HomePunjabपायलट का फर्स्ट इंप्रेशन ‘धांसू’: प्रदर्शन में कांग्रेस के सभी “भावी मुख्यमंत्री”...

पायलट का फर्स्ट इंप्रेशन ‘धांसू’: प्रदर्शन में कांग्रेस के सभी “भावी मुख्यमंत्री” एक ही स्टेज पर!

चन्नी, वड़िंग, बाजवा और रंधावा एक मंच पर; गुलजार सिंह केस में AAP सरकार के खिलाफ पायलट की अगुवाई में कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन, सवाल- क्या मंच की यह एकता 2027 की चुनावी एकता में बदलेगी?

आरके सेठी
चंडीगढ़, 15 सितम्बर।

पंजाब कांग्रेस के नए प्रभारी सचिन पायलट ने पंजाब में अपनी पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा के लिए ऐसा मुद्दा चुना, जिसने पार्टी के भीतर के कई पुराने विरोधी खेमों को एक ही मंच पर ला दिया। गुलजार सिंह की मौत के मामले में वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा के खिलाफ कांग्रेस के प्रदर्शन में चरणजीत सिंह चन्नी, अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, प्रताप सिंह बाजवा और सुखजिंदर सिंह रंधावा समेत पार्टी के लगभग सभी प्रमुख चेहरे पायलट के साथ खड़े दिखाई दिए। इसलिए आज का प्रदर्शन सिर्फ AAP सरकार के खिलाफ विरोध नहीं था; यह पायलट के उस “पंजाब प्रोजेक्ट” की पहली सार्वजनिक तस्वीर भी थी, जिसमें सबसे बड़ी चुनौती सरकार से पहले अपनी पार्टी को एक साथ खड़ा करना है। यानी, पायलट कए पंजाब पॉलिटिक्स में पहले इम्प्रैशन ‘धाँसू’ रहा है।

गुलजार केस से शुरू हुई लड़ाई

कांग्रेस ने गुलजार सिंह की मौत को लेकर पंजाब सरकार में मंत्री हरपाल सिंह चीमा की राजनीतिक जवाबदेही तय करने, उन्हें मंत्रिमंडल से हटाने और मामले की स्वतंत्र जांच की मांग को लेकर चंडीगढ़ में प्रदर्शन किया। गुलजार सिंह की मौत से जुड़े मामले में परिवार और विपक्ष की ओर से गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जबकि चीमा का नाम मूल एफआईआर में दर्ज नहीं है। पुलिस ने मामले में पांच लोगों के खिलाफ कार्रवाई की है और जांच के लिए एसआईटी गठित की गई है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी मामले का संज्ञान लेकर संबंधित रिकॉर्ड मांग चुका है।

पायलट ने खुद संभाली कमान

पंजाब आने से पहले ही पायलट ने साफ कर दिया था कि वह गुलजार सिंह के परिवार के लिए न्याय की मांग को लेकर कांग्रेस नेताओं के साथ चीमा के आवास तक मार्च करेंगे। उनके मुताबिक गुलजार ने नशे के मुद्दे पर सवाल उठाने के बाद दबाव और मानसिक प्रताड़ना का सामना किया और उनकी मौत से पहले की वीडियो रिकॉर्डिंग में चीमा का नाम होने का दावा किया गया है। पायलट ने इसी आधार पर स्वतंत्र जांच की मांग उठाई।

तीन महीने बाद चन्नी-वड़िंग एक मंच पर

आज की तस्वीर का सबसे बड़ा राजनीतिक मतलब यहीं से निकलता है। करीब तीन महीने बाद पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजा वड़िंग एक ही मंच पर दिखाई दिए। दोनों पायलट के आसपास बैठे, बातचीत करते भी नजर आए। प्रताप बाजवा और सुखजिंदर रंधावा की मौजूदगी ने इस तस्वीर को और बड़ा बना दिया। इससे पहले इन नेताओं के बीच मंच साझा करने को लेकर मतभेद सार्वजनिक रहे थे।

एक मंच, लेकिन क्या गुटबाजी खत्म?

पायलट के लिए इसे शुरुआती उपलब्धि जरूर माना जा सकता है, लेकिन इसे कांग्रेस की गुटबाजी खत्म होने की घोषणा कहना जल्दबाजी होगी। आज चन्नी और वड़िंग एक फ्रेम में थे, मगर राजनीतिक दूरी पूरी तरह खत्म हो गई है, इसका प्रमाण अभी नहीं है। खुद प्रदर्शन के दौरान चन्नी ने अपने भाषण में वड़िंग का नाम नहीं लिया। यानी पायलट ने मंच साझा करा दिया है; अब संगठन साझा करवाना बाकी है।

वड़िंग का संदेश भी बदला-बदला

आज के प्रदर्शन में वड़िंग ने चन्नी को सम्मान के साथ संबोधित किया और प्रताप बाजवा को अपना सम्मानित नेता बताया। यह छोटी बात नहीं है, क्योंकि पिछले महीनों में पंजाब कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान सार्वजनिक रही है। पायलट की मौजूदगी में इस तरह का सार्वजनिक बॉडी लैंग्वेज बदलाव बताता है कि हाईकमान के नए प्रभारी के सामने फिलहाल सभी खेमे एक साझा राजनीतिक अनुशासन दिखाना चाहते हैं।

