अजनाला थाने पर हमले के मामले में जेल में बंद खडूर साहिब से लोकसभा सांसद अमृतपाल माझा के साथ मालवा की किसी एक सीट से भी लड़ सकते हैं चुनाव!
अमृतपाल की पार्टी “अकाली दल-वारिस पंजाब दे” इलेक्शन में कर सकती है पंथक वोटों का ध्रुवीकरण!

आरके सेठी
चंडीगढ़, 20 अगस्त.
पंजाब विधानसभा इलेक्शन 2027 से पहले अमृतपाल सिंह की सियासी रणनीति अब सिर्फ खडूर साहिब तक सीमित नहीं दिख रही. खडूर साहिब से लोकसभा सांसद और फिलहाल असम की डिब्रूगढ़ जेल में बंद अमृतपाल के दो विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ने की चर्चा है. इनमें माझा की खडूर साहिब सीट के साथ मालवा की किसी सीट को भी शामिल किया जा सकता है. धूरी का नाम इस चर्चा में सबसे प्रमुखता से सामने आया है, हालांकि पार्टी ने अभी किसी सीट को फाइनल नहीं किया है.
पार्टी से जुड़े सूत्रों के मुताबिक खडूर साहिब से अमृतपाल का चुनाव लड़ना लगभग तय माना जा रहा है, जबकि मालवा में कई ऑप्शन पर विचार चल रहा है. इनमें मुख्यमंत्री भगवंत मान की धूरी सीट के अलावा कुछ दूसरी सीटों के नाम भी चर्चा में हैं. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर अमृतपाल माझा के साथ मालवा से भी चुनाव मैदान में उतरते हैं तो यह सिर्फ दो सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला नहीं होगा. इसके जरिए माझा से बाहर मालवा में अपनी सियासी मौजूदगी दर्ज कराने और पूरे पंजाब में अपनी पंथक पहचान का विस्तार करने की कोशिश का संकेत मिलेगा.
पंथक सियासत का “मेन फेस” बनने की कोशिश?
अमृतपाल की अगुवाई वाला अकाली दल-वारिस पंजाब दे पंजाब में एक अलग पंथक राजनीतिक विकल्प खड़ा करने की कोशिश कर रहा है. पार्टी के भीतर अमृतपाल को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाए जाने की बात भी सामने आ चुकी है. पार्टी के वरिष्ठ नेता और हिंदू चेहरा गैंगवीर राठौर ने कहा है कि अमृतपाल को पार्टी पहले ही मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर चुकी है और उनका समर्थन माझा के साथ मालवा में भी है. माना जा रहा हिया कि अगर अमृतपाल खडूर साहिब से अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के साथ मालवा में भी उतरते हैं तो इसका संदेश सिर्फ क्षेत्रीय विस्तार का नहीं होगा. यह खुद को पूरे पंजाब में एक बड़े पंथक राजनीतिक चेहरे के तौर पर स्थापित करने की कोशिश भी हो सकती है.
खडूर साहिब के साथ मालवा क्यों?
खडूर साहिब अमृतपाल की मौजूदा सियासी पहचान का सबसे मजबूत आधार है. 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने डिब्रूगढ़ जेल में रहते हुए इस सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और कांग्रेस के कुलबीर सिंह जीरा को 1,97,120 वोटों के अंतर से हराया. अमृतपाल को 4,04,430 वोट मिले थे. अब विधानसभा चुनाव में इसी इलाके से उतरने के साथ मालवा की किसी सीट पर दांव लगाना उनकी राजनीतिक पहुंच का दायरा बढ़ाने की कोशिश हो सकती है. धूरी का नाम इसलिए अहम है क्योंकि यह मुख्यमंत्री भगवंत मान की विधानसभा सीट है. अगर पार्टी आखिरकार अमृतपाल को धूरी से उतारने का फैसला करती है तो यह मुकाबला सिर्फ एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं रहेगा. मुख्यमंत्री और एक उभरते पंथक राजनीतिक चेहरे की सीधी टक्कर इसे पूरे पंजाब के सियासी विमर्श का हिस्सा बना सकती है.
दो सीटों की रणनीति का असली मतलब
एक ही विधानसभा इलेक्शन में दो सीटों से उतरना किसी नेता के लिए सिर्फ जीत की कोशिश नहीं होती. यह सियासी असर बढ़ाने का तरीका भी हो सकता है. अमृतपाल के मामले में इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि उनकी मौजूदा राजनीतिक पहचान मुख्य रूप से माझा और खडूर साहिब से जुड़ी है. मालवा में उतरकर वह पंजाब के सबसे बड़े राजनीतिक क्षेत्र में अपनी स्वीकार्यता भी परख सकते हैं. अगर धूरी जैसे हाई-प्रोफाइल ऑप्शन को चुना जाता है तो अमृतपाल का चुनाव पूरे पंजाब में चर्चा का विषय बन जाएगा. खासकर तब, जब पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री पद के चेहरे के तौर पर पेश करने का दावा कर रही है.
सिर्फ अमृतपाल नहीं, पूरी टीम मैदान में
अमृतपाल की संभावित दो सीटों वाली रणनीति को उनकी पार्टी की कैंडिडेट सिलेक्शन प्रक्रिया से जोड़कर देखना भी जरूरी है. अकाली दल-वारिस पंजाब दे अब तक 2027 विधानसभा चुनाव के लिए छह उम्मीदवारों के नाम घोषित कर चुका है. इनमें बस्सी पठाना से सतवंत सिंह, अजनाला से दलजीत सिंह कलसी, मोगा से गुरमीत सिंह बुक्कनवाला, गिल से दर्शन सिंह शिवालिक, कपूरथला से जगजीत सिंह बाबा और कोटकपूरा से राशपाल सिंह सोसन शामिल हैं. पार्टी ने उम्मीदवारों के सिलेक्शन के लिए पांच सदस्यीय कमेटी भी बनाई है. पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष और अमृतपाल के पिता तरसेम सिंह खालसा के मुताबिक 15 सितंबर तक 50 से 60 उम्मीदवारों के नाम घोषित करने का टारगेट है. यानी तैयारी सिर्फ अमृतपाल की व्यक्तिगत उम्मीदवारी तक सीमित नहीं है. अगले कुछ सप्ताह में विधानसभा की करीब आधी सीटों पर उम्मीदवार सामने लाने की योजना बताती है कि वारिस पंजाब दे अपना संगठन और उम्मीदवारों का नेटवर्क तेजी से खड़ा करना चाहता है.
पहला उम्मीदवार भी दे चुका है बड़ा संकेत
पार्टी ने अपना पहला उम्मीदवार बस्सी पठाना से सतवंत सिंह को बनाया. सतवंत सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए केहर सिंह के बेटे हैं. इस चयन ने पार्टी की पंथक राजनीति की दिशा को लेकर भी संकेत दिया. उम्मीदवारों के चयन में ऐतिहासिक पंथक संदर्भों और समुदाय से जुड़े भावनात्मक मुद्दों को महत्व देने की रणनीति दिखाई दे रही है. अगर आगे भी उम्मीदवार चयन में यही पैटर्न दिखाई देता है तो 2027 में वारिस पंजाब दे का मुकाबला सिर्फ सीट जीतने तक सीमित नहीं रहेगा. पार्टी पंथक राजनीतिक स्पेस को अपने पक्ष में संगठित करने की कोशिश करती दिखाई देगी.
पंथक वोटों के ध्रुवीकरण की संभावना
पंजाब में पंथक राजनीति का सबसे पुराना और प्रभावशाली राजनीतिक आधार शिरोमणि अकाली दल रहा है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एसएडी की राजनीतिक स्थिति कमजोर हुई है. ऐसे समय में अकाली दल-वारिस पंजाब दे अगर बड़ी संख्या में सीटों पर उम्मीदवार उतारता है और पंथक मुद्दों को चुनाव अभियान का प्रमुख हिस्सा बनाता है तो पंथक वोटों के भीतर नए राजनीतिक विभाजन की संभावना पैदा हो सकती है. इसका असर सिर्फ एसएडी पर नहीं होगा. जहां पंथक और ग्रामीण वोट चुनावी नतीजे तय करने की स्थिति में होंगे, वहां आप और कांग्रेस का गणित भी प्रभावित हो सकता है. हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि वारिस पंजाब दे कितना वोट हासिल करेगा या कितनी सीटों पर प्रभावी मुकाबले में आएगा. असल असर उम्मीदवारों की काबिलियत, स्थानीय संगठन और चुनावी अभियान की दिशा साफ होने के बाद ही सामने आएगा.
एसएडी के लिए सीधी चुनौती?
अकाली दल-वारिस पंजाब दे की राजनीति का सबसे बड़ा मुकाबला उसी राजनीतिक स्पेस में हो सकता है जिसे लंबे समय से एसएडी अपना आधार मानता रहा है. पार्टी का पहला उम्मीदवार ही इसका संकेत देता है. बस्सी पठाना से केहर सिंह के बेटे सतवंत सिंह को टिकट देकर वारिस पंजाब दे ने पंथक भावनाओं और ऐतिहासिक राजनीतिक स्मृतियों से जुड़े एक खास वर्ग को साधने की कोशिश की है. अगर आगे भी पार्टी इसी तरह के राजनीतिक संकेत देने वाले उम्मीदवार मैदान में उतारती है तो 2027 में एसएडी के सामने आप और कांग्रेस के अलावा पंथक वोट के भीतर उभरते एक नए विकल्प की चुनौती भी होगी.
आप के लिए भी अहम होगा मालवा का मुकाबला
अगर अमृतपाल मालवा की किसी सीट से चुनाव लड़ते हैं तो आप के लिए इसका महत्व बढ़ जाएगा. खासकर अगर धूरी को फाइनल किया जाता है तो मुख्यमंत्री भगवंत मान के सामने अपने ही विधानसभा क्षेत्र में एक हाई-प्रोफाइल पंथक राजनीतिक चुनौती होगी. यह मुकाबला सिर्फ धूरी की सीट तक सीमित नहीं रहेगा. अमृतपाल की मालवा एंट्री से पूरे क्षेत्र में पंथक और ग्रामीण वोटों के समीकरण पर बहस तेज हो सकती है.
जेल से सांसद बनने तक का सफर
अमृतपाल सिंह का राजनीतिक उभार बेहद कम समय में हुआ. वह दुबई में परिवार के कारोबार से जुड़े रहे और 2022 में पंजाब लौटने के बाद उनकी सार्वजनिक पहचान तेजी से बढ़ी. अभिनेता-कार्यकर्ता दीप सिद्धू ने 2021 में “वारिस पंजाब दे” संगठन शुरू किया था. फरवरी 2022 में सिद्धू की सड़क हादसे में मौत के बाद अमृतपाल संगठन से जुड़े और बाद में उसके एक धड़े के प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे.
सितंबर 2022 में अमृतपाल ने आनंदपुर साहिब में अमृत संचार लिया. इसके बाद पंजाब के अलग-अलग इलाकों में धार्मिक और सामाजिक मुद्दों को लेकर उनकी सक्रियता बढ़ी. उनके भाषणों, पहनावे और राजनीतिक बयानों ने उन्हें तेजी से पंथक राजनीति के एक चर्चित और विवादित चेहरे के रूप में स्थापित किया.
अजनाला कांड ने राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया
23 फरवरी 2023 को अमृतपाल और उनके समर्थक अजनाला पुलिस थाने पहुंचे. वे अपने समर्थक लवप्रीत सिंह उर्फ तूफान की गिरफ्तारी के विरोध में वहां पहुंचे थे. समर्थकों की बड़ी भीड़ और हथियारों के साथ थाने तक पहुंचने की घटना ने पूरे देश में राजनीतिक और सुरक्षा बहस छेड़ दी. इसके बाद पंजाब पुलिस ने अमृतपाल और उनके समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की.
18 मार्च 2023 को पुलिस ने उन्हें पकड़ने के लिए बड़ा अभियान चलाया. करीब 36 दिन तक फरार रहने के बाद 23 अप्रैल 2023 को उन्हें मोगा जिले के रोडे गांव से गिरफ्तार किया गया.
जेल से लड़ा लोकसभा इलेक्शन
2024 के लोकसभा चुनाव में अमृतपाल ने डिब्रूगढ़ जेल में रहते हुए खडूर साहिब से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा. उन्होंने 4,04,430 वोट हासिल किए और कांग्रेस के कुलबीर सिंह जीरा को 1,97,120 वोटों से हराया. इस जीत ने अमृतपाल का राजनीतिक कद अचानक बहुत बढ़ा दिया. एक ऐसा नेता जो एक साल पहले पंजाब पुलिस से बचते हुए गिरफ्तार हुआ था, वह जेल में रहते हुए लोकसभा सांसद बन चुका था.
क्या लक्ष्य सिर्फ चुनाव लड़ना है?
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है. अगर अमृतपाल सिर्फ खडूर साहिब से विधानसभा चुनाव लड़ते हैं तो इसे अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की रणनीति माना जा सकता है. लेकिन अगर वह खडूर साहिब के साथ मालवा की किसी सीट से भी मैदान में उतरते हैं, पार्टी 50-60 उम्मीदवारों को जल्द मैदान में उतारने की तैयारी करती है और अमृतपाल को मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर पेश किया जाता है, तो तस्वीर काफी बड़ी होगी. तब लक्ष्य सिर्फ विधानसभा में पहुंचना नहीं होगा. लक्ष्य होगा – पंजाब की पंथक सियासत में एक ऐसा राजनीतिक केंद्र बनाना, जिसके चेहरे के तौर पर अमृतपाल को स्थापित किया जा सके.
असली लड़ाई सीटों से बड़ी हो सकती है
2027 में अकाली दल-वारिस पंजाब दे कितनी सीटें जीतता है, यह महत्वपूर्ण होगा. लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह होगा कि पार्टी पंजाब के पंथक राजनीतिक स्पेस में कितनी जगह बना पाती है. माझा में अमृतपाल की अपनी राजनीतिक पहचान है. मालवा में संभावित एंट्री उस पहचान को दूसरे बड़े क्षेत्र तक ले जाने की कोशिश हो सकती है. छह उम्मीदवारों की घोषणा और 15 सितंबर तक 50-60 उम्मीदवार मैदान में उतारने का टारगेट बताता है कि पार्टी सिर्फ एक चेहरे के सहारे चुनाव लड़ने के बजाय राज्यव्यापी संगठन खड़ा करने की दिशा में बढ़ रही है.
अगर यह रणनीति जमीन पर सफल होती है तो वारिस पंजाब दे की अहमियत सिर्फ जीती हुई सीटों से तय नहीं होगी. वह कई सीटों पर वोटों के बंटवारे और पंथक वोट के पुनर्संयोजन के जरिए भी 2027 के चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है.

