HomeCurrent Newsबीजेपी ने डाला सतीश पूनिया के कंधों पर सबसे "भारी" स्टेट का...

बीजेपी ने डाला सतीश पूनिया के कंधों पर सबसे “भारी” स्टेट का जिम्मा!

राजस्थान के नेता, हरियाणा में खुद को साबित किया और जिम्मेदारी मिली पंजाब जीतने की!

आरके सेठी
चंडीगढ़, 18 अगस्त.
बीजेपी ने पंजाब के अपने चुनावी रण की कमान डॉ. सतीश पूनिया को दे दी है. कल ही उन्हें बीजेपी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया था और आज उन्हें पंजाब प्रभारी बनाकर ‘टफ’ टारगेट दे दिया गया है. पूनिया राज्यसभा सांसद हैं और हरियाणा प्रभारी की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं. उनके साथ डॉ. नरिंदर सिंह रैना को-इंचार्ज की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, जबकि पंजाब बीजेपी की कमान प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों के हाथ में है.

हालांकि, सतीश पूनिया की नियुक्ति को 18 अगस्त का अचानक लिया गया फैसला नहीं माना जाना चाहिए. क्योंकि बीजेपी ने 50 दिन पहले ही यह तय कर लिया था कि अब पूनिया ही पंजाब को संभालेंगे.उनके नाम की औपचारिक घोषणा भले आज हुई, लेकिन पूनिया पंजाब के वरिष्ठ नेताओं से संपर्क और संगठन को चुनावी मोड में लाने की कवायद पहले ही शुरू कर चुके हैं. पूनिया ने पंजाब के वरिष्ठ बीजेपी नेताओं के साथ अनौपचारिक बैठकें शुरू कर दी थीं. चंडीगढ़ में शुरुआती बैठकें हो चुकी थीं.

हरियाणा की ‘हैट्रिक’ के बाद पंजाब की अग्निपरीक्षा

डॉ.सतीश पूनिया के नाम के साथ सबसे बड़ा ताजा चुनावी अनुभव 2024 का हरियाणा विधानसभा चुनाव जुड़ा है. जुलाई 2024 में उन्हें हरियाणा बीजेपी का प्रभारी बनाया गया था. उस चुनाव में किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि, पहलवान आंदोलन, बेरोजगारी और सत्ता विरोधी माहौल जैसे मुद्दे बीजेपी के सामने चुनौती बने हुए थे. इसके बावजूद पार्टी ने 90 में से 48 सीटें जीतकर लगातार तीसरी बार सरकार बनाई. पूनिया उस चुनाव में बीजेपी की चुनावी मशीनरी और संगठन के प्रबंधन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे थे. हालांकि हरियाणा की जीत का पूरा श्रेय किसी एक नेता को देना सही नहीं होगा, लेकिन इस चुनाव ने संगठन और चुनावी प्रबंधन के स्तर पर पूनिया की उपयोगिता जरूर साबित की. अब वही अनुभव पंजाब जैसे कहीं अधिक जटिल राजनीतिक मैदान में आजमाया जाना है.

खुद चुनाव हारे, फिर भी दिल्ली का भरोसा कायम

पूनिया का व्यक्तिगत चुनावी रिकॉर्ड पूरी तरह जीत से भरा नहीं है. 2018 में आमेर से विधायक बने पूनिया 2023 में इसी सीट से विधानसभा चुनाव हार गए थे, जबकि राजस्थान में बीजेपी सत्ता में लौट आई. फिर भी केंद्रीय नेतृत्व का उन पर भरोसा कम नहीं हुआ. विधानसभा चुनाव हारने के बाद उन्हें हरियाणा की जिम्मेदारी मिली, 2026 में राजस्थान से राज्यसभा भेजा गया और अब राष्ट्रीय महासचिव के साथ पंजाब का प्रभारी बनाया गया है. इससे साफ है कि बीजेपी उनके भीतर सबसे ज्यादा जिस क्षमता को देखती है, वह व्यक्तिगत चुनाव जीतने से ज्यादा संगठन खड़ा करने और चुनावी प्रबंधन की है.

छात्र राजनीति से राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा तक

पूनिया का राजनीतिक सफर संगठन की राजनीति से शुरू हुआ. वह एबीवीपी से जुड़े, युवा मोर्चा में जिम्मेदारियां संभालीं और आगे चलकर राजस्थान बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बने. 2019 से 2023 तक उन्होंने राजस्थान बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में काम किया. इसके बाद राजस्थान विधानसभा में उपनेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभाली. 2026 में वह राजस्थान से राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित हुए और 20 जुलाई को राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ली. अब उनकी राजनीतिक हैसियत पहले से अलग है. वह सिर्फ राजस्थान के नेता नहीं हैं, बल्कि संसद के उच्च सदन के सदस्य, बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और दो चुनावी राज्यों के प्रभारी हैं.

पंजाब उनके लिए बिल्कुल नया मैदान भी नहीं

सतीश पूनिया की पंजाब में नियुक्ति का एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह पंजाब को पहली बार नहीं संभाल रहे. संगठन के शुरुआती दौर में वह पंजाब बीजेपी युवा मोर्चा का नेतृत्व कर चुके हैं. यानी राज्य के बीजेपी संगठन, कार्यकर्ताओं और राजनीतिक माहौल से उनका पुराना परिचय है. यही कारण है कि बीजेपी के लिए उन्हें पंजाब भेजना किसी ऐसे बाहरी नेता को उतारने जैसा नहीं है जिसे राज्य की राजनीति को शून्य से समझना पड़े. उनके पास पंजाब का पुराना संगठनात्मक अनुभव, राजस्थान का लंबा राजनीतिक अनुभव और हरियाणा का ताजा चुनावी अनुभव है.

जाट नेता की छवि, पंजाब में जाट सिख समीकरण

राजस्थान की राजनीति में पूनिया की पहचान प्रमुख जाट नेताओं में रही है. पंजाब में जाट सिख राजनीति का अपना अलग महत्व है और खास तौर पर मालवा की राजनीति में इसका प्रभाव बड़ा है. यहां पूनिया के सामने एक दिलचस्प चुनौती होगी. राजस्थान और पंजाब के जाट सामाजिक समीकरण एक जैसे नहीं हैं. इसलिए किसी तैयार मॉडल को पंजाब में सीधे लागू करना आसान नहीं होगा. उन्हें पंजाब के जाट सिख समाज, किसान राजनीति, ग्रामीण इलाकों और पंथक संवेदनशीलताओं को अलग तरीके से समझना होगा. यही उनकी राजनीतिक समझ की असली परीक्षा होगी.

किसान, पंथ और गांव—सबसे कठिन मैदान

पंजाब में बीजेपी के सामने आम आदमी पार्टी की सरकार है. कांग्रेस का पुराना संगठन है. अकाली दल की ग्रामीण और पंथक विरासत है. किसान राजनीति का गहरा प्रभाव है. यानी बीजेपी के सामने सिर्फ सत्ता विरोधी वोट को अपने पक्ष में करने की चुनौती नहीं है. उसे अपना स्वतंत्र सामाजिक आधार बनाना है. शहरी पंजाब में अपनी मौजूदगी के मुकाबले ग्रामीण पंजाब में विस्तार उसकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी. किसान आंदोलन के बाद किसानों के बीच स्वीकार्यता, जाट सिखों के बीच राजनीतिक जगह और पंथक मुद्दों पर पार्टी की स्थिति—इन तीनों पर बीजेपी को काम करना होगा.

सबसे बड़ा सवाल – अकाली दल के साथ क्या होगा?

पूनिया के सामने एक और बड़ा सवाल बीजेपी-अकाली दल रिश्ते का है. 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर बीजेपी और अकाली दल का पुराना गठबंधन टूट गया था. अब 2027 से पहले दोनों दलों के बीच संभावित नजदीकी की चर्चाएं फिर उठती रही हैं. लेकिन किसी नए गठबंधन की औपचारिक घोषणा अभी नहीं हुई है. अगर बीजेपी अकेले लड़ती है तो उसे अपना वोट आधार तेजी से बढ़ाना होगा. अगर अकाली दल के साथ जाती है तो सीट बंटवारे, नेतृत्व और पुराने समीकरणों को नए सिरे से तय करना होगा. इसलिए पूनिया के सामने चुनावी रणनीति के साथ एक बड़ा राजनीतिक रणनीतिक सवाल भी है—बीजेपी पंजाब में अपने दम पर कितनी दूर जाएगी और गठबंधन की जरूरत को किस नजर से देखेगी?

दो दिन, दो नियुक्तियां और बीजेपी का बड़ा संदेश

पंजाब की राजनीति में लंबा अनुभव रखने वाले मनप्रीत बादल को एक दिन पहले राष्ट्रीय टीम में बड़ी भूमिका मिली. दूसरी तरफ पंजाब से पुराना संगठनात्मक रिश्ता रखने वाले, हरियाणा की चुनावी परीक्षा में भूमिका निभा चुके और अब राज्यसभा सांसद व राष्ट्रीय महासचिव बने सतीश पूनिया को पंजाब की कमान दी गई. दोनों नियुक्तियों को साथ रखकर देखें तो राजनीतिक सन्देश साफ़ है. बीजेपी अब पंजाब को केवल संगठन विस्तार का राज्य नहीं, बल्कि 2027 की गंभीर चुनावी लड़ाई का मैदान मानकर चल रही है.

हरियाणा में सरकार बचाना था, पंजाब में जमीन बनानी है

हरियाणा में बीजेपी सत्ता में थी और संगठन की मजबूत जड़ें थीं. पंजाब में उसे अपनी जमीन खुद तैयार करनी है. उसे ग्रामीण पंजाब में विस्तार करना है. किसान और पंथक राजनीति के बीच अपनी जगह बनानी है. जाट सिख समाज में स्वीकार्यता बढ़ानी है. कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के खिलाफ प्रभावी नैरेटिव तैयार करना है. अकाली दल के साथ रिश्ते पर रणनीतिक फैसला लेना है और सबसे अहम, बूथ स्तर पर ऐसा संगठन खड़ा करना है जो चुनाव के दिन वोट को बूथ तक पहुंचा सके. इसलिए पंजाब की जिम्मेदारी सतीश पूनिया के लिए सिर्फ एक और संगठनात्मक पद नहीं है. यह उनके राजनीतिक करियर की बड़ी परीक्षा है. और यही वजह है कि सतीश पूनिया के कंधों पर आया पंजाब का जिम्मा शायद उनके राजनीतिक सफर का अब तक का सबसे “भारी” जिम्मा है. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि वह 2027 में बीजेपी को कितनी सीटें दिला पाते हैं. सवाल यह है कि क्या वह पंजाब में बीजेपी को इतना मजबूत और स्वतंत्र राजनीतिक खिलाड़ी बना पाएंगे कि सत्ता के किसी भी समीकरण में पार्टी को नजरअंदाज करना मुश्किल हो जाए? यही सतीश पूनिया की असली परीक्षा होगी.

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments