अगर ‘द हिन्दू’ की अपनी भाषा में यह विज्ञापन “डीपली ऑफेंसिव” था, तो फिर ‘दैनिक भास्कर’ और ‘दैनिक जागरण’ की चुप्पी क्यों?

आरके सेठी,
चंडीगढ़, 13 सितम्बर।
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख चीफ गुरमीत राम रहीम सिंह के बचाव में प्रकाशित फुल-पेज विज्ञापन को लेकर विवाद अब और बड़ा हो गया है। 12 सितंबर को ‘द हिन्दू’ और ‘दैनिक भास्कर’ में छपा वही विवादित विज्ञापन 13 सितंबर को ‘दैनिक जागरण’ के फ्रंट पेज पर भी दिखाई दिया। लेकिन इसी बीच ‘द हिन्दू’ ने अगले दिन अपने फ्रंट पेज से इस विज्ञापन पर बिना शर्त माफी मांग ली। यानी जिस विज्ञापन को लेकर ‘द हिन्दू’ ने खुद उसे ‘डीपली आफेंसिव’ बताते हुए माफ़ी मांगी, वही नैरेटिव अब तीन बड़े अखबारों के जरिए पाठकों तक पहुंच चुका है।
‘द हिन्दू’ ने फ्रंट पेज पर मांगी अनकंडीशनल माफी
13 सितंबर को ‘द हिन्दू’ ने अपने फ्रंट पेज पर माफीनामा प्रकाशित किया। अखबार ने लिखा- “The Hindu deeply regrets the publication in its Delhi, Mohali, and North India editions of an offensive front-page advertisement titled ‘What is Dera Sacha Sauda? (Facts vs Fiction)’ and alleging, among other things, that there was a conspiracy against the convicted rapist, Gurmeet Ram Rahim Singh, head of the Dera Sacha Sauda, by ‘drug mafias and forces opposed to the Dera.’ The Hindu tenders its unconditional apology to its readers for publishing this deeply offensive advertisement.”
यानी ‘द हिन्दू’ ने खुद इस विज्ञापन को “ऑफेंसिव” और “डीपली ऑफेंसिव” बताते हुए अपने पाठकों से “अनकंडीशनल अपोलॉजी” मांगी। खास बात यह है कि माफीनामे में खुद ‘द हिन्दू’ ने गुरमीत राम रहीम को “द कन्विक्टेड रेपिस्ट” यानी दोषी ठहराया गया रेपिस्ट लिखा है। यही लाइन इस पूरे विवाद की गंभीरता को और साफ कर देती है।
12 सितंबर को ‘द हिन्दू’ और ‘दैनिक भास्कर’ में था वही फुल-पेज विज्ञापन
विवाद की शुरुआत 12 सितंबर से हुई, जब ‘द हिन्दू’ और ‘दैनिक भास्कर’ दोनों में फुल-पेज विज्ञापन प्रकाशित हुआ। इसका टाइटल था- “व्हाट इज़ डेरा सच्चा सौदा? (फैक्ट्स वर्सेज फिक्शन)”। विज्ञापन में डेरा सच्चा सौदा और गुरमीत राम रहीम के खिलाफ चल रहे मामलों को लेकर डेरा का पक्ष रखा गया और उसके खिलाफ कथित साजिश का नैरेटिव बनाया गया। दोनों अखबारों ने डिस्क्लेमर देकर कहा था कि विज्ञापन की सामग्री में उनकी कोई एडिटोरियल या जर्नलिस्टिक भागीदारी नहीं है।
अब ‘दैनिक जागरण’ ने भी वही विज्ञापन फ्रंट पेज पर छापा
लेकिन 13 सितंबर की तस्वीर ने कहानी में नया ट्विस्ट ला दिया। ‘दैनिक जागरण’ के आज के फ्रंट पेज पर भी वही “क्या है डेरा सच्चा सौदा? (फैक्ट्स वर्सेज फिक्शन)” विज्ञापन दिखाई दे रहा है। यानी एक ही डेरा-समर्थक नैरेटिव अब द हिन्दू, दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण- तीन बड़े अखबारों में पहुंच चुका है। और सबसे बड़ा विरोधाभास देखिए- ‘द हिन्दू’ इसी विज्ञापन के लिए माफी मांग रहा है और दूसरी तरफ वही विज्ञापन दूसरे बड़े अखबार में अगले दिन भी पाठकों के सामने है।
विज्ञापन में रेप की 20 साल की सजा का नैरेटिव गायब
इस पूरे विज्ञापन का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि गुरमीत राम रहीम की छवि को किस तरह पेश किया गया। 2017 में सीबीआई कोर्ट ने दो महिला अनुयायियों से रेप के मामले में उसे दोषी ठहराया था और दोनों मामलों में दस-दस साल की सजा सुनाई थी, यानि 20 साल की सजा। लेकिन विज्ञापन का नैरेटिव इस कानूनी तथ्य को सामने रखकर पाठक को पूरी तस्वीर समझाने के बजाय राम रहीम के बचाव और उसके खिलाफ कथित साजिश पर केंद्रित था।
अंशुल बोले- ‘मीडिया समूहों को शर्म आनी चाहिए’
शहीद पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के बेटे अंशुल छत्रपति ने इस विज्ञापन को “भारतीय पत्रकारिता को कलंकित करने वाला कृत्य” बताते हुए कहा कि गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे डेरा प्रमुख की छवि चमकाने वाला ऐसा विज्ञापन “पत्रकारिता को शर्मसार करने वाला” है। विज्ञापन में राम रहीम को साजिश के तहत फंसाया गया बताए जाने पर उन्होंने कहा कि यह “सीबीआई, न्यायपालिका और पूरे सिस्टम पर उंगली उठाने जैसा है।” उन्होंने गवाहों को “माफिया के इशारे पर काम करने वाला” बताए जाने और डेरा के “मानव भलाई” के दावों पर भी सवाल उठाया। अंशुल ने कहा, “क्या भारतीय संविधान या कानून में कोई प्रावधान है कि आप मानवता की भलाई के कार्य करें और आपको हत्याएं, बलात्कार जैसी संगीन अपराध करने का लाइसेंस दे दिया जाए?” हालांकि, छत्रपति हत्याकांड में हाईकोर्ट से मिली राम रहीम की बरी की राहत के खिलाफ अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
‘गुरु जी के खिलाफ साजिश’ का पूरा नैरेटिव
विज्ञापन में बाकायदा सवाल पूछा गया- “क्या गुरु जी के खिलाफ हुई साजिश?” और जवाब दिया गया- “जी हां, बिल्कुल सही।” इसके बाद झूठे गवाहों, पैसों के लालच, फर्जी मामलों और डेरा विरोधी ताकतों की कथित भूमिका का जिक्र किया गया। यहां तक दावा किया गया कि डेरा की नशे के खिलाफ मुहिम से नाराज “ड्रग माफिया” और डेरा विरोधी ताकतों ने राम रहीम के खिलाफ साजिश की। ये सभी विज्ञापन में डेरा की तरफ से किए गए दावे हैं, स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य नहीं।
पैरोल-फरलो पर भी ‘वीआईपी ट्रीटमेंट नहीं’ का बचाव
विज्ञापन में राम रहीम की बार-बार होने वाली पैरोल और फरलो का भी बचाव किया गया। सवाल रखा गया कि क्या उसे मिलने वाली पैरोल और फरलो “वीआईपी ट्रीटमेंट” है? विज्ञापन का जवाब था- “जी नहीं, बिल्कुल नहीं।” इसमें दावा किया गया कि उसकी सभी अस्थायी रिहाइयां कानून और हरियाणा सरकार के नियमों के तहत हुई हैं।
सोशल वर्क के आंकड़ों से ‘गुरु जी’ की पॉजिटिव इमेज
विज्ञापन का बड़ा हिस्सा डेरा की सोशल सर्विस और कथित उपलब्धियों को गिनाने में लगाया गया। इसमें 7.5 करोड़ लोगों को नशे से मुक्त कराने, 35 करोड़ 40 लाख पेड़ लगाने, 33.85 लाख यूनिट ब्लड डोनेट करने, 36 महानगरों में सफाई अभियान और 2,368 जरूरतमंद परिवारों को मकान देने जैसे आंकड़े दिए गए। साथ ही 22 गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स सहित कई रिकॉर्ड्स का दावा किया गया। लेकिन ये सभी आंकड़े विज्ञापन में डेरा की तरफ से किए गए दावे हैं और विज्ञापन में उनका स्वतंत्र वेरिफिकेशन नहीं दिया गया।
असली सवाल- पेड विज्ञापन था तो मीडिया की जिम्मेदारी खत्म?
यहीं से मीडिया एथिक्स का सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। यह बात अलग है कि अखबारों ने इसे एडवर्टाइजमेंट बताया और डिस्क्लेमर दिया कि सामग्री एडिटोरियल नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी गंभीर आपराधिक मामले में दोषी व्यक्ति के बचाव में इस तरह का फुल-पेज नैरेटिव प्रकाशित करने के बाद अखबार पूरी तरह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है? विज्ञापन पेड हो सकता है, लेकिन उसे प्रकाशित करने की जिम्मेदारी अखबार की संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा रहती है।
‘द हिन्दू’ की माफी ने ‘दैनिक भास्कर’ और ‘दैनिक जागरण’ को कटघरे में खड़ा किया
यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा पॉइंट है। अगर ‘द हिन्दू’ ने अगले दिन यह मान लिया कि विज्ञापन “डीपली ऑफेंसिव” था और उसने पाठकों से अनकंडीशनल माफी मांग ली, तो अब स्वाभाविक सवाल है- उसी विज्ञापन को प्रकाशित करने वाले ‘दैनिक भास्कर’ और आज वही विज्ञापन प्रकाशित करने वाले ‘दैनिक जागरण’ का स्टैंड क्या है? क्या दोनों अखबार भी अपने पाठकों को बताएंगे कि उन्होंने यह विज्ञापन किस प्रक्रिया के तहत स्वीकार किया?
