HomeExclusiveमोदी के 'खासमखास' पाटिल की पंजाब इलेक्शन में एंट्री!

मोदी के ‘खासमखास’ पाटिल की पंजाब इलेक्शन में एंट्री!

माइक्रोमैनेजमेंट के मास्टर केंद्रीय मंत्री सीआर पाटिल को कभी भी बनाया जा सकता है बीजेपी का पंजाब चुनाव प्रभारी!

गुजरात की नवसारी सीट से लगातार चार बार के लोकसभा सांसद पाटिल के नाम 2019 में देश में सबसे अधिक वोटों से लोकसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड भी है.

आरके सेठी
चंडीगढ़, 20 अगस्त.
बीजेपी जिस तरह से पंजाब इलेक्शन की तैयारियों में जुटी है, उसे देखकर लगता है कि इस बार बीजेपी पंजाब में सिर्फ सीटें बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि जीतने के लिए लड़ेगी!सतीश पूनिया को प्रदेश प्रभारी बनाने के बाद अब बीजेपी पंजाब चुनाव प्रभारी के रूप में कद्दावर लीडर का नाम लगभग फाइनल कर चुकी है. पार्टी के बेहद ताकतवर और चुनावी रणनीति के माहिर नेताओं में गिने जाने वाले केंद्रीय मंत्री सीआर पाटिल को पंजाब की चुनावी बागडोर सौंपी जा सकती है. पाटिल गुजरात से हैं और प्रधानमंत्री नरेंदर मोदी के ‘खासमखास’ नेताओं में गिने जाते हैं. सूत्र बताते हैं कि उनकी पंजाब जिम्मेदारी को लेकर पार्टी के अंदर गंभीर स्तर पर विचार चल रहा है और कभी भी बड़ा फैसला सामने आ सकता है.

राजनितिक जानकार मानते हैं कि अगर सीआर पाटिल पंजाब के चुनाव प्रभारी बनते हैं तो इसे महज एक संगठनात्मक नियुक्ति नहीं माना जाएगा. इसके पीछे 2027 के चुनाव को लेकर बीजेपी की बड़ी रणनीति दिखाई देगी. पंजाब बीजेपी के प्रभारी के तौर पर सतीश पूनिया पहले से जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. ऐसे में पाटिल की संभावित एंट्री का मतलब साफ है कि बीजेपी पंजाब में संगठन चलाने के साथ-साथ चुनावी रणनीति और सीट-दर-सीट माइक्रोमैनेजमेंट पर भी अलग स्तर से काम करना चाहती है.

आखिर सीआर पाटिल ही क्यों?

सीआर पाटिल की पहचान बीजेपी में सिर्फ केंद्रीय मंत्री के तौर पर नहीं है. उनकी असली ताकत चुनावी संगठन और माइक्रोमैनेजमेंट मानी जाती है. पार्टी के भीतर उनकी राजनीतिक और चुनावी संगठन क्षमता को पंजाब की परिस्थितियों में इस्तेमाल करने की तैयारी दिखाई दे रही है.

गुजरात बीजेपी अध्यक्ष के तौर पर पाटिल ने पार्टी संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और चुनाव को बेहद बारीकी से मैनेज करने पर जोर दिया. 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 182 में से 156 सीटें जीतकर रिकॉर्ड प्रदर्शन किया. पाटिल उस समय गुजरात बीजेपी के अध्यक्ष थे. पाटिल की कार्यशैली का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है – हर सीट का अलग चुनावी गणित और हर बूथ की अलग रणनीति.

अमित शाह खुद पंजाब की चुनावी प्लानिंग में शामिल

दिलचस्प बात यह है कि पंजाब की चुनावी रणनीति को लेकर बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की सक्रियता भी बढ़ गई है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह खुद पंजाब की चुनावी प्लानिंग में शामिल हैं और जून में राज्य को लेकर शुरुआती रणनीतिक बैठक की अध्यक्षता भी कर चुके हैं. बीजेपी पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने की रणनीति पर भी काम कर रही है. ऐसे में सीआर पाटिल की संभावित एंट्री को इसी बड़े चुनावी प्लान का हिस्सा माना जा रहा है. शाह की सीधी नजर, पूनिया की नियुक्ति और अब पाटिल का जिक्र – इन तीनों को जोड़कर देखीं तो इससे साफ़ जाहिर है कि बीजेपी पंजाब को बहुत गंभीरता से ले रही है.

