पंजाब में चुनाव से करीब छह महीने पहले बीजेपी के सामने संगठन को संभालने की चुनौती, नई प्रदेश टीम के गठन के बाद विरोध, पुराने नेताओं की नाराजगी और जिलाध्यक्षों की नियुक्तियों पर विवाद के बाद अब जिलों में 36 प्रभारी-सहप्रभारी नियुक्त

आरके सेठी
चंडीगढ़, 17 अगस्त।
पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी भारतीय जनता पार्टी के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपना संगठन दिखाई दे रहा है. राज्य में अपना राजनीतिक आधार तेजी से बढ़ाने और पहली बार सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनावी तैयारी करने का दावा कर रही बीजेपी को पिछले कुछ सप्ताह में संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर जिस तरह के असंतोष का सामना करना पड़ा है, उसने पार्टी की चुनावी तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. दरअसल, पंजाब में बीजेपी की कोर लीडरशिप वहां “नई बीजेपी” से तालमेल नहीं बिठा पा रही है.
नई प्रदेश टीम के गठन के बाद पुराने नेताओं की नाराजगी सामने आई. इसके बाद जिला अध्यक्षों की नियुक्तियों और बदलाव को लेकर विवाद हुआ. होशियारपुर में 111 पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे दिया. फरीदकोट में भी करीब 10 पदाधिकारियों के इस्तीफे की खबर सामने आई. वरिष्ठ नेता सुखमिंदरपाल सिंह ग्रेवाल और बीजेपी प्रवक्ता चेतन मोहन जोशी ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता तक छोड़ दी.
मामला इतना बढ़ा कि पंजाब बीजेपी नेतृत्व को दिल्ली बुलाकर राष्ट्रीय नेतृत्व ने संगठनात्मक स्थिति पर चर्चा की और नाराज नेताओं को साथ लेकर चलने का संदेश दिया. अब इसी घटनाक्रम के बीच बीजेपी ने पंजाब के सभी 36 संगठनात्मक जिलों में जिला प्रभारी और सह-प्रभारी नियुक्त कर दिए हैं.
नई प्रदेश टीम बनी और साथ ही शुरू हो गया असंतोष
2 अगस्त को पंजाब BJP अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने अपनी नई प्रदेश टीम की घोषणा की. इसमें 5 महासचिव, 12 प्रदेश उपाध्यक्ष और 12 सचिव शामिल किए गए. नई टीम में पुराने बीजेपी नेताओं के साथ दूसरी पार्टियों से बीजेपी में आए नेताओं को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गईं. 12 प्रदेश उपाध्यक्षों में से 6 ऐसे नेता थे, जो कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और आम आदमी पार्टी से बीजेपी में आए थे.
बीजेपी की रणनीति को देखें तो यह कदम पार्टी के विस्तार की कोशिश का हिस्सा माना जा सकता है. पंजाब में लंबे समय तक सीमित शहरी आधार वाली बीजेपी अब राज्य के दूसरे हिस्सों में भी अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाना चाहती है. इसके लिए दूसरे दलों से आए नेताओं के राजनीतिक प्रभाव और सामाजिक नेटवर्क का इस्तेमाल करना पार्टी की रणनीति हो सकती है.
बदलाव पुराने बीजेपी कैडर के एक हिस्से को रास नहीं आया
नई टीम की घोषणा के तुरंत बाद वरिष्ठ बीजेपी नेता सुखमिंदरपाल सिंह ग्रेवाल ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. 1992 से बीजेपी से जुड़े ग्रेवाल ने पार्टी के मौजूदा संगठनात्मक हालात पर सवाल उठाए. उनके साथ बीजेपी प्रवक्ता चेतन मोहन जोशी ने भी प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दिया. यहां सवाल सिर्फ दो नेताओं के इस्तीफे का नहीं था. यह उस पुराने बीजेपी कैडर की नाराजगी का संकेत था, जो वर्षों से पंजाब में पार्टी का संगठन खड़ा करता रहा है.
