पांच करोड़ के बदले रेप केस ख़त्म करने के आरोप का विवाद हाईकोर्ट से होता हुआ अब मानवाधिकार आयोग तक जा पहुंचा है. रिटायर्ड जस्टिस के खिलाफ सीएम की पत्नी ने भी भेजा लीगल नोटिस
आम आदमी पार्टी सरकार डिफेंसिव, शिरोमणि अकाली दल ने सीबीआई जांच की मांग की, कांग्रेस ने कहा- सीएम स्पष्टीकरण दें, बीजेपी ने माँगा भगवंत मान का इस्तीफा ….मुख्यमंत्री फिलहाल ख़ामोश!

आरके सेठी
चंडीगढ़, 23 अगस्त.
अमृतसर के एक रेप केस की एफआईआर से शुरू हुई कहानी अब पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के परिवार, पुलिस जांच, हाईकोर्ट, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और 2027 की चुनावी सियासत तक पहुंच चुकी है. आरोप है कि एफआईआर रद्द कराने के लिए पांच करोड़ की मांग की गई और इस आरोप की कड़ी में मुख्यमंत्री की पत्नी डॉ. गुरप्रीत कौर का नाम आया. हाईकोर्ट ने 20 जुलाई को मामले की जांच लोकल पुलिस से हटाकर ऐसे सीनियर पुलिस ऑफिसर को सौंपने का आदेश दिया जो पहले जांच से जुड़ा नहीं था.
रिटायर्ड जज रंजीत सिंह ने हाईकोर्ट की कार्यवाही का हवाला दे कर प्रेस कांफ्रेंस के जरिये यह मामला सार्वजनिक किया था. सीएम की पत्नी डॉ. गुरप्रीत कौर ने अब उन्हें लीगल नोटिस भेज दिया है. एनएचआरसी ने पंजाब के मुख्य सचिव और डीजीपी को नोटी जारी कर दो सप्ताह में कार्रवाई रिपोर्ट मांग ली है. मजीठिया ने सीबीआई जांच की मांग कर दी और कांग्रेस-बीजेपी ने मुख्यमंत्री से जवाब मांगा. इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल अब यही है- मुख्यमंत्री भगवंत मान खुद इस मामले पर कब बोलेंगे?
पंजाब की राजनीति में आरोप लगते रहे हैं, सरकारें घिरती रही हैं और विपक्ष भी सत्ता पर निशाना साधता रहा है. लेकिन किसी मौजूदा मुख्यमंत्री की पत्नी का नाम एक रेप केस को कथित तौर पर खत्म कराने के लिए करोड़ों रुपये की मांग के आरोप से जुड़ जाए, तो मामला सामान्य राजनीतिक विवाद नहीं रह जाता. यहां मामला सिर्फ पांच करोड़ का नहीं है. मामला यह है कि एक युवती के अपहरण और रेप की एफआईआर से शुरू हुई जांच के बीच राजनीतिक प्रभाव, पुलिस पर कथित दबाव, एफआईआर रद्द कराने की कथित कोशिश और मुख्यमंत्री के परिवार का नाम एक ही कहानी में कैसे आ गया. यही वह सवाल है जिसने अब पंजाब की सियासत को हिला दिया है.
29 अप्रैल से शुरू हुई कहानी
29 अप्रैल को अमृतसर में एक युवती के अपहरण और रेप के आरोप में एफआईआर दर्ज हुई. 1 मई को युवती बरामद हुई और 13 मई को मोहाली निवासी गुरिंदर सिंह उर्फ गूरी चहल को गिरफ्तार किया गया. पीड़ित पिता ने 30 जून को हाईकोर्ट में दाखिल अपनी याचिका में आरोप लगाया कि चहल ने उनकी बेटी को शादी का भरोसा दिया, उसके साथ रेप किया, उसकी निजी तस्वीरें हासिल कीं और बाद में उन्हीं तस्वीरों के जरिए उसे ब्लैकमेल किया. दूसरी तरफ राज्य की ओर से हाईकोर्ट में यह कहा गया कि लड़की और चहल के बीच लिव-इन संबंध था और विवाद मुख्यतः शादी के वादे से जुड़ा था. यानी मूल आपराधिक मामले में शुरुआत से ही दोनों पक्षों के दावे एक-दूसरे के बिल्कुल उलट थे. चहल की गिरफ्तारी के बाद मामला खत्म नहीं हुआ. उलटे पुलिस जांच पर सवाल उठने लगे. यहीं से रेप केस की कहानी धीरे-धीरे उस विवाद में बदलती गई, जिसका अगला पड़ाव हाईकोर्ट बना.
