HomeCurrent Newsकिसान जान गए, आवाज़ ‘जंतर-मंतर’ से गूंजती है!

किसान जान गए, आवाज़ ‘जंतर-मंतर’ से गूंजती है!

खनौरी बॉर्डर पर दिल्ली कूच को लेकर किसानों और हरियाणा प्रशासन में कई दौर की बातचीत बेनतीजा. प्रशासन ने जत्थे की संख्या घटाने को कहा, किसानों ने 41 का प्रस्ताव दिया, लेकिन सहमति नहीं बनी. मुख्यमंत्री से बातचीत के सुझाव पर किसानों ने कहा, मामला कृषि का है तो केंद्र के कृषि मंत्री से बात कराई जाए.

आरके सेठी
चंडीगढ़, 16 अगस्त

किसान दिल्ली क्यों जाना चाहते हैं? सिर्फ अपनी मांगें रखने के लिए? या इसलिए भी कि उन्हें पता है कि जंतर-मंतर वह जगह है, जहां से उठी आवाज दिल्ली की सीमाओं से निकलकर पूरे देश तक पहुंच सकती है! हाल ही में हुए सीजेपी के आन्दोलन की कामयाबी सभी को दिखती है, जाहिर है कि वो आन्दोलन जंतर-मंतर पर था तो पूरे देश की निगाह उस पर टिक गई. ऐसा नहीं की किसानों ने पहली बार दिल्ली जाने की बात की है, हर आन्दोलन में मुद्दा दिल्ल्ली जाने का ही रहा है, लेकिन आगे बढने से पहले ही रोक लिया जाता रहा और आन्दोलन उन्ही हरियाणा पंजाब की सरहदों पर ही चलता रहा. इसबार शांतिपूर्वक आन्दोलन की बात हुई और चुनिन्दा किसानों के दिल्ली जाने का एलान हुआ था. क्योंकि किसान जानते थे कि बड़ी तादाद में सरकार आगे बढने नही देगी. लेकिन ‘जंतर-मंतर’ का नाम सुनते ही सरकार चौकन्नी हो गई. क्योंकि, सीजेपी का आन्दोलन सरकार के गले की फांस बन गया था. अब किसानों की पदयात्रा के मामले में नतीजा सामने है. यात्रा को रोक लिया गया है. बॉर्डर सील है. किसान नेताओं को हिरासत में लिया जा रहा है.

खनौरी-दाता सिंहवाला बॉर्डर से दिल्ली के जंतर-मंतर तक प्रस्तावित ‘किसान बचाओ पदयात्रा’ ने रविवार को इसी सवाल को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया है. किसानों ने शांतिपूर्ण तरीके से दिल्ली पहुंचकर अपनी बात केंद्र सरकार तक पहुंचाने की तैयारी की थी. प्रस्तावित यात्रा करीब 228 किलोमीटर की है और जंतर-मंतर पर किसान पंचायत के बाद केंद्र सरकार को मांगपत्र सौंपने की योजना थी.

लेकिन दिल्ली की ओर पहला कदम बढ़ने से पहले ही खनौरी बॉर्डर पर किसान और हरियाणा प्रशासन आमने-सामने आ गए. हरियाणा प्रशासन ने बॉर्डर को सील कर भारी सुरक्षा व्यवस्था की है. पांच स्तर की बैरिकेडिंग, कंक्रीट के अवरोध और भारी पुलिस बल तैनात किया गया है. किसानों को हरियाणा में प्रवेश कर दिल्ली की ओर आगे बढ़ने की अनुमति नहीं देने की बात प्रशासन की ओर से कही गई है.

कई दौर की बातचीत, लेकिन रास्ता नहीं निकला

दिनभर तनावपूर्ण स्थिति के बीच किसानों के प्रतिनिधिमंडल की जींद के उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक के साथ कई दौर में बातचीत हुई. प्रशासन की ओर से किसानों के प्रस्तावित जत्थे की संख्या कम करने की बात रखी गई. किसानों की ओर से संख्या 51 से घटाकर 41 करने का प्रस्ताव दिया गया, लेकिन इस पर भी सहमति नहीं बन सकी. शाम तक बातचीत किसी ठोस समाधान तक नहीं पहुंच पाई. इसके बाद मुख्यमंत्री से बातचीत करवाने का सुझाव सामने आया. किसानों का तर्क था कि जब आंदोलन के मूल मुद्दे कृषि से जुड़े हैं तो बातचीत केंद्र के कृषि मंत्री से कराई जानी चाहिए. यानी किसानों और हरियाणा प्रशासन के बीच असली सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया कि दिल्ली जाने वाले किसानों की संख्या कितनी होगी. सवाल अब यह भी है कि किसानों की मांगों पर बातचीत का अधिकार और राजनीतिक जिम्मेदारी किस स्तर पर होगी. हरियाणा या केंद्र?

जंतर-मंतर ही क्यों?

किसानों की प्रस्तावित पदयात्रा का अंतिम पड़ाव जंतर-मंतर है. यह चुनावी राजनीति का मंच नहीं है, लेकिन दिल्ली में जनआंदोलनों के लिए इसकी अपनी राजनीतिक और प्रतीकात्मक अहमियत है. किसानों की रणनीति को इसी नजर से भी देखा जा सकता है कि पंजाब और हरियाणा से उठी आवाज को दिल्ली के केंद्र तक ले जाकर उसे राष्ट्रीय मुद्दे के रूप में सामने रखा जाए. यही वजह है कि सवाल उठता है. क्या किसान जानते हैं कि जंतर-मंतर तक पहुंचना सिर्फ दिल्ली पहुंचना नहीं है?

जंतर-मंतर पर एक दिन की किसान पंचायत करने और इसके बाद केंद्र सरकार को मांगपत्र देने की योजना बनाई गई थी. किसान आंदोलन में जान गंवाने वाले शुभकरण सिंह की मौत वाले स्थान की मिट्टी भी पदयात्रा के दौरान दिल्ली ले जाने की बात कही गई है.

सरकार भी समझ रही है इस कदम का महत्व?

खनौरी बॉर्डर पर प्रशासन की तैयारियां इस सवाल को और गंभीर बनाती हैं. अगर यह सिर्फ सीमित संख्या में किसानों की शांतिपूर्ण पदयात्रा होती, तो क्या इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत पड़ती? दूसरी तरफ प्रशासन की दलील कानून-व्यवस्था और दिल्ली की ओर किसानों के प्रवेश को नियंत्रित करने की है. इसलिए इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक महत्व सिर्फ आज की स्थिति तक सीमित नहीं है. किसान जंतर-मंतर पहुंचते हैं तो उनकी आवाज कितनी दूर तक जाती है और सरकार उन्हें वहां तक पहुंचने देती है या नहीं. आने वाले दिनों की राजनीति का एक महत्वपूर्ण सवाल यही है.

फिलहाल खनौरी में ही मोर्चा

रविवार शाम तक बातचीत बेनतीजा रहने के बाद किसानों ने तत्काल टकराव का रास्ता अपनाने के बजाय खनौरी बॉर्डर पर ही शांतिपूर्ण विरोध जारी रखने का फैसला किया है. ताजा रिपोर्टों के अनुसार किसान 28 अगस्त तक बॉर्डर पर डटे रहने की तैयारी में हैं और सड़क जाम न करने की बात कही गई है. यानी दिल्ली कूच फिलहाल रुका है, आंदोलन नहीं.

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