ईडी के तीन पत्रों पर नहीं हुई थी एफआईआर, हाईकोर्ट ने सीबीआई को केस दर्ज करने और दो महीने में स्टेटस रिपोर्ट देने को कहा

आरके सेठी
चंडीगढ़, 5 अक्टूबर।
पंजाब की सत्ता के सबसे संवेदनशील केंद्र यानी मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के आरोपों ने अब ऐसा मोड़ ले लिया है, जहां राज्य की अपनी पुलिस जांच नहीं करेगी। मामला सरकारी तबादलों और तैनातियों, टेंडर, लाइसेंस, सरकारी मंजूरियों और दूसरे सरकारी कामों को कथित तौर पर प्रभावित करने के लिए पैसे और प्रभाव के इस्तेमाल के आरोपों से जुड़ा है। ईडी ने इन आरोपों को लेकर पंजाब के डीजीपी को तीन पत्र भेजकर एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी, लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं हुई। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने इसके बाद पूरे मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी है। अदालत ने सीबीआई को आपराधिक मामला दर्ज कर जांच तत्काल आगे बढ़ाने और दो महीने के भीतर स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।
पंजाब पुलिस पर हाईकोर्ट का भरोसा क्यों टूटा?
इस आदेश की सबसे महत्वपूर्ण बात सिर्फ सीबीआई को जांच सौंपना नहीं, बल्कि पंजाब पुलिस के अब तक के रवैये पर हाईकोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी है। अदालत ने कहा कि मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच जरूरी है और वह पंजाब पुलिस ने अब तक जिस तरीके से कार्रवाई की है, उससे प्रभावित नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने सीबीआई को जांच सौंपना उचित माना और पंजाब सरकार तथा पंजाब पुलिस को जांच में पूरा सहयोग देने का निर्देश दिया। यानी जिस मामले में अब तक आरोप, ईडी के पत्र और राज्य स्तर पर कार्रवाई को लेकर सवाल थे, वह अब बाकायदा केंद्रीय जांच एजेंसी की आपराधिक जांच के दायरे में आ गया है।
तीन पत्र, लेकिन एफआईआर नहीं
मामले की जड़ ईडी के उन तीन औपचारिक पत्रों में है, जो पंजाब के डीजीपी गौरव यादव को भेजे गए थे। उपलब्ध अदालत संबंधी विवरण के मुताबिक ये पत्र 24 जुलाई से 12 अगस्त 2026 के बीच भेजे गए थे। ईडी ने इन पत्रों के जरिए मुख्यमंत्री के ओएसडी राजबीर सिंह घुम्मन और कुछ अन्य लोगों के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों पर एफआईआर दर्ज कर जांच की मांग की थी। आरोपों का दायरा कथित तौर पर तबादलों और तैनातियों, सरकारी नीतियों को प्रभावित करने, टेंडर और अन्य सरकारी कामों तक बताया गया था। इसके बावजूद राज्य पुलिस की ओर से उस समय एफआईआर दर्ज नहीं की गई और यही बात बाद में हाईकोर्ट में उठे विवाद का केंद्रीय मुद्दा बनी।
आरोपों की कड़ी जीएमएडीए जमीन जांच तक
ईडी के पत्रों में लगाए गए आरोप उसकी एक चल रही धनशोधन जांच के दौरान जब्त सामग्री से जुड़े बताए गए हैं। यह जांच जीएमएडीए से संबंधित जमीन आवंटन के मामलों तक पहुंची थी। ईडी के अनुसार, निजी व्यक्ति नितिन गोहल ने कथित तौर पर मुख्यमंत्री के ओएसडी राजबीर सिंह घुम्मन और सरकारी कामों से जुड़े लोगों के बीच बिचौलिए की भूमिका निभाई। एजेंसी के आरोपों में तबादलों और तैनातियों को प्रभावित करने, सरकारी दस्तावेजों तक पहुंच, हथियार लाइसेंस से जुड़े काम और व्यावसायिक परियोजनाओं को मंजूरी दिलाने जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।
मामला हाईकोर्ट तक क्यों पहुंचा?