पुराने कार्यकर्ता बनाम नए राजनीतिक चेहरे
एक तरफ पार्टी के पास उसका पारंपरिक कैडर है, जिसने दशकों तक सीमित राजनीतिक परिस्थितियों में संगठन को जिंदा रखा. दूसरी तरफ कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और शिरोमणि अकाली दल से बीजेपी में आए ऐसे नेता हैं, जिनके पास अपने-अपने इलाकों में राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव है. 2027 के चुनाव में विस्तार करने के लिए बीजेपी को इन नए चेहरों की जरूरत हो सकती है. लेकिन यदि पुराने कार्यकर्ताओं को यह महसूस होने लगे कि वर्षों की निष्ठा और मेहनत के बावजूद महत्वपूर्ण संगठनात्मक जिम्मेदारियां नए आए नेताओं को दी जा रही हैं, तो असंतोष स्वाभाविक है. यही टकराव पंजाब बीजेपी की मौजूदा संगठनात्मक चुनौती का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा दिखाई देता है.
जिलाध्यक्षों की नियुक्ति ने विवाद को और गहरा किया
प्रदेश टीम के गठन के साथ जिला संगठन में भी बड़े बदलाव किए गए. 18 जुलाई को बीजेपी ने पंजाब के 16 संगठनात्मक जिलों में नए जिलाध्यक्ष नियुक्त किए थे. इसके बाद 2 अगस्त को छह और जिलों में जिला अध्यक्ष बदले गए. यानी बहुत कम समय के भीतर जिला संगठन के स्तर पर बड़े पैमाने पर फेरबदल हुआ. सबसे ज्यादा विवाद होशियारपुर में सामने आया. होशियारपुर शहरी बीजेपी के जिलाध्यक्ष सतीश बावा को नियुक्ति के करीब दो सप्ताह बाद ही हटाकर नितिन गुप्ता ‘नन्नू’ को जिम्मेदारी दे दी गई. इस बदलाव को लेकर वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री तीक्ष्ण सूद ने खुलकर नाराजगी जताई. यहीं से मामला केवल नियुक्ति का नहीं रहा, बल्कि संगठन के भीतर मौजूद गुटीय समीकरण भी सामने आने लगे. होशियारपुर में 111 पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे दिया. महत्वपूर्ण बात यह थी कि इन लोगों ने बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता नहीं छोड़ी, बल्कि संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दिया. यानी संदेश यह था कि विरोध पार्टी छोड़ने का नहीं, बल्कि संगठन के भीतर लिए गए फैसलों का था. फरीदकोट में भी करीब 10 पदाधिकारियों के इस्तीफे की खबर सामने आई. इसके अलावा संगरूर, पटियाला और कुछ अन्य क्षेत्रों में भी संगठनात्मक फैसलों को लेकर असंतोष की खबरें आईं.
छह जिलाध्यक्षों के बदलाव ने भी सवाल खड़े किए.
राजनीति के जानकारों का मानना है कि सवाल यह नहीं था कि पार्टी संगठन में बदलाव क्यों कर रही है. राजनीतिक दलों में नियुक्तियां और बदलाव सामान्य प्रक्रिया हैं. सवाल यह था कि कुछ नियुक्तियों के बाद इतनी जल्दी बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी? अगर स्थानीय संगठन पूरी तरह संतुष्ट था तो विरोध की स्थिति क्यों बनी? और अगर सब कुछ पार्टी की सामान्य रणनीति के तहत था तो मामला राष्ट्रीय नेतृत्व तक क्यों पहुंचा?
मामला पंजाब से दिल्ली तक पहुंचा
पंजाब बीजेपी में बढ़ते असंतोष के बाद मामला प्रदेश नेतृत्व तक सीमित नहीं रहा. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के साथ पंजाब बीजेपी अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों और संगठन महामंत्री मनथरी श्रीनिवासुलु की दिल्ली में बैठक हुई. बैठक में बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष और पंजाब के संगठनात्मक पर्यवेक्षक सतीश पूनिया भी मौजूद रहे. बैठक का एक महत्वपूर्ण संदेश यह था कि नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं से संवाद किया जाए तथा सभी को साथ लेकर आगे बढ़ा जाए. सतीश पूनिया को पंजाब संगठन में पैदा हुए असंतोष को समझने और नाराज नेताओं से संवाद करने की जिम्मेदारी भी दी गई. यानी बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व पंजाब की स्थिति को नजरअंदाज करने के बजाय सीधे हस्तक्षेप करता दिखाई दिया.
और अब 36 जिलों में प्रभारी-सहप्रभारी
इसी घटनाक्रम के बाद बीजेपी ने पंजाब के सभी 36 संगठनात्मक जिलों में जिला प्रभारी नियुक्त किए हैं. छह जिलों को छोड़कर बाकी जगह सह-प्रभारी भी नियुक्त किए गए हैं. यह नियुक्तियां 15 अगस्त को की गईं. इसे सामान्य संगठनात्मक नियुक्ति कहकर नजरअंदाज करना इसलिए मुश्किल है क्योंकि यह फैसला उसी दौर में आया है जब पार्टी के भीतर संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर असंतोष सामने आया है. वह प्रदेश नेतृत्व और जिला संगठन के बीच समन्वय की महत्वपूर्ण कड़ी होता है. स्थानीय संगठन की गतिविधियों, पार्टी कार्यक्रमों, नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ तालमेल तथा चुनावी तैयारियों की निगरानी में उसकी भूमिका रहती है. इस लिहाज से 36 जिला प्रभारियों की नियुक्ति बीजेपी के लिए सिर्फ नए पद बांटने की प्रक्रिया नहीं है. यह प्रदेश नेतृत्व और जमीनी संगठन के बीच एक नई समन्वय व्यवस्था बनाने की कोशिश भी हो सकती है.
बीजेपी के सामने 117 सीटों और 24 हजार बूथों की चुनौती
पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए बीजेपी के 2027 के लक्ष्य को देखना जरूरी है. पार्टी साफ कर चुकी है कि वह पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है. यह बीजेपी के लिए बहुत बड़ा विस्तार है. पंजाब में लंबे समय तक बीजेपी मुख्य रूप से सीमित शहरी विधानसभा क्षेत्रों में प्रभावी रही. पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी माना है कि पंजाब में बीजेपी का संगठन लंबे समय तक लगभग 23 विधानसभा क्षेत्रों तक सीमित रहा. अब पार्टी का लक्ष्य पूरे पंजाब में संगठन खड़ा करना है. इसके लिए बीजेपी ने लगभग 24,000 बूथों तक संगठन पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. पार्टी के अनुसार करीब 19,000 बूथों तक उसकी मौजूदगी बन चुकी थी और बाकी बूथों तक पहुंच बढ़ाने की तैयारी है. यानी बीजेपी को सिर्फ 117 उम्मीदवारों की तलाश नहीं करनी है. उसे लगभग 24 हजार बूथों पर कार्यकर्ता, स्थानीय नेतृत्व, संगठनात्मक ढांचा और चुनावी मशीनरी खड़ी करनी है. यही वजह है कि जिला संगठन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है. लेकिन इसी मोड़ पर बीजेपी के सामने सबसे बड़ा विरोधाभास भी खड़ा होता है. जिस पार्टी को अगले छह महीनों में बूथ से लेकर विधानसभा स्तर तक संगठन खड़ा करना है, उसे अभी अपने ही संगठन में पैदा हुए असंतोष को संभालना पड़ रहा है.
हाईकमान के सामने तीन बड़ी चुनौतियां
पंजाब बीजेपी को पटरी पर लाने के लिए हाईकमान के सामने मूल रूप से तीन बड़ी चुनौतियां दिखाई देती हैं. पहली चुनौती पुराने बीजेपी कैडर को भरोसा दिलाने की है. उन्हें यह महसूस कराना होगा कि दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को संगठन में जगह देने का मतलब पुराने कार्यकर्ताओं की भूमिका खत्म करना नहीं है. दूसरी चुनौती नए आए नेताओं को प्रभावी ढंग से समायोजित करने की है. यदि बीजेपी 117 सीटों पर लड़ना चाहती है तो उसे सिर्फ अपने पारंपरिक कैडर पर निर्भर रहना मुश्किल होगा. उसे उन नेताओं की भी जरूरत होगी, जो दूसरे दलों से आकर बीजेपी के साथ जुड़े हैं और अपने इलाकों में राजनीतिक प्रभाव रखते हैं. तीसरी चुनौती इन दोनों के बीच संतुलन बनाते हुए बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करने की है. यानी बीजेपी को एक साथ पुराने और नए दोनों को साथ लेकर चलना होगा. अगर यह संतुलन बिगड़ा तो संगठनात्मक विस्तार ही पार्टी के लिए नई समस्या पैदा कर सकता है.
क्या 36 जिला प्रभारी संगठन की नई कड़ी बनेंगे?
36 जिला प्रभारियों की नियुक्ति अब इस पूरे घटनाक्रम का अगला महत्वपूर्ण चरण है. इनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे प्रदेश नेतृत्व और जिला संगठन के बीच कितनी प्रभावी कड़ी बनते हैं. क्या वे नाराज कार्यकर्ताओं को साथ ला पाएंगे? क्या वे स्थानीय गुटबाजी को कम कर पाएंगे? क्या जिलाध्यक्षों और स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल बना पाएंगे? और क्या वे बीजेपी के 2027 के संदेश को बूथ स्तर तक पहुंचा पाएंगे? अगर इसका जवाब हां है तो 36 जिला प्रभारी बीजेपी के लिए संगठनात्मक संकट से निकलने का माध्यम बन सकते हैं. लेकिन अगर जिला स्तर पर पुराने विवाद और गुटीय खींचतान बनी रहती है तो अतिरिक्त संगठनात्मक लेयर समस्या का समाधान करने के बजाय उसे और जटिल भी कर सकती है.
चुनाव से करीब छह महीने पहले बगावत का अर्थ क्या?
चुनाव से करीब छह महीने पहले किसी राजनीतिक दल के भीतर संगठनात्मक असंतोष का सार्वजनिक होना सामान्य बात नहीं है. यह वह समय है जब राजनीतिक दल बूथ कमेटियों, संभावित उम्मीदवारों, विधानसभा क्षेत्रों के समीकरण, स्थानीय नेताओं की भूमिका और चुनावी अभियान की रणनीति को अंतिम रूप देने की दिशा में बढ़ते हैं. ऐसे समय में बीजेपी के सामने अगर अपने ही संगठन को संभालने की चुनौती खड़ी हो जाए तो यह निश्चित रूप से उसके लिए चिंता का विषय है. एक ऐसी बीजेपी, जो पंजाब में लंबे समय तक सीमित शहरी आधार वाली पार्टी रही, अब पहली बार पूरे राज्य की 117 सीटों पर संगठन खड़ा करने की कोशिश कर रही है. इस प्रक्रिया में दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देना, पुराने कार्यकर्ताओं की भूमिका को बनाए रखना और ग्रामीण पंजाब में बूथ स्तर तक संगठन फैलाना—तीनों काम एक साथ करने हैं. ऐसे में संगठन के भीतर टकराव पैदा होना संभव है. असल सवाल यह है कि बीजेपी उस टकराव को कितनी जल्दी और कितनी कुशलता से सुलझाती है.

