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कांग्रेस ने परगट सिंह को चुना क्यों और उनसे करवाना क्या चाहती है?

वड़िंग के बाद परगट पर दांव के पीछे सिर्फ चेहरा बदलने की बात नहीं; गुटबंदी संभालने, संगठन खड़ा करने और 2027 से पहले कांग्रेस को फिर मुकाबले में लाने की बड़ी चुनौती

आरके सेठी
चंडीगढ़, 4 अक्टूबर
।

परगट सिंह ने पंजाब कांग्रेस की कमान संभाल ली है। दो दिन से उनका फोकस नेताओं और कार्यकर्ताओं का थैंक यू करने और सबको साथ लेकर चलने का संदेश देने पर है। लेकिन अब थैंक यू का दौर खत्म और काम का दौर शुरू होना है। सवाल यह नहीं है कि परगट सिंह अध्यक्ष बन गए। असली सवाल है- कांग्रेस ने परगट सिंह को चुना क्यों और उनसे करवाना क्या चाहती है? क्योंकि यह फैसला ऐसे समय हुआ है जब 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है और पंजाब कांग्रेस महीनों से चल रही अंदरूनी खींचतान से जूझ रही है।

वड़िंग को बदलने की नौबत क्यों आई?

राजा वड़िंग अप्रैल 2022 से पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष थे। लेकिन पिछले कई महीनों में पार्टी के भीतर उनके खिलाफ असंतोष खुलकर सामने आया। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी से जुड़े नेताओं और वड़िंग के बीच खींचतान इतनी बढ़ी कि संगठन की एकजुटता पर सवाल उठने लगे। सितंबर में वड़िंग के कार्यक्रम से चन्नी खेमे के कई वरिष्ठ नेताओं की दूरी भी इसी तनाव का सार्वजनिक संकेत बनी। ताजा रिपोर्टिंग के मुताबिक पंजाब कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट को पार्टी के कई नेताओं से जो फीडबैक मिला, उसमें यह बात सामने आई कि वड़िंग बड़े हिस्से के नेताओं का भरोसा और समर्थन कायम नहीं रख पा रहे थे और उन्हें बनाए रखना पार्टी की 2027 की तैयारी को और मुश्किल कर सकता था। इसी पृष्ठभूमि में हाईकमान ने नेतृत्व बदलने का फैसला किया। यह कहना ठीक नहीं होगा कि सिर्फ एक वजह से वड़िंग गए, लेकिन गुटबाजी और नेतृत्व पर घटता भरोसा इस बदलाव की बड़ी पृष्ठभूमि जरूर बना।

फिर परगट सिंह ही क्यों?

कांग्रेस के पास विकल्प थे। रिपोर्टिंग में विजय इंदर सिंगला का नाम भी चर्चा में था। इसके बावजूद हाईकमान ने परगट सिंह को चुना। परगट जालंधर कैंट से विधायक हैं, पूर्व हॉकी कप्तान हैं, पंजाब सरकार में शिक्षा और खेल मंत्री रह चुके हैं और जट सिख चेहरा हैं। लेकिन इन परिचयों से ज्यादा महत्वपूर्ण उनकी मौजूदा राजनीतिक उपयोगिता है। पार्टी के भीतर की रिपोर्टिंग में परगट को ऐसा चेहरा माना गया है जिसे वड़िंग और चन्नी से जुड़े दोनों पक्षों के बीच अपेक्षाकृत स्वीकार्यता मिल सकती है। हालांकि परगट खुद पूरी तरह किसी गुट से बाहर रहे हों, ऐसा कहना भी सही नहीं होगा। संकट के दौरान वह चन्नी खेमे के नेताओं के साथ दिखाई दिए थे, लेकिन रिपोर्टिंग के मुताबिक उन्होंने हाईकमान के साथ सीधे संवाद और कंसेंसस की कोशिश पर भी जोर दिया। इसलिए उन्हें “न्यूट्रल” कहने के बजाय “गुटों के बीच बातचीत और सहमति की गुंजाइश रखने वाला चेहरा” कहना ज्यादा सटीक है।
यहीं कांग्रेस का असली दांव समझ आता है। जिस पार्टी में कई बड़े नेता अपनी-अपनी पॉलिटिकल जमीन और अपनी-अपनी महत्वाकांक्षा के साथ खड़े हों, वहां हाईकमान को ऐसा प्रदेश अध्यक्ष चाहिए जो किसी एक कैंप का स्थायी झंडाबरदार न दिखाई दे। परगट सिंह को चुनकर शायद कांग्रेस ने पहले पार्टी को जोड़ने वाला कप्तान चुना है, चुनाव जीतने वाला चेहरा बाद की बात है।