24 मई और 9 जून ने खोली दूसरी कड़ी
इस मामले में 24 मई की एक शिकायत का भी जिक्र हुआ. चहल के पक्ष से हाईकोर्ट पहुंचे सिमरनजीत सिंह हुंदल ने दावा किया कि मोहाली के एसएसपी को शिकायत दी गई थी, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई. हुंदल ने यह भी आरोप लगाया कि चहल के खिलाफ मोहाली में भी मामला दर्ज है और अमरदीप सिंह ग्रेवाल झूठे रेप केस दर्ज करवाने और बाद में उन्हें खत्म कराने के नाम पर पैसे वसूलने के काम में लगे हैं. 9 जून को हुंदल ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की. उसने अपने और चहल के लिए जान-माल की सुरक्षा की मांग की और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री सुरक्षित रखने की भी गुहार लगाई. उसकी याचिका में कथित वसूली, आपराधिक धमकी, राजनीतिक प्रभाव और सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल जैसे गंभीर आरोप लगाए गए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस याचिका में ग्रेवाल को मुख्यमंत्री की पत्नी से कथित रूप से करीबी तौर पर जुड़ा व्यक्ति बताया गया और आरोप लगाया गया कि इसी प्रभाव का इस्तेमाल चहल के खिलाफ मामले को खत्म कराने के लिए किया जा रहा है. यहीं से इस कहानी की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक कड़ी बनती है- गूरी चहल से जुड़ा रेप केस, सिमरनजीत सिंह हुंदल की याचिका, अमरदीप सिंह ग्रेवाल का नाम और मुख्यमंत्री की पत्नी से कथित संपर्क.
30 जून को पीड़ित पिता भी हाईकोर्ट पहुंचे
30 जून को 55 वर्षीय पीड़ित पिता ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की. उन्होंने पुलिस की जांच को निष्पक्ष नहीं बताया और मामले को सीबीआई को सौंपने की मांग की. इस याचिका में सिमरनजीत सिंह हुंदल और अमरदीप सिंह ग्रेवाल को भी प्रतिवादी बनाया गया. सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि पिता की याचिका में हुंदल की 9 जून वाली याचिका भी शामिल थी. यानी मुख्यमंत्री की पत्नी के कथित हस्तक्षेप और चार-पांच करोड़ रुपये की कथित मांग का आरोप अब एक ही दस्तावेज में नहीं था. दो अलग-अलग याचिकाओं में यह विवाद अदालत के सामने आ चुका था. यही तथ्य आगे चलकर 20 जुलाई के हाईकोर्ट आदेश का महत्वपूर्ण हिस्सा बना.
20 जुलाई: हाईकोर्ट ने जांच बदल दी
20 जुलाई को जस्टिस मनदीप पन्नू ने मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया. हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच की मांग स्वीकार नहीं की, लेकिन जांच को स्थानीय पुलिस की मौजूदा व्यवस्था से हटाकर स्पेशल डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस की निगरानी में करने का आर्डर दिया. एसडीजीपी को ऐसे सीनियर पुलिस ऑफिसर को जांच सौंपने को कहा गया जो पहले इस मामले की जांच से किसी भी स्तर पर जुड़ा न रहा हो. यानी अदालत ने सीबीआई को जांच नहीं दी, लेकिन यह भी नहीं कहा कि स्थानीय जांच उसी तरीके से चलती रहे. अदालत ने जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए जांच अधिकारी बदलने और वरिष्ठ स्तर की निगरानी का रास्ता चुना. हाईकोर्ट ने अपने आदेश में दर्ज किया कि याचिकाओं में मुख्यमंत्री की पत्नी के कथित हस्तक्षेप और एफआईआर रद्द कराने के लिए चार-पांच करोड़ रुपये की कथित मांग का उल्लेख था. कोर्ट की कार्यवाही में यह बात भी सामने आई कि इन आरोपों के समर्थन में बैठकों की तस्वीरों और बातचीत के प्रतिलेखों का हवाला था.
पांच करोड़ रुपये की कहानी आखिर सामने कैसे आई?
