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“नए-नवेले” पंजाब कांग्रेस चीफ भी हो गए CM फेस की रेस में शामिल!

गुटबाजी घटेगी या और बढ़ेगी? 2027 से पहले कांग्रेस में नई सियासी हलचल

आरके सेठी। PunjabElection.com
चंडीगढ़, 10 अक्टूबर।

जिन्हें पंजाब कांग्रेस के बिखरे कुनबे को एकजुट करने और मुख्यमंत्री पद के दावेदारों के बीच संतुलन बनाने की जिम्मेदारी मिली, अब उन्हीं नए-नवेले प्रधान का नाम भी CM फेस की रेस में आ गया है! परगट सिंह ने मुख्यमंत्री पद की संभावनाओं पर बात करते हुए खुद को भी इस दौड़ से बाहर नहीं रखा। पहली नजर में यह एक सामान्य राजनीतिक बयान लग सकता है, लेकिन कांग्रेस की हालिया नेतृत्व-लड़ाई के संदर्भ में इसकी अहमियत कहीं ज्यादा है। जिस पार्टी ने कई दावेदारों के बीच संतुलन बनाने के लिए नया प्रदेश अध्यक्ष चुना, उसके सामने अब सवाल है- क्या यह नई व्यवस्था नेताओं को एक मंच पर लाएगी या मुख्यमंत्री पद की चर्चा को एक नया केंद्र दे देगी?

बयान में क्या है नया?

मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर पूछे गए सवाल पर परगट सिंह ने कहा कि कांग्रेस में इतने चेहरे हैं कि हर कोई मुख्यमंत्री बनने की क्षमता रखता है। उन्होंने चरणजीत सिंह चन्नी, अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, सुखजिंदर सिंह रंधावा और सुखपाल सिंह खैहरा के नामों के साथ खुद को भी संभावित दावेदारों में शामिल बताया। उनका यह कदम प्रदेश अध्यक्ष बनने के कुछ ही दिनों के भीतर मुख्यमंत्री पद की चर्चा में खुद को शामिल करना उनकी राजनीतिक भूमिका को लेकर एक नया सवाल जरूर खड़ा करता है। यहां असली बात दूसरे नेताओं के नाम गिनाने की नहीं, बल्कि अपनी संभावित भूमिका को भी उसी चर्चा का हिस्सा बनाने की है। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उनकी जिम्मेदारी सभी नेताओं को साथ लेकर चलने की है; मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदार के रूप में उनकी अपनी राजनीतिक पहचान भी चर्चा में रहेगी।

हाईकमान ने परगट सिंह को चुना क्यों था?

परगट सिंह की नियुक्ति को समझने के लिए 2 अक्टूबर को हुए नेतृत्व परिवर्तन पर लौटना होगा। अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटने के बाद कांग्रेस हाईकमान ने परगट सिंह को नई जिम्मेदारी सौंपी। यह बदलाव महीनों से चल रही अंदरूनी खींचतान के बीच हुआ था। राजा वड़िंग और चरणजीत सिंह चन्नी के बीच नेतृत्व को लेकर टकराव पार्टी की राजनीति का हिस्सा रहा है। वड़िंग ने अपने पद से हटाए जाने के बाद पंजाब प्रभारी सचिन पायलट पर भी सवाल उठाए थे। दूसरी तरफ, चन्नी खेमे की प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर अपनी पसंद थी। ऐसे में हाईकमान के सामने किसी एक खेमे के नेता को चुनने के बजाय ऐसा चेहरा तलाशने की चुनौती थी, जिसे व्यापक स्वीकार्यता मिल सके।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सचिन पायलट को विभिन्न नेताओं से मिले फीडबैक में राजा वड़िंग की स्वीकार्यता को लेकर सवाल उठाए गए थे। रिपोर्टों में यह भी बताया गया कि हाईकमान ऐसे सिख नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहता था, जिसकी पहचान पूरे पंजाब में हो और जिसे पार्टी के सत्ता में आने की स्थिति में मुख्यमंत्री पद की दौड़ से बाहर माना जा सके। इसी राजनीतिक गणित के बीच परगट सिंह का चयन हुआ।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा। परगट सिंह को मुख्यमंत्री पद की दौड़ से बाहर रहने की अपेक्षा के साथ चुने जाने की बात मीडिया रिपोर्टों में सामने आई थी। लेकिन यदि चयन के पीछे नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर संगठन को एकजुट करने का तर्क था, तो अब मुख्यमंत्री पद की चर्चा में नए अध्यक्ष का नाम शामिल होना उस रणनीति की परीक्षा बन सकता है।

चन्नी खेमे की अपेक्षाएं और वड़िंग की बची हुई राजनीतिक भूमिका

परगट सिंह की नियुक्ति के बाद सार्वजनिक रूप से बधाइयों और एकजुटता के संदेशों के बावजूद अंदरूनी समीकरण पूरी तरह समाप्त नहीं हुए थे। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, नियुक्ति से चन्नी खेमे के कुछ नेता निराश थे, क्योंकि वे प्रदेश अध्यक्ष पद पर अपने खेमे के अधिक नजदीक किसी नेता की उम्मीद कर रहे थे। रिपोर्टों में यह भी उल्लेख किया गया कि चन्नी खेमे के कुछ नेता प्रदेश कांग्रेस कमेटी में एक वरिष्ठ हिंदू नेता को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के पक्ष में थे। उस समय संगठन में संगत सिंह गिलजियां, सुखविंदर सिंह डैनी और राज कुमार वेरका कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में मौजूद थे। चन्नी खेमे की मांग को संगठन में प्रतिनिधित्व के समीकरण से जोड़कर देखा गया।

यहीं मुख्यमंत्री पद की संभावित दौड़ का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति का उद्देश्य किसी एक गुट के वर्चस्व को सीमित कर व्यापक सहमति बनाना था, तो अब नए अध्यक्ष की अपनी संभावित दावेदारी पर दूसरे नेताओं की प्रतिक्रिया भी देखने योग्य होगी। फिलहाल किसी नए टकराव का प्रमाण नहीं है, लेकिन नेतृत्व और संगठनात्मक हिस्सेदारी के सवाल बने हुए हैं।

क्या परगट सिंह की अपनी दावेदारी नई चुनौती बनेगी?

