसे मामले शामिल हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग को लेकर अधिवक्ता निखिल सराफ ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। 5 अक्टूबर को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सीबीआई को आपराधिक मामला दर्ज कर जांच करने का निर्देश दिया। अदालत ने एजेंसी को दो महीने के भीतर स्टेटस रिपोर्ट पेश करने को भी कहा। हाईकोर्ट ने इस मामले को स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के नजरिये से देखने की जरूरत बताई थी।
सीबीआई की एफआईआर में क्या है?
सीबीआई ने इस मामले में 251 पन्नों की एफआईआर दर्ज की है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इसमें मुख्यमंत्री के ओएसडी राजबीर सिंह घुम्मन समेत छह लोगों के नाम शामिल हैं। एजेंसी ने मामले से जुड़े कई स्थानों पर तलाशी भी ली है। जांच से संबंधित रिपोर्टिंग में कम-से-कम 21 वरिष्ठ सरकारी और पुलिस अधिकारियों के तबादलों में कथित हस्तक्षेप तथा 11 नीतिगत बदलावों से जुड़े मामलों का उल्लेख किया गया है। इनमें अधिकारियों की पोस्टिंग, प्रशासनिक फैसलों और कुछ अन्य सरकारी कामकाज को प्रभावित करने के कथित प्रयासों की जांच की जा रही है।
मान सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी?
हाईकोर्ट के आदेश के बाद पंजाब सरकार ने विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल कर उसे चुनौती दी। सरकार ने अंतरिम राहत मांगते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध किया है। सरकार की ओर से दलील दी गई कि ईडी की ओर से भेजी गई जानकारी के आधार पर सीबीआई जांच का निर्देश देने के लिए संज्ञेय अपराध के पर्याप्त आधार होने चाहिए। सरकार ने इस कार्रवाई की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए हैं और अपने पक्ष में कानूनी दलीलें रखी हैं। 8 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मामले की फाइल समय पर उपलब्ध नहीं होने के कारण सुनवाई अगले दिन के लिए टाल दी गई थी। अदालत ने उस दिन हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने का कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया था।
9 अक्टूबर को जस्टिस शील नागू ने खुद को सुनवाई से अलग किया
शुक्रवार को मामला जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच के सामने आया। सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने बताया कि जस्टिस नागू ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए संबंधित याचिकाकर्ता की कुछ याचिकाओं पर आदेश दिए थे। इसके बाद जस्टिस नागू ने मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। जस्टिस दत्ता ने कहा कि इस मामले को जस्टिस नागू नहीं सुन सकते और इसे भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष दूसरी बेंच को सौंपने के लिए रखा जाएगा। इसका मतलब यह है कि पंजाब सरकार की याचिका पर अब नई बेंच सुनवाई करेगी। जस्टिस नागू के अलग होने को सीबीआई जांच पर रोक, सरकार की जीत या हार के रूप में नहीं देखा जा सकता। जांच के भविष्य पर फैसला सुप्रीम कोर्ट की आगे की कार्यवाही से ही स्पष्ट होगा।
अब अदालत का फैसला, आगे सरकार की साख की परीक्षा!
फिलहाल इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और सीबीआई जांच पर रोक को लेकर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम रुख सामने आना बाकी है। जस्टिस शील नागू के सुनवाई से अलग होने के बाद अब नई बेंच के सामने पंजाब सरकार की चुनौती और हाईकोर्ट के आदेश- दोनों पर आगे की कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी। मुख्यमंत्री भगवंत मान के लिए यह मामला इसलिए भी संवेदनशील है, क्योंकि उनकी सरकार की राजनीति में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई और ईमानदार शासन का दावा अहम रहा है। लेकिन राजनीतिक स्तर पर इतना तय है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह मामला सरकार और विपक्ष के बीच जवाबदेही, पारदर्शिता और राजनीतिक विश्वसनीयता की बहस को और तेज कर सकता है। अब निगाहें नई बेंच की सुनवाई पर हैं- क्योंकि अगला कानूनी कदम ही तय करेगा कि यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।

