पंजाब सरकार की सीबीआई जांच पर रोक की मांग पर आज नहीं मिला अंतरिम आदेश; ईडी के 11 व्हाट्सऐप चैट्स और 21 कथित ट्रांसफर-पोस्टिंग मामलों वाले मटेरियल पर कल फिर होगी सुनवाई।

आरके सेठी
चंडीगढ़, 8 अक्टूबर।
मुख्यमंत्री भगवंत मान के दफ्तर से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में पंजाब सरकार को सुप्रीम कोर्ट से आज तत्काल राहत नहीं मिली। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के सीबीआई जांच के आदेश को चुनौती देने वाली सरकार की याचिका पर सुनवाई 9 अक्टूबर तक टल गई। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच के सामने मामला आया, लेकिन जस्टिस नागू तक पूरी फाइल समय पर नहीं पहुंची थी। सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने सीबीआई की आगे की कार्रवाई पर अंतरिम रोक की मांग की, लेकिन अदालत ने कहा कि जब दूसरे जज को फाइल देखने का मौका ही नहीं मिला तो अंतरिम आदेश कैसे पारित किया जा सकता है। लिहाजा आज कोई अंतरिम रोक नहीं लगी और मामला कल के लिए टाल दिया गया।
चैट्स ने बढ़ाया मामले का वजन!
इस पूरे मामले में अब सबसे अहम डिजिटल कड़ी ईडी की ओर से सामने रखे गए व्हाट्सऐप चैट्स हैं। सीबीआई की 251 पन्नों की एफआईआर में ईडी की ओर से पंजाब के डीजीपी को भेजे गए मटेरियल और इन चैट्स को भी शामिल किया गया है। ईडी ने अपने 30 जुलाई के पत्र में 11 व्हाट्सऐप चैट्स और पंजाब सरकार के अधिकारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग से जुड़े 21 कथित मामलों का उल्लेख किया था। जांच एजेंसी के मुताबिक कुछ चैट्स में गोपनीय सरकारी जानकारी, पॉलिसी प्रस्ताव, प्रशासनिक फैसलों और विभागीय संचार तक कथित पहुंच का जिक्र है, जबकि कुछ बातचीत में कथित भुगतान, किकबैक और सरकारी काम के बदले लाभ पहुंचाने के आरोपों का उल्लेख किया गया है।
‘पेमेंट हो गई, बाकी बाद में’- चैट में क्या लिखा?
जांच एजेंसियों के मटेरियल में कथित भुगतान से जुड़ी बातचीत भी सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक एक व्हाट्सऐप बातचीत में इस तरह का संदेश दर्ज है कि एक निश्चित भुगतान किया जा चुका है और बाकी बाद में किया जाएगा। इसी तरह दूसरी बातचीत में कथित तौर पर अधिकारियों की पोस्टिंग और उससे जुड़े पैसों के लेन-देन का जिक्र सामने आया है। सीबीआई के डोजियर में शामिल इन डिजिटल बातचीत को कथित ‘कैश फॉर ट्रांसफर’ नेटवर्क की जांच में अहम कड़ी माना जा रहा है।
21 ट्रांसफर-पोस्टिंग, 11 चैट्स- दायरा बड़ा
ईडी के मटेरियल के मुताबिक अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग में कथित दखल के 21 मामले सामने रखे गए हैं। इसके अलावा चैट्स में कथित तौर पर हथियार लाइसेंस, जमीन के इस्तेमाल में बदलाव, जमीन और प्रॉपर्टी विवाद, सरकारी मंजूरियों, टेंडर शर्तों और दूसरी प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़ी बातचीत का भी उल्लेख है। सीबीआई की एफआईआर में इन दस्तावेजों और बातचीत को जांच का हिस्सा बनाया गया है।
251 पन्नों की एफआईआर में छह नाम
हाई कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने 5 अक्टूबर की रात 251 पन्नों की एफआईआर दर्ज की। इसमें मुख्यमंत्री के ओएसडी राजबीर सिंह घुम्मन समेत छह लोगों को आरोपी बनाया गया है। एफआईआर में नीति बनाने, विभागीय नियमों में बदलाव, प्रशासनिक मंजूरियों, टेंडर, लाइसेंस, जमीन के इस्तेमाल में बदलाव और अन्य सरकारी मामलों में कथित आर्थिक लाभ के लिए प्रभाव डालने के आरोपों की जांच की जा रही है। सीबीआई ने इसके बाद पंजाब और चंडीगढ़ में आठ ठिकानों पर तलाशी भी ली।
ओएसडी घुम्मन सीबीआई के सामने नहीं पहुंचे
इसी मामले में मुख्यमंत्री के ओएसडी राजबीर सिंह घुम्मन को सीबीआई ने पूछताछ के लिए बुलाया था, लेकिन वह बुधवार को जांच एजेंसी के सामने पेश नहीं हुए। मुख्यमंत्री कार्यालय ने उनकी गैरहाजिरी की पुष्टि की। घुम्मन की तरफ से आरोपों को खारिज किया गया है। उनका कहना है कि सीबीआई ने उन्हें गलत तरीके से मामले में फंसाया है।
घुम्मन ने सीबीआई पर ही उठाया सवाल
घुम्मन ने अब विशेष सीबीआई अदालत का रुख करते हुए जांच एजेंसी पर एफआईआर लीक करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि सीबीआई ने एफआईआर को ऑनलाइन अपलोड न करने की अनुमति ली थी, इसके बावजूद उसकी कॉपी मीडिया में पहुंच गई। अदालत ने सीबीआई से जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी। घुम्मन ने इसे जांच की निष्पक्षता से जुड़ा सवाल बताते हुए कार्रवाई की मांग की है।
सरकार की सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई
पंजाब सरकार ने हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए कई कानूनी आधार उठाए हैं। सरकार का तर्क है कि धनशोधन निवारण कानून की धारा 66(2) के तहत प्रवर्तन निदेशालय से मिली जानकारी को अपने-आप एफआईआर दर्ज करने का अनिवार्य आधार नहीं माना जा सकता। सरकार ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए का भी हवाला दिया है और कहा है कि सरकारी अधिकारियों के नीतिगत फैसलों, ट्रांसफर, टेंडर और दूसरी आधिकारिक कार्रवाइयों की जांच के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी है। पंजाब सरकार ने यह भी कहा है कि पंजाब में सीबीआई की सामान्य सहमति नवंबर 2020 में वापस ली जा चुकी है।
सरकार का दूसरा विकल्प भी तैयार
पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने वैकल्पिक रास्ता भी रखा है। सरकार की मांग है कि अगर हाई कोर्ट के आदेश पर तुरंत रोक नहीं लगती तो पंजाब की अपनी ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन को समयबद्ध तरीके से प्रारंभिक जांच पूरी करने की अनुमति दी जाए और उसकी कार्रवाई रिपोर्ट अदालत में पेश की जाए। यानी सरकार सीबीआई जांच को रोकने के साथ-साथ अपनी एजेंसी से प्रारंभिक जांच कराने का विकल्प भी चाहती है।
हाई कोर्ट के आदेश से शुरू हुआ पूरा घटनाक्रम
पूरा मामला उस समय तेज हुआ जब पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने 5 अक्टूबर को मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और पंजाब पुलिस को सीबीआई को पूरा सहयोग देने और संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। अदालत के सामने प्रवर्तन निदेशालय की ओर से भेजे गए मटेरियल, कथित व्हाट्सऐप चैट्स और सरकारी अधिकारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग से जुड़े आरोप रखे गए थे।