जट सिख और दोआबा फैक्टर भी है

परगट सिंह जट सिख हैं और दोआबा से आते हैं। वड़िंग भी जट सिख थे, इसलिए कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष की सामाजिक पहचान में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया। दूसरी तरफ बीजेपी ने भी पंजाब में जट सिख नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। ऐसे में कांग्रेस के लिए यह सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी महत्व रखता है। लेकिन सिर्फ जातीय गणित से इस नियुक्ति को समझना अधूरा होगा। परगट का तीन बार विधायक रहना, मंत्री के तौर पर अनुभव और हॉकी से बनी उनकी सार्वजनिक पहचान उन्हें एक अलग तरह का चेहरा बनाती है। यानी कांग्रेस ने ऐसा नेता चुना है जिसके पास संगठन के भीतर की राजनीति समझने के साथ जनता के बीच अपनी अलग पहचान भी है।

एक और बड़ा संकेत- अभी कोई सीएम फेस नहीं

यह बात शायद इस पूरी नियुक्ति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। कांग्रेस ने साफ संकेत दिया है कि 2027 का चुनाव किसी एक घोषित मुख्यमंत्री चेहरे के साथ नहीं लड़ा जाएगा। पंजाब प्रभारी सचिन पायलट के मुताबिक पार्टी सामूहिक नेतृत्व के साथ चुनाव में जाएगी और जनादेश मिलने के बाद नेतृत्व पर फैसला होगा। इसका मतलब यह हुआ कि परगट सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने मुख्यमंत्री की कुर्सी का सवाल फिलहाल उनके सामने नहीं रखा है। उनका पहला काम है- पार्टी को एकजुट करना, संगठन को मजबूत करना और चुनाव लड़ने लायक बनाना। मुख्यमंत्री कौन होगा, यह लड़ाई बाद में होगी। और शायद यही वजह है कि परगट सिंह की भूमिका बाकी कई नेताओं से अलग बनती है। उन्हें अभी अपने लिए कुर्सी मांगने से ज्यादा पूरी पार्टी के लिए जमीन तैयार करनी है।

कांग्रेस की असली ‘बीमारी’ नेता नहीं, आपसी खींचतान है

पंजाब कांग्रेस में नेताओं की कमी कभी नहीं रही। समस्या यह रही है कि कई बड़े नेता अपनी-अपनी पॉलिटिकल लाइन के साथ चलते रहे हैं। यही वजह है कि सरकार के खिलाफ मुद्दे होने के बावजूद पार्टी का संदेश कई बार एक आवाज में नहीं निकल पाया। परगट सिंह के सामने अब सबसे कठिन काम यही है- सबको साथ रखना, लेकिन किसी एक के साथ खड़े दिखाई न देना। चन्नी, वड़िंग, रंधावा, बाजवा और दूसरे वरिष्ठ नेताओं के बीच संतुलन बनाना सिर्फ मीटिंग बुलाने से नहीं होगा। टिकट, संगठन, जिलों की कमान और चुनावी रणनीति जैसे फैसलों पर भी वही संतुलन दिखाना पड़ेगा। क्योंकि अगर अध्यक्ष बदल गया लेकिन कैंप वही रहे, तो बदलाव सिर्फ कागज पर होगा।

2022 की हार और 2024 की वापसी- दोनों को साथ देखना होगा

2022 में कांग्रेस पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में सिर्फ 18 सीटों पर सिमट गई थी, जबकि आम आदमी पार्टी ने 92 सीटें जीती थीं। यह आंकड़ा कांग्रेस के लिए 2027 की तैयारी का सबसे बड़ा बैकग्राउंड है। लेकिन तस्वीर का दूसरा हिस्सा भी है। 2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने पंजाब की 13 में से 7 सीटें जीतीं। यानी विधानसभा की भारी हार के बाद पार्टी ने लोकसभा में वापसी की क्षमता दिखाई। लेकिन लोकसभा की वापसी को सीधे विधानसभा की जीत की गारंटी मानना गलत होगा। विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार, स्थानीय समीकरण, बूथ संगठन और लगातार जमीन पर मौजूदगी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। यही वजह है कि परगट सिंह के सामने लक्ष्य सिर्फ यह नहीं है कि कांग्रेस के खिलाफ नाराजगी को वोट में बदला जाए। लक्ष्य यह है कि कांग्रेस का अपना संगठन उस वोट को सीट में बदलने की हालत में भी हो।

अब चंडीगढ़ नहीं, बूथ की परीक्षा है

परगट सिंह के सामने अब मीटिंगों की कमी नहीं होगी। चंडीगढ़ में बैठकें होंगी, बड़े नेताओं के साथ तस्वीरें होंगी, रणनीति बनेगी। लेकिन चुनाव चंडीगढ़ की मीटिंग में नहीं जीता जाएगा। चुनाव गांव में होगा। ब्लॉक में होगा। बूथ पर होगा। कार्यकर्ता के साथ होगा। कांग्रेस के कार्यकर्ता को यह भरोसा चाहिए कि पार्टी चुनाव के कुछ महीने पहले नहीं, अभी से मैदान में है। और जनता से सिर्फ यह कहने से भी काम नहीं चलेगा कि AAP सरकार ने क्या गलत किया। वोटर अगला सवाल पूछेगा- “अच्छा, तुम करोगे क्या?” यानी कांग्रेस को सरकार के खिलाफ नैरेटिव के साथ अपना पॉलिटिकल विजन भी सामने रखना होगा।

परगट ने खुद अपनी भूमिका का संकेत दे दिया है

अध्यक्ष बनने के बाद परगट सिंह ने खुद को “टीम प्लेयर” बताया और कहा कि फैसले सर्वसम्मति से लिए जाएंगे। उन्होंने हॉकी की अपनी पृष्ठभूमि को राजनीति की नई भूमिका से जोड़ते हुए खुद को “फुल बैक” की भूमिका में काम करने वाला बताया। उनका कहना था कि पंजाब के हित को सामने रखकर टीम के साथ फैसला लिया जाएगा। यह बयान महज औपचारिकता है या नई कार्यशैली का संकेत, इसका फैसला आगे होगा। लेकिन एक बात साफ है- परगट खुद अपनी भूमिका को “मैं सबसे आगे” वाली पॉलिटिक्स के बजाय “टीम को साथ लेकर चलने” वाली भाषा में पेश कर रहे हैं। अब देखना यह है कि यही भाषा संगठन में भी दिखाई देती है या नहीं।

AAP के पास भी परगट के खिलाफ सवाल तैयार होंगे

परगट सिंह का पुराना राजनीतिक सफर अब उनके सामने आएगा। उन्होंने राजनीति की शुरुआत अकाली दल के साथ की थी और बाद में कांग्रेस में आए। ऐसे में 2027 की लड़ाई में उनके पुराने बयान, पुराने फैसले और पुराना राजनीतिक रिकॉर्ड विपक्ष के निशाने पर रहना स्वाभाविक है। यानी कांग्रेस के नए कप्तान को सिर्फ अपनी पार्टी के अंदर भरोसा नहीं बनाना है। बाहर भी जवाब देना है। AAP और BJP दोनों उनके पुराने राजनीतिक सफर को मुद्दा बना सकते हैं। लेकिन इसका जवाब भी सिर्फ सफाई देकर नहीं होगा। परगट को अपने मौजूदा काम से यह साबित करना होगा कि वह आज की कांग्रेस का चेहरा हैं और आज की कांग्रेस की लाइन क्या है।

