बंदी सिंहों की रिहाई के लिए सोमवार को होनी है सीएम के साथ कौमी इंसाफ मोर्चा की मीटिंग, अकाल तख्त के एसजीपीसी सदस्य करनैल सिंह पंजोली को मीटिंग में जाने से रोका; अहम सवाल-बंदी सिंहों की रिहाई के लिए सरकार से संवाद का रास्ता क्या होगा?

आरके सेठी
चंडीगढ़, 11 अक्टूबर।
पंजाब में बंदी सिंहों की रिहाई का मुद्दा एक बार फिर अकाल तख्त और भगवंत मान सरकार के बीच टकराव के केंद्र में है। अकाल तख्त के कार्यकारी जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गरगज ने एसजीपीसी सदस्य करनैल सिंह पंजोली को मुख्यमंत्री भगवंत मान से मुलाकात करने से परहेज करने का निर्देश दिया है। पंजोली ने 6 अक्टूबर को पत्र लिखकर 12 अक्टूबर को पंजाब भवन, चंडीगढ़ में कौमी इंसाफ मोर्चा के प्रतिनिधियों के साथ प्रस्तावित बैठक में शामिल होने की अनुमति मांगी थी। जवाब में अकाल तख्त सचिवालय ने मुख्यमंत्री के खिलाफ जून में जारी आदेश का हवाला देते हुए कहा कि एसजीपीसी सदस्य के रूप में पंजोली का कर्तव्य अकाल तख्त के निर्देशों का पालन करना है।
जून में भगवंत मान को ‘गुरु-द्रोही’ और ‘पंथ विरोधी’ क्यों कहा गया?
15 जून 2026 को अकाल तख्त के पांच सिंह साहिबानों की बैठक के बाद मुख्यमंत्री भगवंत मान को “गुरु-द्रोही” और “खालसा पंथ विरोधी” कहा गया था। यह कार्रवाई एक विवादित वायरल वीडियो को लेकर हुए विवाद के बाद की गई थी। अकाल तख्त की ओर से उद्धृत फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर वीडियो को एआई से तैयार या उसके साथ छेड़छाड़ किया हुआ नहीं माना गया। हालांकि मुख्यमंत्री ने वीडियो में दिखाई देने वाला व्यक्ति खुद होने से इनकार किया और इसे फर्जी बताया। आम आदमी पार्टी ने भी फॉरेंसिक रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया कि वीडियो में मान नहीं हैं।
मुख्यमंत्री से मिलने वाले एसजीपीसी सदस्यों पर भी कार्रवाई
सितंबर में एसजीपीसी सदस्य जसवंत सिंह पुरैन और मिट्ठू सिंह कहनेके ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की थी। यह मुलाकात पूर्व एसजीपीसी सदस्य अमरजीत सिंह चावला से जुड़े दुष्कर्म मामले में कार्रवाई की मांग के संदर्भ में हुई थी। इसके बाद दोनों को अकाल तख्त में स्पष्टीकरण देने के लिए तलब किया गया और एसजीपीसी बैठकों में भाग लेने से रोकने की कार्रवाई की गई। अक्टूबर में दोनों ने अकाल तख्त सचिवालय में अपना पक्ष रखते हुए माफी मांगी। यह घटनाक्रम बताता है कि मुख्यमंत्री से मुलाकात का सवाल अब केवल राजनीतिक संपर्क तक सीमित नहीं, बल्कि धार्मिक संस्थाओं के निर्देशों के पालन से भी जुड़ गया है।
अकाल तख्त का तर्क: व्यक्तिगत मुलाकात नहीं, सामूहिक पंथक संघर्ष
करनैल सिंह पंजोली को दिए गए जवाब में अकाल तख्त सचिवालय ने बंदी सिंहों की रिहाई के लिए पूरे पंथ को एकजुट होकर संगठित संघर्ष करने पर जोर दिया। पत्र में सवाल उठाया गया कि सरकार के कार्यकाल के अंतिम महीनों में मुख्यमंत्री से मुलाकात करने पर क्या ठोस परिणाम निकल सकेगा। अकाल तख्त की ओर से यह आरोप भी लगाया गया कि सरकार चुनाव से पहले आश्वासन देकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर सकती है।
बंदी सिंहों की रिहाई: मांग और कानूनी प्रक्रिया में अंतर
बंदी सिंहों का मुद्दा लंबे समय से पंजाब की धार्मिक और राजनीतिक बहस का हिस्सा है। देविंदरपाल सिंह भुल्लर, जगतार सिंह हवारा और बलवंत सिंह राजोआणा जैसे कैदियों के मामले इस बहस में उठते रहे हैं, लेकिन सभी की कानूनी स्थिति एक जैसी नहीं है। उम्रकैद, मौत की सजा, पैरोल और सजा में छूट अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं। और किन मामलों में केंद्र या दूसरे राज्यों के हस्तक्षेप की जरूरत होगी।
कौमी इंसाफ मोर्चा का आंदोलन और कल की प्रस्तावित बैठक
कौमी इंसाफ मोर्चा 7 जनवरी 2023 से चंडीगढ़-मोहाली सीमा पर वाईपीएस चौक के पास बंदी सिंहों की रिहाई की मांग को लेकर धरना दे रहा है। लंबे समय से जारी इस आंदोलन ने बंदी सिंहों का मुद्दा पंजाब की राजनीतिक और सामाजिक बहस में बनाए रखा है। मुख्यमंत्री भगवंत मान और मोर्चा प्रतिनिधियों के बीच 12 अक्टूबर को पंजाब भवन में प्रस्तावित बैठक इसी पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है। बैठक का वास्तविक महत्व उसके एजेंडे, उसमें शामिल प्रतिनिधियों, सरकार के जवाब और किसी लिखित निर्णय से तय होगा।
2027 से पहले पंथक राजनीति के लिए अहम सवाल
अकाल तख्त की ओर से यह आरोप लगाया गया है कि पंजाब सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम महीनों में बंदी सिंहों के मुद्दे पर आश्वासन देकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है। विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बंदी सिंहों का मुद्दा सरकार, अकाल तख्त, एसजीपीसी और आंदोलनकारी संगठनों के बीच संवाद की दिशा को प्रभावित कर सकता है।
सबसे बड़ा सवाल: सरकार से संवाद का रास्ता क्या होगा?
इस पूरे घटनाक्रम का केंद्रीय सवाल यही है कि जब अकाल तख्त ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को “गुरु-द्रोही” और “खालसा पंथ विरोधी” कहा है, तो बंदी सिंहों की रिहाई जैसे गंभीर मुद्दे पर सरकार से संवाद किस तरह किया जाए। अकाल तख्त सामूहिक पंथक संघर्ष पर जोर दे रहा है, जबकि रिहाई के लिए संबंधित सरकारों और सक्षम प्राधिकारियों तक कानूनी मांग पहुंचाना भी जरूरी है। 12 अक्टूबर की प्रस्तावित बैठक, अकाल तख्त के निर्देश पर आगे की कार्रवाई और सरकार के वास्तविक कदम बताएंगे कि इन दोनों रास्तों के बीच कोई व्यावहारिक समाधान निकलता है या नहीं।