राम रहीम जेल से बाहर कितने दिन रहा- यह सवाल भी बना हुआ है
राम रहीम को 20 साल की रेप सजा मिली है, लेकिन पैरोल और फरलो के कारण उसकी जेल से बाहर रहने की अवधि भी लगातार बहस का विषय रही है। 28 जून 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वह अपनी सजा के दौरान कुल 435 दिन जेल से बाहर रह चुका था- यानी 20 साल की सजा का एक उल्लेखनीय हिस्सा अस्थायी रिहाई में बीता।
इसके बाद अगस्त 2026 में उसे फिर 21 दिन की फरलो मिली। उस समय रिपोर्टों के मुताबिक यह उसकी 2017 की सजा के बाद 17वीं अस्थायी रिहाई थी और पैरोल-फरलो के जरिए जेल से बाहर रहने की कुल अवधि लगभग 457 दिन हो गई थी। इसलिए विज्ञापन में जब “वीआईपी ट्रीटमेंट नहीं” कहा गया, तो यह सवाल कोई काल्पनिक सवाल नहीं है। राम रहीम की बार-बार होने वाली अस्थायी रिहाइयां पहले से ही पब्लिक और पॉलिटिकल डिबेट का हिस्सा रही हैं।
हत्या के मामले में राहत मिली, लेकिन पूरी कानूनी कहानी खत्म नहीं
विज्ञापन में राम रहीम के खिलाफ मामलों को जिस तरह एक व्यापक साजिश के नैरेटिव में पेश किया गया, उसके बीच अलग-अलग मामलों की वास्तविक कानूनी स्थिति समझना भी जरूरी है। पत्रकार राम चंदर छत्रपति हत्याकांड में राम रहीम को मिली 2019 की सजा को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 7 मार्च 2026 को पलट दिया। इसके खिलाफ छत्रपति के बेटे ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है और मामला नवंबर में अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध बताया गया है।
रंजीत सिंह केस में बरी, लेकिन सीबीआई अपील मौजूद
रंजीत सिंह हत्याकांड में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मई 2024 में राम रहीम और चार अन्य आरोपियों को बरी किया था। इसके खिलाफ सीबीआई की अपील पर जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया था। वहीं करीब 400 डेरा अनुयायियों के कथित जबरन कैस्ट्रेशन का मामला अभी पंचकूला की स्पेशल सीबीआई कोर्ट में लंबित है।
कोर्ट में लंबित मामलों के बीच विज्ञापन की टाइमिंग पर भी सवाल
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील रविंदर ढुल ने इस विज्ञापन की टाइमिंग और उसके संभावित मकसद पर सवाल उठाए थे। उनका कानूनी मत था कि अदालतों में लंबित मामलों के बीच इस तरह का विज्ञापन कंटेम्प्ट या कोर्ट को प्रभावित करने की कोशिश जैसे सवाल पैदा कर सकता है।
तीन अखबार, एक विज्ञापन और अब सबसे बड़ा मीडिया सवाल
अब पूरी तस्वीर को एक साथ रखिए। 12 सितंबर- ‘द हिन्दू’ और ‘दैनिक भास्कर’। 13 सितंबर-‘दैनिक जागरण’ भी वही विज्ञापन। और 13 सितंबर- ‘द हिन्दू’ उसी विज्ञापन के लिए फ्रंट पेज पर अनकंडीशनल माफी मांगता है। यानी मामला अब सिर्फ ‘द हिन्दू’ की गलती तक सीमित नहीं है। सवाल अब यह है कि एक ही विवादित नैरेटिव को तीन बड़े अखबारों में जगह कैसे मिली और उस नैरेटिव को पाठकों तक पहुंचाने की संस्थागत जिम्मेदारी कौन लेगा?
2027 पंजाब चुनाव में इसका पॉलिटिकल एंगल भी है
यह मामला सिर्फ मीडिया एथिक्स तक सीमित नहीं है। पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव करीब हैं और डेरा सच्चा सौदा का पंजाब की राजनीति, खासकर मालवा की कई विधानसभा सीटों में संभावित प्रभाव लंबे समय से पॉलिटिकल डिबेट का विषय रहा है। ऐसे वक्त में डेरा प्रमुख की इमेज को लेकर बड़े अखबारों में एक ही तरह का पॉजिटिव नैरेटिव चलना अपने आप में पॉलिटिकल सिग्नल भी बन सकता है।
आज की सबसे बड़ी तस्वीर यही है
राम रहीम के बचाव में एक ही पेड एडवर्टाइजमेंट तीन बड़े अखबारों तक पहुंचा। ‘द हिन्दू’ ने अगले दिन गलती मानी और फ्रंट पेज से माफी मांग ली। लेकिन ‘दैनिक भास्कर’ और अब ‘दैनिक जागरण’ पर सवाल पहले से कहीं ज्यादा बड़ा हो गया है। एक विज्ञापन- तीन बड़े अखबार- एक ही नैरेटिव। ‘द हिन्दू’ ने माफी मांग ली। अब सवाल है-‘दैनिक भास्कर’ और ‘दैनिक जागरण’ कब जवाब देंगे?

