HomePunjabपंजाब यूनिवर्सिटी चुनाव में BJP-SAD का पहला ‘ट्रायल’ सफल!

पंजाब यूनिवर्सिटी चुनाव में BJP-SAD का पहला ‘ट्रायल’ सफल!

ABVP के अंकित बिधान की बड़ी जीत, AAP दूसरे और NSUI तीसरे नंबर पर

शिरोमणि अकाली दल की स्टूडेंट विंग SOI ने दिया था बीजेपी की ABVP को समर्थन

आरके सेठी
चंडीगढ़, 31 अगस्त.

पंजाब की 2027 वाली सियासत का एक छोटा लेकिन बेहद दिलचस्प ‘ट्रायल’ सोमवार को पंजाब यूनिवर्सिटी कैंपस में हो गया। बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के बीच विधानसभा चुनाव को लेकर गठबंधन अभी आधिकारिक रूप से तय नहीं है, लेकिन दोनों दलों से जुड़े छात्र संगठनों ने चुनावी मैदान में हाथ मिलाया और पहला नतीजा उनके पक्ष में आया। बीजेपी से जुड़ी ABVP के अंकित बिधान ने पंजाब यूनिवर्सिटी कैंपस स्टूडेंट्स काउंसिल के अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज कर ली।

अंकित बिधान को 2,879 वोट मिले, जबकि AAP समर्थित ASAP के आदिल बराड़ को 2,323 वोट मिले। बिधान ने 556 वोट के अंतर से मुकाबला जीता। कांग्रेस की NSUI के गुरमन सिंह सिद्धू 2,034 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे, जबकि SATH के दर्शनप्रीत सिंह को 1,208 वोट मिले।

यह जीत इसलिए सामान्य छात्रसंघ चुनाव का नतीजा नहीं है क्योंकि इस बार मुकाबले से पहले ही एक ऐसा राजनीतिक प्रयोग सामने आ चुका था, जिस पर पंजाब की नजर थी। शिरोमणि अकाली दल की स्टूडेंट विंग Student Organisation of India यानी SOI ने अपने उम्मीदवार का नामांकन खारिज होने के बाद अध्यक्ष पद के लिए ABVP के अंकित बिधान को समर्थन देने का फैसला किया। SOI ने इसे खुला और बिना शर्त समर्थन बताया था।

यानी पहली बार इस चुनाव में बीजेपी और अकाली दल से जुड़े छात्र संगठनों ने एक साझा उम्मीदवार के पीछे अपनी ताकत लगाई। नतीजे ने इस प्रयोग को पहली परीक्षा में पास कर दिया। ABVP का उम्मीदवार अध्यक्ष बना और AAP समर्थित ASAP को दूसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा, जबकि NSUI तीसरे नंबर पर रही।

यहीं से इस चुनाव का असली राजनीतिक अर्थ निकलता है। पंजाब में BJP और SAD के संभावित साथ को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही रहा है कि क्या दोनों दल अपने-अपने वोट और संगठनात्मक नेटवर्क को वास्तव में एक-दूसरे के पक्ष में इस्तेमाल कर सकते हैं। पंजाब यूनिवर्सिटी का चुनाव उस बड़े सवाल का अंतिम जवाब नहीं देता, लेकिन एक छोटा चुनावी प्रयोग जरूर सामने रखता है—साझा उम्मीदवार, साझा समर्थन और जीत।

इस प्रयोग का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि SOI और ABVP उस समय साथ आए हैं, जब SAD और BJP के बीच 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर संभावित राजनीतिक समझौते की चर्चाएं चल रही हैं। दोनों दलों का पुराना गठबंधन 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर टूट गया था। अब चुनाव से कुछ महीने पहले दोनों के संभावित पुनर्मिलन की अटकलें फिर राजनीतिक बहस में हैं।

AAP समर्थित ASAP के आदिल बराड़ का 2,323 वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। AAP कैंपस के मुकाबले से बाहर नहीं हुई, लेकिन वह ABVP-SOI के संयुक्त समीकरण को पार नहीं कर सकी। दूसरी ओर NSUI के गुरमन सिंह सिद्धू 2,034 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे। यानी इस चुनाव में BJP से जुड़े उम्मीदवार के सामने AAP और कांग्रेस अलग-अलग राजनीतिक विकल्पों के रूप में मैदान में थे और दोनों में से कोई भी मुख्य चुनौती नहीं बन सका।

यहीं 2027 की संभावित कहानी दिखाई देती है। अगर BJP और SAD भविष्य में किसी भी स्तर पर साथ आते हैं और उनके संगठन अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में एक-दूसरे के समर्थन को वोट में बदलने की क्षमता विकसित कर लेते हैं, तो पंजाब का चुनावी गणित बदल सकता है। लेकिन अगर दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं, तो PU का यह प्रयोग छात्र राजनीति तक सीमित रह जाएगा।

ABVP के लिए यह जीत एक और वजह से महत्वपूर्ण है। संगठन ने लगातार दूसरी बार PUCSC अध्यक्ष पद हासिल किया है। यानी पिछले चुनाव की सफलता को इस बार भी दोहराया गया है। यह संकेत देता है कि कैंपस में ABVP ने अपना संगठनात्मक आधार बनाए रखा है और इस बार उसे SOI के समर्थन का अतिरिक्त लाभ भी मिला।

लेकिन AAP और कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या वे 2027 से पहले अपने-अपने राजनीतिक आधार को व्यापक विपक्षी चुनौती में बदल पाएंगे। PU के छात्र मतदाताओं को पंजाब विधानसभा का प्रतिनिधि नमूना मानना सही नहीं होगा, लेकिन वोट के बंटवारे और संगठनात्मक तालमेल का सवाल यहां जरूर दिखाई देता है।

यही वजह है कि पंजाब यूनिवर्सिटी का यह परिणाम केवल अंकित बिधान की जीत की कहानी नहीं है। यह उस संभावित राजनीतिक समीकरण का पहला छोटा परीक्षण है, जिसमें SAD की छात्र इकाई ने BJP से जुड़े छात्र संगठन के उम्मीदवार को समर्थन दिया और वह उम्मीदवार जीत गया।

अब असली सवाल PU से बाहर है—क्या यह ‘ट्रायल’ 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव तक पहुंच पाएगा? क्या BJP और SAD अपने छात्र संगठनों की तरह विधानसभा स्तर पर भी एक-दूसरे के वोट और संगठनात्मक ताकत को जोड़ पाएंगे? क्या यह तालमेल AAP और कांग्रेस के सामने नया राजनीतिक समीकरण खड़ा कर सकता है? या फिर PU का यह प्रयोग सिर्फ कैंपस तक सीमित रह जाएगा?

पंजाब यूनिवर्सिटी ने इन सवालों का जवाब नहीं दिया है। उसने सिर्फ एक संकेत दिया है—BJP और SAD के बीच राजनीतिक दूरी चाहे जितनी हो, उनके छात्र संगठन एक चुनाव में साथ खड़े हो सकते हैं और जीत हासिल कर सकते हैं।

2027 से पहले यह छोटा संकेत है, लेकिन नजरअंदाज करने लायक बिल्कुल नहीं।

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