बाजवा ने भी खोल दिया अगला पन्ना

प्रताप बाजवा ने मंच से कहा कि सभी कांग्रेसी एक मंच पर हैं और पार्टी चुनाव किसी एक चेहरे के बजाय सामूहिक नेतृत्व के साथ लड़ेगी। उनका संकेत साफ था- राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और सचिन पायलट के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा और बहुमत आने के बाद हाईकमान मुख्यमंत्री पद सहित आगे के फैसले करेगा। यानी मुख्यमंत्री चेहरे की संभावित खींचतान को चुनाव से पहले टालने की लाइन आज मंच से ही सामने रख दी गई।

पायलट का असली संदेश- पहले पार्टी, बाद में पद

पायलट ने जिस लाइन को बार-बार सामने रखा, उसका सार यही है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर संगठन और हाईकमान रहेगा। उनका संदेश था कि किसी नेता को अपनी मनमर्जी से चलने का अधिकार नहीं है और शिकायत या मतभेद हो तो सीधे प्रभारी तक बात पहुंचे। यह सिर्फ अनुशासन की बात नहीं है; पंजाब कांग्रेस के लिए यह पायलट द्वारा नया कमांड स्ट्रक्चर स्थापित करने की कोशिश है।

“मेरे पास आओ”- पायलट बनना चाहते हैं रेफरी!

पायलट का दूसरा महत्वपूर्ण संदेश यह है कि पंजाब कांग्रेस के नेता आपस में लड़ने के बजाय अपने मतभेद प्रभारी के सामने रखें। इसका राजनीतिक अर्थ यह है कि वह किसी एक खेमे के नेता नहीं बनना चाहते। चन्नी, वड़िंग, बाजवा या रंधावा- किसी के साथ खड़े होने के बजाय पायलट खुद को उन सभी के ऊपर एक रेफरी की भूमिका में रख रहे हैं। यही वजह है कि आज मंच पर सभी प्रमुख चेहरों को साथ बैठाना उनके लिए महज प्रोटोकॉल नहीं, बल्कि रणनीति थी।

“पहली लाठी मैं खाऊंगा”- सड़क पर भी वही लाइन

पायलट ने अपने संदेशों में यह भी स्पष्ट किया कि सरकार के खिलाफ लड़ाई में वह पीछे नहीं रहेंगे। आज उसका पहला व्यावहारिक प्रदर्शन भी हो गया। मार्च आगे बढ़ा तो पुलिस ने बैरिकेड लगाकर रास्ता रोका और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। पायलट, बाजवा, वड़िंग और दूसरे कांग्रेस नेताओं को हिरासत में लिया गया। करीब एक घंटे बाद नेताओं को छोड़े जाने की रिपोर्ट सामने आई। यानी पायलट का पहला बड़ा पंजाब कार्यक्रम सिर्फ भाषण तक सीमित नहीं रहा; वह खुद आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में रहे।

पायलट बनाम AAP- पहली सीधी भिड़ंत

इस घटनाक्रम ने पायलट को पंजाब की राजनीति में सीधे AAP सरकार के सामने खड़ा कर दिया है। कांग्रेस अब गुलजार सिंह केस को केवल स्थानीय घटना के रूप में नहीं, बल्कि दलित सम्मान, नशे और सरकार की जवाबदेही के बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में पेश कर रही है। पायलट के लिए इसका महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि पंजाब में उनकी पहली राजनीतिक लड़ाई का विषय सीधे AAP सरकार और उसके एक प्रमुख मंत्री से जुड़ गया है।

गुलजार केस में कांग्रेस ने पकड़ा “नशा + दलित” का नैरेटिव

गुलजार सिंह की मौत से जुड़े आरोपों में नशे का मुद्दा और दलित उत्पीड़न का आरोप एक साथ जुड़ रहे हैं। कांग्रेस इसी दोहरे नैरेटिव को AAP सरकार के खिलाफ इस्तेमाल कर रही है। दूसरी तरफ पुलिस की एफआईआर, एसआईटी जांच और एनएचआरसी की कार्रवाई यह दिखाती है कि मामला केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं है; संस्थागत जांच भी चल रही है। इसलिए आने वाले दिनों में जांच की दिशा इस राजनीतिक नैरेटिव को प्रभावित कर सकती है।

AAP के सामने भी सवाल आसान नहीं!

