HomePunjabपरगट सिंह की एंट्री से पंजाब कांग्रेस में क्या बदलेगा?

परगट सिंह की एंट्री से पंजाब कांग्रेस में क्या बदलेगा?

पंजाब के हकों, पॉजिटिव पॉलिटिक्स और टीमवर्क का संदेश; अब परगट के सामने अपने विजन को जमीन पर उतारने और 2027 की चुनावी लड़ाई तैयार करने की चुनौती

आरके सेठी
चंडीगढ़, 3 अक्टूबर।

पंजाब कांग्रेस में सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष नहीं बदला है, चुनाव से कुछ महीने पहले पार्टी की राजनीतिक दिशा को लेकर भी एक नया संकेत सामने आया है। अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के इस्तीफे के बाद कांग्रेस हाईकमान ने जालंधर कैंट के विधायक और पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान परगट सिंह को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी है। जिम्मेदारी संभालते ही परगट ने अपनी लाइन भी साफ कर दी- पंजाब के हकों की आवाज, पॉजिटिव और एजेंडा-बेस्ड पॉलिटिक्स, नफरत की राजनीति से दूरी और टीमवर्क। अब असली सवाल यही है कि यह विजन कांग्रेस के संगठन और 2027 की चुनावी तैयारी में कितना खरा उतरता है।

वड़िंग के इस्तीफे से शुरू हुआ बदलाव

राजा वड़िंग ने 2 अक्टूबर को राहुल गांधी से मुलाकात के बाद पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया। वड़िंग ने कहा कि उन्होंने अपनी मर्जी से पद छोड़ा, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उन्हें लगा कि पंजाब के नए प्रभारी सचिन पायलट शायद उन्हें पद से हटाना चाहते थे। उन्होंने यह भी कहा कि चन्नी साहिब जीत गए। वड़िंग के इस बयान ने नेतृत्व परिवर्तन के पीछे चल रहे अंदरूनी मतभेदों को सार्वजनिक कर दिया। हालांकि इस्तीफे को लेकर वड़िंग ने खुद इसे स्वैच्छिक फैसला बताया है।

परगट आए, लेकिन पूरा चुनावी ढांचा नहीं बदला

परगट की नियुक्ति के साथ कांग्रेस ने एक अहम बात साफ की है। पहले से बनाई गई चुनाव संबंधी समितियों के वर्किंग प्रेसिडेंट, चेयरमैन और को-चेयरमैन फिलहाल अपने पदों पर बने रहेंगे। यानी हाईकमान ने अभी पूरा चुनावी ढांचा बदलने के बजाय प्रदेश अध्यक्ष के स्तर पर बदलाव किया है। परगट को मौजूदा टीम और इसी चुनावी मशीनरी के साथ संगठन को आगे बढ़ाना होगा।

पहली ही पारी में परगट ने अपना विजन साफ कर दिया

जिम्मेदारी संभालने के बाद परगट सिंह ने कहा कि पंजाब के लोग नफरत की राजनीति को स्वीकार नहीं करते। उन्होंने अर्थपूर्ण, पॉजिटिव और एजेंडा-बेस्ड पॉलिटिक्स पर जोर दिया। उनका फोकस पंजाब के असली मुद्दों और जनता से जुड़े सवालों पर राजनीति करने का है। यानी नए प्रदेश अध्यक्ष की शुरुआती लाइन सिर्फ कांग्रेस संगठन तक सीमित नहीं है, बल्कि पंजाब के मुद्दों को केंद्र में रखकर अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश भी दिखाई देती है।

पंजाब के हकों को राजनीतिक एजेंडा बनाने का संकेत

परगट ने पंजाब के हकों की आवाज मजबूत करने और राज्य के हितों के लिए एकजुट होकर काम करने की बात कही है। उन्होंने पंजाब की संपत्तियों और सरकारी संसाधनों से जुड़े सवाल भी उठाए हैं। इन मुद्दों पर उनके आरोपों की अपनी अलग तथ्यात्मक जांच जरूरी होगी, लेकिन राजनीतिक तौर पर यह संकेत साफ है कि नए कांग्रेस अध्यक्ष सरकार को सिर्फ पार्टी संगठन के सवालों पर नहीं, बल्कि पंजाब के संसाधनों और शासन से जुड़े मुद्दों पर भी घेरने की तैयारी में हैं।

चन्नी की बधाई क्यों महत्वपूर्ण है?

परगट की नियुक्ति पर पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने भी सार्वजनिक तौर पर स्वागत और बधाई दी है। राजा वड़िंग, प्रताप सिंह बाजवा, सुखजिंदर सिंह रंधावा और दूसरे वरिष्ठ नेताओं ने भी परगट के आने का स्वागत किया है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वड़िंग के दौर में कांग्रेस के भीतर अलग-अलग नेताओं के बीच मतभेद खुलकर सामने आते रहे हैं। ऐसे माहौल में नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति पर प्रमुख नेताओं की सार्वजनिक बधाई कम से कम शुरुआती स्तर पर परगट के लिए व्यापक स्वीकार्यता का संकेत देती है। इसे अंदरूनी मतभेद खत्म होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन नई शुरुआत के लिए उन्हें राजनीतिक स्पेस जरूर मिलता है।

अब AAP ने भी खोल दिया मोर्चा

परगट की ताजपोशी के तुरंत बाद आम आदमी पार्टी ने उनके पुराने राजनीतिक रिकॉर्ड को लेकर सवाल उठाए हैं। वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने अकाली दल से जुड़े उनके पुराने राजनीतिक दौर के साथ नशे और बेअदबी के मुद्दों पर उनकी भूमिका को लेकर सवाल किए। चीमा ने उनके शिक्षा एवं खेल मंत्री रहते 1158 असिस्टेंट प्रोफेसरों और लाइब्रेरियनों की भर्ती का मुद्दा भी उठाया।

परगट का पुराना रिकॉर्ड भी अब फिर चर्चा में रहेगा

परगट की राजनीतिक यात्रा सीधे कांग्रेस से शुरू नहीं हुई। उन्होंने 2012 में जालंधर कैंट से शिरोमणि अकाली दल के टिकट पर चुनाव जीता और बाद में कांग्रेस में शामिल हुए। 2017 और 2022 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर इसी सीट से जीत दर्ज की। वह चरणजीत सिंह चन्नी सरकार में शिक्षा और खेल मंत्री भी रहे। अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद उनका यही राजनीतिक सफर उनके खिलाफ उठने वाले सवालों और उनके पक्ष में रखे जाने वाले तर्क- दोनों का हिस्सा रहेगा।

AAP के खिलाफ उनकी लड़ाई नई नहीं है

परगट पिछले कुछ समय से भगवंत मान सरकार पर नशे, बेअदबी, कानून-व्यवस्था, सरकारी कामकाज और 1158 असिस्टेंट प्रोफेसरों से जुड़े मामलों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। इसलिए प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद AAP के खिलाफ उनकी राजनीतिक लाइन अचानक शुरू नहीं हुई है। फर्क यह है कि अब व्यक्तिगत विधायक के तौर पर उठाए गए मुद्दों को पूरे प्रदेश कांग्रेस के राजनीतिक एजेंडे में बदलने की जिम्मेदारी उनके पास होगी।

सचिन पायलट के साथ तालमेल भी अहम

परगट की नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब सचिन पायलट को पंजाब कांग्रेस का प्रभारी बनाए जाने के बाद संगठन में बदलाव की प्रक्रिया तेज हुई। पायलट ने परगट की नियुक्ति का स्वागत करते हुए संगठन को मजबूत करने और जनता से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाने की जरूरत बताई। परगट ने भी जिम्मेदारी संभालने के बाद पायलट से मुलाकात की। फिलहाल यह नए प्रदेश अध्यक्ष और पंजाब प्रभारी के बीच शुरुआती तालमेल का संकेत है। आगे यह तालमेल संगठन के फैसलों और चुनावी तैयारी में कितना दिखाई देता है, यह महत्वपूर्ण रहेगा।

सबसे पहली परीक्षा- कांग्रेस के भीतर तालमेल

परगट के सामने सबसे कठिन काम सरकार पर हमला करना नहीं, बल्कि अपनी पार्टी को एक साथ लेकर चलना होगा। पंजाब कांग्रेस में लंबे समय से अलग-अलग नेताओं और खेमों के बीच मतभेद की चर्चा रही है। दूसरी तरफ परगट खुद गुटबाजी की बात को खारिज करते हुए सभी को साथ लेकर चलने की बात कर रहे हैं। इसलिए उनकी पहली बड़ी परीक्षा यही होगी कि चन्नी, बाजवा, रंधावा, वड़िंग और दूसरे वरिष्ठ नेताओं के साथ संगठन को किस तरह एक साझा चुनावी टीम में बदला जाता है।

2027 के लिए अब समय बहुत कम है

विधानसभा चुनाव करीब हैं और कांग्रेस के पास संगठन को चुनावी मोड में लाने के लिए सीमित समय है। बूथ स्तर के संगठन को सक्रिय करना, स्थानीय नेताओं और संभावित उम्मीदवारों के बीच तालमेल बनाना, पंजाब के मुद्दों पर पार्टी की साफ लाइन तय करना और उसे पूरे राज्य में एक जैसी आवाज में पहुंचाना- यही वे काम होंगे जिनसे परगट के विजन की असली परीक्षा होगी। सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष बदलने से चुनावी तैयारी पूरी नहीं होगी; अब संगठन को जमीन पर सक्रिय करना होगा।

असली सवाल अब विजन से आगे का है

परगट सिंह ने अपनी शुरुआत की राजनीतिक लाइन सामने रख दी है- पंजाब के हक, पॉजिटिव पॉलिटिक्स, जनता के असली मुद्दे और टीमवर्क। चन्नी समेत कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं की बधाई से उन्हें शुरुआत में सार्वजनिक स्वीकार्यता मिली है, लेकिन पुरानी खींचतान खत्म हो ही जाएगी, ये बात यकीनी फिलहाल नही है। चुनावी समितियां फिलहाल पहले जैसी हैं, AAP ने पुराने रिकॉर्ड पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं और 2027 का समय लगातार करीब आ रहा है।
अब असली सवाल यह है कि परगट सिंह अपने विजन को कितनी तेजी से संगठन की रोजमर्रा की राजनीति में बदलते हैं। अगर वह अलग-अलग नेताओं को एक साझा राजनीतिक लाइन पर ला पाए, पंजाब के मुद्दों को कांग्रेस का साफ एजेंडा बना पाए और संगठन को जमीन पर चुनावी टीम में बदल पाए, तभी उनकी एंट्री का असर सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष बदलने से आगे दिखाई देगा।

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