पंजाब में बीजेपी के लिए चुनौती गुजरात से बिल्कुल अलग

गुजरात और पंजाब की राजनीतिक जमीन में बहुत बड़ा अंतर है. गुजरात में बीजेपी का संगठन दशकों से मजबूत है. पंजाब में बीजेपी का पारंपरिक आधार मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों और कुछ खास विधानसभा सीटों तक रहा है. ग्रामीण पंजाब में पार्टी का विस्तार लंबे समय तक अकाली दल के साथ उसके गठबंधन पर निर्भर रहा. लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है. बीजेपी और अकाली दल अलग हैं. किसान आंदोलन के बाद ग्रामीण पंजाब में बीजेपी को लेकर बनी धारणा अब भी उसके सामने बड़ी चुनौती है. दूसरी तरफ पार्टी 2027 में खुद को केवल शहरी वोट की पार्टी के रूप में सीमित नहीं रखना चाहती. यानी पाटिल के सामने सिर्फ चुनाव लड़ने की चुनौती नहीं होगी. उन्हें बीजेपी को पंजाब के उन हिस्सों में चुनावी ताकत बनाने की चुनौती होगी, जहां पार्टी अभी तक निर्णायक ताकत नहीं रही है.

सतीश पूनिया और सीआर पाटिल, दो अलग जिम्मेदारियां!

सतीश पूनिया पंजाब बीजेपी के प्रभारी हैं. उनकी भूमिका संगठन और राजनीतिक समन्वय में महत्वपूर्ण है. अगर इसके साथ सीआर पाटिल को चुनावी प्रभारी की जिम्मेदारी दी जाती है तो बीजेपी पंजाब में दो स्तरों पर काम करती दिखाई देगी. एक तरफ संगठन और राज्य की राजनीतिक गतिविधियां. दूसरी तरफ चुनावी रणनीति, सीट-दर-सीट आकलन, उम्मीदवारों की क्षमता, बूथ मैनेजमेंट और चुनावी संसाधनों का माइक्रोमैनेजमेंट. यह कोई सामान्य चुनावी तैयारी नहीं होगी.

बीजेपी के लिए 2027 सिर्फ सीट बढ़ाने का चुनाव नहीं!

पंजाब में बीजेपी के सामने 2027 में बड़ा सवाल है – वह आखिर हासिल क्या करना चाहती है? राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर लक्ष्य सिर्फ पिछली बार से कुछ ज्यादा सीटें जीतना है तो मौजूदा संगठनात्मक ढांचा काफी हो सकता है. लेकिन अगर बीजेपी पंजाब में सरकार बनाने की दौड़ में खुद को गंभीर दावेदार बनाना चाहती है तो उसे अपनी चुनावी रणनीति में बड़ा बदलाव करना होगा. यहीं सीआर पाटिल की संभावित भूमिका समझ में आती है. पाटिल चुनाव को केवल रैलियों और बड़े नेताओं के दौरों से नहीं देखते. उनकी राजनीति का मॉडल सीट और बूथ के स्तर पर चुनावी ताकत को मापने और उसी हिसाब से रणनीति बनाने पर आधारित रहा है.

बीजेपी- अकाली दल समीकरण भी पाटिल की रणनीति का हिस्सा होगा!

पंजाब में बीजेपी की 2027 की रणनीति को अकाली दल से उसके रिश्ते से अलग करके नहीं देखा जा सकता. हालांकि माना यह भी जा रहा है कि अगर बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के बीच फिर कोई समझ बनती है तो चुनाव का पूरा सामाजिक और सीट गणित बदल सकता है. हालांकि बीजेपी अकेले चुनाव लड़ने की बात कह चुकी है. अगर दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो बीजेपी को ग्रामीण पंजाब में अपने दम पर आधार खड़ा करना होगा. दोनों परिस्थितियों में सीट-दर-सीट रणनीति बेहद महत्वपूर्ण होगी. और यही पाटिल की संभावित भूमिका को महत्वपूर्ण बनाता है.

कांग्रेस, आप और पंथक राजनीति- तीनों से मुकाबला

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी के सामने इस बार मुकाबला सिर्फ ‘आप’ से नहीं है. ‘आप’ सत्ता में है और उसके पास सरकार के साथ संगठन का लाभ है. कांग्रेस, सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश करेगी. शिरोमणि अकाली दल अपने पुराने राजनीतिक आधार को वापस पाने की कोशिश में है. और दूसरी तरफ ‘वारिस पंजाब दे’ जैसी ताकतें पंजाब की पंथक राजनीति में नया स्पेस बनाने की कोशिश कर रही हैं. ऐसे माहौल में बीजेपी को हर सीट के लिए अलग रणनीति बनानी होगी. यानी पंजाब में 2027 का चुनाव एक राज्यव्यापी चुनाव कम और 117 अलग-अलग विधानसभा सीटों के चुनाव ज्यादा हो सकता है.

पाटिल की एंट्री का सबसे बड़ा संदेश

अगर सीआर पाटिल को पंजाब की चुनावी बागडोर दी जाती है तो इसका सबसे बड़ा संदेश यही होगा कि बीजेपी ने पंजाब को लेकर अपना नजरिया बदल दिया है. पार्टी अब पंजाब में सिर्फ गठबंधन के सहारे अपनी भूमिका तय करने के बजाय अपने संगठन और चुनावी ताकत को विस्तार देने की कोशिश कर रही है. पाटिल जैसे अनुभवी नेता को सामने लाने का मतलब है कि पार्टी चुनाव को लंबे समय की तैयारी, डेटा, संगठन और माइक्रोमैनेजमेंट के जरिए लड़ने की तैयारी कर रही है.

पंजाब बीजेपी के सामने असली परीक्षा

लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल बीजेपी का भी है. क्या गुजरात में सफल रहा पाटिल मॉडल पंजाब में भी सफल हो सकता है? सियासी विश्लेषक मानते हैं कि पंजाब की राजनीति बेहद अलग है. यहां धर्म, किसान, क्षेत्र, भाषा, ग्रामीण-शहरी विभाजन और पंथिक भावनाएं चुनावी गणित को प्रभावित करती हैं. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि सिर्फ बूथ मैनेजमेंट से पंजाब नहीं जीता जा सकता. इसके लिए स्थानीय नेतृत्व, भरोसेमंद चेहरे, ग्रामीण नेटवर्क और पंजाब की राजनीतिक संवेदनशीलताओं की गहरी समझ भी चाहिए. यही सीआर पाटिल की सबसे बड़ी परीक्षा होगी.

पंजाब की राजनीति में एक नया संकेत

2027 के चुनाव में अभी कई महीने बाकी हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है. ‘आप’ अपने संगठन को मजबूत कर रही है. कांग्रेस नेतृत्व और जमीन दोनों को मजबूत करने की कोशिश में है. अकाली दल वापसी के रास्ते तलाश रहा है. ‘वारिस पंजाब दे’ अपना अलग राजनीतिक स्पेस बनाने की तैयारी कर रहा है. और बीजेपी अब जिस तरीके से अपनी चुनावी मशीनरी तैयार कर रही है, वह संकेत दे रहा है कि पार्टी इस बार पंजाब में सिर्फ मौजूद रहने के लिए नहीं, बल्कि मुकाबले की पूरी ताकत के साथ उतरना चाहती है. अगर सीआर पाटिल पंजाब की चुनावी कमान संभालते हैं तो यह इसी बड़े बदलाव की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक होगा.

पंजाब की 2027 की चुनावी लड़ाई अब धीरे-धीरे शुरू हो चुकी है. और बीजेपी ने अगर पाटिल जैसे माइक्रोमैनेजमेंट के मास्टर को मैदान में उतारने का फैसला किया है, तो आने वाले महीनों में पंजाब की राजनीति में चुनावी रणनीति का खेल निश्चित तौर पर और दिलचस्प होने वाला है.

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments