संगरूर में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में काला झंडा दिखाने से शुरू हुआ विवाद अब विपक्ष के धड़ाधड़ हमले, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जांच के आदेश और पंथक लीडरों के सख्त रिएक्शन तक पहुंच चुका है; सवाल सिर्फ पुलिस कार्रवाई का नहीं, भगवंत मान सरकार की राजनीतिक साख का भी है!

आरके सेठी
चंडीगढ़, 6 सितम्बर।
सीएम का पॉलिटिकल प्रोग्राम और एक शख्स द्वारा लहराए गये एक काले झंडे ने आज पूरे पंजाब में एक नैरेटिव लहरा दिया है कि “वार अगेंस्ट ड्रग्स” मुहिम चलाने वाली सरकार नशे के मसले पर विरोध की आवाज को बर्दाशत नहीं कर पा रही है! हालांकि, सरकार इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती. संगरूर में हुआ ये एपिसोड पंजाब इलेक्शन में क्या रंग दिखाता है, ये देखना दिलचस्प होगा!
AAP सरकार के लिए बड़ा पॉलिटिकल सवाल!
संगरूर के शेरों गांव में 2 सितंबर को मुख्यमंत्री भगवंत मान की ‘लोक मिलनी’ के दौरान 37 वर्षीय मोहनजीत सिंह ने पड़ोसी के घर की छत पर चढ़कर काला झंडा दिखाया और पंजाब में ड्रग्स की समस्या को लेकर सरकार से सवाल उठाए। इसके बाद पुलिस उसे नीचे उतारकर अपने साथ ले गई। अगले दिन उसे जमानत मिल गई, लेकिन अस्पताल पहुंचने के बाद उसके द्वारा पुलिस हिरासत में कथित मारपीट और प्रताड़ना के आरोप लगाए जाने से मामला तेजी से पॉलिटिकल विवाद में बदल गया।
मसला इसलिए अहम् हो गया कि मुख्यमंत्री मंच से ड्रग्स के खिलाफ सरकार की कोशिशों का संदेश दे रहे थे और उसी दौरान छत से काला झंडा दिखाकर एक ग्रामीण ने उसी मुद्दे पर सवाल उठा दिया। इस दृश्य ने विवाद को प्रतीकात्मक ताकत दे दी है। यही वजह है कि विपक्ष इसे सिर्फ एक पुलिस स्टेशन की घटना नहीं बल्कि मुख्यमंत्री की राजनीतिक जवाबदेही से जोड़ रहा है।
मोहनजीत का आरोप -ड्रग्स पर सवाल उठाने के बाद पुलिस हिरासत में उसके साथ गंभीर ज्यादती हुई
अस्पताल में भर्ती मोहनजीत ने आरोप लगाया कि उसे गांव में और बाद में पुलिस थाने में पीटा गया, बाल-दाढ़ी खींची गई, बिजली के झटके दिए गए और जांघों पर ब्लेड से चोटें पहुंचाकर उन पर नमक डाला गया। उसने धार्मिक पहचान और केश-ककारों के कथित अपमान के आरोप भी लगाए।
पुलिस का दावा – सिर्फ काला झंडा दिखाने के कारण नहीं लिया हिरासत में!
पंजाब पुलिस के मुताबिक मोहनजीत के खिलाफ करीब आठ एफआईआर दर्ज हैं और इनमें हत्या के प्रयास से जुड़ा मामला भी शामिल है। पुलिस का कहना है कि 2 सितंबर को उसे बीएनएसएस की धारा 126 और 170 के तहत एहतियाती कार्रवाई में हिरासत में लिया गया था। पुलिस ने यह भी दावा किया कि उसका डोप टेस्ट पॉजिटिव आया था। पुलिस के अनुसार गांव की पंचायत ने भी पुलिस को बताया कि उसने अतीत में ड्रग्स का इस्तेमाल किया था, लेकिन बाद में वह ड्रग्स के खिलाफ मुहिम से जुड़ गया था।
मेडिकल रिपोर्ट में सामने आया फर्क अब अहम पॉइंट बन गया!