परगट सिंह की नियुक्ति का एक महत्वपूर्ण पहलू उनकी अलग राजनीतिक पहचान है। वह जालंधर कैंट से विधायक हैं, पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान रहे हैं और चरणजीत सिंह चन्नी की सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। कांग्रेस में उनकी राजनीतिक यात्रा 2016 में पार्टी में शामिल होने से पहले शिरोमणि अकाली दल से शुरू हुई थी। उनका संगठनात्मक अनुभव भी महत्वपूर्ण है। वह कांग्रेस में महासचिव (संगठन) की जिम्मेदारी निभा चुके हैं। इस कारण पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और जमीनी कामकाज से उनका परिचय नया नहीं है। उनकी नियुक्ति के पीछे व्यापक स्तर पर नेताओं के साथ संवाद और तालमेल बनाने की संभावना को भी एक कारण माना गया था।

लेकिन मुख्यमंत्री पद की संभावित दौड़ में खुद का नाम शामिल होने से एक व्यावहारिक सवाल खड़ा होता है: क्या वह अपनी राजनीतिक संभावनाओं पर चर्चा के बावजूद उन नेताओं के साथ कामकाजी तालमेल बनाए रख पाएंगे, जिनकी मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षाएं पहले से सार्वजनिक हैं?

गुटबाजी घटेगी या और बढ़ेगी?

परगट सिंह के सामने चुनौती केवल अलग-अलग गुटों के बीच समझौता कराने की नहीं है। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि संगठनात्मक फैसलों में किसी नेता या खेमे को दरकिनार किए जाने की धारणा न बने। चन्नी, वड़िंग और रंधावा जैसे नेताओं का राजनीतिक प्रभाव अपनी जगह है, जबकि नए प्रदेश अध्यक्ष को अपनी स्वतंत्र पहचान और संगठनात्मक अधिकार का इस्तेमाल भी करना होगा।

यदि परगट सिंह सभी नेताओं को उचित भूमिका देने में सफल रहते हैं, तो मुख्यमंत्री पद के कई संभावित दावेदारों के बावजूद सामूहिक नेतृत्व की व्यवस्था चल सकती है। लेकिन यदि नेतृत्व के सवाल पर असहमति फिर सार्वजनिक होती है, तो यही व्यवस्था तनाव का नया कारण भी बन सकती है।

2027 से पहले कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती

पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले कांग्रेस को मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरों पर चर्चा के साथ-साथ उम्मीदवारों के चयन, स्थानीय नेतृत्व, संगठनात्मक एकता और जनता से जुड़े मुद्दों पर भी स्पष्ट रणनीति बनानी होगी। परगट सिंह के लिए चुनौती केवल प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभाने की नहीं, बल्कि वरिष्ठ नेताओं के बीच भरोसा कायम करने और चुनावी अभियान को एक दिशा देने की भी है। उनकी अपनी संभावित दावेदारी को लेकर उठी चर्चा इस व्यापक राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

अब निगाह इस पर रहेगी कि परगट सिंह सामूहिक नेतृत्व के संदेश और अपनी संभावित राजनीतिक भूमिका के बीच किस तरह संतुलन बनाते हैं। साथ ही यह भी देखना होगा कि कांग्रेस हाईकमान मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर क्या रणनीति अपनाता है।

असली परीक्षा अब शुरू

परगट सिंह के खुद को संभावित मुख्यमंत्री दावेदारों में शामिल बताने से कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का एक नया पहलू सामने आया है। हाईकमान ने उन्हें ऐसे समय प्रदेश अध्यक्ष बनाया, जब पार्टी को कई वरिष्ठ नेताओं के बीच संतुलन बनाने और संगठन को चुनाव के लिए तैयार करने की जरूरत थी। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संगठनात्मक संतुलन बनाने की जिम्मेदारी संभालने वाले नेता की अपनी संभावित दावेदारी भी अब चर्चा में है। यह अपने आप में नेतृत्व की रणनीति और उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन के बीच एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़ा करता है।

2027 से पहले कांग्रेस को यह साबित करना होगा कि कई संभावित दावेदारों के रहते भी पार्टी एक साझा नेतृत्व-संदेश और चुनावी रणनीति पर काम कर सकती है। परगट सिंह के लिए भी यही सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा होगी- सिर्फ मुख्यमंत्री पद की चर्चा में शामिल होना नहीं, बल्कि अलग-अलग नेताओं को साथ लेकर संगठन को चुनावी मुकाबले के लिए तैयार करना। अब निगाह इस पर रहेगी कि नए प्रदेश अध्यक्ष की अपनी संभावित दावेदारी और सामूहिक नेतृत्व का उनका संदेश किस तरह साथ चलते हैं।

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