नाभा जेल ब्रेक में 10 साल की सजा पाए गुरप्रीत सिंह सेखों को मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पार्टी में शामिल कराया, कांग्रेस, SAD और BJP ने उठाए गंभीर सवाल

आरके सेठी
चंडीगढ़, 7 सितम्बर।
पंजाब विधानसभा चुनाव से करीब पांच महीने पहले आम आदमी पार्टी ने फिरोजपुर जिले की जीरा विधानसभा सीट से जुड़ा एक ऐसा राजनीतिक दांव चला है, जिसने राज्य की सियासत गरमा दी है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने जीरा में आयोजित कार्यक्रम के दौरान गुरप्रीत सिंह सेखों को आम आदमी पार्टी में शामिल कराया। सेखों का नाम 2016 के चर्चित नाभा जेल ब्रेक मामले से जुड़ा रहा है और इस मामले में उसे 10 साल की सजा भी सुनाई जा चुकी है। इस मामले को लेकर कांग्रेस, बीजेपी और अकाली दल ने तीखा विरोध किया है।
नाभा जेल ब्रेक से राजनीति तक पहुंची सेखों की कहानी
गुरप्रीत सिंह सेखों 2016 के नाभा जेल ब्रेक मामले के प्रमुख आरोपियों में रहा। जेल ब्रेक के दौरान हथियारबंद हमलावरों ने नाभा की मैक्सिमम सिक्योरिटी जेल पर हमला कर कई कैदियों को छुड़ा लिया था। इसके बाद सेखों पंजाब पुलिस की तलाश में रहे प्रमुख नामों में शामिल हुआ। मार्च 2023 में पटियाला की अदालत ने इस मामले में 22 आरोपियों को दोषी ठहराया और छह को बरी किया। सेखों समेत कुछ दोषियों को 10 साल की सजा सुनाई गई।
47 मुकदमों का रिकॉर्ड, लेकिन सेखों का दावा- बदल चुका हूं
अलग-अलग समय में उपलब्ध पुलिस रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्टों में गुरप्रीत सिंह सेखों के खिलाफ 47 आपराधिक मामले दर्ज होने की बात सामने आई है। हालांकि इन सभी मामलों की कानूनी स्थिति एक जैसी नहीं है, नाभा जेल ब्रेक मामले में मिली सजा के बाद भी कानूनी प्रक्रिया आगे चली है। दूसरी तरफ उसका दावा है कि वह अपना पुराना रास्ता छोड़ चुका है और अब समाजसेवा तथा राजनीति के जरिए काम करना चाहता है।
मान का तर्क- गलत रास्ते से लौटने वाले को मौका क्यों नहीं?
गुरप्रीत सिंह सेखों को पार्टी में शामिल कराते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान ने उसके अतीत को पूरी तरह नकारने के बजाय यह तर्क दिया कि परिस्थितियां किसी व्यक्ति को गलत रास्ते पर ले जा सकती हैं। लेकिन अगर वही व्यक्ति बाद में सही रास्ता चुनता है और समाज की सेवा करना चाहता है तो उसे मौका मिलना चाहिए। AAP का मूल बचाव यही है कि किसी व्यक्ति को उसके अतीत में हमेशा के लिए कैद नहीं किया जा सकता।
लेकिन सवाल सिर्फ सेखों का नहीं, AAP की राजनीति का भी है
यहीं से इस पूरे घटनाक्रम का बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा होता है। आम आदमी पार्टी ने पंजाब में अपनी राजनीति की शुरुआत पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था, भ्रष्टाचार और पुराने सत्ता तंत्र के खिलाफ लड़ाई के दावे के साथ की थी। ऐसे में गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले किसी व्यक्ति को पार्टी में शामिल करने का फैसला AAP के पुराने नैरेटिव पर ही सवाल खड़े करता है।
कांग्रेस ने इसे ‘खतरनाक मिसाल’ बताया
पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने सेखों की AAP में एंट्री को खतरनाक मिसाल बताया है। कांग्रेस का आरोप है कि अगर आपराधिक अतीत वाले प्रभावशाली लोगों के लिए राजनीति के दरवाजे खुलते हैं तो इससे पंजाब की राजनीतिक संस्कृति को गलत संदेश जाएगा। कांग्रेस ने जीरा में सेखों की एंट्री के विरोध में प्रदर्शन भी किया।
अकाली दल ने कानून-व्यवस्था को बनाया निशाना
शिरोमणि अकाली दल ने भी सेखों को AAP में शामिल किए जाने पर मुख्यमंत्री भगवंत मान को घेरा है। अकाली दल का निशाना सीधे AAP सरकार की कानून-व्यवस्था की राजनीति पर है। पार्टी का सवाल है कि जिस पंजाब में गैंगस्टर कल्चर और अपराध को लेकर सरकार लगातार सख्ती के दावे करती है, उसी पंजाब में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को राजनीतिक मंच क्यों दिया जा रहा है।
बीजेपी ने पूछा- क्या गैंगस्टर चलाएंगे पंजाब की सरकार?
अब इस विवाद में बीजेपी भी खुलकर उतर आई है। बीजेपी पंजाब ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया पोस्ट में भगवंत मान सरकार पर सीधा हमला करते हुए कहा कि पार्टी सत्ता बचाने के लिए अपराधियों का सहारा लेने में जुट गई है। बीजेपी ने सेखों को ‘पूर्व गैंगस्टर’ और नाभा जेल कांड का साजिशकर्ता बताते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान से सवाल किया- “मान साहब, कि हुण गैंगस्टर चलाउंगे पंजाब दी सरकार?” यानी क्या अब गैंगस्टर पंजाब की सरकार चलाएंगे?