पुलिस के मुताबिक 3 सितंबर को अदालत में पेश किए जाने से पहले मेडिकल जांच में मोहनजीत के शरीर पर ताजा चोट के निशान नहीं मिले थे। लेकिन बाद में अस्पताल की मेडिकल-लीगल रिपोर्ट में 10 चोटों का जिक्र हुआ। पुलिस के अनुसार डॉक्टरों ने इन चोटों को मेडिकल जांच से दो से छह घंटे पहले का बताया। मोहनजीत को उसी दिन शाम करीब 4 बजे जमानत मिली और लगभग ढाई घंटे बाद वह संगरूर सिविल अस्पताल में भर्ती हुआ। यही पूरा टाइम-फ्रेम अब जांच का अहम हिस्सा है- चोटें कब लगीं, कैसे लगीं और हिरासत से बाहर आने के बाद क्या हुआ।
पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई ने विवाद को और गंभीर बना दिया!
5 सितंबर को पंजाब पुलिस ने सुनाम के डीएसपी हरविंदर सिंह खैरा का तबादला कर दिया। उन्हें डीएसपी फर्स्ट कमांडो बटालियन, बहादुरगढ़, पटियाला भेजा गया। सुनाम थाने के इंस्पेक्टर प्रतीक जिंदल, चीमा थाने के एसआई बलजीत सिंह और एएसआई हरप्रीत सिंह को संगरूर पुलिस लाइंस भेज दिया गया। डीएसपी का तबादला प्रशासनिक आधार पर बताया गया, लेकिन यह कार्रवाई मोहनजीत मामले पर बढ़ते दबाव के बीच हुई।
विपक्ष को सरकार पर और धड़ाधड़ हमला करने का मौका मिला
डीएसपी का तबादला और तीन अन्य पुलिसकर्मियों को पुलिस लाइंस भेजे जाने के बाद विपक्ष ने इसे जवाबदेही की शुरुआत के बजाय अधूरी कार्रवाई बताया। बीजेपी नेता तरुण चुघ ने कहा कि सिर्फ तबादला जवाबदेही नहीं है और एनएचआरसी की दखल से पूरे मामले की सच्चाई सामने आनी चाहिए। यानी सरकार के सामने अब दोहरा दबाव है- पुलिस के खिलाफ लगे आरोपों की जांच भी और ये भरोसा कायम रखना भी कि मामले को दबाने की कोई कोशिश नहीं हो रही।
एनएचआरसी की एंट्री ने मोहनजीत मामले को और बड़ा कर दिया
बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सांसद तरुण चुघ की शिकायत पर 5 सितंबर को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मामले का संज्ञान लिया। एनएचआरसी सदस्य प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने पंजाब के मुख्य सचिव, डीजीपी, संगरूर के एसपी और जिला मजिस्ट्रेट को जांच कर दो सप्ताह के भीतर बिंदुवार कार्रवाई रिपोर्ट यानी एटीआर देने का निर्देश दिया।
एनएचआरसी ने मोहनजीत की तत्काल मेडिकल-लीगल जांच कराने के साथ संबंधित पुलिस परिसरों की पूरी और बिना एडिट की गई सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने और उसकी प्रमाणित प्रति पेन ड्राइव में देने को कहा है। आयोग ने एफआईआर, हिरासत से जुड़े रिकॉर्ड, पूछताछ और हिरासत में शामिल सभी पुलिसकर्मियों का विवरण तथा परिवार के सदस्यों से जुड़े आरोपों की रिपोर्ट भी मांगी है। इसके अलावा मेडिकल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, पुलिस रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक डेटा और दूसरे संबंधित सबूत सुरक्षित रखने के निर्देश दिए गए हैं।
AAP का कहना है कि घटना दुर्भाग्यपूर्ण, लेकिन आरोप अभी जांच का विषय
AAP के प्रदेश अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री अमन अरोड़ा ने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि इसे टाला जा सकता था। उन्होंने कहा कि संबंधित पुलिसकर्मियों ने प्रताड़ना से इनकार किया है और चोटों की वास्तविक वजह मेडिकल रिपोर्ट से स्पष्ट होगी। यानी सरकार ने एक तरफ जांच का रास्ता खुला रखा है, वहीं कथित प्रताड़ना को अभी स्थापित तथ्य नहीं माना है।
कांग्रेस ने अभियान बनाने की तैयारी शुरू कर दी!
पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने मोहनजीत से मुलाकात की और अस्पताल से राहुल गांधी से उसकी फोन पर बातचीत कराई। इसके बाद वड़िंग ने ऐलान किया कि मुख्यमंत्री भगवंत मान जहां भी जाएंगे, कांग्रेस कार्यकर्ता काले झंडे दिखाकर विरोध करेंगे। यानी कांग्रेस इस घटना को सिर्फ एक पुलिस विवाद नहीं रहने देना चाहती, बल्कि इसे मुख्यमंत्री के खिलाफ राज्यव्यापी पॉलिटिकल मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है।
बीजेपी ने AAP सरकार पर मानवाधिकार और कानून-व्यवस्था का दबाव बढ़ाया
तरुण चुघ की शिकायत पर एनएचआरसी का संज्ञान बीजेपी के लिए पॉलिटिकल तौर पर महत्वपूर्ण है। इसके अलावा बीजेपी के संगरूर जिला-2 अध्यक्ष दमन बाजवा ने भी काला झंडा लेकर कैबिनेट मंत्री अमन अरोड़ा के घर के बाहर प्रदर्शन किया। बीजेपी ने सवाल उठाया कि अगर काला झंडा दिखाकर सवाल पूछना अपराध नहीं है तो प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई क्यों होनी चाहिए।
अकाली दल ने भी विवाद को पंथक पॉलिटिक्स से जोड़ दिया
अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल और वरिष्ठ अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया मोहनजीत से मिलने अस्पताल पहुंचे। मजीठिया ने भी काला झंडा लेकर वहां पहुंचकर सरकार के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया। इससे अकाली दल को AAP के खिलाफ ड्रग्स, पुलिस कार्रवाई और पंथक सम्मान- तीनों सवालों को एक साथ उठाने का मौका मिला है।
अकाल तख्त के जत्थेदार के रिएक्शन ने मामले का पंथक दायरा और बढ़ा दिया
अकाल तख्त के कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज ने काला झंडा दिखाने को लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार बताया और पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने मोहनजीत के केश और ककारों के कथित अपमान का मुद्दा भी उठाया और संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
एसजीपीसी ने भी विवाद को सिख धार्मिक भावनाओं से जुड़े सवाल में बदल दिया
एसजीपीसी ने भी मोहनजीत के साथ कथित दुर्व्यवहार और केश-ककारों के कथित अपमान की निंदा की तथा प्रतिनिधिमंडल भेजकर उससे मुलाकात की। इससे मामले का दायरा सिर्फ पुलिस और सरकार के बीच विवाद तक सीमित नहीं रहा। अब यह पंथक संस्थाओं की निगाह में भी है, जो पंजाब की पॉलिटिक्स में किसी भी सरकार के लिए बेहद संवेदनशील इलाका है।
AAP के लिए असली पॉलिटिकल खतरा साझा विपक्षी नैरेटिव है
मोहनजीत किसी राजनीतिक दल का घोषित चेहरा नहीं है। यही बात इस पूरे मामले को अलग बनाती है। एक स्थानीय शख्स ने मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में ड्रग्स पर सवाल उठाया, उसके बाद पुलिस कार्रवाई पर आरोप लगे और कुछ ही दिनों में कांग्रेस, बीजेपी, अकाली दल और पंथक नेतृत्व अलग-अलग स्तर पर उसी मामले में सरकार से जवाब मांगने लगे। अगर ये सिलसिला आगे बढ़ता है तो विपक्ष के लिए एक ऐसा साझा मुद्दा तैयार हो सकता है, जिसमें अलग-अलग राजनीतिक दल अपने-अपने हितों के बावजूद AAP सरकार पर एक ही दिशा से दबाव बना सकें।
“वॉर अगेंस्ट ड्रग्स” का मुद्दा AAP के लिए संवेदनशील
AAP सरकार के लिए ड्रग्स के खिलाफ मुहिम सिर्फ कानून-व्यवस्था की कार्रवाई नहीं बल्कि उसके शासन का बड़ा राजनीतिक दावा है। ऐसे में मोहनजीत का विरोध और उसके बाद का विवाद सीधे उसी दावे के बीच पैदा हुआ है। विपक्ष अब ये सवाल उठा रहा है कि अगर सरकार वास्तव में ड्रग्स के खिलाफ जनता को साथ लेकर लड़ रही है तो ड्रग्स की उपलब्धता पर सवाल उठाने वाले शख्स के साथ पुलिस हिरासत में क्या हुआ। यही विरोधाभास इस मामले को सामान्य पुलिस विवाद से बड़ा बना रहा है।
मोहनजीत की क्रिमिनल हिस्ट्री सरकार के बचाव का आधार, लेकिन हिरासत में कथित ज्यादती का जवाब अलग!
पुलिस द्वारा बताए गए आठ एफआईआर और पॉजिटिव डोप टेस्ट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन यहां दो सवाल अलग हैं- पहला, मोहनजीत को हिरासत में लेने की वजह क्या थी; दूसरा, हिरासत के दौरान उसके साथ कानून के मुताबिक व्यवहार हुआ या नहीं। पुराने मुकदमे पहले सवाल के जवाब में महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन दूसरे सवाल का जवाब जांच और सबूतों से ही मिलेगा। यही फर्क इस पूरे मामले को समझने में सबसे जरूरी है।
कांग्रेस के काले झंडे वाले अभियान की असली परीक्षा बाकी
कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के खिलाफ काले झंडे के विरोध की घोषणा करके पॉलिटिकल लड़ाई का अगला चरण तय करने की कोशिश की है। लेकिन सिर्फ विरोध प्रदर्शन से कोई मामला स्थायी चुनावी मुद्दा नहीं बनता। कांग्रेस को इसे ड्रग्स की उपलब्धता, परिवारों की परेशानी, पुलिस जवाबदेही और सरकार के दावों से लगातार जोड़ना होगा। अगर ऐसा होता है तो मोहनजीत एपिसोड AAP के खिलाफ व्यापक नैरेटिव का हिस्सा बन सकता है; अगर नहीं, तो ये कुछ दिनों की पॉलिटिकल हलचल तक सीमित रह सकता है।
बीजेपी और अकाली दल के लिए ये मामला AAP के खिलाफ जमीन तैयार करने का मौका!
बीजेपी इसे मानवाधिकार और कानून-व्यवस्था के सवाल से जोड़ रही है, जबकि अकाली दल के लिए इसमें ड्रग्स के साथ पंथक और धार्मिक सम्मान का पहलू भी जुड़ गया है। दोनों दलों के राजनीतिक लक्ष्य अलग हैं, लेकिन फिलहाल सरकार के खिलाफ सवाल एक ही मामले से निकल रहे हैं। यही विपक्षी समानता AAP के लिए चिंता का कारण हो सकती है।
मोहनजीत मामला AAP की “वॉर अगेंस्ट ड्रग्स” की राजनीतिक साख का नया टेस्ट!
संगरूर के इस मामले ने AAP सरकार के सामने एक असहज राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है- जिस सरकार ने ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई को अपनी बड़ी प्राथमिकता बनाया, उसी मुहिम के दौरान ड्रग्स के मुद्दे पर सवाल उठाने वाला एक ग्रामीण पुलिस कार्रवाई और कथित हिरासत की ज्यादती का केंद्र कैसे बन गया। अब सरकार के पास इस सवाल का सबसे मजबूत जवाब बयान नहीं बल्कि पारदर्शी जांच और उसके निष्कर्ष होंगे।
विपक्ष ने अपना नैरेटिव तैयार कर लिया है!
मोहनजीत एपिसोड में अभी तीन चीजें साथ-साथ चल रही हैं- पुलिस की विभागीय जांच, एनएचआरसी की जांच और राजनीतिक-पंथक दबाव। अगर आरोपों की पुष्टि होती है तो AAP के खिलाफ ये मामला ड्रग्स, पुलिस और लोकतांत्रिक विरोध के सवालों को एक साथ जोड़ सकता है। अगर आरोप साबित नहीं होते तो सरकार इसी जांच को अपने बचाव का आधार बना सकती है। लेकिन इतना तय है कि 2 सितंबर को शेरों की एक छत से दिखाया गया काला झंडा अब सिर्फ एक विरोध का प्रतीक नहीं रहा- ये भगवंत मान सरकार की “वॉर अगेंस्ट ड्रग्स” की राजनीतिक साख का टेस्ट बन चुका है।

