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सरकार के भीतर से ही सरकार पर सवाल!

नशे पर स्पीकर का कबूलनामा, जीएमएडीए पर आप सांसद का हमला, विधानसभा में अपने ही मंत्री से टकराव और पुलिस व्यवस्था पर सवाल, क्या ये अलग-अलग घटनाएं हैं या 2027 से पहले आप सरकार के भीतर बढ़ते राजनीतिक दबाव का संकेत?

आरके सेठी
चंडीगढ़, 1 सितम्बर.

सरकार के खिलाफ विपक्ष बोले, यह राजनीति की रिवायत है। कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल लगातार भगवंत मान सरकार को घेरते रहे हैं। लेकिन राजनीतिक कहानी तब बदल जाती है, जब वही सवाल सत्ता के भीतर से उठने लगें। पिछले तीन वर्षों में आम आदमी पार्टी के स्पीकर, सांसद और विधायक नशे, कानून-व्यवस्था, प्रशासन, भ्रष्टाचार, जमीन और सरकारी जवाबदेही जैसे मुद्दों पर सार्वजनिक सवाल उठा चुके हैं। हर असहमति को बगावत कहना गलत होगा, लेकिन इन घटनाओं को एक साथ रखने पर एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा होता है कि क्या सरकार के भीतर का जमीनी फीडबैक अब सार्वजनिक असहमति का रूप लेने लगा है?

नशे पर स्पीकर की स्वीकारोक्ति

सबसे ताजा और सबसे संवेदनशील उदाहरण पंजाब विधानसभा स्पीकर कुलतार सिंह संधवां का है। उन्होंने स्वीकार किया कि आम आदमी पार्टी सरकार नशा खत्म करने की अपनी गारंटी पूरी नहीं कर सकी। संधवां ने साथ ही स्पष्ट किया कि सरकार नशे के खिलाफ काम कर रही है और सरकार के किसी मंत्री, विधायक, स्पीकर या मुख्यमंत्री का नशे के कारोबार में साथ नहीं है। लेकिन सवाल यहाँ खड़ा होता है कि 2022 में सत्ता परिवर्तन के बड़े वादों में शामिल नशा-मुक्त पंजाब की गारंटी के अधूरे रहने की स्वीकारोक्ति सत्ता के भीतर से आना अपने आप में बड़ा राजनीतिक संकेत है?

चार साल बाद सबसे बड़ा चुनावी सवाल

नशा पंजाब में केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है। यह वही मुद्दा है जिसे आप ने 2022 में अपने राजनीतिक बदलाव के नैरेटिव का हिस्सा बनाया था। अब विपक्ष के पास 2027 में एक बेहद सीधा सवाल होगा कि अगर सरकार ने नशे के खिलाफ निर्णायक जीत हासिल की है, तो उसके अपने स्पीकर को यह क्यों कहना पड़ा कि गारंटी पूरी नहीं हुई? यहां फर्क आरोप और स्वीकारोक्ति का है। विपक्ष का आरोप सरकार खारिज कर सकती है; लेकिन सत्ता पक्ष के वरिष्ठ नेता की स्वीकारोक्ति को खारिज करना राजनीतिक रूप से कहीं ज्यादा मुश्किल होता है।

जीएमएडीए पर अपने सांसद की चोट

स्पीकर के बयान से कुछ दिन पहले आनंदपुर साहिब से आप सांसद मलविंदर सिंह कंग ने जीएमएडीए की कार्रवाई को लेकर अपनी ही सरकार को असहज किया। सैनी माजरा में दुकानों पर कार्रवाई के बाद कंग ने जीएमएडीए को “लूट का केंद्र” और “भ्रष्टाचार का अड्डा” बताया तथा आरोप लगाया कि कार्रवाई चयनात्मक थी और रिश्वत देने वालों को कथित रूप से राहत मिली। उन्होंने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। इस बात का राजनीतिक महत्व इस बात में है कि सवाल उठाने वाला विपक्ष का नेता नहीं, सत्ताधारी दल का सांसद है।

कंग की आवाज एक घटना नहीं

कंग का मामला इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि जीएमएडीए से पहले भी वह सरकार और प्रशासन के कामकाज पर सवाल उठाते रहे हैं। उनके सार्वजनिक बयानों में सत्ता के केंद्रीकरण, पार्टी के भीतर संवाद की कमी, किसानों से जुड़े पुलिस कार्रवाई के मामलों और अवैध रेत खनन जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं। इसलिए जीएमएडीए प्रकरण को केवल एक स्थानीय प्रशासनिक विवाद मानना पूरी तस्वीर नहीं देता। यहां एक निर्वाचित सांसद लगातार यह सवाल उठा रहा है कि सरकार की मशीनरी जमीन पर कैसे काम कर रही है।

