राहुल गांधी ने चन्नी का दबाव माना या बड़ा ‘ऑपरेशन बदलाव’ अभी बाकी? हाईकमान ने पंजाब में अपना राजनीतिक मैनेजमेंट मॉडल बदला!

आरके सेठी
चंडीगढ़, 5 सितंबर।
पंजाब कांग्रेस में नेतृत्व संकट के बीच हाईकमान ने पहला बड़ा फैसला कर दिया है। कांग्रेस ने भूपेश बघेल को पंजाब प्रभारी पद से हटाकर सचिन पायलट को नया प्रभारी बनाया है। यह फैसला राहुल गांधी की अध्यक्षता में दिल्ली में हुई उस अहम बैठक के अगले ही दिन सामने आया है, जिसमें पंजाब कांग्रेस की गुटबाजी, संगठनात्मक स्थिति और संभावित फेरबदल पर चर्चा हुई थी। पंजाब कांग्रेस में प्रभारी बदलना केवल संगठनात्मक नियुक्ति नहीं माना जा सकता। पिछले कई महीनों से बघेल वड़िंग और चन्नी समेत अलग-अलग शक्ति केंद्रों के बीच तालमेल बैठाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन जुलाई में वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने के बाद भी चन्नी खेमे की असहमति खत्म नहीं हुई। अब बघेल की जगह पायलट को लाने से हाईकमान ने पंजाब में अपना राजनीतिक मैनेजमेंट मॉडल बदलने का संकेत जरूर दिया है।
सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि क्या बघेल की छुट्टी पर चन्नी खेमे की लगातार आपत्ति का असर पड़ा है। जुलाई में चन्नी और उनके समर्थकों ने वड़िंग को हटाने की मांग हाईकमान तक पहुंचाई थी और बघेल की भूमिका को लेकर भी असंतोष सामने आया था।
जुलाई में वड़िंग को बचाने का फैसला अब कसौटी पर
जुलाई में कांग्रेस ने वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने के साथ चन्नी को चुनाव अभियान समिति की जिम्मेदारी देकर दोनों शक्ति केंद्रों को अलग-अलग भूमिकाएं दी थीं। उस समय हाईकमान का संदेश यही था कि 2027 के लिए संगठन और चुनाव अभियान को अलग-अलग जिम्मेदारियों के जरिए साथ चलाया जाएगा। लेकिन उसके बाद भी वड़िंग को हटाने की मांग और गुटीय तनाव खत्म नहीं हुआ।
अब सबसे बड़ा सवाल- वड़िंग की बारी?
यहीं से आज का फैसला सीधे वड़िंग की कुर्सी से जुड़ता है। अगर हाईकमान ने प्रभारी बदलकर पंजाब कांग्रेस के संचालन में पहला बड़ा बदलाव कर दिया है तो क्या प्रदेश अध्यक्ष को लेकर भी अगला फैसला होगा? अभी वड़िंग को हटाने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। लेकिन शुक्रवार की राहुल गांधी वाली बैठक में पीसीसी फेरबदल की संभावना सामने आने के बाद शनिवार को प्रभारी बदलना इस सवाल को और बड़ा जरूर करता है।
पायलट के सामने पहली चुनौती गुटबाजी
सचिन पायलट के सामने सबसे पहली चुनौती किसी एक नेता को जिताना नहीं, बल्कि पंजाब कांग्रेस के अलग-अलग शक्ति केंद्रों को एक चुनावी कमांड में लाना होगी। वड़िंग, चन्नी, बाजवा, रंधावा और दूसरे क्षेत्रीय नेताओं के बीच संतुलन बनाए बिना केवल प्रभारी बदलने से पुराना विवाद खत्म होना मुश्किल है।
पायलट के आने से तीसरे चेहरे की संभावना भी खुली
एक दूसरा रास्ता भी खुल सकता है। अगर हाईकमान वड़िंग और चन्नी के बीच सीधा चुनाव करने के बजाय किसी तीसरे चेहरे को प्रदेश संगठन की कमान देने का फैसला करता है तो पायलट उस नई व्यवस्था के राजनीतिक समन्वयक की भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन यह अभी संभावना है।
राहुल की पंजाब यात्रा ने फैसला जरूरी किया
राहुल गांधी की प्रस्तावित पंजाब बस यात्रा ने हाईकमान पर समय का दबाव बढ़ा दिया है। कांग्रेस चाहती है कि राहुल पंजाब आएं तो पार्टी का संगठन अंदरूनी लड़ाई के बजाय एकजुट राजनीतिक संदेश देता दिखाई दे। प्रस्तावित यात्रा के पहले संगठनात्मक विवाद सुलझाने की कोशिशें तेज हुई हैं।
बघेल की जगह पायलट सिर्फ चेहरा बदलना नहीं