यहीं से विवाद का सबसे विस्फोटक हिस्सा सामने आता है. हुंदल की याचिका में यह आरोप था कि ग्रेवाल मामले को खत्म कराने के लिए करोड़ों रुपये की मांग कर रहे थे. इसी याचिका के संदर्भ में मुख्यमंत्री की पत्नी के नाम से पांच करोड़ की कथित मांग का आरोप सामने आया. पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज रंजीत सिंह ने बाद में 18 अगस्त को चंडीगढ़ में प्रेस कांफ्रेंस करके इसी आरोप को सार्वजनिक किया. उनका कहना था कि वह अपनी तरफ से यह आरोप नहीं लगा रहे हैं, बल्कि यह हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में मौजूद है और याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने संबंधित सामग्री भी पेश की थी. यानी पांच करोड़ वाला आरोप किसी पॉलिटिकल स्टेज पर पहली बार पैदा नहीं हुआ. उसका संदर्भ हाईकोर्ट की कार्यवाही में मौजूद था और हाईकोर्ट ने अपने 20 जुलाई के आदेश में भी इस आरोप का उल्लेख किया. यही कारण है कि यह विवाद अचानक इतना बड़ा हो गया.
ग्रेवाल क्यों बने सबसे अहम नाम?
अमरदीप सिंह ग्रेवाल की भूमिका इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से है. हाईकोर्ट की कार्यवाही से संबंधित सामग्री में उन्हें मुख्यमंत्री की पत्नी से कथित रूप से करीबी तौर पर जुड़ा बताया गया. आरोप यह है कि इसी कथित संपर्क और प्रभाव का इस्तेमाल करके रेप केस की एफआईआर रद्द कराने की कोशिश की जा रही थी. हुंदल की याचिका में ग्रेवाल पर इससे भी गंभीर आरोप लगाए गए- कि वह झूठे रेप केस दर्ज करवाकर बाद में उन्हें दबाने के नाम पर पैसे वसूलने के काम में लगे हैं. इन आरोपों की जांच होनी है. लेकिन राजनीतिक रूप से ग्रेवाल का महत्व इसी में है कि उनका नाम इस विवाद में वह कड़ी बनकर आया, जिसके जरिए मुख्यमंत्री की पत्नी का नाम मूल रेप केस से जोड़ा गया. इसलिए जांच के सबसे महत्वपूर्ण सवालों में एक यह भी है कि ग्रेवाल और मुख्यमंत्री परिवार के बीच वास्तविक संपर्क क्या था और क्या इस संपर्क का इस्तेमाल इस मामले में किया गया.
गुरप्रीत कौर पर आरोप इतना बड़ा क्यों है?
डॉ. गुरप्रीत कौर पेशे से डॉक्टर हैं और भगवंत मान से विवाह के बाद उनकी सार्वजनिक मौजूदगी लगातार बढ़ी है. धूरी विधानसभा क्षेत्र में उनकी सक्रियता दिखाई दी. 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने आम आदमी पार्टी के लिए प्रचार किया और 2025 के उपचुनावों में भी पार्टी के उम्मीदवारों के लिए प्रचार करती दिखाई दीं. यानी पंजाब की राजनीति में वह केवल मुख्यमंत्री की निजी जिंदगी का हिस्सा नहीं हैं. वह आम आदमी पार्टी के चुनावी अभियान का सार्वजनिक चेहरा भी बन चुकी हैं. इसीलिए उनके नाम को किसी रेप केस को खत्म कराने के लिए करोड़ों रुपये की कथित मांग से जोड़ने वाला आरोप सीधे मुख्यमंत्री की राजनीतिक विश्वसनीयता को प्रभावित करता है. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि गुरप्रीत कौर के नाम का इस्तेमाल किसने किया. सवाल यह भी है कि किस आधार पर किसी व्यक्ति ने मुख्यमंत्री की पत्नी के नाम और कथित प्रभाव को इस तरह इस्तेमाल करने का दावा किया.
रंजीत सिंह ने आरोप सार्वजनिक किए, गुरप्रीत कौर ने नोटिस भेज दिया
रिटायर्ड जज रंजीत सिंह के सार्वजनिक बयान के बाद मामला तेजी से राजनीतिक बहस में आया. उन्होंने पांच करोड़ की कथित मांग का जिक्र करते हुए कहा कि यह आरोप हाईकोर्ट की याचिका में मौजूद है. इसके बाद गुरप्रीत कौर की ओर से उन्हें कानूनी नोटिस भेजा गया. नोटिस में आरोपों को गलत बताया गया तथा 24 घंटे में जवाब और माफी की मांग की गई. ऐसा न करने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई. रंजीत सिंह ने कहा कि नोटिस मिलने पर वह उसका जवाब देंगे. अब विवाद की एक कानूनी लड़ाई भी शुरू हो चुकी है- एक तरफ हाईकोर्ट में दर्ज आरोपों का रिकॉर्ड और दूसरी तरफ मुख्यमंत्री की पत्नी की ओर से आरोप लगाने वाले रिटायर्ड जज को लीगल नोटिस.
एनएचआरसी की एंट्री ने मामला पलट दिया
22 अगस्त को लीगल राइट्स ऑब्जर्वेटरी की शिकायत पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यानी एनएचआरसी ने संज्ञान लिया. आयोग ने पंजाब के मुख्य सचिव और डीजीपी को आरोपों की जांच करने और दो सप्ताह के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट देने को कहा. आयोग ने मामले को केंद्रीय गृह मंत्रालय की वुमन सेफ्टी डिवीजन को भी भेजा. एनएचआरसी सदस्य प्रियंक कानूनगो ने इसे गंभीर मामला बताया. यहीं से विवाद की गंभीरता एक और स्तर ऊपर चली गई. अब यह केवल मुख्यमंत्री की पत्नी और एक रिटायर्ड जज के बीच आरोप-प्रत्यारोप नहीं है. अब पंजाब सरकार की प्रशासनिक और पुलिस मशीनरी को इस मामले पर रिपोर्ट देनी है. और जिस मामले में मुख्यमंत्री की पत्नी का नाम आया है, उसी मामले में राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी से रिपोर्ट मांगी गई है. यही असली सियासी विस्फोट है.
मजीठिया ने मांगी सीबीआई जांच
अकाली दल के वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने इस मामले को और आक्रामक राजनीतिक मोड़ दे दिया. उन्होंने सीबीआई जांच की मांग की और सवाल उठाया कि जब एनएचआरसी ने आरोपों पर संज्ञान लेकर मुख्य सचिव और डीजीपी से रिपोर्ट मांग ली है, तो जांच सीबीआई को क्यों नहीं सौंपी जाती. मजीठिया ने यह भी आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री की पत्नी के करीब बताए जा रहे एक व्यक्ति ने रेप केस के आरोपी से पांच करोड़ रुपये की मांग की.
कांग्रेस का निशाना अब मुख्यमंत्री पर
कांग्रेस के लिए यह मामला बेहद राजनीतिक महत्व का है. पार्टी का हमला सिर्फ गुरप्रीत कौर पर नहीं है. सवाल अब मुख्यमंत्री भगवंत मान की जवाबदेही का है. पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने मुख्यमंत्री से स्पष्टीकरण की मांग की है. कांग्रेस का तर्क है कि जब एनएचआरसी ने मामले पर संज्ञान लिया है और राज्य की मशीनरी से रिपोर्ट मांगी है, तो मुख्यमंत्री को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए. पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने सीबीआई जांच की मान की है. यानी कांग्रेस इस कहानी को “पत्नी पर आरोप” से “मुख्यमंत्री की जवाबदेही” में बदलना चाहती है.
बीजेपी भी सीधे भगवंत मान को घेर रही है
बीजेपी ने भी आरोपों को लेकर मुख्यमंत्री पर हमला तेज किया है और भगवंत मान से जवाब मांगने के साथ उनके इस्तीफे की मांग तक उठाई है. बीजेपी के लिए यह मामला आम आदमी पार्टी के उस राजनीतिक दावे पर हमला करने का मौका है, जिसमें भ्रष्टाचार विरोधी राजनीति और साफ-सुथरे शासन को उसकी पहचान बताया जाता है. सीनियर बीजेपी लीडर मनोरंजन कालिया ने भगवंत मान की इस्तीफे की मांग की है जबकि इकबाल सिंह लालपुरा ने कहा कि इस मामले की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए. विपक्ष का सवाल सीधा है- अगर मुख्यमंत्री की पत्नी के नाम से किसी रेप केस को खत्म कराने के लिए करोड़ों रुपये की मांग का आरोप सामने आता है, तो सरकार इसकी तह तक जाने के लिए क्या कर रही है?
आप का बचाव- राजनीतिक साजिश
आम आदमी पार्टी ने आरोपों को बेबुनियाद और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है. पार्टी ने रंजीत सिंह के कांग्रेस विधायक सुखपाल सिंह खैरा से पारिवारिक संबंध को भी राजनीतिक बहस में उठाया है. आम आदमी पार्टी के मीडिया इंचार्ज बलतेज सिंह पन्नू ने आरोपों को विपक्ष की राजनीतिक कीचड़ उछालने की कोशिश बताया, जबकि आप विधायक कौर ने मुख्यमंत्री की पत्नी पर लगाए गए आरोपों को बेबुनियाद और राजनीतिक रूप से प्रेरित करार दिया. पार्टी का कहना है कि विपक्ष के पास सरकार के काम का जवाब नहीं है, इसलिए वह मुख्यमंत्री और उनके परिवार को निशाना बना रहा है. आप का नैरेटिव है कि आरोपों के पीछे राजनीतिक मंशा देखी जानी चाहिए. लेकिन विपक्ष का जवाब भी तैयार है- अगर आरोप राजनीतिक हैं तो जांच से सच सामने आने में डर कैसा? यानी पंजाब में अब दो समानांतर लड़ाइयां चल रही हैं. एक तरफ आरोपों की सत्यता का सवाल है, दूसरी तरफ आरोप लगाने वालों की राजनीतिक विश्वसनीयता का.
और भगवंत मान?
यही अब इस पूरी कहानी का सबसे धारदार राजनीतिक सवाल है. मुख्यमंत्री की पत्नी ने कानूनी नोटिस भेज दिया. आम आदमी पार्टी के नेता बचाव में उतर आए. कांग्रेस मुख्यमंत्री से जवाब मांग रही है. बीजेपी इस्तीफे की मांग कर रही है. मजीठिया सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं. एनएचआरसी मुख्य सचिव और डीजीपी से रिपोर्ट मांग चुका है. लेकिन उपलब्ध प्रमुख रिपोर्टिंग में भगवंत मान की इस पांच करोड़ वाले आरोप पर कोई प्रत्यक्ष, ऑन-द-रिकॉर्ड सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. 23 अगस्त तक उनकी अपनी ओर से इस आरोप पर कोई स्पष्ट बयान रिपोर्ट नहीं हुआ. इसलिए अब यह अपने आप में राजनीतिक सवाल बन चुका है- मुख्यमंत्री की पत्नी पर इतना गंभीर आरोप है, एनएचआरसी सरकार से जवाब मांग चुका है, विपक्ष मुख्यमंत्री से स्पष्टीकरण मांग रहा है तो भगवंत मान खुद कब बोलेंगे? उनकी चुप्पी को लेकर विपक्ष के पास हमला करने का पूरा राजनीतिक अवसर है. क्योंकि यह अब केवल गुरप्रीत कौर का निजी कानूनी विवाद नहीं रह गया. मामला राज्य सरकार की विश्वसनीयता तक पहुंच चुका है.
असली मामला फिर भी वही रेप केस है
गुरिंदर सिंह उर्फ गूरी चहल के खिलाफ दर्ज एफआईआर ही वह बिंदु है, जहां से पूरा विवाद शुरू हुआ. पीड़ित पिता ने बेटी के अपहरण, रेप, शादी के वादे और निजी तस्वीरों के जरिए ब्लैकमेलिंग के आरोप लगाए. चहल को 13 मई को गिरफ्तार किया गया. दूसरी ओर चहल के पक्ष से दाखिल याचिका में मामले को झूठा बताया गया और आरोप लगाया गया कि उसे खत्म कराने के नाम पर करोड़ों रुपये मांगे जा रहे हैं. यानी इस कहानी में एक तरफ अपराध का आरोप है और दूसरी तरफ उस अपराध के आरोप को झूठा बताते हुए उसे खत्म कराने के लिए कथित वसूली का आरोप. यही विरोधाभास जांच को और महत्वपूर्ण बनाता है. अगर रेप का आरोप झूठा था, तो किसने और क्यों करोड़ों रुपये मांगने की कोशिश की? अगर रेप केस वास्तविक था, तो क्या उसे दबाने की कोशिश हुई? और अगर राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल किया गया, तो वह किस स्तर तक पहुंचा? इन सवालों के जवाब पूरे विवाद की दिशा तय करेंगे.
2027 के लिए यह मामला क्यों खतरनाक है?
पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी के खिलाफ विपक्ष के पास पहले से कई मुद्दे हैं- कानून-व्यवस्था, ड्रग्स, किसानों के सवाल, वित्तीय स्थिति और सरकार की कार्यशैली. अब एक नया और बेहद संवेदनशील सवाल जुड़ गया है- क्या सत्ता के प्रभाव का इस्तेमाल किसी आपराधिक मामले की जांच को प्रभावित करने के लिए किया गया? अगर जांच में कोई ठोस कड़ी सामने आती है, तो मामला सीधे भगवंत मान सरकार की राजनीतिक विश्वसनीयता पर चोट करेगा. कांग्रेस इसे पुलिस और सरकार की जवाबदेही बनाएगी. अकाली दल इसे सत्ता और प्रभाव की राजनीति से जोड़ेगा. बीजेपी इसे आप के भ्रष्टाचार विरोधी दावे के खिलाफ इस्तेमाल करेगी. और आम आदमी पार्टी के सामने तब सबसे बड़ी चुनौती होगी- यह साबित करना कि मुख्यमंत्री परिवार का नाम इस मामले में किस तरह और क्यों आया. लेकिन अगर जांच आरोपों को पुष्ट नहीं करती, तो आप के पास इसे विपक्ष की राजनीतिक साजिश बताने का मजबूत आधार होगा. इसलिए अभी इस कहानी का राजनीतिक परिणाम तय नहीं हुआ है. लेकिन मुद्दा चुनावी राजनीति में प्रवेश कर चुका है.
अब आगे क्या होगा?
सबसे पहले नजर एनएचआरसी की दो सप्ताह में मांगी गई कार्रवाई रिपोर्ट पर होगी. फिर हाईकोर्ट के 20 जुलाई के आदेश के बाद चल रही नई जांच पर. फिर उन तस्वीरों, बातचीत के प्रतिलेखों और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री पर, जिनका अदालत की कार्यवाही में उल्लेख हुआ. फिर यह सवाल कि अमरदीप सिंह ग्रेवाल और मुख्यमंत्री परिवार के बीच वास्तविक संबंध क्या है. फिर गुरप्रीत कौर के कानूनी नोटिस पर रंजीत सिंह का जवाब. और सबसे महत्वपूर्ण- मूल रेप केस में आरोपी गूरी चहल की कानूनी स्थिति और उससे जुड़े कोर्ट के आदेश. इनमें से किसी एक कड़ी में भी ठोस नया तथ्य सामने आया तो कहानी की दिशा बदल सकती है.
भूचाल आ चुका है, तूफान बाकी है
यह मामला सिर्फ पांच करोड़ रुपये का ही नहीं है. यह सिर्फ गुरप्रीत कौर का मामला नहीं है. यह सिर्फ अमरदीप सिंह ग्रेवाल का मामला भी नहीं है. और यह सिर्फ आप बनाम कांग्रेस की राजनीतिक लड़ाई भी नहीं है. एक युवती के अपहरण और रेप की एफआईआर से शुरू हुई कहानी पुलिस जांच तक गई. पुलिस जांच पर सवाल उठे तो मामला हाईकोर्ट पहुंचा. हाईकोर्ट के सामने दो अलग-अलग याचिकाओं में राजनीतिक प्रभाव और चार-पांच करोड़ रुपये की कथित मांग का जिक्र आया. अदालत ने आरोपों को सही नहीं ठहराया, लेकिन जांच की निष्पक्षता को लेकर पैदा हुई आशंका को गंभीर माना और जांच का तरीका बदल दिया.
इसके बाद रिटायर्ड जज रंजीत सिंह ने आरोप सार्वजनिक किए. मुख्यमंत्री की पत्नी ने कानूनी नोटिस भेज दिया. एनएचआरसी ने मामले को अपने हाथ में लेते हुए पंजाब के मुख्य सचिव और डीजीपी से रिपोर्ट मांग ली. मजीठिया ने सीबीआई जांच की मांग कर दी. कांग्रेस और बीजेपी ने भगवंत मान को घेर लिया.
और इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यमंत्री की अपनी आवाज अब तक सामने नहीं आई है. यही वह बिंदु है जहां मामला राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा विस्फोटक हो जाता है. क्योंकि सवाल अब यह नहीं है कि किसने क्या आरोप लगाया. सवाल यह है कि- मुख्यमंत्री की पत्नी का नाम एक रेप केस को खत्म कराने के लिए चार-पांच करोड़ की कथित मांग में कैसे आया?
लेकिन एक बात आज साफ है- अमृतसर के एक रेप केस से निकला यह विवाद अब भगवंत मान सरकार के दरवाजे पर नहीं, सरकार के भीतर खड़े सवालों के बीच पहुंच चुका है. पंजाब में सियासी भूचाल आ चुका है. अब देखना यह है कि जांच इसे यहीं रोकती है या 2027 के चुनाव तक इसकी गूंज पूरे पंजाब में सुनाई देती है.