विधानसभा में सत्ता पक्ष बनाम सत्ता पक्ष

अगस्त में पंजाब विधानसभा के भीतर तस्वीर और ज्यादा साफ हो गई। पायल से आप विधायक मनविंदर सिंह ग्यासपुरा ने पंचायत जमीन की नीलामी को लेकर अपनी ही सरकार के मंत्री तरुणप्रीत सिंह सोंड के जवाब को चुनौती दी। ग्यासपुरा ने मंत्री के दावे पर सवाल उठाते हुए यहां तक कहा कि अगर मंत्री यह साबित कर दें कि इस साल नीलामी हुई थी, तो वह विधायक पद से इस्तीफा देने को तैयार हैं। उन्होंने सदन में कहा कि यह झूठ बोलने की जगह नहीं है। यह विपक्ष द्वारा सरकार को घेरने का मामला नहीं था; सवाल सत्ता पक्ष के विधायक ने उठाया और जवाब सत्ता पक्ष के मंत्री को देना पड़ा।

जमीन का सवाल और गहरा हुआ

इसी बहस में आप विधायक दिनेश चड्ढा ने बारा फूल गांव की पंचायत जमीन के कथित फर्जी हस्तांतरण और अधिकारियों तथा प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत का आरोप उठाया। लेकिन राजनीतिक तस्वीर साफ थी—सरकार के अपने विधायक शासन और प्रशासन की प्रक्रिया पर जवाब मांग रहे थे। जब ऐसे सवाल विधानसभा के भीतर रिकॉर्ड पर आते हैं, तो उनका महत्व किसी सामान्य राजनीतिक बयान से बढ़ जाता है।

पुलिस पर अपने सांसद की चिंता

राज्यसभा सांसद बलबीर सिंह सीचेवाल ने अपनी सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों को वापस लेकर उन्हें पुलिस थानों में लगाने की मांग की और पुलिस बल की कमी तथा कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता जताई। इसके बाद उन्होंने “अपणा पिंड संभालो” अभियान शुरू किया, जिसके जरिए गांवों को नशे और अपराध के खिलाफ स्थानीय स्तर पर सक्रिय होने की अपील की। सीचेवाल ने स्पष्ट किया कि उनका अभियान सरकार या पुलिस के खिलाफ नहीं है। इसलिए इसे सरकार-विरोधी आंदोलन कहना गलत होगा। लेकिन एक सत्ताधारी दल के सांसद का यह सार्वजनिक हस्तक्षेप पुलिस व्यवस्था की क्षमता पर सवाल जरूर खड़ा करता है।

असली सुराग 2025 में मिला था

अगर आज की घटनाओं को समझना है तो 2025 की एक घटना पर लौटना जरूरी है। फरवरी 2025 में विधानसभा सत्र से पहले आप की फ्लोर रणनीति बैठक में विधायकों को अपनी ही सरकार को सदन में घेरने से बचने की सलाह दी गई थी। लेकिन इसके बावजूद विधायकों ने प्रश्नकाल और शून्यकाल में मंत्रियों से सवाल किए। रिपोर्ट के अनुसार बैठक में कई विधायकों ने अधिकारियों की अनदेखी, खराब सड़कों, नीतिगत देरी और दूसरी स्थानीय समस्याओं की शिकायत की थी।

शिकायतें बंद कमरे से बाहर क्यों आईं?

मार्च 2025 में आप के पंजाब प्रभारी मनीष सिसोदिया और सह-प्रभारी सत्येंद्र जैन ने विधायकों से सार्वजनिक रूप से अपनी शिकायतें न रखने और पार्टी की एकजुट छवि बनाए रखने को कहा था। बैठक में मुख्यमंत्री भगवंत मान भी मौजूद थे। इस घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि पार्टी नेतृत्व खुद इस बात को लेकर चिंतित था कि सार्वजनिक असहमति से पार्टी की छवि प्रभावित हो सकती है।

यहीं से कहानी का असली सवाल निकलता है

अगर विधायकों की शिकायतें केवल व्यक्तिगत नाराजगी थीं, तो पार्टी नेतृत्व को उन्हें सार्वजनिक रूप से न रखने की सलाह देने की जरूरत क्यों महसूस हुई? और अगर ये शिकायतें जमीनी समस्याओं से जुड़ी थीं, तो क्या उनके लिए पार्टी के भीतर पर्याप्त फीडबैक तंत्र मौजूद था? इन सवालों का निर्णायक उत्तर उपलब्ध घटनाओं से नहीं मिलता, लेकिन 2025 की ये घटनाएं 2026 में सामने आए सार्वजनिक टकरावों को एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि जरूर देती हैं।

कंवर विजय प्रताप का मामला: असहमति की सीमा

जहरीली शराब कांड के बाद आप विधायक कंवर विजय प्रताप सिंह ने शराब माफिया और पुलिस तंत्र के बीच कथित सांठगांठ पर सवाल उठाए और अधिकारियों की जवाबदेही की मांग की थी। बाद में आप ने उन्हें पांच साल के लिए निलंबित करते हुए पार्टी विरोधी गतिविधियों का हवाला दिया। यह मामला एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न छोड़ता है कि सत्ताधारी दल के भीतर सार्वजनिक असहमति की स्वीकार्य सीमा क्या है?

अजय गुप्ता से भी मिला था संकेत

2024 में अमृतसर सेंट्रल के आप विधायक अजय गुप्ता ने अपनी ही सरकार पर नशे और भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने में विफल रहने के आरोप लगाए थे। इसके बाद मुख्यमंत्री भगवंत मान ने उनसे बातचीत की और उनकी शिकायतों पर चर्चा का आश्वासन दिया। बाद में गुप्ता ने अपने बयान की अलग व्याख्या की। यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे एक और पहलू सामने आता है कि सरकार के भीतर से उठती शिकायत को सार्वजनिक राजनीतिक संकट बनने से पहले नेतृत्व किस तरह संभालता है।

पैटर्न को नजरअंदाज करना भी जोखिम है

कहानी किसी एक बयान में नहीं है। असली महत्व उस पैटर्न में है जिसमें अलग-अलग समय पर सत्ता पक्ष के अलग-अलग प्रतिनिधि शासन के अलग-अलग मूल क्षेत्रों पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं। नशा, प्रशासन, पुलिस, भ्रष्टाचार, जमीन और सरकारी जवाबदेही—ये सभी किसी भी सरकार की गवर्नेंस की बुनियाद हैं। जब इन्हीं क्षेत्रों पर अपने लोग सवाल करें, तो नेतृत्व के लिए इसे केवल व्यक्तिगत असहमति मानकर छोड़ देना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है।

क्या सरकार और संगठन के बीच कम्युनिकेशन गैप है?

विधायक और सांसद जनता से सीधे जुड़े होते हैं। उन्हें स्थानीय स्तर पर अधिकारियों, पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली का सामना करना पड़ता है। अगर उन्हें लगता है कि उनकी शिकायतें ऊपर तक पर्याप्त तेजी से नहीं पहुंच रहीं, तो सार्वजनिक बयान एक दबाव का माध्यम बन सकता है। 2025 में विधायकों को सार्वजनिक शिकायतों से बचने की सलाह और 2026 में विधानसभा तथा मीडिया के सामने उठते सवाल इस संभावना को नजरअंदाज नहीं करने देते।

भगवंत मान नेतृत्व की असली परीक्षा

सरकार के सामने सवाल यह नहीं है कि उसके विधायक कभी असहमत क्यों होते हैं। लोकतांत्रिक राजनीति में असहमति स्वाभाविक है। असली परीक्षा यह है कि नेतृत्व उन शिकायतों को संस्थागत फीडबैक में बदलता है या नहीं। अगर शिकायतों पर जांच, सुधार और कार्रवाई होती है, तो यही आवाजें सरकार की जवाबदेही का प्रमाण बन सकती हैं। अगर शिकायतें लगातार सार्वजनिक होती रहें और समाधान दिखाई न दे, तो उनका राजनीतिक अर्थ बदल जाएगा।

विपक्ष को मिल सकता है सबसे विश्वसनीय हथियार

2027 में विपक्ष के लिए इन घटनाओं का महत्व यहीं बढ़ेगा। कांग्रेस इन्हें गवर्नेंस की कमजोरी के रूप में पेश कर सकती है। भारतीय जनता पार्टी इन्हें कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक विश्वसनीयता से जोड़ सकती है। अकाली दल इन्हें ग्रामीण पंजाब, जमीन और स्थानीय शासन के सवालों से जोड़ने की कोशिश कर सकता है। लेकिन तीनों के लिए सबसे प्रभावी सामग्री वही होगी जो सत्ता पक्ष के अपने नेताओं के बयानों में उपलब्ध है। विपक्ष को हर बात खुद कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी; उसे केवल यह पूछना होगा—“ये आरोप हमारे नहीं, आपके अपने लोगों के हैं।”

