नशे पर सीधा वार और महिलाओं को 2100 रुपये का दांव- 2027 से पहले पंजाब में बीजेपी का नया पॉलिटिकल दांव कितना असरदार?

आरके सेठी
चंडीगढ़, 9 सितम्बर।
पंजाब विधानसभा चुनाव में अभी कुछ महीने बाकी हैं, लेकिन बीजेपी ने जिस तरह अपनी चुनावी पिच तैयार करनी शुरू की है, उससे लगता है कि पार्टी अब पंजाब में सिर्फ अपने पारंपरिक मुद्दों के सहारे आगे बढ़ने के बजाय सीधे उन मुद्दों पर निशाना साधना चाहती है, जो आम परिवार की रोजमर्रा की चिंता से जुड़े हैं। नशा और महिला आर्थिक सुरक्षा- ये दो ऐसे मुद्दे हैं जिनका असर गांव से शहर तक और परिवार से वोटिंग बिहेवियर तक जाता है। बीजेपी शायद इसी वजह से इन दोनों को अपनी 2027 की रणनीति में ज्यादा धार देने की कोशिश कर रही है।
अमित शाह वाली नशा विरोधी यात्राएं बड़ा राजनीतिक संदेश
बीजेपी 18 से 30 सितंबर तक पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों को कवर करने वाली राज्यव्यापी नशा-विरोधी यात्राओं की तैयारी कर रही है। चार अलग-अलग स्थानों से यात्राएं शुरू होंगी और जालंधर में इसका समापन होगा। बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन यात्राओं को फ्लैग ऑफ करेंगे, जबकि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत बड़े केंद्रीय नेता इसमें शामिल होंगे। पार्टी ने नशे के साथ लॉ एंड ऑर्डर और गवर्नेंस को भी चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी की है। यानी यह सिर्फ नशे के खिलाफ अभियान नहीं, बल्कि 2027 की चुनावी पिच तैयार करने की कवायद है।
अमित शाह की मौजूदगी बता रही कि बीजेपी पंजाब को सीरियस ले रही!
किसी राज्य के स्थानीय कार्यक्रम और केंद्रीय गृह मंत्री की मौजूदगी वाले राज्यव्यापी अभियान में फर्क होता है। अमित शाह का इस अभियान से जुड़ना बताता है कि बीजेपी नशे के मुद्दे को पंजाब में बड़े राजनीतिक नैरेटिव में बदलना चाहती है। मार्च में मोगा की बदलाव रैली में शाह पहले ही नशे को लेकर पंजाब सरकार पर हमला कर चुके हैं। अब राज्य की 117 सीटों तक इस मुद्दे को यात्रा के जरिए ले जाने की कोशिश उस पुराने संदेश को चुनावी अभियान में बदलती दिखाई दे रही है।
117 सीटों की यात्रा बीजेपी के पूरे पंजाब में अपनी जगह बनाने की कोशिश!
इस यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण बात सिर्फ इसका मुद्दा नहीं, इसका विस्तार है। 117 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करने का मतलब है कि बीजेपी नशे के मुद्दे के बहाने उन इलाकों में भी पहुंचना चाहती है जहां उसका संगठन अभी कांग्रेस, AAP या अकाली दल जितना मजबूत नहीं है। पार्टी पहले ही बूथ से लेकर सर्किल स्तर तक अपना संगठन फैलाने और माइक्रो-मैनेजमेंट मजबूत करने की योजना बना चुकी है। इसलिए यात्रा को राजनीतिक संदेश के साथ-साथ संगठन विस्तार की कवायद के रूप में भी पढ़ना चाहिए।
बीजेपी नशे को सिर्फ सरकार की नाकामी नहीं, परिवार की त्रासदी के मुद्दे के रूप में पेश करना चाहती है!
नशे का मुद्दा पंजाब में नया नहीं है, लेकिन इसकी राजनीतिक ताकत इस बात में है कि यह किसी एक जाति, धर्म या इलाके तक सीमित नहीं है। जिस परिवार का बेटा या भाई नशे में फंसता है, वहां यह सीधे घर की चिंता बन जाता है। बीजेपी अगर इस मुद्दे को सिर्फ आंकड़ों और गिरफ्तारियों तक सीमित रखने के बजाय परिवारों की पीड़ा, इलाज, पुनर्वास और गांवों में नशे की उपलब्धता से जोड़ती है तो उसका नैरेटिव ज्यादा असरदार हो सकता है।
महिला वोट पर 2100 का दांव हरियाणा मॉडल को पंजाब में राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश!
बीजेपी का दूसरा बड़ा फोकस महिला वोट पर है। हरियाणा की दीन दयाल लाडो लक्ष्मी योजना में पात्र महिलाओं को 2100 रुपये मासिक सहायता दी जा रही है और हरियाणा सरकार ने हाल में इसकी पात्रता का दायरा भी बढ़ाया है। बीजेपी अब इसी मॉडल को पंजाब में AAP सरकार की ‘मुख्यमंत्री मावां धियां सत्कार’ योजना के मुकाबले रख रही है, जिसमें सामान्य वर्ग की पात्र महिलाओं के लिए 1000 रुपये और एससी महिलाओं के लिए 1500 रुपये मासिक सहायता का प्रावधान है। फिलहाल यह हरियाणा मॉडल को पंजाब में चुनावी तुलना के तौर पर पेश करने का राजनीतिक दांव है।
2100 बनाम 1000 की तुलना आसान, लेकिन पूरी तस्वीर इससे कहीं बड़ी!
बीजेपी के लिए यह तुलना इसलिए आकर्षक है क्योंकि इसका संदेश बहुत सरल है- हरियाणा में 2100 तो पंजाब में कितना? लेकिन यहां राजनीतिक बहस का दूसरा पहलू भी है। हरियाणा की योजना में उम्र, आय और निवास जैसी पात्रता शर्तें हैं, जबकि पंजाब की योजना का दायरा कहीं ज्यादा व्यापक रखा गया है। इसलिए सिर्फ रकम की तुलना करने से दोनों योजनाओं की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। बीजेपी को राजनीतिक फायदा मिल सकता है, लेकिन AAP के पास भी यह जवाब रहेगा कि कम रकम ज्यादा महिलाओं तक पहुंच रही है।
महिलाओं को बीजेपी सिर्फ लाभार्थी नहीं बल्कि चुनावी निर्णायक वर्ग के रूप में देख रही है!
पंजाब के मतदाताओं में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग आधी है और हाल के चुनावों में महिला मतदान भी महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे में महिला के खाते में आने वाली रकम सिर्फ कल्याणकारी योजना नहीं रहती, वह घर के बजट और सरकार के प्रति सीधे अनुभव से जुड़ जाती है। बीजेपी शायद यही समझ रही है कि अगर हरियाणा के मॉडल को पंजाब की महिलाओं के सामने एक आसान तुलना के रूप में रखा जाए तो यह चुनावी बहस को सीधे घर के अंदर तक ले जा सकता है।
नशा और महिला आर्थिक सुरक्षा को जोड़कर बीजेपी बना रही है परिवार-केंद्रित पॉलिटिकल पिच!
बीजेपी की मौजूदा रणनीति में इन दोनों मुद्दों का एक दिलचस्प कनेक्शन है। एक तरफ पार्टी कह रही है कि पंजाब के परिवारों को नशे से बचाना जरूरी है, दूसरी तरफ महिला को आर्थिक मदद का सवाल उठा रही है। यानी सुरक्षा और आर्थिक राहत- दोनों को एक ही परिवार-केंद्रित नैरेटिव में जोड़ा जा सकता है। अगर यह नैरेटिव जमीन पर पकड़ बनाता है तो बीजेपी के लिए यह सिर्फ दो अलग-अलग मुद्दे नहीं रहेंगे, बल्कि सरकार के खिलाफ एक संयुक्त पॉलिटिकल पिच बन सकते हैं।
बीजेपी का असली निशाना सिर्फ AAP नहीं, पंजाब की खाली पड़ी राजनीतिक स्पेस भी है!
बीजेपी की रणनीति को केवल भगवंत मान सरकार के खिलाफ अभियान मानना अधूरा होगा। 117 सीटों पर तैयारी, बूथ और सर्किल स्तर पर संगठन विस्तार और पूरे पंजाब में यात्रा निकालने की योजना बताती है कि पार्टी अपनी अलग राजनीतिक जगह बनाने की कोशिश भी कर रही है। लंबे समय तक पंजाब की राजनीति में बीजेपी की भूमिका गठबंधन के जरिए सीमित रही थी, लेकिन अब पार्टी अपने दम पर राज्यव्यापी पहचान बनाने की कोशिश कर रही है।
अकेले 117 सीटों पर लड़ने की तैयारी बीजेपी के बदले हुए आत्मविश्वास का संकेत!
बीजेपी ने सार्वजनिक तौर पर सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी की बात कही है। ऐसे में नशा-मुक्ति यात्रा को सिर्फ चुनावी प्रचार नहीं माना जा सकता। यह 117 सीटों पर संगठन को एक्टिव करने, स्थानीय कार्यकर्ताओं को मैदान में उतारने और केंद्रीय नेतृत्व को सीधे गांवों तक पहुंचाने का माध्यम भी बन सकती है। हालांकि गठबंधन की संभावनाओं को लेकर राजनीतिक चर्चाएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं, इसलिए अंतिम तस्वीर चुनाव तक बदल सकती है।
बड़ी चुनौती – पंजाब में मुद्दा मिलना और वोट मिलना दो अलग बातें!
नशा पंजाब की दुखती रग जरूर है और महिला आर्थिक सहायता भी बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है, लेकिन किसी मुद्दे की लोकप्रियता अपने आप वोट में नहीं बदलती। बीजेपी को अभी पंजाब में स्थानीय नेतृत्व, सामाजिक स्वीकार्यता, ग्रामीण नेटवर्क और बूथ स्तर की मजबूत मौजूदगी की चुनौती का सामना करना है। सिर्फ अमित शाह की रैली या बड़ी यात्रा से वह चुनौती खत्म नहीं होगी।
सिख और ग्रामीण पंजाब में बीजेपी को नैरेटिव से आगे भरोसा बनाना होगा!
बीजेपी के लिए पंजाब की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि वह नशे और महिला कल्याण जैसे व्यापक मुद्दों को राज्य की सामाजिक और राजनीतिक संवेदनशीलताओं के साथ कैसे जोड़ती है। पंजाब में चुनाव सिर्फ योजनाओं और नारों से नहीं जीते जाते। गांव, किसान, सिख समाज, स्थानीय नेतृत्व, क्षेत्रीय अस्मिता और दिल्ली से आने वाली राजनीति को लेकर लोगों की धारणा- इन सभी का असर चुनावी फैसले पर पड़ता है। बीजेपी को इसलिए अपनी पॉलिटिकल पिच को पंजाब की स्थानीय जमीन से जोड़ना होगा।
नशे पर बीजेपी की यात्रा का असली टेस्ट तब होगा जब सरकारों के दावों और गांव की हकीकत को आमने-सामने रखा जाएगा
नशे के मुद्दे पर बीजेपी को AAP सरकार के दावों को चुनौती देने का मौका जरूर मिलेगा, लेकिन उसे खुद भी एक स्पष्ट रोडमैप बताना होगा। सिर्फ यह कहना कि नशा खत्म करेंगे काफी नहीं होगा। पंजाब के परिवार जानना चाहेंगे कि सप्लाई कैसे रुकेगी, इलाज और रिहैबिलिटेशन कैसे मजबूत होगा, नशे के आदी युवाओं की वापसी कैसे होगी और गांवों में उपलब्धता वास्तव में कैसे कम होगी।
2100 का नैरेटिव भी तभी असर करेगा जब बीजेपी यह बताएगी कि पंजाब में उसका मॉडल क्या होगा!
महिलाओं के लिए 2100 की तुलना चुनावी मंच पर आकर्षक है, लेकिन वोटर का अगला सवाल स्वाभाविक होगा- अगर बीजेपी पंजाब में सत्ता में आती है तो क्या वह भी 2100 देगी, किसे देगी और कब से देगी? यहीं बीजेपी के लिए हरियाणा मॉडल को सिर्फ तुलना से आगे ले जाकर पंजाब के लिए स्पष्ट नीति और वित्तीय रोडमैप में बदलने की जरूरत होगी।
बीजेपी ने शायद पंजाब की दुखती रग पहचान ली, लेकिन अब उसे उस रग पर भरोसे का हाथ रखना होगा!
यही 2027 की बीजेपी रणनीति का सबसे बड़ा सवाल है। नशा पंजाब की दुखती रग है, महिला आर्थिक सुरक्षा घर की सीधी चिंता है और 117 सीटों पर संगठन बीजेपी की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का संकेत है। इन तीनों को एक साथ जोड़ना बीजेपी के लिए बड़ा अवसर है।
लेकिन पंजाब में चुनावी राजनीति सिर्फ यह पहचान लेने से नहीं बदलती कि जनता की तकलीफ क्या है। असली सवाल यह है कि बीजेपी उस तकलीफ का ऐसा समाधान, ऐसा नेतृत्व और ऐसा भरोसा पेश कर पाती है या नहीं जिसे पंजाब का वोटर अपने घर और अपने गांव से जोड़ सके।
यात्राएं सड़क पर होंगी, 2100 की तुलना चुनावी मंच पर होगी, लेकिन अंतिम फैसला पंजाब के वोटर के हाथ में होगा- क्या बीजेपी ने उसकी “दुखती रग” सच में समझी है, या सिर्फ चुनाव से पहले उसे पहचान लिया है?

