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बाबा बकाला: स्टेज अलग-अलग, पर पूरे पंजाब की सियासी तस्वीर एकसाथ!

रखड़ पुन्न्या जोड़ मेले में AAP का सरकार बचाने का नैरेटिव, BJP-SAD के संभावित समीकरण की आहट, चन्नी-वड़िंग की जंग, बादल परिवार के खिलाफ वारिस पंजाब दे की सीधी चुनौती और बीजेपी ने पहली बार सजाई अपनी अलग स्टेज

आरके सेठी
चंडीगढ़, 28 अगस्त.

बाबा बकाला साहिब में शुक्रवार को स्टेज अलग-अलग थे, झंडे अलग-अलग थे और निशाने भी अलग-अलग थे, लेकिन इन सभी मंचों को एक साथ रखिए तो पंजाब की 2027 वाली सियासत की तस्वीर काफी हद तक साफ दिखाई देने लगती है. ऐतिहासिक रखड़ पुन्न्या जोड़ मेले के मौके पर आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल, बीजेपी और अकाली दल वारिस पंजाब दे ने अपने-अपने सियासी मंच सजाए. धार्मिक आस्था के बीच हुई इन अलग-अलग कांफ्रेंसों ने यह भी बता दिया कि पंजाब की अगली चुनावी लड़ाई में कौन किसके राजनीतिक स्पेस में प्रवेश कर रहा है.

रखड़ पुन्न्या जोड़ मेला इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

बाबा बकाला साहिब का रखड़ पुन्न्या जोड़ मेला पंजाब के प्रमुख धार्मिक और ऐतिहासिक आयोजनों में गिना जाता है. इसका संबंध सिख इतिहास की उस महत्वपूर्ण घटना से है, जब 1664 में बाबा बकाला साहिब में गुरु तेग बहादुर साहिब को नौवें गुरु के रूप में पहचाना गया. गुरु हरिकृष्ण साहिब के अंतिम बचनों में आए “बाबा बकाले” के संकेत के बाद यहां गुरु तेग बहादुर साहिब की पहचान सामने आई. इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण रखड़ पुन्न्या पर बाबा बकाला साहिब में बड़ी संख्या में संगत पहुंचती है और धार्मिक समागमों के साथ सालाना जोड़ मेला लगता है. पंजाब की सियासत में इस मौके पर राजनीतिक कांफ्रेंसों की परंपरा ने इसे धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सियासी ताकत परखने का भी बड़ा मंच बना दिया है. इस बार 2027 विधानसभा चुनाव से पहले इसका महत्व और बढ़ गया, क्योंकि पंजाब की लगभग सभी प्रमुख सियासी ताकतों ने यहां अपनी मौजूदगी दर्ज कराई.

AAP ने काम और कल्याण को बनाया हथियार

आम आदमी पार्टी ने अपना राज्य स्तरीय कार्यक्रम बाबा बकाला साहिब के बजाय नजदीकी रईया की दाना मंडी में रखा, लेकिन सियासी संदेश बिल्कुल साफ था. मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाईं और अकाली दल तथा बादल परिवार पर सीधा हमला किया. मुफ्त बिजली, नहर के पानी, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के कामों को सामने रखते हुए मान ने यह बताने की कोशिश की कि 2027 में AAP का चुनावी आधार सरकार के काम और जनकल्याण की योजनाएं होंगी.

खाते में पैसा, मंच से चुनावी संदेश

AAP ने इस कार्यक्रम को सिर्फ भाषण तक सीमित नहीं रखा. सरकार के मुताबिक मुख्यमंत्री मावां-धीयां सत्कार योजना के तहत 5.30 लाख महिलाओं के खातों में 181.50 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए. मान ने 70,840 सरकारी नौकरियों और सरकारी स्कूलों के 882 विद्यार्थियों के नीट में सफल होने का भी उल्लेख किया. संदेश साफ था- जब बाकी दल 2027 की तैयारी में सियासी कांफ्रेंस कर रहे हैं, सरकार अपने काम और सीधे लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं के जरिए वोटर के सामने अपना रिपोर्ट कार्ड रख रही है.

