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चिट्टे से चीमा तक! संगरूर सुसाइड केस में अब परिवार ने मंत्री को कटघरे में खड़ा किया!

मंत्री चीमा के खिलाफ एफआईआर की मांग लेकर राज्यपाल तक पहुंचे चन्नी-रंधावा; सीबीआई जांच की मांग पर विपक्ष का दबाव, वड़िंग ने 11 सितंबर को पूरे पंजाब में एसपी-एसएसपी घेराव का दिया कॉल- आज एनसीएससी चेयरमैन किशोर मकवाना गुलजार के घर पहुंचे, परिवार ने न्याय मिलने तक भोग न करने का ऐलान किया

आरके सेठी
चंडीगढ़, 10 सितम्बर।

संगरूर के तूर बंजारा गांव के गुलजार सिंह की मौत का मामला आज उस समय और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया, जब गुलजार का पूरा परिवार मीडिया के सामने आया और प्रशासन पर अंतिम संस्कार को लेकर दबाव बनाने के गंभीर आरोप लगाए। परिवार का कहना है कि उन्हें अपने पिता का चेहरा तक नहीं देखने दिया गया और उनकी सहमति के बिना अंतिम संस्कार करा दिया गया। परिवार ने साफ कहा है कि जब तक उन्हें न्याय नहीं मिलता, गुलजार सिंह का भोग नहीं किया जाएगा। परिवार ने मंत्री चीमा की गिरफ्तारी की भी मांग की। इसी बीच राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के चेयरमैन किशोर मकवाना गुलजार के घर पहुंचे और परिवार से मुलाकात की। यानी जिस मामले की शुरुआत चिट्टे के खिलाफ उठी एक आवाज से हुई थी, वह अब परिवार के न्याय के संघर्ष और संवैधानिक आयोग की सीधी दखल तक पहुंच चुका है।

गुलजार ने चीमा के सामने पूछा था कि गांव में चिट्टा इतनी आसानी से कैसे बिक रहा है

6 सितंबर को तूर बंजारा में पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा के कार्यक्रम के दौरान गुलजार सिंह ने इलाके में नशे की खुलेआम उपलब्धता का सवाल उठाया था। गुलजार के परिवार के मुताबिक, उनका अपना बेटा नशे की गिरफ्त में था और परिवार इस त्रासदी को झेल रहा था। गुलजार ने सवाल उठाया कि अगर गांव में चिट्टा इतनी आसानी से उपलब्ध है तो सरकार और पुलिस इसे रोक क्यों नहीं पा रही। यही सवाल आगे चलकर पूरे मामले की बुनियाद बन गया।
परिवार का आरोप है कि मंत्री से सवाल पूछने के बाद गुलजार पर स्थानीय स्तर पर दबाव बनाया गया और उनसे माफी मांगने के लिए कहा गया। परिवार के मुताबिक, उन्हें अपमानित किया गया और जातिसूचक टिप्पणियों का भी सामना करना पड़ा। गुलजार की मौत से पहले सामने आए कथित वीडियो में भी उन्होंने कुछ स्थानीय लोगों और पंचायत से जुड़े लोगों पर गंभीर आरोप लगाए थे।

गुलजार के आखिरी वीडियो ने मामले को सिर्फ राजनीतिक आरोप नहीं रहने दिया

गुलजार की मौत से पहले रिकॉर्ड किए गए कथित वीडियो ने पूरे मामले को नया वजन दिया। वीडियो में उन्होंने नशे के सवाल, मंत्री के सामने अपनी बात रखने और उसके बाद पैदा हुए विवाद का जिक्र किया। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने भी इस वीडियो को गंभीरता से लिया है। आयोग के मुताबिक, वीडियो में गुलजार ने मंत्री और गांव की पंचायत से जुड़े लोगों के बारे में गंभीर आरोप लगाए और अपनी स्थिति को लेकर चिंता जताई थी।

पांच लोगों के खिलाफ एफआईआर, लेकिन हरपाल चीमा का नाम अभी शामिल नहीं

गुलजार की मौत के बाद पुलिस ने उनके परिवार की शिकायत के आधार पर पांच लोगों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और एससी-एसटी एक्ट की धाराओं में मामला दर्ज किया। एफआईआर में गांव की सरपंच, उनके पति और पंचायत से जुड़े अन्य लोगों के नाम शामिल हैं। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की है और मामले की जांच के लिए एसआईटी भी गठित की गई है। लेकिन हरपाल सिंह चीमा का नाम मौजूदा एफआईआर में शामिल नहीं है। यही बात अब विपक्ष के सबसे बड़े राजनीतिक और कानूनी सवाल का आधार बन गई है।

आज परिवार पहली बार एक साथ मीडिया के सामने आया और अंतिम संस्कार पर पूरा सवाल बदल दिया

आज गुलजार सिंह के परिवार ने एक साथ मीडिया के सामने आकर कहा कि अंतिम संस्कार को लेकर उन पर दबाव बनाया गया। परिवार के बेटों ने आरोप लगाया कि उन्हें अपने पिता का चेहरा तक देखने नहीं दिया गया, शव को घर नहीं ले जाने दिया गया और उनकी इच्छा के मुताबिक अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी नहीं होने दी गई। परिवार का कहना है कि प्रशासन की ओर से नौकरी और अन्य सहायता का भरोसा दिया गया था, लेकिन उन्हें जिस तरह अंतिम संस्कार के लिए दबाव में लाया गया, उससे परिवार बेहद आहत है।

परिवार का सीधा आरोप-“पिता का चेहरा तक नहीं देखने दिया, दबाव बनाकर कराया अंतिम संस्कार”

परिवार का कहना है कि गुलजार के अंतिम संस्कार के दौरान उनकी भावनाओं और पारंपरिक अधिकारों का सम्मान नहीं किया गया। परिवार के मुताबिक, प्रशासन ने दबाव बनाकर अंतिम संस्कार कराया और अब वे तब तक भोग नहीं करेंगे जब तक उन्हें न्याय नहीं मिलता। परिवार का यह फैसला इस पूरे मामले को एक नए मुकाम पर ले गया है, क्योंकि अब सवाल सिर्फ गुलजार की मौत से पहले के घटनाक्रम का नहीं है; मौत के बाद प्रशासन ने परिवार के साथ कैसा व्यवहार किया, यह भी जांच का बड़ा हिस्सा बन गया है।

अंतिम संस्कार पर पहले सामने आई कहानी परिवार के आज के आरोपों से अलग क्यों है?

इस मामले में एक महत्वपूर्ण विरोधाभास भी सामने आया है। पहले की बातचीत और रिपोर्टिंग में यह बात सामने आई थी कि परिवार और प्रशासन के बीच बातचीत हुई थी और नौकरी, मुआवजे तथा अन्य आश्वासनों को लेकर सहमति बनने के बाद अंतिम संस्कार कराया गया। लेकिन आज परिवार खुद मीडिया के सामने आकर कह रहा है कि उस पर दबाव बनाया गया और वास्तविक सहमति नहीं थी। इसलिए अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अंतिम संस्कार की सहमति किसने दी?

न्याय नहीं तो भोग नहीं- परिवार के इस फैसले ने सरकार पर नैतिक दबाव बढ़ाया

गुलजार के परिवार का यह कहना कि न्याय मिलने तक भोग नहीं किया जाएगा, इस मामले को सिर्फ कानूनी या राजनीतिक विवाद नहीं रहने देता। यह परिवार की सार्वजनिक रूप से घोषित न्याय की मांग है। अब सरकार और जांच एजेंसियों के सामने सवाल यह है कि क्या परिवार को उन सभी आरोपों का जवाब मिलेगा जो उसने मौत से पहले और अब अंतिम संस्कार को लेकर लगाए हैं।

चन्नी-रंधावा की मांग साफ- चीमा की भूमिका की भी स्वतंत्र जांच हो

गुलजार सिंह मामले में कांग्रेस ने आज राजनीतिक दबाव का एक और बड़ा कदम उठाया। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, गुरदासपुर के सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा और अन्य कांग्रेस नेता राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से मिले। कांग्रेस नेताओं ने मामले की सीबीआई जांच की मांग रखी और हरपाल सिंह चीमा का नाम एफआईआर में शामिल करने की मांग की। चन्नी और रंधावा का तर्क है कि गुलजार की मौत के पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए और अगर जांच में मंत्री की भूमिका सामने आती है तो उन्हें भी कानूनी जांच के दायरे में लाया जाना चाहिए। कांग्रेस सीबीआई जांच को इसलिए जरूरी बता रही है क्योंकि राज्य पुलिस की एसआईटी पर राजनीतिक दबाव की आशंका जताई जा रही है। यह विपक्ष का आरोप है; सरकार का कहना है कि जांच निष्पक्ष तरीके से चल रही है।

राहुल गांधी के हमले ने मामले को पंजाब से निकालकर राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचाया

कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता राहुल गांधी पहले ही हरपाल सिंह चीमा के इस्तीफे और स्वतंत्र, निष्पक्ष तथा समयबद्ध जांच की मांग कर चुके हैं। उन्होंने इस मामले को पंजाब में सरकार की विफलताओं पर सवाल उठाने वालों के साथ कथित धमकी और प्रताड़ना के बड़े पैटर्न से जोड़ने की कोशिश की है। उन्होंने पंजाब के दलित समाज से भी सतर्क रहने की अपील की। इससे गुलजार केस अब सिर्फ संगरूर या पंजाब कांग्रेस का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि कांग्रेस के राष्ट्रीय राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बन चुका है।

कांग्रेस का नया पंजाब प्रभारी सरकार के खिलाफ मैदान में

सचिन पायलट के पंजाब कांग्रेस प्रभारी बनने के बाद यह पहला बड़ा मुद्दा है जिसमें उन्होंने भी सरकार पर निशाना साधा है। पायलट ने नशे के खिलाफ आवाज उठाने को लोकतांत्रिक अधिकार बताते हुए गुलजार सिंह मामले में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की जरूरत पर जोर दिया। यानी कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक स्तर पर भले ही गुटों को साथ लाने की कोशिश चल रही हो, लेकिन AAP सरकार के खिलाफ इस मामले में पार्टी की राजनीतिक लाइन कमजोर नहीं हुई है।

वड़िंग ने 11 सितंबर को पूरे पंजाब में एसपी-एसएसपी दफ्तर घेरने का कॉल दिया

राजा वड़िंग ने अब इस मामले को संगरूर से निकालकर पूरे पंजाब में ले जाने की तैयारी कर ली है। उन्होंने 11 सितंबर को सभी जिलों में एसपी और एसएसपी कार्यालयों के घेराव का आह्वान किया है। इसका मतलब साफ है कि कांग्रेस अब गुलजार सिंह केस को सिर्फ एक गांव की घटना नहीं रहने देना चाहती। इसे नशे, पुलिस, प्रशासन और सरकार की जवाबदेही के व्यापक मुद्दे से जोड़ा जा रहा है।

आप का बचाव- विपक्ष मौत पर राजनीति कर रहा है

आम आदमी पार्टी और सरकार ने विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक बताया है। हरपाल सिंह चीमा ने गुलजार की मौत से अपनी किसी भूमिका से इनकार किया है और कहा है कि उन्होंने कार्यक्रम के दौरान नशा बेचने वालों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए थे। सरकार का कहना है कि परिवार की शिकायत के आधार पर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई हुई है और एसआईटी मामले की जांच कर रही है। सरकार विपक्ष पर दुखद मौत को राजनीतिक हथियार बनाने का आरोप लगा रही है।

मोहंजीत सिंह प्रकरण ने संगरूर में सवाल पूछने वाले नागरिकों का बड़ा नैरेटिव खड़ा कर दिया है

संगरूर क्षेत्र में नशे के मुद्दे और पुलिस कार्रवाई को लेकर मोहंजीत सिंह का मामला भी पहले से विवाद में है। विपक्ष अब दोनों घटनाओं को जोड़कर यह सवाल उठा रहा है कि पंजाब में नशे और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले नागरिकों के साथ सरकारी मशीनरी का रवैया कैसा है। यह फिलहाल राजनीतिक नैरेटिव है, स्थापित तथ्य नहीं; लेकिन 2027 के चुनाव से पहले इसका असर बड़ा हो सकता है।

गुलजार केस ने पंजाब कांग्रेस के भीतर भी एक साझा मोर्चा तैयार कर दिया है!

पंजाब कांग्रेस में पिछले दिनों चन्नी कैंप और राजा वड़िंग के बीच खुला टकराव दिखाई देता रहा है। सचिन पायलट के प्रभारी बनने के बाद रंधावा के सुर वड़िंग को लेकर नरम हुए हैं और पार्टी में सार्वजनिक तौर पर साथ चलने की कोशिश दिखाई दे रही है। लेकिन गुलजार सिंह केस में चन्नी और रंधावा का राज्यपाल तक पहुंचना और वड़िंग का अगले दिन पूरे पंजाब में पुलिस कार्यालयों के घेराव का आह्वान करना बताता है कि AAP सरकार के खिलाफ यह मुद्दा कांग्रेस के अलग-अलग गुटों को फिलहाल एक साझा मंच दे रहा है।

चिट्टे का सवाल अब 2027 के चुनावी नैरेटिव में बदल सकता है

AAP सरकार ने पंजाब से नशा खत्म करने का दावा किया है। लेकिन गुलजार सिंह की कहानी विपक्ष को यह कहने का मौका दे रही है कि अगर एक आम आदमी मंत्री के सामने अपने गांव में चिट्टे की उपलब्धता का सवाल उठा रहा है, तो जमीन पर समस्या अभी भी मौजूद है। कांग्रेस इस घटना को सरकार के दावों और जमीन की हकीकत के बीच अंतर के उदाहरण के रूप में पेश कर रही है। सरकार इसके जवाब में अपनी कार्रवाई और नशे के खिलाफ अभियान का हवाला दे रही है। अब आने वाले दिनों में जनता किस तस्वीर को स्वीकार करती है, यह महत्वपूर्ण होगा।

चिट्टे से चीमा तक पहुंची कहानी अब सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे की मांग नहीं रह गई

गुलजार सिंह ने सवाल चिट्टे पर उठाया था। उनकी मौत के बाद मामला कथित दबाव, जातिगत अपमान, स्थानीय पंचायत, पुलिस कार्रवाई, एफआईआर, एसआईटी, अंतिम संस्कार, परिवार के ताजा आरोप, एनसीएससी की जांच, राज्यपाल तक विपक्ष की पहुंच और पूरे पंजाब में आंदोलन तक पहुंच चुका है। कांग्रेस चीमा के खिलाफ एफआईआर और सीबीआई जांच मांग रही है। बीजेपी भी स्वतंत्र जांच की मांग कर रही है। सरकार अपनी एसआईटी और पुलिस कार्रवाई का हवाला दे रही है। और परिवार कह रहा है-न्याय मिलने तक भोग नहीं।

गुलजार ने सवाल चिट्टे पर पूछा था, अब सवाल पूरी पंजाब सरकार से है

एक गांव के आम आदमी ने मंत्री के सामने नशे की समस्या का सवाल उठाया। उसके बाद उसकी मौत हुई। अब परिवार न्याय की मांग कर रहा है, कांग्रेस राज्यपाल तक पहुंच चुकी है, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का चेयरमैन खुद परिवार से मिलने पहुंच गया है और विपक्ष ने पूरे पंजाब में आंदोलन का ऐलान कर दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या गुलजार सिंह की मौत की पूरी सच्चाई सामने आएगी?
या फिर चिट्टे के खिलाफ उठी एक आम आदमी की आवाज, राजनीतिक आरोपों और सरकारी जवाबों के शोर में दबकर रह जाएगी?

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