तीनों विपक्षी दलों का हमला AAP के लिए नया दबाव
कांग्रेस, अकाली दल और बीजेपी के रिएक्शन को एक साथ देखें तो सेखों की एंट्री अब सिर्फ जीरा की स्थानीय राजनीति का मामला नहीं रह गई है। तीनों दल अलग-अलग राजनीतिक भाषा में एक ही सवाल उठा रहे हैं- क्या AAP 2027 की चुनावी जरूरतों के लिए ऐसे स्थानीय प्रभावशाली चेहरों को भी अपने साथ जोड़ने के लिए तैयार है, जिनकी पृष्ठभूमि विपक्ष के लिए सीधा चुनावी हथियार बन सकती है?
सेखों का AAP तक पहुंचना अचानक नहीं हुआ
इस एंट्री को सिर्फ 6 सितंबर के राजनीतिक कार्यक्रम से जोड़कर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। सेखों ने AAP में शामिल होने से करीब दस दिन पहले जीरा में अपना राजनीतिक कार्यालय भी खोला था। वह पहले ही 2027 का विधानसभा चुनाव जीरा से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़ने की इच्छा जाहिर कर चुका था।सेखों की राजनीति में एंट्री पहले से तय दिशा में आगे बढ़ रही थी। फर्क यह आया कि जो व्यक्ति निर्दलीय चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा था, वह अब एक बड़ी राजनीतिक पार्टी के मंच पर आ गया है।
जीरा से बड़ा है फिरोजपुर का राजनीतिक संदेश
इस घटनाक्रम को सिर्फ जीरा सीट तक सीमित करना भी सही नहीं होगा। फिरोजपुर बेल्ट की राजनीति में स्थानीय नेटवर्क, व्यक्तिगत प्रभाव और परिवार की राजनीतिक मौजूदगी का अपना महत्व है। सेखों का परिवार भी स्थानीय राजनीति में सक्रिय रहा है। ऐसे में AAP के लिए यह सिर्फ एक नया सदस्य जोड़ने का मामला नहीं, बल्कि स्थानीय प्रभाव को अपने राजनीतिक ढांचे में शामिल करने की कोशिश भी हो सकती है।
AAP को फायदा मिल सकता है, लेकिन कीमत भी चुकानी पड़ सकती है
राजनीतिक गणित के लिहाज से देखें तो सेखों के पास स्थानीय पहचान और अपना नेटवर्क होने का दावा है। अगर यह प्रभाव वास्तव में चुनावी समर्थन में बदलता है तो AAP को फायदा मिल सकता है। लेकिन दूसरी तरफ यही चेहरा पार्टी के लिए कानून-व्यवस्था और अपराध के मुद्दे पर विपक्ष के हमले का केंद्र भी बन सकता है। यानी जिस चेहरे से वोट का फायदा मिलने की उम्मीद है, वही चेहरा राजनीतिक नुकसान का कारण भी बन सकता है।
विपक्ष को 2027 के लिए तैयार मिला बड़ा मुद्दा
कांग्रेस, SAD और BJP अब इस मुद्दे को 2027 के चुनाव तक खींच सकते हैं। AAP सरकार से पूछा जा सकता है कि एक तरफ वह गैंगस्टर नेटवर्क और अपराध के खिलाफ कार्रवाई का दावा करती है, तो दूसरी तरफ ऐसे व्यक्ति को पार्टी में शामिल क्यों किया गया जिसकी आपराधिक पृष्ठभूमि इतनी विवादित रही है। यह सवाल सिर्फ जीरा में नहीं, पूरे पंजाब में AAP की कानून-व्यवस्था वाली छवि पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
पंजाब में अपराध से राजनीति तक का सवाल नया नहीं
गुरप्रीत सिंह सेखों का मामला पंजाब की राजनीति में अपराध और मुख्यधारा की राजनीति के रिश्ते पर फिर बहस खड़ी करता है। देश की राजनीति में भी अलग-अलग समय पर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के चुनावी राजनीति में आने को लेकर सवाल उठते रहे हैं। बहस का एक पक्ष कहता है कि सुधार के बाद किसी व्यक्ति को सार्वजनिक जीवन में वापसी का मौका मिलना चाहिए, जबकि दूसरा पक्ष मानता है कि गंभीर आपराधिक अतीत वाले चेहरों को राजनीतिक संरक्षण मिलना लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए गलत संदेश है।
AAP ने दांव चला है, अब नजर उसके राजनीतिक रिटर्न पर
गुरप्रीत सिंह सेखों को पार्टी में शामिल करके AAP ने एक स्पष्ट राजनीतिक दांव खेला है। पार्टी को उम्मीद हो सकती है कि उसका स्थानीय प्रभाव चुनावी गणित में काम आएगा। लेकिन कांग्रेस, SAD और अब बीजेपी के हमले ने यह भी साफ कर दिया है कि विपक्ष इस फैसले को आसानी से छोड़ने वाला नहीं है।
यानी असली कहानी सिर्फ गुरप्रीत सिंह सेखों के AAP में आने की नहीं है। असली सवाल यह है कि 2027 की चुनावी लड़ाई में पंजाब की पार्टियां किस तरह के स्थानीय प्रभाव को अपने साथ जोड़ेंगी, राजनीतिक पुनर्वास की सीमा क्या होगी और मतदाता आपराधिक अतीत वाले चेहरों को किस नजर से देखेगा। जीरा से शुरू हुआ यह विवाद पंजाब की राजनीति में 2027 का एक बड़ा नैरेटिव बनता है या नहीं- अब इसकी दिशा आने वाले महीनों में तय होगी।

