यूनिवर्सिटी के चांसलर और भाजपा के राज्यसभा सांसद अशोक मित्तल बोले- गैंगस्टरवाद, नशे और फिरौती से कारोबारी सहमे; कई लोग पंजाब से बाहर जाने की सोच रहे, चितकारा-एलपीयू हिंसा को बताया एक जैसा पैटर्न

आरके सेठी
चंडीगढ़, 1 अक्टूबर।
लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी यानी एलपीयू में 26-27 सितंबर की रात सोशल मीडिया पर फैली एक अपुष्ट पोस्ट के बाद शुरू हुआ विवाद अब सिर्फ एक यूनिवर्सिटी कैंपस की हिंसा का मामला नहीं रह गया है। इस घटनाक्रम ने पंजाब की कानून-व्यवस्था, सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों, निजी विश्वविद्यालयों की सुरक्षा, राजनीतिक टकराव और सबसे बढ़कर राज्य के निवेश माहौल को लेकर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अब एलपीयू के चांसलर और भाजपा के राज्यसभा सांसद अशोक मित्तल ने इस पूरे घटनाक्रम को एक बड़ी साजिश बताते हुए इसे पंजाब की अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक सौहार्द तक से जोड़ दिया है।
मित्तल का दावा- एलपीयू को नहीं, पंजाब को निशाना बनाने की कोशिश
30 सितंबर को पहली बार पूरे घटनाक्रम पर खुलकर बोलते हुए मित्तल ने कहा कि उन्हें एलपीयू की संपत्ति के नुकसान से ज्यादा चिंता पंजाब की है। उनका दावा था कि एलपीयू और चितकारा यूनिवर्सिटी में लगभग एक जैसे घटनाक्रम महज संयोग नहीं हैं। मित्तल ने कहा, “चितकारा और एलपीयू में जो घटनाएं हुईं, वे एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई और गुंडा तत्वों द्वारा सुनियोजित की गई लगती हैं।” उन्होंने इसे “पंजाब को नुकसान पहुंचाने, हिंदू-सिख एकता में दरार डालने, यूनिवर्सिटी को अस्थिर करने, पंजाब को बदनाम करने, पंजाब की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने और रोजगार को निशाना बनाने की साजिश” बताया।
27 घंटे, करीब 140 किलोमीटर और दो विश्वविद्यालयों में लगभग एक जैसा घटनाक्रम
चितकारा यूनिवर्सिटी और एलपीयू की घटनाओं के बीच समानता ने ही मित्तल के दावे को बड़ा राजनीतिक और सुरक्षा सवाल बना दिया है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक दोनों विश्वविद्यालयों में करीब 27 घंटे के अंतराल और लगभग 140 किलोमीटर की दूरी पर छात्र विरोध शुरू हुए। दोनों जगह महिला छात्रों से जुड़ी अपुष्ट सूचनाएं सोशल मीडिया पर फैलीं और देखते ही देखते विरोध हिंसक हो गया। लेकिन यहां सबसे जरूरी फर्क भी है- समान पैटर्न और आपराधिक कनेक्शन एक ही बात नहीं हैं।
“दो लाइन की पोस्ट और फिर उसे सच मान लिया गया”
मित्तल ने एलपीयू हिंसा की शुरुआत को सोशल मीडिया से जोड़ते हुए सवाल उठाया कि बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के एक पोस्ट इतनी तेजी से कैसे फैल गई। उन्होंने कहा, “किसी ने रेडिट पर सिर्फ दो लाइनें लिखीं और फिर फोन करके लोगों को उकसाना शुरू कर दिया कि आप लोग चुप क्यों बैठे हैं। सिर्फ पोस्ट कर देने से कोई बात सच कैसे हो जाती है?” मित्तल का कहना है कि एलपीयू में कथित दुष्कर्म की घटना हुई ही नहीं। उन्होंने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पूरी कहानी सोशल मीडिया से शुरू हुई। उन्होंने कहा, “एलपीयू में दुष्कर्म की कोई घटना नहीं हुई। इससे जुड़ी सभी रिपोर्टें झूठी और पूरी तरह निराधार हैं।”
नकाबपोश कौन थे? पूर्व छात्रों पर भी जांच की नजर
हिंसा में बाहरी लोगों की भूमिका और नकाबपोश लोगों की मौजूदगी अब जांच का अहम हिस्सा है। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज और सोशल मीडिया पर उपलब्ध वीडियो खंगालना शुरू किया है। एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर भी सीसीटीवी फुटेज के आधार पर पुलिस की जांच के दायरे में आया है। मित्तल का दावा है कि हिंसा में शामिल कई लोग एलपीयू के पूर्व छात्र हो सकते हैं। उनके मुताबिक इनमें ऐसे लोग भी शामिल हो सकते हैं जिन्हें यूनिवर्सिटी से निकाला गया था या जिनके अकादमिक रिकॉर्ड खराब थे। उन्होंने कहा, “ऐसा लगता है कि इनमें कई ऐसे लोग हैं जिन्हें पहले यूनिवर्सिटी से निकाला गया था या जिनके अंक कम थे।” मित्तल ने यह भी दावा किया कि हिंसा में शामिल नकाबपोश लोगों को कथित तौर पर “हायर” किया गया था और यूनिवर्सिटी परिसर में तोड़फोड़ की गई। यह दावा भी फिलहाल जांच का विषय है। पुलिस की प्रारंभिक जांच में भी कुछ पूर्व छात्रों और कैंपस से बाहर किराये के मकानों में रहने वाले लोगों की भूमिका जांच के दायरे में आने की बात सामने आई है। हालांकि, किसी व्यापक साजिश की अंतिम पुष्टि अभी नहीं हुई है।
एलपीयू हिंसा से अब सीधा सवाल- पंजाब में निवेश का माहौल कैसा है?
