राहुल गांधी और भगवंत मान की जुबानी जंग के बीच अपनी जान गंवाने वाले संगरूर के गुलज़ार सिंह के सवाल की पड़ताल में विधानसभा के आंकड़े, सरकार की नशा-विरोधी मुहिम का रिपोर्ट कार्ड, गिरफ्तारियां-बरामदगी, इलाज की हकीकत और विपक्ष के सवाल- किसके दावे में कितना दम?

आरके सेठी
चंडीगढ़, 9 सितम्बर।
गुलज़ार सिंह की मौत ने पंजाब में सिर्फ एक राजनीतिक विवाद खड़ा नहीं किया है, बल्कि सरकार के अपने नशा-विरोधी दावों की भी परीक्षा शुरू कर दी है। संगरूर के तूर बंजारा गांव के गुलज़ार सिंह ने 6 सितंबर को वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा के सामने सार्वजनिक तौर पर सवाल उठाया था कि उसके गांव में चिट्टा इतनी आसानी से कैसे मिल रहा है और उसका अपना बेटा नशे की गिरफ्त में क्यों है। अगले दिन उसने कथित तौर पर जहरीला पदार्थ निगल लिया और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। परिवार का आरोप है कि सवाल पूछने के बाद उस पर माफी मांगने का दबाव बनाया गया और उसे प्रताड़ित किया गया। मंत्री चीमा से ले कर पूरी सरकार को विपक्ष ने कटघरे में खड़ा कर रखा है। पुलिस ने पांच लोगों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है तथा मामले की जांच के लिए एसआईटी बनाई गई है। लेकिन एक सवाल अब टाला नहीं जा सकता- जिस नशे की उपलब्धता पर गुलज़ार ने सत्ता के सामने सवाल किया, उस नशे के खिलाफ सरकार ने पिछले वर्षों में क्या किया और उसके नतीजे क्या रहे?
राहुल गांधी ने सरकार से जवाबदेही मांगते हुए हरपाल चीमा के इस्तीफे की मांग की
राहुल गांधी ने पूरे मामले को सत्ता की जवाबदेही और सवाल पूछने के अधिकार से जोड़ दिया। उन्होंने एक्स पर कहा, “A dangerous pattern is emerging in Punjab’s AAP government – if you question government failures, the response will come in the form of threats and torture.” राहुल गांधी ने कहा कि दलित समुदाय से आने वाले गुलज़ार सिंह ने अपने बेटे को नशे का शिकार होते देखा और वित्त मंत्री से सिर्फ यह पूछा कि सरकार ड्रग ट्रेड रोकने में इतनी नाकाम क्यों है। राहुल गांधी के मुताबिक इसके बाद गुलज़ार पर माफी मांगने का दबाव बनाया गया और उसे धमकियों तथा कथित प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। उन्होंने मुख्यमंत्री भगवंत मान से हरपाल चीमा का इस्तीफा मांगते हुए मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की। राहुल गांधी का मूल सवाल यह है कि अगर कोई नागरिक सरकार की नाकामी पर सवाल उठाता है और उसके बाद उसके साथ कथित तौर पर दबाव और प्रताड़ना का मामला सामने आता है, तो इसे सिर्फ विपक्ष की राजनीति कहकर खारिज कैसे किया जा सकता है?
