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अमृतपाल का बड़ा सियासी दांव! CM भगवंत मान और सुखबीर बादल के खिलाफ उतरेंगे मैदान में, दो सीटों से लड़ेंगे चुनाव!

दो सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति से पंजाब में तीसरे राजनीतिक केंद्र के उभार की कोशिश; 2027 में युवा वोटरों, पंथक राजनीति और पारंपरिक दलों के समीकरण पर क्या पड़ेगा असर?

Alt Text: अमृतपाल सिंह, भगवंत मान और सुखबीर बादल की तस्वीरों के साथ पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक रणनीति पर आधारित PunjabElection.com का न्यूज विजुअल।

आरके सेठी
चंडीगढ़, 9 अक्टूबर।

पंजाब की राजनीति में विधानसभा चुनाव से पहले एक ऐसा सियासी दांव सामने आया है, जो आने वाले चुनाव की बहस को नया मोड़ दे सकता है। खडूर साहिब से सांसद अमृतपाल सिंह को लेकर अकाली दल वारिस पंजाब दे की रणनीति अब सिर्फ अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने तक सीमित नहीं दिख रही। पार्टी की आज मोहाली में हुई बैठक के बाद सामने आई जानकारी के मुताबिक, अमृतपाल को मुख्यमंत्री भगवंत मान और शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल के मुकाबले चुनाव मैदान में उतारने की योजना बनाई गई है। रणनीति के तहत अमृतपाल दो विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ सकते हैं। हालांकि, दोनों सीटों के नामों की औपचारिक घोषणा अभी बाकी है। सवाल यह है कि क्या अमृतपाल दो बड़े नेताओं को चुनौती देकर अपनी पार्टी को पंजाब की राजनीति में एक अलग और प्रभावशाली केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहते हैं?

रामपुरा फूल से पीछे हटे, अब नजरें लंबी और गिद्दड़बाहा पर!

पार्टी की रणनीति में सबसे अहम बदलाव मालवा क्षेत्र को लेकर दिखाई देता है। पहले अमृतपाल को रामपुरा फूल विधानसभा सीट से उतारने की चर्चा थी। लेकिन 9 अक्टूबर की बैठक के बाद सामने आई जानकारी के मुताबिक, अब इस सीट से पंजाबी गीतकार और फिल्म लेखक गिल रौंता को उम्मीदवार बनाया गया है। पार्टी ने रामपुरा फूल से उनकी उम्मीदवारी घोषित की है। इसके बाद अमृतपाल के लिए दूसरी सीट के विकल्पों में लंबी और गिद्दड़बाहा का नाम सामने आया है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, योजना यह है कि अमृतपाल उस सीट से चुनाव लड़ें, जहां से सुखबीर बादल मैदान में उतरेंगे। इसी तरह उन्हें भगवंत मान की विधानसभा सीट से भी चुनौती देने की रणनीति पर काम किया जा रहा है।

दो सीटों की रणनीति के पीछे क्या है पॉलिटिकल मैसेज?

राजनीतिक तौर पर दो सीटों से चुनाव लड़ने की रणनीति का मकसद सिर्फ दो मुकाबलों में उतरना नहीं हो सकता। इसके जरिए पार्टी माझा से आगे मालवा में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने और यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि उसका आधार किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में मालवा क्षेत्र की 69 सीटें हैं। मुख्यमंत्री भगवंत मान की सीट से चुनाव लड़ने की योजना सीधे आम आदमी पार्टी की सरकार और उसके नेतृत्व को राजनीतिक चुनौती देने का संकेत देती है। वहीं, सुखबीर बादल के मुकाबले उतरने की रणनीति शिरोमणि अकाली दल के पारंपरिक पंथक आधार में अपनी जगह बनाने की कोशिश के रूप में देखी जा सकती है।

2024 की लोकसभा जीत से विधानसभा चुनाव तक का सफर

अमृतपाल सिंह ने 2024 का लोकसभा चुनाव खडूर साहिब से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़ा था और जेल में रहते हुए जीत दर्ज की थी। उन्हें 4,04,430 वोट मिले थे और उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार कुलबीर सिंह जीरा को 1,97,120 वोटों के अंतर से हराया था। उस चुनाव में उनके परिवार और समर्थकों ने प्रचार की जिम्मेदारी संभाली थी, क्योंकि वह खुद चुनाव प्रचार नहीं कर सके थे। अब 2027 के विधानसभा चुनाव में दो सीटों से उतरने की योजना के जरिए पार्टी उस जनसमर्थन को विधानसभा की राजनीति में बदलने की कोशिश कर सकती है। लेकिन लोकसभा चुनाव में मिली जीत को विधानसभा चुनाव में सीधे दोहराया जा सकेगा, ऐसा मान लेना जल्दबाजी होगी।

