HomePunjabरंधावा क्यों बदले? पायलट की एंट्री के बाद वड़िंग पर नरमी!

रंधावा क्यों बदले? पायलट की एंट्री के बाद वड़िंग पर नरमी!

राहुल गांधी के पंजाब दौरे से पहले कांग्रेस में ‘ऑल इज़ वेल’ का ऑपरेशन!

सीएम फेस पर भी ‘नो-फेस’ फॉर्मूला, चन्नी कैंप को साथ रखने, वड़िंग को फिलहाल कायम रखने और सभी गुटों को एक मंच पर लाने की कोशिश; लेकिन असली परीक्षा 117 सीटों के टिकट बंटवारे में होगी।

आरके सेठी
चंडीगढ़, 10 सितम्बर।

पंजाब कांग्रेस में पिछले कुछ समय से चल रही अंदरूनी खींचतान के बीच सचिन पायलट की एंट्री ने पार्टी की राजनीतिक चाल जरूर बदल दी है। सबसे बड़ा संकेत उन नेताओं के रुख में दिखाई दे रहा है, जो कुछ दिन पहले तक वड़िंग को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाने के लिए खुलकर मोर्चा खोले हुए थे। गुरदासपुर के सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा का बदला हुआ सुर इसी बदलाव का सबसे ताजा संकेत है। कुछ सप्ताह पहले वड़िंग के खिलाफ सबसे मुखर नेताओं में शामिल रंधावा अब यह सवाल उठाते नजर आ रहे हैं कि आखिर प्रदेश अध्यक्ष बदलने की मांग किसने की है। सवाल सीधा है- रंधावा क्यों बदले? क्या पायलट की एंट्री ने पंजाब कांग्रेस के भीतर पावर समीकरण बदल दिया है?

रंधावा का सुर बदलना महज बयान नहीं, पावर समीकरण का संकेत

रंधावा पहले वड़िंग को हटाने और पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत पर जोर दे रहे थे। लेकिन 5 सितंबर को सचिन पायलट के पंजाब प्रभारी बनने के बाद उन्होंने पायलट के नेतृत्व का खुलकर स्वागत किया और अब वड़िंग को हटाने की तत्काल मांग से पीछे हटते दिख रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, रंधावा ने अब वड़िंग को बदलने की जरूरत पर ही सवाल उठाया है। कुछ सप्ताह पहले तक वड़िंग को हटाने की मुहिम में रंधावा अग्रिम पंक्ति में थे। इसलिए मुद्दा सिर्फ एक बयान का नहीं बल्कि टाइमिंग और राजनीतिक पोजिशनिंग का है।

वड़िंग के खिलाफ पुरानी मुहिम अचानक खत्म हुई या फिलहाल थमी है?

यह कहना हालांकि जल्दबाजी हो सकती है कि रंधावा और वड़िंग के बीच पूरी सुलह हो गई है। हालिया घटनाक्रम इसके उलट भी संकेत देता है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, वड़िंग के एक कार्यक्रम से रंधावा समेत चन्नी कैंप के कई प्रमुख नेताओं की दूरी सामने आई थी। यानी सार्वजनिक टकराव कम हुआ है, लेकिन अंदरूनी मतभेद खत्म हो गए हैं- यह अभी कहना मुश्किल है। यही फर्क इस पूरे घटनाक्रम को दिलचस्प बनाता है।

पायलट की एंट्री ने कांग्रेस को टकराव से ‘ट्रूस’ की तरफ धकेला

सचिन पायलट की नियुक्ति के बाद कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं के रुख में बदलाव का संकेत तेजी से सामने आया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पायलट के आने के बाद चन्नी और रंधावा समेत असंतुष्ट नेताओं की ओर से सहयोग के संकेत मिले और इसे ‘ट्रूस’ यानी अस्थायी युद्धविराम के संकेत के तौर पर देखा गया। यह बदलाव उस समय हुआ जब राहुल गांधी के प्रस्तावित पंजाब दौरे की तैयारी चल रही थी। यानी हाईकमान की प्राथमिकता फिलहाल किसी एक गुट की जीत कराने से ज्यादा पार्टी को राहुल गांधी के दौरे से पहले एक मंच पर खड़ा करना दिखाई देती है।