अगर बघेल की जगह पायलट केवल प्रशासनिक फेरबदल के कारण आए हैं तो इसका असर सीमित हो सकता है। लेकिन अगर उन्हें पंजाब कांग्रेस की पूरी राजनीतिक कमांड को नए सिरे से व्यवस्थित करने का जिम्मा मिला है तो प्रदेश अध्यक्ष से लेकर टिकट चयन और चुनावी रणनीति तक कई स्तरों पर बदलाव संभव हैं। अभी उपलब्ध तथ्यों के आधार पर दोनों संभावनाएं खुली हैं।
कांग्रेस के सामने 2027 का बड़ा जोखिम
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा खतरा यह है कि नेतृत्व विवाद चलता रहा तो आम आदमी पार्टी विरोधी वोट का लाभ किसी एक पार्टी को मिलने के बजाय कई राजनीतिक विकल्पों में बंट सकता है। भाजपा अपने विस्तार की कोशिश कर रही है, अकाली दल ग्रामीण और पंथक आधार वापस पाने की कोशिश में है और निर्दलीय-पंथक विकल्प भी कुछ सीटों पर प्रभाव डाल सकते हैं।
वड़िंग रहेंगे तो भी सवाल खत्म नहीं होगा
अगर पायलट आने के बाद भी वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखा जाता है तो हाईकमान को चन्नी खेमे की नाराजगी को राजनीतिक रूप से संभालना होगा। केवल पद बरकरार रखना पर्याप्त नहीं होगा; वड़िंग और चन्नी के बीच वास्तविक चुनावी तालमेल सुनिश्चित करना होगा। जुलाई का फार्मूला इसी परीक्षा से गुजर चुका है।
वड़िंग हटे तो जुलाई का फैसला सवालों में आएगा
दूसरी तरफ अगर वड़िंग को हटा दिया जाता है तो जुलाई में उन्हें बनाए रखने के हाईकमान के फैसले पर सवाल उठेंगे। इससे यह संदेश जा सकता है कि कांग्रेस ने कुछ ही महीनों में अपना पंजाब मॉडल बदल दिया। इसलिए वड़िंग को हटाना भी हाईकमान के लिए राजनीतिक रूप से आसान फैसला नहीं होगा।
असली सवाल बघेल नहीं, कमांड का है
यही इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी परत है। बघेल की छुट्टी और पायलट की एंट्री दिखाई देने वाला फैसला है। असली सवाल यह है कि 2027 के लिए पंजाब कांग्रेस की अंतिम राजनीतिक कमांड किसके पास होगी। प्रदेश संगठन, चुनाव अभियान, टिकट वितरण और क्षेत्रीय नेताओं के बीच तालमेल अगर अलग-अलग केंद्रों से चलता रहा तो प्रभारी बदलने से भी संकट खत्म नहीं होगा।
क्या राहुल ने चन्नी का संदेश पढ़ लिया
चन्नी खेमे की लंबे समय से चली आ रही आपत्तियों, वड़िंग को हटाने की मांग और बघेल के साथ बनी असहमति की पृष्ठभूमि में अब प्रभारी बदल गया है। इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हाईकमान ने चन्नी की राजनीतिक आपत्ति को गंभीरता से लेते हुए अपना रुख बदला है। लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि चन्नी जीत गए और बघेल हार गए।
या बड़ा ऑपरेशन अभी बाकी है?
संभव है कि बघेल की जगह पायलट की नियुक्ति केवल पहला कदम हो। अगर इसके बाद पीसीसी में भी बदलाव होता है तो आज का फैसला पंजाब कांग्रेस में बड़े ‘ऑपरेशन बदलाव’ की शुरुआत माना जाएगा। अगर वड़िंग बने रहते हैं और नई कमांड संरचना उनके आसपास ही तैयार होती है तो संदेश अलग होगा।
पंजाब कांग्रेस की कमांड बदलेगी?
बघेल की छुट्टी ने पंजाब कांग्रेस के पुराने विवाद में नई परत खोल दी है। पायलट की एंट्री के बाद अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नया प्रभारी पार्टी को कैसे संभालेगा। बड़ा सवाल यह है कि क्या हाईकमान जुलाई में बनाए गए वड़िंग-चन्नी संतुलन को जारी रखेगा या 2027 से पहले पंजाब कांग्रेस की कमांड संरचना को फिर से बदलेगा।
चन्नी का दबाव रंग लाया या हाईकमान ने उससे भी बड़ा फैसला करने की तैयारी शुरू कर दी है- इसका जवाब अब वड़िंग की कुर्सी तय करेगी।
बघेल की छुट्टी पहला फैसला है; अगर अगला फैसला वड़िंग पर हुआ, तो समझिए पंजाब कांग्रेस में ‘ऑपरेशन बदलाव’ वास्तव में शुरू हो चुका है।