AAP के लिए चुनौती यह है कि वह इस मामले को केवल विपक्ष की राजनीति कहकर खारिज करे या गुलजार केस के साथ जुड़े गंभीर आरोपों पर अधिक स्पष्ट जवाब दे। मुख्यमंत्री भगवंत मान पहले ही विपक्ष पर मामले का राजनीतिकरण करने का आरोप लगा चुके हैं। वहीं कांग्रेस इसे मंत्री की जवाबदेही और दलित न्याय का सवाल बना रही है। ऐसे में यह मुद्दा सिर्फ एक मौत का मामला नहीं रह गया है; यह 2027 से पहले नशे और कानून-व्यवस्था की राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा बन रहा है।

बाजवा ने नशे पर अलग लाइन भी खींची

प्रदर्शन से एक दिन पहले प्रताप बाजवा ने AAP सरकार और केंद्र की BJP सरकार दोनों पर नशे के मुद्दे को लेकर राजनीतिक ऑप्टिक्स पर ज्यादा जोर देने का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि असली लड़ाई नशे की सप्लाई चेन तोड़ने की होनी चाहिए। यानी कांग्रेस के भीतर भी अब नशे के सवाल को केवल AAP पर आरोप लगाने के बजाय एक बड़े शासन और सप्लाई नेटवर्क के मुद्दे के रूप में पेश करने की कोशिश दिखाई दे रही है।

पायलट का सबसे बड़ा दांव- 2027 से पहले कांग्रेस को टीम बनाना

पायलट के सामने पंजाब में समय बहुत कम है। विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और पार्टी को संगठन, उम्मीदवारों, बूथ स्तर की तैयारी और आपसी तालमेल पर काम करना है। उनके लिए इसलिए सबसे पहला काम मुख्यमंत्री का चेहरा तय करना नहीं, बल्कि उन सभी नेताओं को एक चुनावी मशीनरी में बदलना है जो अलग-अलग समय पर एक-दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। पायलट का पंजाब पदार्पण कांग्रेस की एकता की परीक्षा के रूप में भी देखा जा रहा है।

राहुल गांधी का नाम लेकर अथॉरिटी साफ

पायलट के संदेशों में राहुल गांधी और हाईकमान का उल्लेख भी इसी रणनीति का हिस्सा है। उनका संकेत है कि पंजाब कांग्रेस में उनकी भूमिका किसी स्थानीय गुट की सहमति से नहीं, बल्कि केंद्रीय नेतृत्व के निर्णय से तय हुई है। यानी अगर किसी नेता को दूसरे नेता से समस्या है, तो समाधान आपसी शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि हाईकमान की तय व्यवस्था के भीतर होगा। यह संदेश खास तौर पर उस पंजाब कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण है जहां नेतृत्व को लेकर खींचतान लंबे समय से सार्वजनिक रही है।

आज का मंच पायलट के पक्ष में क्यों गया?

क्योंकि पहली ही राजनीतिक कार्रवाई में उन्हें वह तस्वीर मिल गई जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत थी- सभी बड़े नेता साथ, सरकार के खिलाफ एक साझा मुद्दा और सड़क पर एक साझा संघर्ष। इससे पायलट को शुरुआत में ही यह कहने का आधार मिलता है कि वह किसी एक खेमे के प्रभारी नहीं, बल्कि पूरी पंजाब कांग्रेस के प्रभारी हैं। लेकिन यह तस्वीर तभी राजनीतिक सफलता बनेगी जब यही नेता अगले कुछ महीनों तक साथ दिखाई दें।

असली परीक्षा अब मंच के बाद

आज चन्नी-वड़िंग साथ बैठे, बाजवा और रंधावा साथ खड़े हुए और पायलट ने सभी को एक मंच पर ला दिया। लेकिन 2027 की लड़ाई मंच पर फोटो खिंचवाने से नहीं जीती जाएगी। असली परीक्षा उम्मीदवार चयन, बूथ संगठन, टिकट बंटवारे, स्थानीय नेतृत्व और मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षाओं के बीच तालमेल की होगी। अगर वहां भी पायलट यही संतुलन बनाए रखते हैं, तभी आज का “एक मंच” वास्तविक राजनीतिक एकता में बदल पाएगा।

पायलट का फर्स्ट इंप्रेशन सच में ‘धांसू’?

पहले राजनीतिक इम्प्रेशन के लिहाज से पायलट को आज वह मिला जिसकी किसी नए प्रभारी को जरूरत होती है-सड़क पर मौजूदगी, विपक्षी खेमों की एक तस्वीर और हाईकमान की स्पष्ट कमान। लेकिन पंजाब की राजनीति में पहली तस्वीर और अंतिम नतीजे के बीच लंबा रास्ता होता है। पायलट ने आज पहला पड़ाव पार कर लिया है; अब उन्हें इस मंच को संगठन और संगठन को चुनावी वोट में बदलना होगा।

अब सबसे बड़ा सवाल

पायलट ने आज पंजाब कांग्रेस के उन चेहरों को एक स्टेज पर खड़ा कर दिया जिन्हें अलग-अलग समय में मुख्यमंत्री पद की संभावनाओं से जोड़कर देखा जाता रहा है। गुलजार सिंह केस ने उन्हें AAP के खिलाफ एक साझा लड़ाई भी दे दी और कांग्रेस के भीतर एकता का मंच भी। अब असली सवाल यह नहीं कि कांग्रेस के “भावी मुख्यमंत्री” एक मंच पर आ सकते हैं या नहीं; सवाल यह है कि क्या पायलट उन्हें 2027 तक एक ही चुनावी टीम बनाकर रख पाएंगे? यही उनके पंजाब प्रोजेक्ट की असली परीक्षा होगी।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments