HomePunjabपंजाब बनाम सेंटर! जस्टिस मिश्रा की नियुक्ति पर इतना बड़ा विवाद क्यों?

पंजाब बनाम सेंटर! जस्टिस मिश्रा की नियुक्ति पर इतना बड़ा विवाद क्यों?

मसला कंसल्ट या कंसेंट का! पंजाब सरकार के विरोध के बावजूद जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा ने शपथ ले ली, लेकिन असली सवाल अब शुरू हुआ है- क्या पंजाब सरकार इस मुद्दे को भी पंजाब बनाम सेंटर बनाना चाहती है, या वास्तव में मामला वैधानिक पेचीदगियों का है?

आरके सेठी
चंडीगढ़, 7 सितम्बर।

पंजाब सरकार और सेंटर में अब हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को लेकर विवाद हो गया है, हालांकि सेंटर ने चीफ जस्टिस की नियुक्ति और शपथ ग्रहण हो चुकने तक पंजाब सरकार की आपत्तियों की कोई परवाह नहीं की है! खास बात यह रही कि पंजाब सरकार ने शपथ से ठीक एक दिन पहले इमरजेंसी कैबिनेट बैठक कर नियुक्ति और शपथ दोनों रोकने की मांग की थी। इसके बावजूद केन्द्र की अधिसूचना के बाद शपथ समारोह तय कार्यक्रम के मुताबिक हुआ। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के नए चीफ जस्टिस के रूप में जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा ने सोमवार को शपथ ले ली। पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी समारोह में मौजूद रहे, लेकिन पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और उनका कोई भी मंत्री नहीं पहुंचे।

केन्द्र और पंजाब के अधिकारों का सवाल!

विवाद इस बात पर है कि हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की नियुक्ति में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम, केन्द्र सरकार और संबंधित राज्य सरकार की भूमिका क्या है और उसकी सीमा कहां तक है। पंजाब सरकार का कहना है कि उससे राय मांगी गई, लेकिन उसकी राय आने और उस पर विचार होने का इंतजार किए बिना नियुक्ति कर दी गई। केन्द्र की तरफ से जवाब है कि राज्य की राय ली जाती है, लेकिन उसे नियुक्ति रोकने का अधिकार या वीटो नहीं दिया गया है।

पूरी कहानी की शुरुआत 6 अगस्त से होती है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की। उस समय वह इसी हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस थे। कॉलेजियम ने उसी दौर में कई दूसरे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के लिए भी नामों की सिफारिश की थी। यानी 6 अगस्त को नियुक्ति नहीं हुई थी, बल्कि न्यायपालिका की ओर से नाम की सिफारिश हुई थी। इसके बाद संवैधानिक प्रक्रिया में केन्द्र और संबंधित राज्य सरकार की भूमिका आई।

केंद्र का कहना है कि पंजाब को पर्याप्त समय मिला

केन्द्र की तरफ से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन का कहना है कि पंजाब और हरियाणा दोनों सरकारों को 10 अगस्त को प्रस्ताव की जानकारी दी गई और उनकी राय मांगी गई। उनका दावा है कि हरियाणा सरकार और संबंधित राज्यपालों की तरफ से जवाब आ गया, जबकि पंजाब सरकार ने अपनी राय नहीं दी। केन्द्र का तर्क है कि पंजाब को पर्याप्त समय मिला और वह जवाब न देकर प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक रोक नहीं सकता था।

पंजाब का कहना है कि राय मांगी जरूर गई, लेकिन जवाब का इंतजार नहीं किया गया

पंजाब सरकार की आपत्ति का मूल बिंदु यही है। उसका कहना है कि राज्य सरकार से राय मांगी गई थी और उसे अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए था। पंजाब कैबिनेट ने 6 सितंबर को प्रस्ताव पारित कर कहा कि नियुक्ति और शपथ को तब तक रोका जाए, जब तक राज्य सरकार की राय प्राप्त कर उस पर विधिवत विचार नहीं किया जाता। मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार ने इसे पंजाब के संवैधानिक अधिकारों और संघीय ढांचे से जोड़ते हुए राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और राज्यपाल तक अपनी आपत्ति पहुंचाई।

“सहमति” और “राय” के बीच का फर्क बहुत महत्वपूर्ण

यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है। पंजाब सरकार की राजनीतिक भाषा में “सहमति” और “मंजूरी” का सवाल प्रमुख है, लेकिन हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की नियुक्ति की प्रक्रिया में संबंधित राज्य सरकार की भूमिका को सामान्य तौर पर उसकी राय लेने के रूप में देखा जाता है। राज्य सरकार की राय अपने आप में नियुक्ति पर रोक लगाने वाला वीटो नहीं है।

पंजाब सरकार का तर्क है कि जब केन्द्र ने खुद राज्य सरकार से राय मांगी थी, तो उस राय के आने से पहले नियुक्ति को अंतिम रूप क्यों दे दिया गया? यही वह बिंदु है जहां प्रक्रिया और संवैधानिक मर्यादा का सवाल उठता है।

ढुल बोले- कंसेंट नहीं, सिर्फ स्टेट की राय लेना जरूरी था

हरियाणा के पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के अधिवक्ता रविंद्र सिंह ढुल के मुताबिक, जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया में संबंधित स्टेट गवर्नमेंट से उसकी राय लेना जरूरी है, लेकिन इसका मतलब स्टेट सरकार की कंसेंट लेना नहीं है। उनका कहना है कि प्रक्रिया के तहत राज्य सरकार से विचार मांगे जाते हैं, उसकी सहमति नियुक्ति के लिए अनिवार्य नहीं है। ढुल के मुताबिक, नोटिफिकेशन जारी होने के बाद चीफ जस्टिस की शपथ को एक वर्किंग डे से ज्यादा रोकना भी उचित नहीं है, इसलिए इस पूरे घटनाक्रम को जल्दबाजी का मामला बताना सही नहीं होगा। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से उठाए गए सवालों को भी वह उचित मानते हैं। उनका स्पष्ट मत है कि न्यायिक दृष्टि से पंजाब सरकार की ओर से शपथ रोकने और नियुक्ति पर इस तरह आपत्ति दर्ज कराने का कदम सही नहीं था।

“इतनी जल्दी” वाली बात को भी तारीखों के साथ समझना होगा

इस मामले में यह कहना ठीक नहीं होगा कि कॉलेजियम की सिफारिश होते ही अगले दिन नियुक्ति कर दी गई। 6 अगस्त की सिफारिश और 5 सितंबर की अधिसूचना के बीच लगभग एक महीना था। असली सवाल यह है कि इस दौरान पंजाब सरकार को राय देने के लिए कितना अवसर मिला और क्या उसके जवाब का इंतजार करना जरूरी था। इसके बाद 5 सितंबर की अधिसूचना से 7 सितंबर की शपथ तक सिर्फ दो दिन का अंतर रहा। यही वजह है कि पंजाब सरकार इसे जल्दबाजी के रूप में देख रही है, जबकि केन्द्र इसे पहले से चल रही नियुक्ति प्रक्रिया को पूरा करना बता रहा है।

सबसे बड़ी संवैधानिक पेचीदगी!

एक तरफ सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की भूमिका है, जिसकी न्यायिक नियुक्तियों में महत्वपूर्ण और प्रमुख स्थिति है। दूसरी तरफ संबंधित राज्य सरकार से राय लेने की व्यवस्था है। लेकिन सवाल यह है कि राज्य की राय लेने का मतलब क्या केवल पत्र भेज देना है, या राज्य को अपनी राय देने और उसके उचित विचार का वास्तविक अवसर देना भी उस प्रक्रिया का हिस्सा है?

पंजाब सरकार ने अपने विरोध में जस्टिस गुरमीत सिंह संधावालिया के पुराने मामले का हवाला दिया है। सरकार का तर्क है कि एक दूसरे मामले में संबंधित राज्य की राय का इंतजार किया गया था और नियुक्ति को आगे बढ़ने में समय लगा। पंजाब इसी उदाहरण से सवाल उठा रहा है कि अगर वहां राज्य की प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा सकता था तो इस मामले में क्यों नहीं किया गया।

भगवंत मान को “पंजाब बनाम केन्द्र” की लड़ाई से फायदा?

राजनीतिक नजर से देखें तो यह विवाद भगवंत मान सरकार के लिए तैयार मुद्दा लेकर आया है। पंजाब सरकार इसे आरडीएफ, बीबीएमबी, बाढ़ राहत और दूसरे केन्द्र-राज्य विवादों के साथ जोड़ सकती है। संदेश यह बनाया जा सकता है कि पंजाब की निर्वाचित सरकार की राय को बार-बार नजरअंदाज किया जा रहा है।
2027 के चुनाव से पहले यह AAP के लिए उपयोगी नैरेटिव हो सकता है, क्योंकि इससे सरकार की रोजमर्रा की शासन संबंधी परेशानियों से ध्यान हटाकर पंजाब के अधिकार और केन्द्र के हस्तक्षेप की तरफ बहस मोड़ी जा सकती है।

लेकिन यही मुद्दा AAP के लिए उलटा भी पड़ सकता है!

पंजाब सरकार की मुश्किल यह है कि पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने खुद सरकार के कदम पर सवाल उठाए हैं। बार ने कहा कि न्यायिक नियुक्तियां संवैधानिक व्यवस्था के तहत होती हैं और राजनीतिक असहमति के जरिए न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा पर असर नहीं पड़ना चाहिए। उसने पंजाब कैबिनेट की कार्रवाई को कार्यपालिका के जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप के रूप में भी देखा।

यानी AAP के सामने दो बिल्कुल उलटे संदेश खड़े हो गए हैं!

एक तरफ सरकार कह सकती है- “हम पंजाब के अधिकारों की रक्षा कर रहे हैं।” दूसरी तरफ विरोधी कह सकते हैं-“सरकार न्यायपालिका की नियुक्ति में राजनीतिक भूमिका चाहती है।” यही वह बिंदु है जहां AAP की राजनीतिक रणनीति अगर सावधानी से नही रही तो मामला उलझ सकता है!
अगर भगवंत मान इस मामले को बहुत ज्यादा राजनीतिक बना देते हैं तो विपक्ष को यह कहने का मौका मिलेगा कि सरकार न्यायपालिका को भी अपने राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बना रही है। लेकिन अगर सरकार चुप हो जाती है तो केन्द्र के खिलाफ उठाया गया पूरा मुद्दा ठंडा पड़ सकता है।

केन्द्र का कानूनी तर्क मजबूत, लेकिन राजनीतिक जोखिम भी!

केन्द्र इस मामले में कह सकता है कि नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश और राष्ट्रपति की संवैधानिक मंजूरी के बाद हुई है और राज्य सरकार के पास इसे रोकने का अधिकार नहीं था। यह तर्क उसके पक्ष को मजबूती देता है। लेकिन पंजाब की राजनीति में कानूनी स्थिति और राजनीतिक धारणा हमेशा एक जैसी नहीं होती। अगर यह संदेश गया कि “पंजाब से राय तो मांगी गई, लेकिन राय आने से पहले ही फैसला कर दिया गया”, तो AAP इसे केन्द्र के खिलाफ इस्तेमाल करेगी। यानी इस मामले में सेंटर के पास प्रक्रिया का बचाव मजबूत हो सकता है, लेकिन उसकी राजनीतिक कीमत भी हो सकती है।

कांग्रेस के सामने बीच की ‘जमीन’ लेने का मौका

कांग्रेस के लिए यह मामला आसान नहीं है। AAP के साथ खड़े होने पर वह AAP के पंजाब-केंद्र टकराव वाले नैरेटिव को मजबूत करेगी। पूरी तरह केन्द्र के साथ जाने पर उसे पंजाब के अधिकारों से जुड़े सवाल पर नुकसान हो सकता है। इसलिए कांग्रेस अगर यह कहती है कि राज्य की राय का सम्मान होना चाहिए, लेकिन न्यायपालिका की स्वतंत्रता से भी समझौता नहीं होना चाहिए, तो वह दोनों पक्षों से अलग अपनी जगह बना सकती है।

इस विवाद का असली सवाल व्यवस्था है!

अगर इस पूरे मामले को एक व्यक्ति की नियुक्ति तक सीमित कर दिया गया तो कहानी छोटी हो जाएगी। बड़ी कहानी यह है कि भारत के संघीय ढांचे में न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, संबंधित राज्य की राय का वास्तविक महत्व कितना है और अगर राज्य समय पर अपनी राय न दे तो केन्द्र कब तक इंतजार करे? यही वह सवाल है जिसका स्पष्ट जवाब भविष्य के ऐसे विवादों को रोक सकता है।

राजनीतिक लड़ाई अभी बाकी!

तथ्यों की सीधी तस्वीर यह है- सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा के नाम की सिफारिश की, केन्द्र ने नियुक्ति की अधिसूचना जारी की, पंजाब सरकार ने विरोध किया, शपथ रोकने की मांग की और इसके बावजूद 7 सितंबर को जस्टिस मिश्रा ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में शपथ ले ली।

कानूनी धरातल पर पंजाब सरकार के लिए सबसे कमजोर बात यह है कि राज्य को नियुक्ति पर वीटो हासिल नहीं है। लेकिन पंजाब का सवाल पूरी तरह खारिज करने लायक भी नहीं है- जब राज्य से राय मांगी गई थी तो उस राय को रखने और उस पर विचार का वास्तविक अवसर कितना मिला, यही असली विवाद है। बेशक, सेंटर ये कहे कि कंसल्ट में और कंसेंट में फर्क सभी को समझना चाहिए.

राजनीतिक धरातल पर AAP को इससे “पंजाब बनाम केन्द्र” का मुद्दा मिल गया है। BJP को “संवैधानिक प्रक्रिया बनाम राजनीतिक हस्तक्षेप” का जवाब मिल गया है। Congress के सामने बीच की जमीन है और SAD के सामने पंजाब के अधिकारों की अपनी पुरानी राजनीति को फिर धार देने का मौका। और 2027 के लिहाज से सबसे अहम सवाल यही है-क्या भगवंत मान इसे सिर्फ एक नियुक्ति विवाद रहने देंगे, या इसे पंजाब की अस्मिता और अधिकारों की बड़ी राजनीतिक लड़ाई बना देंगे?

अगर यह मुद्दा आने वाले महीनों में आरडीएफ, बीबीएमबी, पानी, बाढ़ राहत और दूसरे केन्द्र-राज्य विवादों से जुड़ता गया, तो जस्टिस मिश्रा की नियुक्ति एक अलग घटना नहीं रहेगी। यह 2027 के चुनाव से पहले AAP के “पंजाब के अधिकार” वाले बड़े नैरेटिव की एक और ईंट बन सकती है।
यहीं से इस पूरे विवाद की असली पॉलिटिक्स शुरू होती है।

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