राहुल गांधी का पंजाब दौरा कांग्रेस के लिए डेडलाइन जैसा क्यों बन गया

कांग्रेस के अंदर यह समझ साफ दिखाई दे रही है कि राहुल गांधी जब पंजाब में चुनावी अभियान की शुरुआत करें तो पार्टी के भीतर वही पुरानी लड़ाई, सार्वजनिक बयानबाजी और एक-दूसरे के कार्यक्रमों के बहिष्कार का माहौल नहीं दिखना चाहिए। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, राहुल गांधी की संभावित पंजाब यात्रा से पहले कांग्रेस हाईकमान राज्य संगठन में ‘ऑल इज़ वेल’ का माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है। उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स में राहुल गांधी का छह दिन का पंजाब दौरा 15 सितंबर के बाद प्रस्तावित बताया गया है। ऐसे में हाईकमान के सामने अपनी पंजाब इकाई को कम-से-कम सार्वजनिक तौर पर एकजुट दिखाने की चुनौती है।

सीएम फेस पर ‘नो-फेस’ फॉर्मूला भी इसी नई रणनीति का हिस्सा

सचिन पायलट ने साफ कर दिया है कि कांग्रेस पंजाब विधानसभा चुनाव में किसी एक नेता को मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट नहीं करेगी। चुनाव सामूहिक नेतृत्व में लड़ा जाएगा और राहुल गांधी कांग्रेस के केंद्रीय चुनावी चेहरे होंगे। यह फैसला पूरी तरह नया नहीं है। जून की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस पहले ही किसी एक सीएम फेस को घोषित नहीं करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही थी। लेकिन अब नए पंजाब प्रभारी पायलट ने इसे स्पष्ट रूप से सामने रख दिया है।
पंजाब कांग्रेस में मुख्यमंत्री चेहरे का सवाल सिर्फ चुनावी रणनीति नहीं बल्कि अंदरूनी सत्ता-संतुलन का सवाल भी रहा है। अगर किसी एक नेता को सीएम फेस घोषित किया जाता तो दूसरे गुट के लिए राजनीतिक जगह तेजी से सिकुड़ जाती। लेकिन सामूहिक नेतृत्व का फॉर्मूला चन्नी, वड़िंग, रंधावा और दूसरे दावेदारों को फिलहाल अपने-अपने राजनीतिक स्पेस में बने रहने देता है। इससे टिकट और संगठन की लड़ाई को चुनाव के करीब तक टालने की गुंजाइश भी पैदा होती है।

पायलट ने वड़िंग को हटाया नहीं, लेकिन वड़िंग विरोध की धार जरूर कम हुई

सचिन पायलट की नियुक्ति के बाद हाईकमान ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजा वड़िंग को तत्काल नहीं हटाया। यही अपने आप में बड़ा संदेश है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पायलट के आने के बाद भी प्रदेश नेतृत्व में तत्काल बदलाव नहीं किया गया है। कांग्रेस ने फिलहाल किसी एक गुट को जीत और दूसरे को हार का संदेश देने के बजाय मौजूदा संगठन के भीतर ही सामंजस्य बैठाने का रास्ता चुना है। पायलट के सामने चुनौती अब वड़िंग, चन्नी, रंधावा और दूसरे प्रभावशाली नेताओं को साथ लेकर चलने की है।
अगर हाईकमान ने वड़िंग को तत्काल हटाने का फैसला नहीं किया और नए प्रभारी पायलट ने आते ही सभी गुटों से मिलकर साथ चलने का संदेश दिया, तो रंधावा के लिए भी अपनी पुरानी टकराव वाली लाइन जारी रखना राजनीतिक रूप से उतना उपयोगी नहीं रह जाता। इसलिए उनका सुर बदलना सिर्फ व्यक्तिगत बयान नहीं, बल्कि बदलते संगठनात्मक समीकरण की प्रतिक्रिया भी हो सकता है।

रंधावा और पायलट का राजस्थान वाला समीकरण इस कहानी को और दिलचस्प बनाता है

कुछ वर्ष पहले राजस्थान में सुखजिंदर सिंह रंधावा कांग्रेस के प्रभारी थे और सचिन पायलट तथा अशोक गहलोत के बीच चल रहे संघर्ष से जूझ रहे थे। उस दौर में रंधावा का पायलट के साथ सख्त राजनीतिक टकराव भी सामने आया था। अब समीकरण उलट गया है- पंजाब में पायलट प्रभारी हैं और रंधावा उनके संगठनात्मक दायरे में। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों नेताओं के बीच यह ‘रोल रिवर्सल’ पंजाब की मौजूदा राजनीति को समझने की एक अहम कड़ी है।
यह कहना जल्दबाजी होगी कि राजस्थान का पुराना समीकरण आज के पंजाब फैसलों को सीधे प्रभावित कर रहा है। लेकिन इतना जरूर है कि रंधावा पायलट की राजनीतिक कार्यशैली और संगठनात्मक भूमिका से अनजान नहीं हैं। अब जब पायलट को पंजाब कांग्रेस के गुटों को साथ लाने की जिम्मेदारी मिली है, तो रंधावा का उनके साथ सहयोगी रुख अपनाना संगठनात्मक रूप से स्वाभाविक भी हो सकता है।

पायलट की पहली चुनौती कांग्रेस को चुनाव के लिए खड़ा करना दिख रही है

पायलट ने पंजाब में नेताओं से बातचीत के बाद सामूहिक जिम्मेदारी और संगठनात्मक अनुशासन पर जोर दिया है। उनका फोकस किसी एक नेता को विजेता बनाने से ज्यादा पार्टी को चुनावी मशीनरी में बदलने पर दिखाई दे रहा है। पंजाब में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा अवसर आम आदमी पार्टी के खिलाफ सत्ता-विरोधी माहौल को अपने पक्ष में खींचना है, लेकिन इसके लिए उसे पहले अपने अंदर की लड़ाई को नियंत्रित करना होगा।
कांग्रेस को अब सबसे पहले अपना घर व्यवस्थित करना है। राहुल गांधी पंजाब आएं तो उनके सामने ऐसा प्रदेश संगठन हो जो कम से कम सार्वजनिक तौर पर एकजुट दिखाई दे। पायलट की नियुक्ति, चन्नी-रंधावा का सहयोग वाला रुख, रंधावा का वड़िंग पर नरम पड़ना और सीएम फेस को लेकर सामूहिक नेतृत्व का ऐलान- इन सबको एक साथ रखें तो यह एक व्यापक ‘इंटरनल रीसेट’ यानी अंदरूनी रीसेट जैसा दिखाई देता है।

असली परीक्षा अभी बाकी है

सार्वजनिक बयान बदल जाना और संगठनात्मक लड़ाई खत्म हो जाना दो अलग चीजें हैं। वड़िंग अभी भी प्रदेश अध्यक्ष हैं, चन्नी कैंप की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं खत्म नहीं हुई हैं और टिकट वितरण का असली संघर्ष अभी आगे है। यही वह चरण होगा जहां पायलट की असली संगठनात्मक क्षमता सामने आएगी।
राहुल गांधी का दौरा और बड़े नेताओं का एक मंच पर आना एक बात है; टिकट वितरण दूसरी। कौन-सी सीट किस गुट के खाते में जाएगी, किस नेता की सिफारिश चलेगी और किस उम्मीदवार को हाईकमान का समर्थन मिलेगा-यहीं से गुटबाजी फिर सिर उठा सकती है। जिस सीट पर चन्नी समर्थक उम्मीदवार होगा, वहां वड़िंग कैंप क्या करेगा? जहां रंधावा का प्रभाव है, वहां टिकट का समीकरण कौन तय करेगा? और क्या पायलट सभी गुटों को उम्मीदवार चयन पर साथ ला पाएंगे?

टिकट बंटवारा तय करेगा कि ‘ट्रूस’ असली एकता है या सिर्फ चुनावी मजबूरी!

अभी नेताओं का एक मंच पर आना अपेक्षाकृत आसान है। असली टकराव तब होगा जब टिकट, संगठनात्मक पद और चुनावी संसाधनों का बंटवारा शुरू होगा। इसलिए 2027 की पंजाब कांग्रेस को समझने के लिए अगले कुछ महीनों में सिर्फ बयान नहीं, बल्कि कौन किस नेता के साथ खड़ा है, कौन किस सीट पर सक्रिय है और टिकट के लिए किस कैंप की पैरवी कर रहा है- यह देखना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा।

रंधावा बदले हैं या सिर्फ रणनीति बदली है?

फिलहाल उपलब्ध संकेत यह नहीं बताते कि रंधावा और वड़िंग के बीच पूरी सुलह हो गई है। ज्यादा सटीक तस्वीर यह है कि सचिन पायलट की एंट्री के बाद कांग्रेस के भीतर टकराव की भाषा थोड़ी नरम हुई है और हाईकमान ने फिलहाल “सबको साथ लेकर चलो” वाला फॉर्मूला अपनाया है। रंधावा का नरम पड़ना इसका पहला बड़ा संकेत है। सीएम फेस पर सामूहिक नेतृत्व दूसरा। वड़िंग को फिलहाल पद पर बनाए रखना तीसरा। और राहुल गांधी के प्रस्तावित दौरे से पहले संगठन को ‘ऑल इज़ वेल’ दिखाने की कोशिश चौथा। लेकिन कहानी का सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी है- क्या पायलट इस अस्थायी युद्धविराम को स्थायी संगठनात्मक एकता में बदल पाएंगे, या 117 सीटों के टिकट बंटवारे के साथ पंजाब कांग्रेस की पुरानी लड़ाई फिर धड़ाधड़ बाहर आ जाएगी? 2027 की कांग्रेस कहानी का अगला बड़ा अध्याय यहीं से शुरू होगा।

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