पंजाब पुलिस की ओर से अपेक्षित कार्रवाई न होने का आरोप लगाते हुए अधिवक्ता निखिल सराफ ने 27 अगस्त 2026 को हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि ईडी ने राज्य के डीजीपी को औपचारिक रूप से पत्र भेजकर कार्रवाई की मांग की, लेकिन इसके बावजूद मामला एफआईआर तक नहीं पहुंचा। याचिकाकर्ता ने स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए सीबीआई को जांच सौंपने की गुहार लगाई। इसी याचिका पर सुनवाई के बाद अब हाईकोर्ट ने राज्य पुलिस से जांच लेकर केंद्रीय जांच एजेंसी को दे दी है।
सरकार का तर्क- पहले प्रारंभिक जांच जरूरी
सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार ने याचिका का विरोध किया। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि पुलिस मामले को देख रही है और एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच जरूरी है। सरकार ने इसके लिए अतिरिक्त समय भी मांगा था। लेकिन हाईकोर्ट ने राज्य पुलिस की इस प्रक्रिया को स्वीकार नहीं किया। अदालत का निष्कर्ष था कि इस मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की जरूरत है और पंजाब पुलिस के अब तक के तरीके को देखते हुए सीबीआई को जांच सौंपना उचित होगा।
ईडी ने सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाया
सुनवाई के दौरान ईडी की ओर से भी पंजाब सरकार के रवैये पर सवाल उठाया गया। ईडी की तरफ से अदालत में यह तर्क रखा गया कि उसके जालंधर क्षेत्रीय कार्यालय की ओर से भेजे गए पत्र पर सरकार ने कार्रवाई नहीं की। ईडी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एवं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन ने सरकार पर अपने संवैधानिक दायित्व के बजाय राजनीतिक दृष्टिकोण से काम करने का आरोप लगाया।
दो महीने की समय-सीमा ने बढ़ाई राजनीतिक अहमियत
हाईकोर्ट ने सीबीआई को सिर्फ जांच करने का निर्देश नहीं दिया, बल्कि दो महीने के भीतर स्टेटस रिपोर्ट भी मांगी है। साथ ही पंजाब सरकार और पंजाब पुलिस को केंद्रीय एजेंसी को पूरा सहयोग देने को कहा गया है। इसका अर्थ यह है कि यह मामला लंबी अवधि के लिए अनिश्चितता में नहीं छोड़ा गया है। आने वाले दो महीने में जांच किस दिशा में जाती है, किन लोगों से पूछताछ होती है, कौन से दस्तावेज सामने आते हैं और क्या कोई आपराधिक साक्ष्य मिलता है- इन सब पर अब नजर रहेगी।
सरकार के लिए कानूनी आदेश से बड़ा राजनीतिक सवाल
राजनीतिक तौर पर इस आदेश की गंभीरता इसलिए ज्यादा है क्योंकि मामला मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के आरोपों से संबंधित है और जांच अब राज्य पुलिस के बजाय सीबीआई करेगी। आम आदमी पार्टी सरकार पहले ईडी की कार्रवाई को राजनीतिक निशाना बनाए जाने से जोड़ती रही है, जबकि विपक्ष इस मामले को सरकार की जवाबदेही से जोड़ रहा है। लेकिन इन राजनीतिक दावों से अलग अदालत का आदेश अपने आप में महत्वपूर्ण है- हाईकोर्ट ने राज्य पुलिस की अब तक की कार्रवाई पर असंतोष जताते हुए निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के लिए केंद्रीय एजेंसी को चुना है।
अब कहानी आरोपों से जांच की तरफ
इस मामले का अगला अध्याय अब राजनीतिक बयानों से नहीं, बल्कि सीबीआई की जांच से तय होगा। लेकिन इतना तय है कि हाईकोर्ट के आदेश ने इन आरोपों को एक औपचारिक आपराधिक जांच के रास्ते पर पहुंचा दिया है। सीबीआई को एफआईआर दर्ज करनी है, जांच आगे बढ़ानी है और दो महीने में अदालत को स्टेटस रिपोर्ट देनी है। यानी पंजाब की सत्ता के सबसे संवेदनशील दफ्तर से जुड़े इन आरोपों पर अब असली सवाल यह नहीं है कि किसने क्या कहा- सवाल यह है कि जांच में क्या निकलता है।