भगवंत मान ने मौत को राजनीतिक हथियार बनाने के आरोप के साथ राहुल गांधी को पलटवार किया
भगवंत मान ने राहुल गांधी के आरोपों को राजनीतिक हमला बताते हुए एक्स पर लिखा, “Rahul Gandhi ji, don’t do politics over dead bodies; Punjabis don’t like this kind of politics.” मुख्यमंत्री ने कहा कि परिवार की निशानदेही पर पुलिस आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है और मामले में कार्रवाई चल रही है। मान ने कांग्रेस नेताओं के गांव पहुंचने पर स्थानीय विरोध का वीडियो भी साझा किया। मुख्यमंत्री का तर्क है कि जब पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी है और जांच आगे बढ़ रही है, तब एक दुखद मौत को राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना उचित नहीं है। मान ने यह भी कहा कि पंजाब में नशे की समस्या पुरानी सरकारों की देन रही है और उनकी सरकार नशा तस्करों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। यानी मुख्यमंत्री की तरफ से जवाब यह है कि सरकार ने मामले को दबाया नहीं, कार्रवाई की है और अब जांच को अपना काम करने देना चाहिए।
गुलज़ार की मौत से पहले उठाया गया सवाल अब पूरे पंजाब की नशा नीति की परीक्षा बन गया
इस विवाद का असली केंद्र गुलज़ार सिंह की मौत से ज्यादा वह सवाल है जो उसने अपनी मौत से पहले उठाया था। एक ग्रामीण व्यक्ति का कहना था कि उसके गांव में चिट्टा आसानी से उपलब्ध है और उसका बेटा नशे की गिरफ्त में है। यही सवाल पंजाब की नशा नीति के मूल दावे को चुनौती देता है। सरकार लगातार कहती रही है कि उसने नशे की सप्लाई लाइन पर बड़ा प्रहार किया है, बड़े तस्करों को गिरफ्तार किया है, भारी मात्रा में ड्रग्स जब्त किया है और नशे के आदी लोगों के इलाज के लिए व्यवस्था बढ़ाई है। ऐसे में जमीन से उठता सवाल यह है कि अगर कार्रवाई इतनी व्यापक है तो गांवों में चिट्टे की उपलब्धता को लेकर शिकायतें अब भी क्यों सामने आ रही हैं। यह सवाल सरकार के आंकड़ों को झूठा साबित नहीं करता, लेकिन आंकड़ों और जमीन के अनुभव के बीच मौजूद अंतर को जरूर जांच के दायरे में लाता है।
विधानसभा में सरकार ने 2023 में करीब दस लाख नशा-पीड़ितों का आंकड़ा रखा था
मार्च 2023 में पंजाब विधानसभा में सरकार ने नशे की समस्या का जो पैमाना बताया था, वह अपने आप में बेहद गंभीर था। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. बलबीर सिंह ने सदन में बताया था कि पंजाब में करीब दस लाख लोग नशे की गिरफ्त में हैं। इनमें करीब 2.62 लाख लोग सरकारी डी-एडिक्शन सेंटरों और करीब 6.12 लाख लोग निजी नशा मुक्ति केंद्रों में इलाज करा रहे थे। सरकार ने यह भी माना था कि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है क्योंकि सामाजिक बदनामी के डर से बहुत से लोग इलाज के लिए सामने नहीं आते। उसी समय यह सवाल भी सामने आया था कि इलाज के बाद कितने लोग वास्तव में नशे से पूरी तरह बाहर आ रहे हैं। सरकार के सामने तब भी चुनौती सिर्फ नशा तस्करों को पकड़ने की नहीं, बल्कि नशे की मांग और उसकी लत से लोगों को स्थायी रूप से बाहर निकालने की थी।
सरकार ने इलाज और पुनर्वास को नशे के खिलाफ लड़ाई का अहम हिस्सा बताया लेकिन रिकवरी का सवाल बना रहा
AAP सरकार का घोषित मॉडल सिर्फ पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा। सरकार ने बार-बार कहा कि नशे के आदी व्यक्ति को केवल अपराधी मानकर जेल भेजना समाधान नहीं है, बल्कि उसे इलाज और पुनर्वास की जरूरत है। इसी सोच के तहत ओओएटी क्लीनिक, सरकारी डी-एडिक्शन सेंटर और दूसरे उपचार नेटवर्क को मजबूत करने की कोशिश की गई। लेकिन विधानसभा की बहसों में यह सवाल लगातार बना रहा कि इलाज लेने वालों में कितने लोग वास्तव में पूरी तरह नशे से मुक्त हुए और कितने दोबारा नशे की तरफ लौट गए। यही वह जगह है जहां नशा-विरोधी नीति का असली पैमाना सामने आता है-कितने तस्कर पकड़े गए यह जरूरी आंकड़ा है, लेकिन कितने परिवारों से नशा निकला, यह उससे भी बड़ा सामाजिक परिणाम है।
‘युद्ध नशियां विरुद्ध’ में सरकार ने हजारों एफआईआर और गिरफ्तारियों को बड़ी उपलब्धि बताया
2025 में सरकार ने नशे के खिलाफ ‘युद्ध नशियां विरुद्ध’ अभियान को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाया। जुलाई 2025 में विधानसभा में वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने अभियान के शुरुआती आंकड़े रखते हुए बताया कि 1 मार्च से अब तक 13,665 एफआईआर दर्ज की गईं और 21,977 गिरफ्तारियां हुईं। करीब 11 करोड़ रुपये की ड्रग मनी जब्त किए जाने की बात भी सरकार ने कही। चीमा ने विधानसभा में कहा कि सरकार बड़े तस्करों और ड्रग नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई कर रही है तथा नशे की समस्या के लिए पिछली सरकारों की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया। विपक्ष ने इन आंकड़ों को स्वीकार करने के बजाय सरकार की रणनीति और उसके दावों पर सवाल उठाए और कहा कि केवल एफआईआर तथा गिरफ्तारियां नशे की समस्या खत्म होने का प्रमाण नहीं हैं।
एक साल के अभियान का सरकार ने भारी बरामदगी और करीब 48 हजार गिरफ्तारियों वाला रिपोर्ट कार्ड पेश किया
मार्च 2026 में सरकार ने ‘युद्ध नशियां विरुद्ध’ के एक साल का रिपोर्ट कार्ड विधानसभा के सामने रखा। हरपाल चीमा के मुताबिक 1 मार्च 2025 से 28 फरवरी 2026 के बीच एनडीपीएस एक्ट के तहत 36,178 एफआईआर दर्ज हुईं और 47,902 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। सरकार ने 2,276 किलो हेरोइन, 29 टन पोस्त की भूसी, 686 किलो अफीम, 786 किलो गांजा, 68 किलो चरस, करीब 4 किलो कोकीन, 36 किलो आईसीई और 49 लाख से अधिक नशीली गोलियां-कैप्सूल बरामद करने का दावा किया। 285 ड्रोन पकड़े जाने और ड्रोन के जरिए तस्करी से जुड़े मामलों में करीब 338 किलो हेरोइन बरामद होने की बात भी कही गई। सरकार ने 89 प्रतिशत कन्विक्शन रेट का दावा करते हुए इसे नशे के खिलाफ कार्रवाई की बड़ी सफलता बताया।
सरकार ने दावा किया कि सप्लाई लाइन पर चोट से ड्रग्स की कीमत बढ़ी और तस्करी नेटवर्क पर दबाव बना
भगवंत मान सरकार ने नशा-विरोधी अभियान के परिणाम को केवल गिरफ्तारियों और बरामदगी तक सीमित नहीं रखा। सरकार की तरफ से कहा गया कि एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स की कार्रवाई से हेरोइन और सिंथेटिक ड्रग्स की सप्लाई प्रभावित हुई तथा बाजार में उनकी कीमत बढ़ी। सरकार ने यह भी बताया कि ‘सेफ पंजाब’ व्हाट्सऐप चैटबॉट से मिली सूचनाओं के आधार पर बड़ी संख्या में एफआईआर और गिरफ्तारियां हुईं। सरकार का तर्क था कि ड्रग नेटवर्क की आर्थिक कमर तोड़ना और सप्लाई चेन को बाधित करना लंबी लड़ाई का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यानी AAP का दावा यह है कि नशा अचानक गायब नहीं हो सकता, लेकिन सप्लाई नेटवर्क को लगातार कमजोर करके समस्या को नियंत्रित करने की दिशा में ठोस काम हुआ है।
भारी कार्रवाई के बावजूद सवाल यह है कि नशा गांवों की जमीन से क्यों गायब नहीं हुआ
सरकार के आंकड़ों को खारिज करना आसान नहीं है। हजारों एफआईआर, बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां और हजारों किलो ड्रग्स की बरामदगी यह बताती है कि एनफोर्समेंट के स्तर पर बड़ी कार्रवाई हुई है। लेकिन यही आंकड़े अपने आप में यह साबित नहीं करते कि नशे की सामाजिक समस्या खत्म हो गई। अगर कार्रवाई के इतने बड़े दावों के बीच तूर बंजारा जैसे गांव में एक पिता सार्वजनिक तौर पर कहता है कि चिट्टा आसानी से उपलब्ध है, तो इस विरोधाभास को समझना जरूरी है। क्या सप्लाई नेटवर्क पर दबाव पड़ने के बावजूद स्थानीय स्तर पर छोटे तस्करों और नए नेटवर्क के जरिए नशा पहुंच रहा है? क्या कार्रवाई के साथ मांग कम करने और पुनर्वास की गति पर्याप्त है? या सरकार की सफलता का आकलन अभी मुख्य रूप से पुलिस कार्रवाई के आंकड़ों से किया जा रहा है? यही सवाल गुलज़ार सिंह के मामले को सामान्य राजनीतिक विवाद से आगे ले जाता है।
गुलज़ार को अस्पतालों के बीच ले जाने की टाइमलाइन ने नशे से आगे स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा किया
गुलज़ार सिंह की मौत का एक अहम पहलू उसकी मेडिकल जर्नी भी है। परिवार के मुताबिक उसे पहले संगरूर सिविल अस्पताल ले जाया गया, वहां से राजिंदरा अस्पताल पटियाला रेफर किया गया, फिर उसे वापस संगरूर और एक निजी अस्पताल ले जाया गया और बाद में डीएमसीएच लुधियाना पहुंचाया गया, जहां उसकी मौत हुई। इस पूरी मेडिकल टाइमलाइन को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं और अस्पतालों के बीच रेफरल तथा इलाज में कितना समय लगा, इसकी स्वतंत्र जांच जरूरी है। राहुल गांधी ने भी अस्पतालों के बीच भटकने का मुद्दा उठाया है। इसलिए इस मामले की जांच सिर्फ यह तय करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि गुलज़ार ने आत्महत्या क्यों की; यह भी देखना होगा कि जहरीला पदार्थ खाने के बाद उसे समय पर और पर्याप्त मेडिकल ट्रीटमेंट मिला या नहीं। अगर इलाज की व्यवस्था में कोई कमी थी तो यह सीधे पंजाब की हेल्थ गवर्नेंस का सवाल बन जाता है।
विधानसभा कमेटी ने बुप्रेनॉर्फिन की बढ़ती खरीद और ओओएटी मरीजों की संख्या पर सरकार से कठिन सवाल पूछे
2026 में विधानसभा की एक कमेटी ने नशे के इलाज की व्यवस्था से जुड़े आंकड़ों पर सवाल उठाए। कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब सरकार ने पिछले साढ़े चार साल में करीब 43.44 करोड़ बुप्रेनॉर्फिन टैबलेट खरीदीं। खरीद 2022 में 7 करोड़ टैबलेट से बढ़कर 2023 में 9.44 करोड़, 2024 में 10 करोड़ और 2025 में 11 करोड़ तक पहुंची; जून 2026 तक करीब 6 करोड़ टैबलेट और खरीदी जा चुकी थीं। इसी दौरान ओओएटी में पंजीकृत मरीजों की संख्या करीब 2 लाख से बढ़कर 3.17 लाख हो गई। कमेटी ने इस बढ़ती संख्या को देखते हुए यह सवाल उठाया कि इलाज लेने वालों की संख्या बढ़ रही है तो पूरी तरह नशा-मुक्त होने वालों की संख्या कितनी है। जेलों में बुप्रेनॉर्फिन की सप्लाई में भी तेज बढ़ोतरी दर्ज हुई- 2022 में करीब 1.17 करोड़ टैबलेट से बढ़कर 2026 में अब तक 8.87 करोड़ तक। यह सरकार की नीति को खारिज करने वाला निष्कर्ष नहीं था, लेकिन इसने एक महत्वपूर्ण कमी जरूर सामने रखी- इलाज की पहुंच और वास्तविक रिकवरी के बीच अंतर को मापने के लिए अधिक स्पष्ट डेटा की जरूरत है।
सरकार ने बढ़ी दवा खरीद को इलाज के विस्तार से जोड़ा और कहा कि इसे नशे की बढ़ोतरी का सीधा प्रमाण नहीं माना जा सकता
बुप्रेनॉर्फिन के आंकड़ों पर सरकार का पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से तर्क दिया गया कि दवा की बढ़ी खरीद का एक कारण उपचार व्यवस्था का विस्तार है और जेलों के भीतर भी ओओएटी जैसी सेवाएं बढ़ाई गई हैं। जेलों में हजारों कैदियों के ओओएटी से जुड़ने की वजह से दवा की जरूरत बढ़ना भी सरकार के स्पष्टीकरण का हिस्सा है। इसलिए ज्यादा दवा की खपत को सीधे यह निष्कर्ष निकालने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि पंजाब में नशा बढ़ गया। लेकिन कमेटी का सवाल अपनी जगह बना रहा कि अगर उपचार व्यवस्था का विस्तार हुआ है तो उसका अंतिम परिणाम भी मापा जाना चाहिए। कितने लोग लंबे समय तक नशे से दूर रहे, कितने दोबारा लौटे और कितने पूरी तरह रिकवर हुए- इन सवालों के जवाब नशा-विरोधी नीति की सफलता को आंकने के लिए गिरफ्तारियों जितने ही जरूरी हैं।
NCRB के 2024 के आंकड़े बताते हैं कि कार्रवाई के बावजूद पंजाब ड्रग ट्रैफिकिंग के गंभीर संकट से बाहर नहीं आया
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2024 के आंकड़े तस्वीर का दूसरा पहलू सामने रखते हैं। पंजाब में 2024 में ड्रग ओवरडोज से 106 मौतें दर्ज हुईं, जबकि 2023 में यह संख्या 89 थी; 2022 में यह आंकड़ा 144 था। यानी 2022 की तुलना में ओवरडोज मौतों में कमी आई है, लेकिन 2023 के मुकाबले 2024 में फिर बढ़ोतरी हुई। इसी साल पंजाब में 8,973 एनडीपीएस से जुड़े मामले दर्ज हुए और ड्रग ट्रैफिकिंग तथा तस्करी के लिए कब्जे से जुड़े 6,060 मामले सामने आए, जो देश में सबसे ज्यादा थे। ड्रग ओवरडोज मौतों में पंजाब 2024 में देश में दूसरे स्थान पर रहा। इसका मतलब यह नहीं कि सरकार की कार्रवाई बेअसर रही- क्योंकि 2022 की तुलना में ओवरडोज मौतों में स्पष्ट कमी भी दिखती है, लेकिन यह जरूर बताता है कि पंजाब अभी भी देश के सबसे गंभीर ड्रग ट्रैफिकिंग हॉटस्पॉट्स में बना हुआ है। इसलिए सरकार के एनफोर्समेंट आंकड़े और NCRB की तस्वीर को आमने-सामने रखकर देखने की जरूरत है: कार्रवाई बढ़ी है, लेकिन संकट खत्म होने का निष्कर्ष अभी नहीं निकाला जा सकता।
सरकार के दावे और स्वतंत्र आंकड़े एक-दूसरे को पूरी तरह खारिज नहीं करते बल्कि संकट की अलग-अलग तस्वीर दिखाते हैं
सरकार की एफआईआर, गिरफ्तारी और बरामदगी यह दिखाती है कि एनफोर्समेंट बड़े स्तर पर हुआ है। NCRB के आंकड़े बताते हैं कि उसी व्यापक दौर में भी पंजाब में ड्रग ट्रैफिकिंग का संकट गंभीर बना हुआ है। विधानसभा कमेटी इलाज के बढ़ते विस्तार और रिकवरी मापने की जरूरत पर सवाल उठा रही है। गांव की आवाज नशे की उपलब्धता को लेकर अलग अनुभव सामने रख रही है। इसलिए इन आंकड़ों में सीधा विरोधाभास मानने के बजाय असली सवाल यह है कि पुलिस कार्रवाई, सप्लाई रोकने, इलाज और वास्तविक रिकवरी- इन चारों का संयुक्त परिणाम क्या निकला? यही वह जगह है जहां पंजाब की नशा नीति का असली ऑडिट होना चाहिए।
ड्रग और सोशल-इकोनॉमिक सर्वे भी विपक्ष के सवालों से नहीं बच पाया
सरकार ने 2026 में नशे की सामाजिक और आर्थिक स्थिति समझने के लिए बड़े स्तर पर ड्रग और सोशल-इकोनॉमिक सर्वे शुरू किया। सरकार का दावा था कि लाखों परिवारों तक पहुंचकर नशे की वास्तविक तस्वीर तैयार की जाएगी और उसके आधार पर नीति बनाई जाएगी। लेकिन विपक्ष ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे 2027 चुनाव से पहले प्री-पोल फीडबैक एक्सरसाइज तक बताया। सर्वे को लेकर यह विवाद भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर सरकार खुद पंजाब में नशे की वास्तविक स्थिति का नया और व्यापक डेटा तैयार कर रही है, तो यही डेटा आगे चलकर उसके मौजूदा दावों की स्वतंत्र कसौटी बन सकता है। सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया और कहा कि सर्वे का उद्देश्य नशे की सामाजिक-आर्थिक स्थिति समझना है।
गुलज़ार के गांव की आवाज सरकारी आंकड़ों को खारिज नहीं करती लेकिन उनके अंतिम परिणाम पर सवाल जरूर उठाती है
तूर बंजारा की ग्राउंड रिपोर्ट इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण मानवीय पक्ष सामने लाती है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक गांव में करीब 1,800 मतदाता हैं और बड़ी संख्या अनुसूचित जाति समुदाय की है। ग्रामीणों ने नशे की उपलब्धता और सरकार के खिलाफ नाराजगी जताई। एक ग्रामीण ने चिट्टे की उपलब्धता को नमक की तरह आसान बताया। यह कोई वैज्ञानिक सर्वेक्षण नहीं है और इसे पूरे पंजाब का आंकड़ा नहीं माना जा सकता, लेकिन ऐसी जमीन की आवाज को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार के पास कार्रवाई के आंकड़े हैं; गांव के पास अपना अनुभव है। 2027 के पंजाब की नशा बहस में असली चुनौती यही होगी कि इन दोनों तस्वीरों को एक-दूसरे के सामने रखकर देखा जाए।
NCSC और NHRC की एंट्री ने गुलज़ार मामले को राजनीतिक आरोप से आगे संस्थागत जांच तक पहुंचा दिया
गुलज़ार सिंह मामले में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने पंजाब सरकार से पांच दिन के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है और आयोग के चेयरमैन के संगरूर जाने की जानकारी सामने आई है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी मामले से जुड़े दस्तावेज, मेडिकल रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम और जांच से संबंधित सामग्री मांगी है। अब मौत से पहले के वीडियो, कथित धमकियों, पुलिस कार्रवाई, इलाज की प्रक्रिया और घटनाक्रम की पूरी टाइमलाइन को जांचना होगा। यही जांच तय करेगी कि राजनीतिक आरोपों में कितना तथ्य है।
हरपाल चीमा पर लगे आरोपों का अंतिम सच जांच से ही सामने आएगा!
हरपाल चीमा ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से इनकार किया है। उनका कहना है कि गुलज़ार सिंह ने उनके सामने नशे का मुद्दा उठाया था और उन्होंने पुलिस को नशा सप्लाई करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कहा था। उन्होंने गुलज़ार को धमकाने या उसकी मौत से जुड़े घटनाक्रम में अपनी भूमिका से इनकार किया है। दूसरी तरफ परिवार और विपक्ष उनके खिलाफ गंभीर आरोप लगा रहे हैं और राजनीतिक तौर पर उनके इस्तीफे तथा गिरफ्तारी की मांग की जा रही है।
लाशों पर सियासत का सवाल अपनी जगह, लेकिन सत्ता से सवाल का जवाब भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी!
भगवंत मान का ‘लाशों पर सियासत’ वाला सवाल राजनीतिक रूप से समझ में आता है क्योंकि किसी परिवार की त्रासदी को चुनावी हथियार बनाना संवेदनशील और नैतिक सवाल है। लेकिन राहुल गांधी का सवाल भी अपनी जगह है कि अगर किसी नागरिक ने सत्ता के सामने नशे और सरकारी नाकामी का मुद्दा उठाया और उसके बाद उसके साथ कथित प्रताड़ना का मामला सामने आया, तो उसकी निष्पक्ष जांच की मांग को केवल राजनीति कहकर खत्म नहीं किया जा सकता। दोनों बातों के बीच संतुलन का रास्ता एक ही है- न आरोप को अंतिम सच मानना और न सवाल को राजनीतिक कहकर बंद कर देना। सरकार को जांच से जवाब देना होगा और विपक्ष को भी आरोपों को तथ्य के साथ साबित करने की जिम्मेदारी निभानी होगी।
गुलज़ार सिंह का सवाल अब पंजाब की नशा नीति के अंतिम परिणाम पर जवाब मांग रहा है
पिछले वर्षों के विधानसभा आंकड़े बताते हैं कि पंजाब में नशे की समस्या कितनी बड़ी रही है। सरकार के हालिया आंकड़े बताते हैं कि उसने बड़े पैमाने पर एफआईआर दर्ज कीं, गिरफ्तारियां कीं, ड्रग्स जब्त किए, तस्करों की संपत्ति पर कार्रवाई की और कन्विक्शन का दावा किया। सरकार की उपचार व्यवस्था भी बढ़ी है। लेकिन NCRB के आंकड़े बताते हैं कि ड्रग ट्रैफिकिंग की चुनौती अभी गंभीर है, विधानसभा कमेटी इलाज और रिकवरी के आंकड़ों पर सवाल उठा रही है और गांवों से नशे की उपलब्धता की शिकायतें अभी भी सामने आ रही हैं। साथ ही गुलज़ार की मेडिकल जर्नी ने स्वास्थ्य व्यवस्था की क्षमता पर भी सवाल खड़ा किया है। इसलिए तस्वीर न तो पूरी तरह सरकार के खिलाफ है और न सरकार के दावों को बिना जांच स्वीकार करने वाली। पंजाब ने कार्रवाई जरूर की है, लेकिन क्या कार्रवाई ने नशे को निर्णायक रूप से पीछे धकेला है- यही वह सवाल है जिसका जवाब अभी बाकी है।
अंतिम कसौटी यह होगी कि कितने तस्कर पकड़े गए से आगे बढ़कर कितने परिवार नशे से मुक्त हुए
इस मामले ने सरकार के सामने एक बड़ा और असहज सवाल जरूर रख दिया है। नशे के खिलाफ लड़ाई की सफलता सिर्फ एफआईआर, गिरफ्तारी, बरामदगी और कन्विक्शन से नहीं मापी जा सकती; उसका अंतिम परिणाम गांवों और परिवारों में दिखाई देना चाहिए। अगर सरकार के आंकड़े जमीन पर नशे की उपलब्धता कम होने की तस्वीर दिखाते हैं तो उसे पारदर्शी डेटा के साथ सामने रखना चाहिए। अगर विपक्ष कहता है कि सरकार विफल है तो उसे भी अपने आरोपों को प्रमाण और तुलनात्मक आंकड़ों के साथ साबित करना होगा। गुलज़ार सिंह ने सत्ता से सवाल किया था; अब पंजाब को उस सवाल का जवाब आंकड़ों, जांच, इलाज की व्यवस्था और जमीन की सच्चाई- चारों से चाहिए।

