पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष पद से राजा वडिंग का इस्तीफा लेने के बाद कांग्रेस हाईकमान के सामने अब “सर्वमान्य” नाम फाइनल करने की चुनौती!

आरके सेठी
चंडीगढ़, 1 अक्टूबर।
पंजाब कांग्रेस में राजा वडिंग की विदाई सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष बदलने की कवायद नहीं है। यह उस पूरी राजनीतिक गणित को फिर से खोल रही है जिसे कांग्रेस हाईकमान ने जुलाई में एक साथ कई नेताओं को अलग-अलग जिम्मेदारियां देकर साधने की कोशिश की थी। उस समय वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखा गया, चरणजीत सिंह चन्नी को 2027 चुनाव अभियान समिति की कमान दी गई, विजय इंदर सिंगला को चुनाव प्रबंधन एवं समन्वय समिति और सुखजिंदर सिंह रंधावा को कोर कमेटी की जिम्मेदारी दी गई थी।
लेकिन यह संतुलन ज्यादा दिन नहीं चल पाया। सचिन पायलट के पंजाब प्रभारी बनने के बाद प्रदेश कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं से लिए गए फीडबैक के बीच हाईकमान ने वडिंग को हटाने का फैसला किया और वडिंग ने इस्तीफा दे दिया। रिपोर्टों के मुताबिक पायलट की रिपोर्ट में संगठन के भीतर गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर असंतोष प्रमुख मुद्दे रहे। सूत्रों के अनुसार पायलट के सामने 50 से ज्यादा नेताओं और कार्यकर्ताओं से मिले फीडबैक पर चर्चा हुई थी। अब असली सवाल है- कांग्रेस पंजाब का नया चेहरा किस सामाजिक और राजनीतिक समीकरण के साथ चुनेगी?
हिन्दू चेहरा सामने लाकर कांग्रेस क्या संदेश देना चाहती है?
मौजूदा चर्चा में सबसे ज्यादा उभरकर आया नाम विजय इंदर सिंगला का है। सिंगला पूर्व कैबिनेट मंत्री, पूर्व सांसद और कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर पर संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभाल चुके नेता हैं। कांग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट उन्हें एआईसीसी का जॉइंट ट्रेजरर और पूर्व केंद्रीय/पंजाब मंत्री के रूप में सूचीबद्ध करती है। सिंगला का एक बड़ा प्लस उनका दिल्ली से संगठनात्मक संपर्क और चुनाव प्रबंधन का मौजूदा अनुभव है। जुलाई में कांग्रेस ने उन्हें चुनाव प्रबंधन एवं समन्वय समिति का चेयरमैन बनाया था। यानी प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से पहले ही हाईकमान ने उन्हें चुनावी मशीनरी के एक महत्वपूर्ण हिस्से की जिम्मेदारी दी थी।
लेकिन उनके सामने एक स्पष्ट चुनौती भी है। 2024 में वह श्री आनंदपुर साहिब लोकसभा सीट से चुनाव हार चुके हैं और 2022 में संगरूर विधानसभा सीट पर भी उन्हें हार मिली थी। इसलिए अगर उन्हें संगठन की कमान मिलती है तो सवाल केवल संगठन चलाने का नहीं, बल्कि जमीनी चुनावी स्वीकार्यता और गुटों को साथ लेकर चलने का भी होगा। यही वजह है कि सिंगला का नाम केवल “हिन्दू चेहरा” भर नहीं है। हाईकमान के सामने गणित यह भी है कि क्या ऐसा चेहरा वडिंग-चन्नी खेमों के बीच टकराव को कम कर सकता है।
दूसरी तरफ जट्ट सिख चेहरों की लंबी कतार
अगर कांग्रेस हिन्दू चेहरे के बजाय पारंपरिक जट्ट सिख नेतृत्व के किसी बड़े चेहरे को प्रदेश अध्यक्ष बनाती है तो विकल्प भी कम नहीं हैं। इनमें परगट सिंह, सुखजिंदर सिंह रंधावा, सुखबिंदर सिंह सरकारिया और गुरजीत सिंह औजला के नाम प्रमुखता से सामने आए हैं। राजनीति के जानकारों ने परगट, सरकारिया और औजला को संभावित दावेदारों में गिना है लेकिन हर नाम अपने साथ अलग राजनीतिक समीकरण लेकर आता है।
परगट सिंह- संगठन का अनुभव, लेकिन अपनी राजनीतिक शैली अलग
जालंधर कैंट से विधायक परगट सिंह पूर्व मंत्री हैं। वह नवजोत सिंह सिद्धू के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए पीपीसीसी के महासचिव-संगठन की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। यानी संगठन और चुनावी राजनीति दोनों का अनुभव उनके पक्ष में है। उनका प्लस यह है कि वह पंजाब कांग्रेस की पुरानी गुटबाजी से पूरी तरह बाहर के व्यक्ति नहीं हैं और संगठनात्मक ढांचे को समझते हैं। लेकिन यही राजनीतिक इतिहास उनके सामने चुनौती भी बन सकता है- क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने के बाद उन्हें अलग-अलग वरिष्ठ नेताओं और गुटों के बीच संतुलन साधना होगा।
सुखजिंदर रंधावा- पुराना संगठन, बड़ा राजनीतिक अनुभव
सुखजिंदर सिंह रंधावा गुरदासपुर से लोकसभा सांसद और पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री हैं। कांग्रेस ने जुलाई में उन्हें कोर कमेटी की कमान दी थी। रंधावा के पक्ष में सबसे बड़ी बात उनका सरकार, संगठन और चुनावी राजनीति का लंबा अनुभव है। वह कांग्रेस के पुराने संगठनात्मक ढांचे को जानते हैं और पार्टी के भीतर उनका अपना राजनीतिक आधार है। लेकिन चुनौती यह है कि उन्हें अगर प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाता है तो कांग्रेस को फिर वही सवाल झेलना पड़ सकता है कि क्या हाईकमान ने वडिंग-चन्नी विवाद का समाधान किया या सिर्फ एक और वरिष्ठ जट्ट सिख नेता को सामने कर दिया। और यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जुलाई में जब अलग-अलग नेताओं को अलग-अलग जिम्मेदारियां दी गई थीं, तब रंधावा को पहले ही कोर कमेटी की कमान मिल चुकी थी।
सुखबिंदर सिंह सरकारिया- पुराना संगठनात्मक चेहरा
सुखबिंदर सिंह सरकारिया भी इस दौड़ में हैं। राजा सांसी से विधायक रहे सरकारिया पूर्व कैबिनेट मंत्री और पीपीसीसी के उपाध्यक्ष रह चुके हैं। उनके पक्ष में सरकार और संगठन दोनों का अनुभव है। उनका अमृतसर क्षेत्र से संबंध कांग्रेस के लिए क्षेत्रीय संतुलन का एक पहलू भी बन सकता है। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए केवल क्षेत्रीय पकड़ पर्याप्त नहीं होगी। उनके सामने वही चुनौती होगी- क्या वह चन्नी, रंधावा, वडिंग और अन्य वरिष्ठ नेताओं के अलग-अलग प्रभाव क्षेत्रों को एक संगठनात्मक ढांचे में ला पाएंगे?
गुरजीत औजला- तीन बार के सांसद, लेकिन संगठन की कुर्सी अलग परीक्षा
गुरजीत सिंह औजला अमृतसर से कांग्रेस के लोकसभा सांसद हैं और लगातार तीसरी बार संसद में हैं। पीआरएस के मुताबिक मौजूदा लोकसभा कार्यकाल में उनकी उपस्थिति 87 प्रतिशत रही है और उन्होंने 28 बहसों में हिस्सा लिया है। उनका प्लस साफ है- अमृतसर जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र में लगातार लोकसभा जीत और संसदीय अनुभव। कांग्रेस ने जुलाई में उन्हें घोषणापत्र समिति के सह-अध्यक्षों में भी शामिल किया था। लेकिन लोकसभा का चुनाव जीतना और पूरे प्रदेश संगठन को चलाना दो अलग भूमिकाएं हैं। औजला की चुनौती यही होगी कि उनका संसदीय आधार किस हद तक पूरे पंजाब के संगठनात्मक ढांचे में राजनीतिक प्रभाव में बदल सकता है।
चरणजीत सिंह चन्नी- नाम दौड़ में सबसे भारी, लेकिन उन्हें अध्यक्ष बनाना नई खींचतान भी पैदा कर सकता है!