लेकिन कर्मचारी असंतोष ने तस्वीर में दूसरा रंग भर दिया

AAP की इस सरकारी तस्वीर के साथ कर्मचारी आंदोलन का सवाल भी खड़ा है. पंजाब में सरकारी कर्मचारियों की महाहड़ताल ने सरकार पर दबाव बढ़ाया है. यहां तक कि बाबा बकाला में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के दौरान कर्मचारी विरोध की आशंका को लेकर प्रशासन को भी सतर्क रहना पड़ा. यानी सरकार के मंच पर कल्याणकारी योजनाओं और उपलब्धियों का संदेश था, लेकिन उसके बाहर कर्मचारी असंतोष भी राजनीतिक जमीन पर मौजूद था. 2027 में AAP के लिए चुनौती यही होगी कि वह अपने काम के नैरेटिव को कर्मचारी नाराजगी और सरकार विरोधी भावनाओं पर कितना भारी बना पाती है.

BJP का अलग मंच, अलग संदेश

बाबा बकाला की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर बीजेपी के स्वतंत्र राजनीतिक मंच से सामने आई. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की मौजूदगी ने इसे सामान्य पार्टी कार्यक्रम से बड़ा बना दिया. बीजेपी ने यह संकेत दिया कि पंजाब में उसकी राजनीति अब सिर्फ SAD के पुराने गठबंधन के सहारे नहीं चलने वाली. माझा के इस महत्वपूर्ण सियासी और पंथक क्षेत्र में अपना अलग मंच लगाना 2027 की तैयारी में बीजेपी के आत्मविश्वास का संकेत भी है.

शिवराज-सैनी की जोड़ी क्यों महत्वपूर्ण है?

बीजेपी ने केंद्र और पड़ोसी राज्य, दोनों के बड़े चेहरों को एक मंच पर रखकर पंजाब में अपनी राजनीतिक पहुंच का संदेश दिया. शिवराज सिंह चौहान ने बाबा बकाला पहुंचने से पहले उमरा नंगल में किसान चौपाल की और फिर रखड़ पुन्न्या के मुख्य कार्यक्रम में शामिल हुए. नायब सिंह सैनी की मौजूदगी ने बीजेपी के पंजाब अभियान को हरियाणा की राजनीतिक पृष्ठभूमि से जोड़ने का अवसर दिया. यह सिर्फ एक कार्यक्रम में दो नेताओं की मौजूदगी नहीं थी, बल्कि बीजेपी के पास पंजाब में इस्तेमाल किए जा सकने वाले राजनीतिक चेहरों और मुद्दों की ताकत दिखाने की कोशिश थी.

किसान से पंथ तक BJP की नई रणनीति

शिवराज चौहान ने किसानों के हितों से समझौता न करने की बात कही. उन्होंने पंजाब में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू न होने और बाढ़ प्रभावित किसानों से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए भगवंत मान सरकार पर निशाना साधा. कानून-व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने पंजाब सरकार को घेरा. यानी बीजेपी ने बाबा बकाला के मंच को सिर्फ पंथक या धार्मिक संदर्भ में नहीं देखा. किसान, ग्रामीण पंजाब, विकास, सुरक्षा और पंथक भावनाओं को एक साथ जोड़कर उसने अपने लिए उस राजनीतिक स्पेस की तलाश की, जहां अब तक SAD का प्रभाव ज्यादा रहा है.

BJP-SAD की आहट के बीच अलग-अलग स्टेज

यहीं बाबा बकाला की सबसे दिलचस्प राजनीतिक तस्वीर सामने आई. एक तरफ बीजेपी और SAD के दोबारा साथ आने की चर्चाएं चल रही हैं, दूसरी तरफ बीजेपी ने SAD के पारंपरिक सियासी मैदान में उसी दिन अपना अलग मंच लगाया. इसे गठबंधन के टूटने या बनने का प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन संकेत जरूर साफ है कि गठबंधन हुआ भी तो बीजेपी पंजाब में अपनी अलग संगठनात्मक जमीन को कमजोर नहीं करना चाहती. यही वजह है कि संभावित BJP-SAD समीकरण 2027 की राजनीति का एक बड़ा सवाल बन गया है.

SAD के सामने अपना पंथक आधार बचाने की चुनौती

शिरोमणि अकाली दल ने बाबा बकाला साहिब में अपने पारंपरिक पंथक और ग्रामीण आधार को फिर सक्रिय करने की कोशिश की. माझा SAD की पुरानी राजनीतिक ताकत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है और पार्टी के लिए यहां की सियासी मौजूदगी सिर्फ एक सालाना रस्म नहीं है. लेकिन इस बार चुनौती पहले से बड़ी है. AAP सत्ता में है, बीजेपी अपना स्वतंत्र आधार बनाने में लगी है और पंथक स्पेस में वारिस पंजाब दे सीधे चुनौती दे रहा है.

मजीठिया ने मुकाबला सीट तक पहुंचाया

SAD की सियासत सिर्फ पंथक अपील तक सीमित नहीं रही. वरिष्ठ अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने भगवंत मान को मजीठा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की खुली चुनौती दी. मजीठिया ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री मजीठा से उनके खिलाफ चुनाव लड़ते हैं तो वहां के लोग उन्हें ऐसा सबक सिखाएंगे जिसे वह जिंदगी भर याद रखेंगे. इस चुनौती ने बाबा बकाला के सियासी मंच को सीधे 2027 के विधानसभा मुकाबले से जोड़ दिया. अब यह देखना भी दिलचस्प होगा कि AAP इस चुनौती का राजनीतिक जवाब किस तरह देती है.

वारिस पंजाब दे का सीधा निशाना- बादल परिवार

बाबा बकाला साहिब में वारिस पंजाब दे ने सबसे स्पष्ट और आक्रामक पंथक राजनीतिक संदेश दिया. संगठन के मंच से बादल परिवार को हराना चुनावी लक्ष्य बताया गया और कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने का संदेश दिया गया. इसका अर्थ साफ है- पंथक राजनीति का वह स्पेस जिसे लंबे समय तक SAD अपनी स्वाभाविक राजनीतिक जमीन मानता रहा, अब वहां एक नया दावेदार खुली चुनौती के साथ खड़ा है.

पंथ बचाओ, पंजाब बचाओ से ड्रग्स के खिलाफ नया नैरेटिव

वारिस पंजाब दे की कांफ्रेंस में सिर्फ बादल परिवार विरोध नहीं था. संगठन ने पंजाब के ड्रग्स संकट को भी प्रमुख मुद्दा बनाया और राज्य में नशे की समस्या पर व्हाइट पेपर लाने की बात कही. बापू तरसेम सिंह ने मंच से भाई अमृतपाल सिंह की ओर से पंजाबियों से किया गया संकल्प पढ़कर सुनाया. इससे वारिस पंजाब दे ने पंथक राजनीति को पंजाब के व्यापक सामाजिक मुद्दों, खासकर नशे के संकट, से जोड़ने की कोशिश की.

पंथक राजनीति में नया मुकाबला

वारिस पंजाब दे का “पंथ बचाओ, पंजाब बचाओ” सम्मेलन इसीलिए महत्वपूर्ण है. यह सिर्फ SAD को चुनौती देने वाला मंच नहीं, बल्कि पंजाब और सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के दावे की नई लड़ाई का संकेत है. इसके अलावा दूसरे पंथक संगठन भी अपनी गतिविधियों के जरिए मौजूद रहे. यानी पंथक स्पेस को अब सिर्फ SAD बनाम वारिस पंजाब दे के दोतरफा मुकाबले में सीमित करना भी सही नहीं होगा.

कांग्रेस का मंच बना चन्नी-वड़िंग की लड़ाई का आईना

बाबा बकाला साहिब में कांग्रेस की सियासी कांफ्रेंस ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को भी सामने ला दिया. पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थक नेताओं की सक्रियता और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग खेमे की दूरी ने एक पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया- 2027 में पंजाब कांग्रेस की सियासी कमान किसके हाथ में होगी? खास बात यह रही कि यह सालाना राज्य स्तरीय आयोजन इस बार PPCC के आधिकारिक मंच से नहीं हुआ, बल्कि चन्नी विरोधी वड़िंग खेमे के नेताओं से अलग एक मंच के रूप में सामने आया.

चन्नी के साथ माझा के कई चेहरे

चन्नी के मंच पर पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा, पूर्व मंत्री तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा, भारत भूषण आशु, राणा गुरजीत सिंह और पूर्व विधायक रमनजीत सिंह सिक्की समेत कई वरिष्ठ नेता दिखाई दिए. इन नेताओं की मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि चन्नी के पास कांग्रेस के भीतर अभी भी अपना मजबूत राजनीतिक नेटवर्क है. दूसरी तरफ वड़िंग खेमे की गैरमौजूदगी ने यह साफ किया कि प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री के बीच राजनीतिक दूरी खत्म नहीं हुई है.

तरसेम सिंह की तारीफ और चन्नी की पोस्ट

अमृतपाल सिंह के पिता और वारिस पंजाब दे के कार्यकारी अध्यक्ष तरसेम सिंह की ओर से चन्नी की तारीफ वाला वीडियो सामने आया और चन्नी ने उसे अपने सोशल मीडिया पर साझा किया. इससे कांग्रेस के भीतर चन्नी की पंथक राजनीति को लेकर चर्चा तेज हुई. यह दिखता है कि चन्नी सिख और पंथक मुद्दों पर अपनी अलग राजनीतिक पहचान को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. यही पहलू कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में उनके विरोधियों के लिए नया सवाल बन सकता है.

एक ही जोड़ मेले में चार बड़ी सियासी लड़ाइयां

अगर बाबा बकाला साहिब के पूरे घटनाक्रम को एक साथ रखा जाए तो चार बड़े संघर्ष साफ दिखाई देते हैं. AAP और संभावित BJP-SAD समीकरण के बीच सत्ता की लड़ाई है. कांग्रेस के भीतर चन्नी और वड़िंग के बीच नेतृत्व की लड़ाई है. SAD और वारिस पंजाब दे के बीच पंथक स्पेस की लड़ाई है. और इन सबके ऊपर किसान, कर्मचारी, रोजगार, पंजाब के अधिकार, नशा और पंथक पहचान जैसे मुद्दों पर वोटर को अपने साथ जोड़ने की लड़ाई है.

कौन बनेगा पंजाब और पंथ की आवाज?

बाबा बकाला में आज जो कुछ हुआ उसका असली सवाल सिर्फ यह नहीं था कि 2027 में कौन सरकार बनाएगा. उससे पहले सवाल यह था कि पंजाब और खासकर पंथक राजनीति का प्रतिनिधि होने का दावा कौन कर सकता है. AAP सत्ता के काम और कल्याणकारी योजनाओं के जरिए यह जगह तलाश रही है. बीजेपी किसान, विकास और केंद्र के सहारे अपना स्पेस बढ़ाना चाहती है. SAD अपने पुराने पंथक आधार को बचाने में जुटा है. वारिस पंजाब दे उसी पंथक जमीन पर नई दावेदारी कर रहा है. कांग्रेस में चन्नी अपनी अलग पंथक-पंजाब लाइन के साथ आगे बढ़ रहे हैं.

हर मंच का निशाना अलग, मंजिल 2027

AAP काम और कल्याण के जरिए सत्ता बचाने की कोशिश कर रही है. बीजेपी संभावित गठबंधन के बावजूद अपनी स्वतंत्र जमीन तैयार कर रही है. SAD अपने पुराने पंथक-कैडर आधार को वापस खड़ा करने में जुटा है. वारिस पंजाब दे उसी आधार में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा है. कांग्रेस के भीतर चन्नी-वड़िंग की खींचतान यह तय करेगी कि AAP विरोधी राजनीति को एकजुट नेतृत्व मिल पाता है या नहीं. यानी बाबा बकाला में लड़ाई सिर्फ पार्टियों के बीच नहीं थी; यह अलग-अलग राजनीतिक नैरेटिव के बीच भी थी.

2027 का नक्शा अभी से दिखाई देने लगा

बाबा बकाला साहिब में हुई इन सियासी मजलिसों ने चुनावी मुकाबले के किरदार, उनके निशाने और उनके राजनीतिक स्पेस जरूर सामने कर दिए. AAP के सामने सरकार के काम के साथ कर्मचारी असंतोष की चुनौती है. बीजेपी के सामने पंजाब में अपना आधार बढ़ाने का सवाल है. SAD के सामने अपनी पंथक पहचान और संगठन को बचाने की चुनौती है. वारिस पंजाब दे उसी पंथक जमीन पर नई दावेदारी कर रहा है. कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल अपने अंदर की लड़ाई खत्म कर एक स्पष्ट राजनीतिक नेतृत्व देने का है.

स्टेज अलग-अलग, तस्वीर एकसाथ

बाबा बकाला साहिब में शुक्रवार को स्टेज अलग-अलग थे, लेकिन उन सभी स्टेजों को जोड़ दें तो पूरे पंजाब की सियासी तस्वीर एकसाथ दिखाई देती है. रखड़ पुन्न्या जोड़ मेले ने 2027 की लड़ाई का नतीजा तो नहीं बताया, लेकिन इतना जरूर बता दिया कि अगला पंजाब चुनाव सिर्फ AAP बनाम कांग्रेस नहीं होगा. यह सत्ता, पंथक राजनीति, किसान, पंजाब के अधिकार, नशे के खिलाफ लड़ाई, संगठन, गठजोड़ और नेतृत्व- इन सभी मोर्चों पर एक साथ लड़ा जाएगा. और बाबा बकाला साहिब में आज जो दिखाई दिया, वह आने वाले महीनों में पंजाब की सियासत का और बड़ा रूप ले सकता है.

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