वारिस पंजाब दे का संगठन विस्तार, चार सीटों पर नई नियुक्तियां

पार्टी चुनावी तैयारी को केवल अमृतपाल के नाम तक सीमित नहीं रखना चाहती। 9 अक्टूबर को चार विधानसभा क्षेत्रों के लिए नए उम्मीदवारों या हलका इंचार्जों की घोषणा की गई। रामपुरा फूल से गिल रौंता, सनौर से राजवंत कौर घराम, समराला से बरजिंदर सिंह बबलू लोपो और जंडियाला से एडवोकेट दिलशेर सिंह के नाम सामने आए हैं। इन नियुक्तियों को पार्टी के संगठन विस्तार की दिशा में एक और कदम माना जा रहा है। इससे पहले भी पार्टी विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में हलका इंचार्ज नियुक्त करती रही है। अब चुनौती इन नामों को जमीनी संगठन, स्थानीय कार्यकर्ताओं और मतदाताओं से जोड़ने की होगी।

पार्टी रजिस्ट्रेशन की अड़चन भी बनी हुई है

अमृतपाल की चुनावी रणनीति के सामने एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पार्टी के पंजीकरण का भी है। अकाली दल वारिस पंजाब दे को अभी निर्वाचन आयोग से राजनीतिक दल के रूप में औपचारिक मान्यता नहीं मिली है। पंजीकरण के मामले में निर्वाचन आयोग ने दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित कुछ आशंकाओं का उल्लेख किया है। पार्टी ने इस देरी को चुनौती दी है और उसके नेताओं ने राज्यपाल से भी मुलाकात कर पंजीकरण प्रक्रिया आगे बढ़ाने की मांग की है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, इस मामले में अगली सुनवाई नवंबर में निर्धारित है। पार्टी नेताओं का कहना है कि पंजीकरण में देरी के बावजूद वे 2027 का चुनाव लड़ने की तैयारी जारी रखेंगे। यदि समय रहते पंजीकरण नहीं होता, तो उम्मीदवारों को निर्दलीय रूप में चुनाव लड़ने जैसे विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है। यह स्थिति पार्टी की चुनावी पहचान और संगठनात्मक रणनीति दोनों के लिए अहम होगी।

क्या पंजाब में तीसरा राजनीतिक केंद्र उभर सकता है?

अमृतपाल और वारिस पंजाब दे की रणनीति का सबसे बड़ा राजनीतिक परीक्षण यही होगा कि क्या वे व्यक्तिगत लोकप्रियता को राज्यव्यापी संगठन और स्थायी चुनावी समर्थन में बदल पाते हैं। माझा में अपनी मौजूदगी के बाद मालवा में विस्तार की कोशिश, पारंपरिक अकाली राजनीति को चुनौती देने की संभावना और भगवंत मान के मुकाबले उतरने की योजना- इन सभी से पार्टी अपने लिए एक बड़ा राजनीतिक नैरेटिव बनाने का प्रयास कर रही है। लेकिन पंजाब की राजनीति में जगह बनाने के लिए पंथक मुद्दों के साथ रोजगार, कृषि, नशे, शिक्षा, कानून-व्यवस्था और शासन जैसे सवालों पर भी स्पष्ट एजेंडा और उम्मीदवारों का मजबूत नेटवर्क जरूरी होगा। दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के साथ कांग्रेस तथा भाजपा की रणनीतियां भी स्थानीय मुकाबलों को प्रभावित करेंगी।

अब नजरें औपचारिक ऐलान और चुनावी जमीन पर

फिलहाल अमृतपाल की दो सीटों वाली रणनीति ने 2027 के चुनाव से पहले राजनीतिक चर्चा तेज कर दी है। मान और सुखबीर के खिलाफ उतरने की योजना को पार्टी की ओर से बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसका असर तभी स्पष्ट होगा जब दोनों सीटों का औपचारिक ऐलान, पार्टी के पंजीकरण का मामला और उम्मीदवारों की जमीनी तैयारी आगे बढ़ेगी। असली सवाल सिर्फ यह नहीं कि अमृतपाल किन दो सीटों से चुनाव लड़ेंगे, बल्कि यह है कि क्या वारिस पंजाब दे अपनी इस रणनीति को व्यापक जनसमर्थन और मजबूत संगठन में बदल पाएगी। यही 2027 से पहले इस नई राजनीतिक चुनौती की असली परीक्षा होगी।

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