चरणजीत सिंह चन्नी का नाम इस पूरी कहानी में सबसे महत्वपूर्ण है, भले ही ताजा रिपोर्टों में सिंगला का नाम आगे बताया जा रहा हो। चन्नी 2022 में कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे, 2024 में जालंधर से लोकसभा सांसद चुने गए और इस साल कांग्रेस ने उन्हें 2027 विधानसभा चुनाव की अभियान समिति का चेयरमैन बनाया। जुलाई में कांग्रेस के एक पर्यवेक्षक पैनल की कवायद से जुड़ी रिपोर्ट में चन्नी को प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए मजबूत पसंद बताया गया था। उनके समर्थन में 20 से ज्यादा मौजूदा और पूर्व विधायक तथा कई वरिष्ठ नेताओं के आने की बात भी सामने आई थी।
चन्नी का सबसे बड़ा प्लस है मुख्यमंत्री रह चुके होने के कारण राज्यव्यापी पहचान और दलित प्रतिनिधित्व का सवाल। जनवरी 2026 में उन्होंने खुद कांग्रेस संगठन में दलित प्रतिनिधित्व की कमी का मुद्दा उठाया था और पार्टी के कई प्रमुख पदों पर जट्ट सिख नेतृत्व का वर्चस्व होने पर सवाल खड़े किए थे।
लेकिन यही मुद्दा उनके सामने चुनौती भी पैदा करता है। चन्नी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का मतलब केवल एक संगठनात्मक नियुक्ति नहीं होगा; इससे कांग्रेस के भीतर नेतृत्व-संतुलन और सामाजिक प्रतिनिधित्व की बहस फिर तेज हो सकती है। साथ ही, चन्नी और वडिंग खेमे के बीच पिछले महीनों में चली खींचतान कांग्रेस हाईकमान के सामने पहले से मौजूद है।
राणा केपी सिंह- वरिष्ठता है, लेकिन दौड़ में तस्वीर कितनी मजबूत?
राणा केपी सिंह का नाम भी ताजा चर्चाओं में आया है। वह आनंदपुर साहिब से तीन बार विधायक रहे और 2017 से 2022 तक पंजाब विधानसभा के स्पीकर रहे। उनके पक्ष में सबसे स्पष्ट तथ्य विधानसभा संचालन और वरिष्ठ संसदीय अनुभव है। लेकिन वर्तमान दौड़ में उनका नाम सिंगला, परगट, रंधावा और सरकारिया जैसे नामों के मुकाबले कम प्रमुखता से सामने आया है। ताजा रिपोर्टों में उन्हें संभावित विकल्प के तौर पर जरूर गिना गया है।
प्रताप बाजवा का नाम भी चर्चा में, लेकिन समीकरण अलग
प्रताप सिंह बाजवा पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और कांग्रेस के वरिष्ठ जट्ट सिख नेताओं में हैं। कुछ रिपोर्टों में उनका नाम संभावित दावेदारों की विस्तृत सूची में आया है। लेकिन यहां एक व्यावहारिक सवाल है- अगर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी किसी दूसरे नेता को देती है तो बाजवा नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपनी मौजूदा भूमिका जारी रखते हुए विधानसभा में सरकार के खिलाफ पार्टी की मुख्य राजनीतिक आवाज बने रह सकते हैं। कांग्रेस ने जुलाई में भी उन्हें नेता प्रतिपक्ष के पद पर बनाए रखा था।
असली पेच: एक कुर्सी, लेकिन कई पावर सेंटर
यही पंजाब कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या है। कांग्रेस ने जुलाई में एक तरह का साझा नेतृत्व मॉडल बनाया था- वडिंग संगठन के अध्यक्ष, चन्नी चुनाव अभियान के चेयरमैन, सिंगला चुनाव प्रबंधन के प्रभारी, रंधावा कोर कमेटी के प्रमुख और बाजवा विधानसभा में विपक्ष के नेता। कागज पर यह संतुलन था। जमीन पर यह कई पावर सेंटर बन गया। अब वडिंग के हटने के बाद सवाल यह नहीं है कि अध्यक्ष कौन होगा? सवाल यह है कि अध्यक्ष के साथ बाकी पावर सेंटरों की भूमिका क्या होगी?
सिंगला को अध्यक्ष बनाने की चर्चा क्यों तेज?