BJP और अकाली दल को भी कहानी से बाहर नहीं कर सकते

2027 का मुकाबला सिर्फ AAP और कांग्रेस के बीच नहीं रहने वाला। BJP अपनी राजनीतिक जमीन बढ़ाने की कोशिश कर रही है और अकाली दल अपनी पुरानी जगह वापस लेने की लड़ाई में है। इसका सीधा असर कांग्रेस के कोर वोट पर पड़ सकता है। कांग्रेस के लिए इसलिए दो काम एक साथ जरूरी हैं- अपना वोटर वापस लाना और उसे दूसरी तरफ जाने से रोकना। यह काम सिर्फ भाषणों से नहीं होगा। वोटर देखेगा कि कौन लगातार मैदान में है, कौन उसके मुद्दे पर खड़ा है और किस पार्टी का संगठन उसके इलाके में सक्रिय है। परगट सिंह को इसलिए सिर्फ कांग्रेस को जोड़ना नहीं है। उन्हें कांग्रेस के वोट को भी बिखरने से रोकना है।

तो कांग्रेस ने आखिर परगट सिंह को चुना क्यों?

अब पूरी तस्वीर को जोड़िए। वड़िंग के खिलाफ बढ़ता असंतोष, चन्नी-वड़िंग खेमों की खींचतान, हाईकमान को मिला यह फीडबैक कि मौजूदा नेतृत्व बड़े हिस्से का भरोसा नहीं बना पा रहा, और 2027 से पहले संगठन को फिर से खड़ा करने की जरूरत- इन सबके बीच कांग्रेस को ऐसा चेहरा चाहिए था जो कम से कम अलग-अलग पक्षों के बीच बातचीत की गुंजाइश बनाए रख सके। ताजा रिपोर्टिंग में यही परगट सिंह की सबसे बड़ी राजनीतिक उपयोगिता के रूप में सामने आती है। इसके साथ जट सिख और दोआबा का प्रतिनिधित्व, तीन बार विधायक रहने का अनुभव, मंत्री पद का अनुभव और हॉकी से बनी सार्वजनिक पहचान जुड़ जाती है। यानी फैसला सिर्फ एक नाम पर नहीं, कई राजनीतिक जरूरतों के जोड़ पर हुआ दिखाई देता है।

और उनसे करवाना क्या चाहती है कांग्रेस?

यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा जवाब है। कांग्रेस परगट सिंह से सबसे पहले अपनी पार्टी को लड़ने लायक बनाने का काम करवाना चाहती है। गुटों को एक टेबल पर लाना। नेताओं की महत्वाकांक्षा को टकराव में बदलने से रोकना। जिला और ब्लॉक संगठन को सक्रिय करना। वर्कर को फिर से चुनावी मोड में लाना। और सबसे महत्वपूर्ण- 2027 से पहले ऐसा माहौल बनाना कि जनता को लगे कांग्रेस सिर्फ सरकार से नाराज नहीं है, सरकार चलाने के लिए तैयार भी है। अगर यह हो गया, तो परगट सिंह की नियुक्ति सफल मानी जाएगी। अगर नहीं हुआ, तो सवाल फिर वही खड़ा होगा- चेहरा बदला, लेकिन कांग्रेस बदली क्या?

अब असली फैसला ग्राउंड पर होगा

परगट सिंह की नियुक्ति का असली फैसला आज नहीं होगा। अगले कुछ महीने बताएंगे कि कांग्रेस ने सिर्फ अध्यक्ष बदला है या अपनी काम करने की शैली भी बदली है। जब बड़े नेताओं की तस्वीरों की जगह बूथ पर कार्यकर्ता दिखाई देगा, जब मीटिंगों की खबरों की जगह जमीन पर संगठन दिखाई देगा, जब सरकार की कमियों के साथ कांग्रेस का अपना विजन भी सामने आएगा और जब अलग-अलग गुट चुनाव के वक्त एक ही मंच पर खड़े दिखाई देंगे- तब समझ आएगा कि परगट सिंह को जिम्मेदारी क्यों दी गई थी। क्योंकि अब समय कम है। 2027 सामने है। और कांग्रेस के पास एक और आधा-अधूरा प्रयोग करने की गुंजाइश बहुत कम है। परगट सिंह को मौका मिला है। अब उन्हें सिर्फ यह साबित नहीं करना कि वह अच्छे कप्तान हैं। उन्हें यह साबित करना है कि वह बिखरी हुई टीम को फिर से मैच जिताने वाली टीम बना सकते हैं। क्योंकि आखिर में चुनाव में कहानी नहीं चलती। रिजल्ट बोलता है।

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