कई जिलों में बाजार बंद, हाईवे और बस सेवाएं प्रभावित; जालंधर में अस्पताल जा रहे व्यक्ति से मारपीट
जेलों से बंदी सिंहों की रिहाई और जगतार सिंह हवारा को पैरोल देने की मांग को लेकर किया गया था आज पंजाब बंद

आरके सेठी
चंडीगढ़, 21 अगस्त.
पंजाब में शुक्रवार को कौमी इंसाफ मोर्चा के आह्वान पर किया गया बंद कई जिलों में असरदार रहा. बाजार बंद रहे, कई जगह सड़कें रोकी गईं और बसों की आवाजाही प्रभावित हुई. इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ा. लेकिन आज का पंजाब बंद सिर्फ कुछ घंटों के जनजीवन को रोकने की कहानी नहीं है. इसके पीछे बंदी सिंहों की रिहाई और जगतार सिंह हवारा को पैरोल देने की मांग के साथ साथ पंथक भावनाओं का मुद्दा है. अब सबसे बड़ा मसला यह है कि क्या यह आंदोलन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब की पंथक सियासत के बदलते मिजाज का संकेत है?
बंद का आह्वान बंदी सिंहों की रिहाई, जगतार सिंह हवारा को पैरोल देने की मांग और 15 अगस्त को चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर कौमी इंसाफ मोर्चा के प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई के विरोध में किया गया था. मोर्चे को कई पंथक संगठनों, किसान संगठनों और एसजीपीसी का समर्थन मिला. बंद के दौरान जरूरी और मेडिकल सेवाओं को इससे बाहर रखने की अपील भी की गई थी. इसके बावजूद कई जगह आम लोगों को परेशानी हुई.
पंजाब के बड़े हिस्से में रहा बंद का असर
जालंधर में बंद का असर सबसे ज्यादा दिखाई देने वाले इलाकों में रहा. बाजार बंद रहे और प्रदर्शनकारियों ने कई जगह रास्ते रोके. इसी दौरान एक व्यक्ति अपनी पत्नी के इलाज के लिए अस्पताल जा रहा था. प्रदर्शनकारियों ने उसे रोककर उसके साथ मारपीट की. यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी आंदोलन की ताकत सिर्फ भीड़ या बंद बाजारों से नहीं मापी जाती. आम आदमी उस आंदोलन को किस नजर से देखता है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है. बंदी सिंहों की रिहाई की मांग का अपना राजनीतिक और भावनात्मक आधार है, लेकिन अगर इसी आंदोलन के दौरान किसी मरीज को अस्पताल पहुंचने में दिक्कत होती है या किसी परिवार को जरूरी काम के लिए सड़क पर रोका जाता है तो सवाल आंदोलन के तौर-तरीकों पर भी उठेंगे.
फगवाड़ा में लुधियाना-जालंधर नेशनल हाईवे-44 पर प्रदर्शन के कारण ट्रैफिक प्रभावित हुआ और वाहनों को दूसरे रास्तों से भेजना पड़ा. लंबी दूरी के यात्रियों और निजी वाहन चालकों को परेशानी हुई.
लुधियाना में भी कई जगह बंद का असर दिखाई दिया. लाडोवाल के पास धरना दिया गया और कुछ बाजारों में दुकानें बंद रहीं. हालांकि शहर में बंद का असर हर इलाके में एक जैसा नहीं था.
होशियारपुर और फिरोजपुर में भी प्रदर्शन और धरने हुए. फिरोजपुर शहर और कैंट इलाके के कई बाजार बंद रहे. ऑक्ट्रॉय नंबर 7 के पास रास्ता रोके जाने से जीरा और लुधियाना की ओर जाने वाला ट्रैफिक प्रभावित हुआ. पटियाला में बंद को मिश्रित प्रतिक्रिया मिली. प्रमुख बाजारों में ज्यादातर दुकानें बंद रहीं, लेकिन कुछ रिहायशी इलाकों में दुकानें खुली भी दिखाई दीं. धधेड़ी जट्टां टोल प्लाजा के पास किसान संगठनों ने सड़क रोकी. पटियाला बस स्टैंड के बाहर प्रदर्शन के कारण बसों की आवाजाही प्रभावित हुई और यात्री परेशान हुए.
रोपड़ जिले में रोपड़, आनंदपुर साहिब और नंगल में बंद का असर रहा. बाजार बंद कराने और हाईवे पर यातायात रोकने की घटनाएं सामने आईं. अमृतसर में भी बंद का असर दिखाई दिया और पुलिस को संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बढ़ानी पड़ी. मोहाली में स्थिति इसलिए ज्यादा संवेदनशील रही क्योंकि चंडीगढ़-मोहाली सीमा पर पहले से भारी पुलिस बल और बैरिकेडिंग की गई थी. रैपिड एक्शन फोर्स की तैनाती भी रही.
बंद से आगे है पंथक राजनीति का सवाल
बंदी सिंहों की रिहाई पंजाब में नया मुद्दा नहीं है. लेकिन चुनाव से पहले इस मुद्दे का फिर सड़क पर आना महत्वपूर्ण है. कौमी इंसाफ मोर्चा चुनावी पार्टी नहीं है. फिर भी उसका आंदोलन ऐसे मुद्दों को सामने ला रहा है जिनका सीधा संबंध पंजाब की पंथक राजनीति से है. उसका वास्ता बंदी सिंहों, बेअदबी, पंथक संस्थाओं, पुलिस कार्रवाई और सिख समुदाय से जुड़े भावनात्मक सवालों से है.
2027 का ट्रेलर?
2027 के विधानसभा चुनाव सामने हैं और पंजाब में राजनीतिक लड़ाई शुरू हो चुकी है. आज के बंद ने कम से कम इतना तो दिखा दिया कि पंथक मुद्दे पंजाब की राजनीति से बाहर नहीं गए हैं. सवाल अब यह नहीं है कि बंदी सिंहों की रिहाई का मुद्दा मौजूद है या नहीं. सवाल यह है कि इस मुद्दे को राजनीतिक रूप कौन देगा? क्या पारंपरिक अकाली राजनीति इसका फायदा उठा पाएगी? क्या पंथक राजनीति में कोई नया विकल्प अपनी जगह बनाएगा? क्या आम आदमी पार्टी सरकार इस मुद्दे पर अपनी स्थिति मजबूत कर पाएगी? और क्या कांग्रेस या बीजेपी इस बदलते पंथक माहौल में अपना राजनीतिक स्पेस तलाश पाएंगी? इन सवालों का जवाब आज के बंद से नहीं मिलेगा. लेकिन आज का बंद एक संकेत जरूर देता है. पंजाब में 2027 की सियासत सिर्फ सरकार के कामकाज, विकास और सत्ता विरोधी लहर पर नहीं लड़ी जाएगी. पंथक सवाल भी उसमें अपनी जगह मांगेंगे.
आज सड़क पर बंद था. आगे शायद मुकाबला राजनीतिक जमीन का होगा. और इसी मायने में पंजाब बंद, बंदी सिंहों की रिहाई से आगे 2027 की पंथक सियासत का ट्रेलर दिखाई देता है.