यही वह जगह है जहां विजय इंदर सिंगला का नाम बाकी समीकरणों से अलग दिखाई देता है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक हाईकमान ने सिंगला के नाम को मंजूरी दे दी है और औपचारिक घोषणा बाकी है। लेकिन दूसरी रिपोर्टें अभी उन्हें केवल सबसे आगे चल रहे दावेदार के रूप में बता रही हैं। अगर सिंगला अध्यक्ष बनते हैं तो कांग्रेस के सामने एक साथ कई संतुलन साधने का मॉडल होगा- संगठन की कमान एक हिन्दू चेहरे के पास, चुनाव अभियान चन्नी के पास, कोर कमेटी रंधावा के पास और विधानसभा में बाजवा की भूमिका बरकरार। यह मॉडल कांग्रेस के लिए सामाजिक प्रतिनिधित्व और गुटीय संतुलन दोनों को साधने की कोशिश हो सकता है। लेकिन इसका दूसरा सवाल भी उतना ही बड़ा है- क्या सिंगला के पास इतना स्वतंत्र राजनीतिक स्पेस होगा कि वह सभी गुटों को साथ लेकर चल सकें? यानी नियुक्ति आसान हिस्सा है। उसके बाद की राजनीति कठिन होगी।
कांग्रेस के सामने सिर्फ हिन्दू बनाम जट्ट सिख का सवाल नहीं
इस पूरे घटनाक्रम को केवल हिन्दू बनाम जट्ट सिख की लड़ाई मानना पंजाब कांग्रेस की वास्तविक तस्वीर को छोटा करके देखना होगा। इसके भीतर कम से कम चार परतें हैं- पहली, सामाजिक प्रतिनिधित्व।
हिन्दू चेहरा बनाम जट्ट सिख नेतृत्व की बहस के साथ दलित प्रतिनिधित्व का सवाल भी मौजूद है, जिसे चन्नी पहले ही खुलकर उठा चुके हैं। दूसरी, गुटीय संतुलन। वडिंग खेमे और चन्नी खेमे के बीच लंबे समय से चली आ रही खींचतान ने हाईकमान के सामने नेतृत्व परिवर्तन की जमीन तैयार की। तीसरी, संगठन बनाम चुनावी चेहरा। जो नेता संगठन चला सकता है, जरूरी नहीं कि वही सबसे बड़ा चुनावी चेहरा हो। और जो नेता राज्यव्यापी चुनावी पहचान रखता है, जरूरी नहीं कि उसके पास संगठन के हर जिले में मशीनरी हो। चौथी, 2027 की समय सीमा। पंजाब विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल मार्च 2027 में समाप्त होना है। यानी कांग्रेस के पास अब नेतृत्व परिवर्तन के बाद संगठन को दोबारा व्यवस्थित करने के लिए सीमित समय है।
राजा वडिंग की विदाई से कांग्रेस को क्या मिला, क्या खोया?
वडिंग अप्रैल 2022 में पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बने थे। वह लुधियाना से लोकसभा सांसद भी हैं। उनकी जगह बदलने का फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस ने जुलाई में ही उन्हें जारी रखने का फैसला किया था। महज दो महीने बाद नेतृत्व बदलना यह संकेत देता है कि जुलाई का फार्मूला पार्टी के भीतर स्थायी सहमति नहीं बना सका। वडिंग की जगह नया अध्यक्ष चुनना इसलिए केवल चेहरा बदलना नहीं है। यह हाईकमान के उस प्रयोग की भी समीक्षा है जिसमें कई नेताओं को अलग-अलग जिम्मेदारियां देकर एक सामूहिक चुनावी ढांचा तैयार किया गया था।
अब असली परीक्षा दिल्ली की नहीं, पंजाब की है
कांग्रेस हाईकमान के सामने अभी सबसे बड़ा सवाल नाम का नहीं, स्वीकार्यता का है। जिस नेता को अध्यक्ष बनाया जाएगा, उसे चन्नी, बाजवा, रंधावा, परगट, औजला, सरकारिया और संगठन के दूसरे वरिष्ठ नेताओं के साथ काम करना होगा। साथ ही उसे जिलों में बिखरे संगठन, टिकट की दावेदारी, गुटीय खींचतान और 2027 के चुनाव अभियान को एक दिशा देनी होगी। सिंगला का नाम अगर औपचारिक रूप से सामने आता है तो कांग्रेस को यह साबित करना होगा कि यह केवल हिन्दू चेहरे की तलाश नहीं, बल्कि ऐसा संगठनात्मक समझौता है जिसमें बाकी सभी पावर सेंटर भी साथ चलें। और अगर जट्ट सिख चेहरे की ओर वापसी होती है तो हाईकमान को यह समझाना होगा कि वह सामाजिक प्रतिनिधित्व और दलित नेतृत्व के सवाल को किस तरह संतुलित करेगा। यानी राजा वडिंग के इस्तीफे ने पंजाब कांग्रेस की एक कुर्सी खाली की है, लेकिन उस कुर्सी के आसपास खड़े राजनीतिक सवाल कई गुना बड़े हैं। 2027 से पहले कांग्रेस को अब ऐसा चेहरा चाहिए जिसके नाम पर सिर्फ दिल्ली में सहमति न बने, बल्कि पंजाब में पार्टी के अलग-अलग खेमे भी कम से कम चुनाव तक एक साथ चलने को तैयार हों। यही वजह है कि पंजाब कांग्रेस का अगला अध्यक्ष सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष नहीं होगा- वह कांग्रेस के 2027 चुनावी मॉडल का पहला बड़ा संकेत होगा।

