हाईकोर्ट के CBI जांच आदेश के खिलाफ मंगलवार तड़के 1:42 बजे SLP; पंजाब सरकार ने रोक की मांग की; सुप्रीम कोर्ट में कल या परसों सुनवाई के संकेत!

आरके सेठी,
चंडीगढ़, 6 अक्तूबर।
पंजाब की भगवंत मान सरकार के लिए सोमवार का हाईकोर्ट आदेश सिर्फ एक अदालती फैसला नहीं था। फैसला आया कि सीएम ऑफिस से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच अब CBI करेगी और मंगलवार तड़के करीब 1:42 बजे सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में SLP दाखिल कर दी। सुबह होते-होते सुप्रीम कोर्ट में अर्जेंट लिस्टिंग की मांग भी पहुंच गई। सवाल इसलिए बड़ा है- आखिर ऐसा क्या था कि सरकार ने कुछ घंटों का भी इंतजार नहीं किया और सीधे देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटा दिया?
हाईकोर्ट ने क्या बदल दिया?
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की बेंच ने 5 अक्टूबर को CBI को कथित भ्रष्टाचार के आरोपों पर क्रिमिनल केस दर्ज कर जांच करने का निर्देश दिया। CBI को दो महीने में स्टेटस रिपोर्ट देने को कहा गया और पंजाब सरकार तथा पंजाब पुलिस को जांच में पूरा सहयोग करने का निर्देश दिया गया। यानी मामला अब राज्य पुलिस की प्रारंभिक जांच से निकलकर एक स्वतंत्र केंद्रीय जांच एजेंसी के हाथ में पहुंच गया।
मामले की जड़ में ED के तीन पत्र
पूरे विवाद की शुरुआत ED की ओर से पंजाब के DGP को भेजे गए पत्रों से हुई। ED ने आरोप लगाया कि नितिन गोहल कथित तौर पर ऐसे लोगों और मुख्यमंत्री के OSD राजबीर सिंह घुम्मन के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा था, जो सरकार से अलग-अलग तरह के फायदे हासिल करना चाहते थे। आरोपों में ट्रांसफर-पोस्टिंग प्रभावित करने, गोपनीय सरकारी दस्तावेजों तक पहुंच, आर्म्स लाइसेंस और सरकारी मंजूरियों में कथित प्रभाव जैसी बातें शामिल थीं।
पंजाब पुलिस पर हाईकोर्ट की सबसे बड़ी नाराजगी
हाईकोर्ट के 66 पेज के फैसले में पंजाब पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए गए। कोर्ट के मुताबिक ED की जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने प्रारंभिक जांच तो शुरू की, कई लोगों को नोटिस दिए और 29 विभागों से जानकारी मांगी, लेकिन FIR दर्ज करने की दिशा में निर्णायक कदम नहीं उठाया। सबसे अहम बात यह रही कि ED के मटेरियल में प्रमुखता से सामने आए राजबीर सिंह घुम्मन को प्राथमिक जांच में शामिल नहीं किया गया और उनका जवाब भी नहीं लिया गया।
‘ऑल ट्रैवल, नो रीचिंग’ क्यों?
हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच को लेकर टिप्पणी की कि ED की ओर से मिली सूचना के बाद यह पूरी प्रक्रिया “ऑल ट्रैवल एंड नो रीचिंग” जैसी रही। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि अगर ED के डाक्यूमेंट्स पढ़ने लायक नहीं थे तो पुलिस ने करीब एक महीने तक कार्रवाई करने और 29 विभागों को पत्र भेजने के बाद पढ़ने लायक कॉपी क्यों मांगीं। कोर्ट के मुताबिक उपलब्ध मटेरियल पहली नजर में गंभीर था और FIR दर्ज कर प्रॉपर इन्वेस्टीगेशन की जरूरत थी।
अब पंजाब सरकार का दांव क्या है?
सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सरकार की तरफ से वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने अर्जेंट लिस्टिंग की मांग करते हुए कहा कि चुनाव के समय इस तरह के मामले उठाए जा रहे हैं और इसे फेडरल स्ट्रक्चर के उल्लंघन से जोड़ा। सरकार का मूल प्रयास फिलहाल हाईकोर्ट के CBI जांच आदेश पर रोक हासिल करना है। सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार की सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से खुद इस मामले को आने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़ने की कोशिश हुई। विकास सिंह ने कहा कि इलेक्शन टाइम में ऐसे मामले “ट्रंप अप” किए जा रहे हैं।
जनरल कन्सेंट का पुराना पेच
इस मामले का एक महत्वपूर्ण कानूनी बैकग्राउंड पंजाब की CBI को दी गई जनरल कन्सेंट से जुड़ा है। पंजाब ने नवंबर 2020 में CBI की जनरल कन्सेंट वापस ले ली थी। इसके बाद सामान्य स्थिति में CBI को राज्य में जांच के लिए राज्य सरकार की अनुमति की जरूरत पड़ती है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि संवैधानिक अदालत किसी विशेष मामले में CBI जांच का आदेश नहीं दे सकती। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में असली कानूनी सवालों में यह भी शामिल हो सकता है कि इस मामले में हाईकोर्ट ने अपनी न्यायिक शक्ति का इस्तेमाल किस आधार पर किया।
सरकार को इतनी जल्दी किस बात का डर?
हाईकोर्ट के आदेश के बाद सबसे बड़ा प्रेक्टिक्ल रिस्क यह था कि CBI क्रिमिनल केस दर्ज करके जांच आगे बढ़ा सकती थी। हाईकोर्ट ने दो महीने में स्टेटस रिपोर्ट भी मांगी है। ऐसे में अगर सरकार को आदेश पर रोक नहीं मिलती, तो जांच शुरू होने की संभावना बनी रहती है। यही वजह है कि सरकार ने सामान्य कानूनी प्रक्रिया का इंतजार करने के बजाय कुछ ही घंटों में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने अभी क्या किया है?
मंगलवार को CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच के सामने पंजाब सरकार ने अर्जेंट सुनवाई की मांग रखी। कोर्ट ने उसी दिन सुनवाई नहीं की, लेकिन कहा कि मामला बुधवार को लिया जा सकता है और अगर ऐसा नहीं हुआ तो गुरुवार को जरूर लिया जाएगा। अभी सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर कोई स्टे नहीं दिया है।
अब असली कानूनी लड़ाई क्या होगी?
सुप्रीम कोर्ट के सामने सिर्फ CBI जांच का सवाल नहीं होगा। मामला यह भी उठ सकता है कि ED की ओर से भेजे गए मटेरियल की प्रकृति क्या थी, क्या उसके आधार पर FIR और CBI जांच का निर्देश उचित था, पंजाब पुलिस की प्रारंभिक जांच पर्याप्त थी या नहीं और जनरल कन्सेंट वापस होने के बावजूद हाईकोर्ट की CBI जांच का आदेश देने की शक्ति किस सीमा तक है। यानी आने वाली सुनवाई में जांच बनाम राज्य का अधिकार क्षेत्र दोनों आमने-सामने होंगे।
2027 से पहले राजनीतिक असर कितना बड़ा?
कानूनी लड़ाई के साथ इसका राजनीतिक असर भी बड़ा हो सकता है। अगर CBI जांच आगे बढ़ती है तो विपक्ष इसे मान सरकार के खिलाफ बड़ा मुद्दा बना सकता है। दूसरी तरफ AAP सरकार इसे इलेक्शन से पहले केंद्रीय जांच के जरिए दबाव बनाने की कोशिश और पंजाब के फेडरल अधिकारों का सवाल बता सकती है।
अब निगाह सुप्रीम कोर्ट पर
एक ही रात में कहानी हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई। सोमवार को CBI जांच का आदेश, मंगलवार तड़के 1:42 बजे SLP, सुबह अर्जेंट लिस्टिंग की कोशिश और अब बुधवार या गुरुवार की संभावित सुनवाई- घटनाक्रम की रफ्तार अपने आप में इस मामले की गंभीरता बता रही है। अब सुप्रीम कोर्ट का अगला कदम तय करेगा कि CBI जांच तत्काल आगे बढ़ती है, उस पर रोक लगती है या फिर यह विवाद पंजाब सरकार और केंद्रीय जांच एजेंसी के बीच एक लंबी कानूनी लड़ाई का रूप लेता है।