2027 में असली कसौटी: विश्वसनीयता

चुनाव में योजनाएं, घोषणाएं और उपलब्धियां महत्वपूर्ण होती हैं। लेकिन सत्ता की विश्वसनीयता इस बात से भी तय होती है कि जनता सरकार के दावों और अपने अनुभव के बीच कितना अंतर महसूस करती है। अगर नशा, कानून-व्यवस्था, प्रशासन और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे चुनाव तक बने रहते हैं और उन्हीं पर सत्ता पक्ष के अपने प्रतिनिधि सार्वजनिक सवाल उठाते रहते हैं, तो विपक्ष के लिए इन सबको एक साझा चुनावी कहानी में बदलना आसान होगा।

2022 का बदलाव, 2027 का हिसाब

2022 में आप ने पंजाब की राजनीति में “बदलाव” को सबसे बड़ा राजनीतिक नैरेटिव बनाया था। 2027 में मतदाता उस बदलाव का हिसाब मांगेंगे। सवाल यह नहीं होगा कि सरकार ने कुछ किया या नहीं—हर सरकार कुछ न कुछ करती है। असली सवाल यह होगा कि क्या उसकी उपलब्धियां उन कमियों और विवादों से बड़ी साबित होंगी, जिन्हें उसके अपने जनप्रतिनिधि चुनाव से पहले सार्वजनिक रूप से उठा रहे हैं।

अभी संकट नहीं, लेकिन संकेत जरूर

आज की तारीख में आप सरकार को संकटग्रस्त घोषित करना जल्दबाजी होगी। लेकिन इन घटनाओं को महज संयोग मानना भी आसान नहीं है। 2024 से 2026 तक एक सिलसिला दिखाई देता है—पहले विधायकों की शिकायतें, फिर पार्टी नेतृत्व की उन्हें सार्वजनिक न करने की कोशिश, उसके बाद भी सदन में सवाल, अलग-अलग मुद्दों पर सांसदों और विधायकों की सार्वजनिक आपत्तियां और अब नशे की गारंटी पर स्पीकर की स्वीकारोक्ति। यह किसी संगठित विद्रोह का प्रमाण नहीं, लेकिन सत्ता के भीतर से बढ़ते राजनीतिक दबाव का पर्याप्त आधार जरूर है।

आईना बाहर से नहीं, भीतर से

पंजाब में विपक्ष सरकार को आईना दिखाता रहा है और आगे भी दिखाता रहेगा। लेकिन इस समय असली राजनीतिक कहानी यह है कि आईना केवल विपक्ष के हाथ में नहीं है। नशे पर स्पीकर, जीएमएडीए पर सांसद, पंचायत जमीन पर विधायक, विधानसभा में मंत्री के जवाब पर सत्ता पक्ष की आपत्ति और पुलिस व्यवस्था पर सांसद की चिंता—इन घटनाओं में राजनीतिक कारण अलग हो सकते हैं, लेकिन एक साझा सवाल जरूर है: क्या सत्ता के भीतर से शासन के परिणामों और तरीके पर असंतोष की आवाज बढ़ रही है?

और यही 2027 की आहट हो सकती है

अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि ये आवाजें किसी बड़े विद्रोह की शुरुआत हैं। लेकिन इन्हें पूरी तरह सामान्य राजनीतिक शोर मानना भी ठीक नहीं होगा। क्योंकि किसी सरकार के लिए विपक्ष की आलोचना से निपटना अपेक्षाकृत आसान होता है; अपने ही लोगों के सवालों का जवाब देना कहीं कठिन। 2027 से पहले आप नेतृत्व के सामने अब यही चुनौती है—इन आवाजों को दबाना नहीं, समझना; इन्हें असंतोष बनने से पहले फीडबैक में बदलना; और जनता के सामने यह साबित करना कि सरकार अपने भीतर उठ रहे सवालों से भागती नहीं, उनका जवाब देती है।

सरकार के भीतर से ही सरकार पर सवाल!

यह एक खुला राजनीतिक सवाल है। क्या ये अलग-अलग जनप्रतिनिधियों की अपनी-अपनी शिकायतें हैं? क्या यह सरकार और संगठन के बीच बढ़ते कम्युनिकेशन गैप का संकेत है? या फिर यह उस जमीनी बेचैनी की शुरुआती आवाज है, जो 2027 के चुनाव तक एक बड़े नैरेटिव में बदल सकती है?
इसका फैसला अभी नहीं हुआ है। लेकिन एक बात साफ है—2027 में विपक्ष अगर सरकार के खिलाफ सबसे प्रभावी कहानी लिखना चाहेगा, तो उसे शायद अपने शब्दों से शुरुआत करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। उसके पास सरकार के भीतर से निकले हुए शब्द पहले से मौजूद हैं। और यही किसी भी सरकार के लिए सबसे कठिन राजनीतिक स्थिति होती है…जब सवाल बाहर से नहीं, भीतर से उठने लगें।

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