अगर यह वोट कांग्रेस, अकाली दल, भाजपा, निर्दलीय, पंथक और BSP के बीच बंट गया तो पंजाब का चुनाव एक बड़े पॉलिटिकल कोलिजन में बदल सकता है।

आरके सेठी
चंडीगढ़, 5 सितम्बर।
पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव का शुरुआती बड़ा राजनीतिक संकेत किसान आंदोलन के रूप में उभरता दिख रहा है। लेकिन असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इससे भाजपा और AAP को कितना नुकसान होगा। बड़ा सवाल यह है कि अगर AAP विरोधी वोट बढ़ता है तो वह जाएगा किसके खाते में? कांग्रेस, अकाली दल, भाजपा, निर्दलीय, पंथक राजनीति या फिर कई हिस्सों में बंटकर पूरा चुनावी गणित ही बदल देगा?
मांगें MSP से आगे निकल चुकी हैं
संयुक्त किसान मोर्चा के 32 संगठनों का चंडीगढ़-मोहाली सीमा पर मोर्चा चल रहा है। किसान मजदूर मोर्चा ने 22 जिलों में प्रदर्शन किए हैं और भारतीय किसान यूनियन एकता उगराहां भी अलग-अलग जिलों में सक्रिय है। MSP की कानूनी गारंटी और कर्जमाफी से लेकर गन्ने का भाव, ग्रामीण मजदूरों की पेंशन, वैकल्पिक फसलों की खरीद, पानी, बिजली, जमीन और व्यापार समझौतों तक कई मुद्दे आंदोलन में शामिल हैं। यानी ग्रामीण पंजाब की नाराजगी का दायरा सिर्फ धान और MSP तक सीमित नहीं है।
किसान आंदोलन एक वोट बैंक नहीं है
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसान आंदोलन को एकमुश्त चुनावी वोट बैंक मानना सही नहीं होगा। अलग-अलग किसान संगठन अलग मोर्चों पर सक्रिय हैं और उनकी रणनीति भी पूरी तरह एक जैसी नहीं है। किसान, खेत मजदूर और ग्रामीण समाज के दूसरे वर्गों के हित भी हर मुद्दे पर समान नहीं हैं। इसलिए आंदोलन मजबूत होने का मतलब यह जरूरी नहीं कि पूरा ग्रामीण वोट किसी एक पार्टी के साथ चला जाएगा।
2022 की 92 सीटों वाली AAP और 2024 का बदला चुनावी नक्शा
2022 में AAP ने 117 में से 92 विधानसभा सीटें जीती थीं। लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव के विधानसभा क्षेत्रवार रुझानों में कांग्रेस 37, AAP 33, भाजपा 23, निर्दलीय 15 और SAD 9 क्षेत्रों में आगे रहे। इसे 2027 का पूर्वानुमान नहीं माना जा सकता, लेकिन इतना जरूर साफ है कि 2022 का राजनीतिक नक्शा स्थिर नहीं रहा।
यहीं से शुरू होता है राजनीतिक टकराव
2024 ने यह संकेत दिया कि AAP के पुराने मजबूत इलाकों में वैकल्पिक राजनीतिक ताकतें जगह बना सकती हैं। अब अगर किसान असंतोष के साथ कांग्रेस, SAD, भाजपा और पंथक-निर्दलीय विकल्प सक्रिय होते हैं तो मुकाबला दो दलों के बीच नहीं रहेगा। कई सीटों पर असली लड़ाई यह होगी कि AAP विरोधी वोट कितने हिस्सों में टूटता है।
मालवा में सबसे बड़ा सवाल निर्दलीय उछाल का है
धर्मकोट में 2024 के लोकसभा विधानसभा-सेगमेंट मुकाबले में निर्दलीय उम्मीदवार ने AAP को केवल 561 वोटों से पीछे छोड़ा। मोगा में अंतर करीब 2,079 रहा, जबकि निहाल सिंहवाला में निर्दलीय बढ़त 21,677 वोट तक पहुंची। बाघापुराना में यह अंतर 11,664 और रामपुराफूल में 18,066 वोट रहा। ये ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक दलों के बाहर पैदा हुई राजनीतिक जगह का संकेत हैं।
धर्मकोट और मोगा में AAP के सामने बहुकोणीय चुनौती
धरमकोट और मोगा जैसे इलाकों में AAP का पुराना आधार, किसान असंतोष और निर्दलीय-पंथक राजनीति एक साथ दिखाई दे सकती है। अगर कांग्रेस और SAD भी मजबूत उम्मीदवार उतारते हैं तो AAP की कमजोरी का फायदा किसी एक विरोधी को मिलना जरूरी नहीं होगा। यही वोट फ्रैगमेंटेशन 2027 का सबसे महत्वपूर्ण चुनावी गणित बन सकता है।
निहाल सिंहवाला और जगराओं दो अलग रास्ते दिखाते हैं
निहाल सिंह वाला में 2024 का बड़ा निर्दलीय उछाल दिखाता है कि AAP विरोधी वोट पारंपरिक दलों से बाहर भी जा सकता है। दूसरी तरफ जगराओं में कांग्रेस ने AAP पर 8,989 वोट की बढ़त बनाई। यानी एक जगह विरोधी वोट निर्दलीय की तरफ गया, दूसरी जगह कांग्रेस की तरफ। यही अंतर पूरे पंजाब में सीट-दर-सीट अलग परिणाम पैदा कर सकता है।
लम्बी में SAD की वापसी का संकेत साफ दिखा
SAD के लिए भी तस्वीर बदल रही है। लम्बी में 2024 में SAD ने AAP पर 23,264 वोट की बढ़त हासिल की। मलोट में दोनों के बीच अंतर केवल 839 वोट रहा और फिरोजपुर रूरल में SAD लगभग 1,695 वोट से आगे रही। यानी AAP से नाराज ग्रामीण मतदाता हर जगह कांग्रेस की ओर नहीं जा रहा; कुछ इलाकों में अकाली दल भी वापसी की जमीन बना रहा है।
मौड़ में 252 वोट का अंतर बड़ी चेतावनी है
मौड़ बेहद करीबी मुकाबले की चेतावनी देता है। 2024 में AAP और SAD के बीच सिर्फ 252 वोट का अंतर था। ऐसी सीट पर किसान आंदोलन, उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ या किसी तीसरे उम्मीदवार का कुछ हजार वोट हासिल करना पूरा समीकरण बदल सकता है।
कांग्रेस के सामने अवसर भी है और चुनौती भी
कांग्रेस के लिए किसान असंतोष बड़ा अवसर है, लेकिन यह अवसर अपने आप वोट में नहीं बदलेगा। 2024 में कांग्रेस 37 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही और जगराओं, दाखा समेत कई ग्रामीण इलाकों में उसने AAP को चुनौती दी। लेकिन पंजाब कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक खींचतान और नेतृत्व संबंधी बदलाव की कवायद जारी है। इसलिए कांग्रेस के सामने सवाल केवल AAP की कमजोरी का फायदा उठाने का नहीं, बल्कि उस लाभ को बूथ स्तर के संगठन और सही उम्मीदवार में बदलने का है।
SAD के सामने पुराने ग्रामीण नेटवर्क को फिर जगाने की चुनौती
SAD के लिए किसान राजनीति पुराने ग्रामीण नेटवर्क को फिर सक्रिय करने का अवसर है। किसान आंदोलन के कई मुद्दे उसके पारंपरिक राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े हैं, लेकिन 2022 की हार के बाद उसे यह साबित करना होगा कि ग्रामीण असंतोष वास्तव में अकाली वोट में बदल सकता है। लम्बी, मलौट, फिरोजपुर रूरल, बठिंडा रूरल और राल्वंदी साबो जैसे इलाके इस कोशिश की परीक्षा बन सकते हैं।
भाजपा के सामने किसान नाराजगी और नए सामाजिक आधार की दोहरी चुनौती
भाजपा के लिए 2027 का सवाल दोहरा होगा- किसान नाराजगी कितनी रोकती है और गैर-किसान समर्थन कितना उसकी भरपाई करता है। शहरी हिंदू मतदाता, व्यापारी वर्ग, संगठनात्मक विस्तार और नया सिख संपर्क कुछ सीटों पर भाजपा को अलग आधार दे सकते हैं। इसलिए भाजपा के मामले में भी “किसान आंदोलन यानी भाजपा का नुकसान” वाला सीधा फार्मूला काम नहीं करेगा।
पंथक राजनीति AAP विरोधी वोट का नया रास्ता खोल सकती है
पंथक राजनीति इस पूरे समीकरण में चौथा रास्ता खोल सकती है। वारिस पंजाब दे की सक्रियता और अमृतपाल सिंह को लेकर चल रही राजनीतिक चर्चा खासकर मालवा में AAP के पुराने आधार के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन पंथक भावना, सिख धार्मिक मुद्दे और किसी संगठन को वोट- इन तीनों को एक ही चीज मानना भी सही नहीं होगा।
यही वजह है कि वारिस पंजाब दे को केवल सीट जीतने की क्षमता से नहीं मापना चाहिए। असली सवाल यह भी है कि वह किस पार्टी का कितना वोट काट सकता है। अगर किसी सीट पर वह AAP का महत्वपूर्ण हिस्सा काटता है लेकिन कांग्रेस या SAD को बहुत कम नुकसान पहुंचाता है तो उसका चुनावी प्रभाव उसकी अपनी जीत से कहीं बड़ा हो सकता है।
BSP कई सीटों पर नतीजे का अंतर बदल सकती है
BSP का अकेले चुनाव लड़ना भी इसी तरह मार्जिन बदलने वाला कारक बन सकता है। पंजाब में SC आबादी करीब 32 प्रतिशत है और 34 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं। लेकिन पूरे SC मतदाता को BSP का निश्चित वोट मानना गलत होगा, लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि BSP कितनी सीटों पर कुछ हजार वोट लेकर मुख्य मुकाबले का अंतर बदलती है।
कर्मचारी असंतोष AAP के लिए दूसरा दबाव बन सकता है
किसानों के बाद अब सरकारी कर्मचारी भी सरकार के सामने बड़ा दबाव बना रहे हैं। करीब 85 हजार कर्मचारियों का डीए 42 से बढ़ाकर 60 प्रतिशत करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है, लेकिन तीन लाख से अधिक कर्मचारी लंबित डीए किस्तों और एरियर को लेकर अभी भी आंदोलन की तैयारी में हैं। 8 सितंबर के सामूहिक अवकाश का ऐलान इस असंतोष को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना रहा है।
नशा और युवा ग्रामीण नाराजगी की अलग रेखा हैं
युवा और नशे का मुद्दा खासकर मालवा में अलग राजनीतिक रेखा खींच सकता है। संगरूर के शेरों में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के दौरान काला झंडा दिखाने के बाद पुलिस कार्रवाई को लेकर उठा विवाद बताता है कि ग्रामीण असंतोष केवल खेती के मुद्दों तक सीमित नहीं है। नशा, युवा, पुलिस जवाबदेही और स्थानीय शासन जैसे मुद्दे भी कई क्षेत्रों में चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं।
सबसे बड़ा भ्रम- AAP विरोधी वोट सीधे कांग्रेस को मिलेगा
यही वह धारणा है जिसे 2027 का चुनाव सबसे पहले चुनौती दे सकता है। AAP से निकलने वाला वोट कांग्रेस, SAD, भाजपा, निर्दलीय, पंथक विकल्प या BSP में बंट सकता है। कुछ मतदाता मतदान से दूर भी रह सकते हैं। यही वोट ट्रांसफर और वोट फ्रैगमेंटेशन के बीच का फर्क है।
यही पंजाब की 2027 की सबसे बड़ी चुनावी पहेली बन सकती है। अगर AAP विरोधी वोट एक उम्मीदवार के पीछे जमा हुआ तो मुकाबला सीधा होगा और सत्ता परिवर्तन की संभावना मजबूत होगी। लेकिन अगर वही वोट कई राजनीतिक धाराओं में बंट गया तो AAP कमजोर होकर भी कई सीटें बचा सकती है। दूसरी तरफ 25 से 30 प्रतिशत वोट वाला उम्मीदवार भी जीत सकता है, यदि बाकी वोट कई हिस्सों में बंट जाएं।
किसान आंदोलन से बड़ा सवाल वोट का बिखराव
2027 की कहानी इसलिए यह नहीं है कि किसान आंदोलन से किस पार्टी को फायदा होगा। असली कहानी यह है कि अगर किसान असंतोष AAP के खिलाफ जमीन बनाता है तो क्या वह जमीन किसी एक विपक्षी पार्टी को मिलेगी या कई राजनीतिक ताकतें उसी जमीन के लिए एक-दूसरे से लड़ेंगी।
117 सीटों पर अलग-अलग पॉलिटिकल कोलिजन
पंजाब 2027 में असली मुकाबला केवल सत्ता-विरोधी लहर का नहीं होगा। असली सवाल यह होगा कि किसान, खेत मजदूर, युवा, कर्मचारी, एससी मतदाता, पंथक मतदाता और पारंपरिक राजनीतिक समर्थक किस दिशा में जाते हैं। जहां ये धाराएं एक साथ आएंगी वहां सत्ता परिवर्तन का रास्ता खुल सकता है, लेकिन जहां ये अलग-अलग दिशाओं में बंटेंगी वहां AAP कमजोर होकर भी सीट बचा सकती है।
चुनौती नहीं, एक बड़ा चुनावी सवाल!
किसान आंदोलन ने सिर्फ भाजपा और AAP के सामने चुनौती नहीं खड़ी की है। उसने 117 सीटों पर एक बड़ा चुनावी सवाल खड़ा कर दिया है- AAP विरोधी वोट आखिर किसके खाते में जाएगा? अगर यह वोट एक जगह जमा हुआ तो 2027 का मुकाबला सत्ता परिवर्तन की तरफ तेजी से जा सकता है। लेकिन अगर यही वोट कांग्रेस, अकाली दल, भाजपा, निर्दलीय, पंथक और BSP के बीच बंट गया तो पंजाब का चुनाव एक बड़े पॉलिटिकल कोलिजन में बदल सकता है।