मित्तल के बयान का सबसे बड़ा आर्थिक पहलू यही है। उनका कहना है कि एलपीयू और चितकारा की घटनाओं का असर सिर्फ दो विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं है। इससे पंजाब में निवेश करने की सोच रहे लोगों का भरोसा प्रभावित हो सकता है। मित्तल ने कहा, “इन घटनाओं से उन शिक्षाविदों का हौसला टूटा है जो पंजाब में निवेश करना चाहते थे।” इसके बाद उनका बयान और आगे जाता है। मित्तल ने पंजाब में गैंगस्टरवाद, नशे और फिरौती को लेकर कारोबारी समुदाय की चिंता का मुद्दा उठाया और दावा किया कि कई कारोबारी अब पंजाब में निवेश करने या यहां बने रहने को लेकर दोबारा सोच रहे हैं। उनके मुताबिक, “कई कारोबारी अब पंजाब से बाहर जाने के बारे में सोच रहे हैं।” यानी एलपीयू हिंसा के बहाने मित्तल ने सवाल को कैंपस सुरक्षा से आगे बढ़ाकर पंजाब के निवेश माहौल और आर्थिक भरोसे तक पहुंचा दिया है।
“मैं काफी डरा हुआ हूं”- मित्तल का सबसे व्यक्तिगत बयान
मित्तल के ताजा बयान में सबसे ध्यान खींचने वाली बात उनका खुद के बारे में किया गया उल्लेख है। उन्होंने कहा, “मैं काफी डरा हुआ हूं।” उनके मुताबिक, पंजाब में निवेश की सोच रहे उनके आसपास के कुछ लोग भी मौजूदा घटनाओं को देखकर पीछे हटने पर विचार कर रहे हैं। उन्होंने गैंगस्टरवाद, नशे और फिरौती को कारोबारी समुदाय की चिंता से जोड़ा। हालांकि, मित्तल ने यह भी स्पष्ट किया कि वह खुद पंजाब छोड़ने वाले नहीं हैं। उनका कहना है, “चाहे कुछ भी हो, मैं पंजाब कभी नहीं छोड़ूंगा।” यह बयान खास इसलिए है क्योंकि एलपीयू खुद पंजाब के बड़े निजी शिक्षा संस्थानों में से एक है और मित्तल ने विश्वविद्यालय को राज्य की अर्थव्यवस्था और रोजगार से जोड़कर देखा है।
हिंदू-सिख एकता का मुद्दा क्यों आया?
मित्तल ने कथित साजिश का एक और मकसद हिंदू-सिख एकता को नुकसान पहुंचाना बताया है। उन्होंने कहा कि पंजाब ने बेहद कठिन दौर देखे हैं और इसके बावजूद दोनों समुदायों के बीच सामाजिक संबंध बने रहे। उनके मुताबिक, एलपीयू जैसी घटना को लेकर फैलने वाली गलत सूचनाएं इस सामाजिक भरोसे को प्रभावित कर सकती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इस पूरे घटनाक्रम का एक मकसद “हिंदू-सिख एकता में दरार डालना” भी हो सकता है।
आप से बीजेपी तक का राजनीतिक संदर्भ भी कहानी में मौजूद
मित्तल का यह बयान ऐसे समय आया है जब उनका राजनीतिक सफर भी पंजाब की मौजूदा राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव से गुजरा है। आम आदमी पार्टी ने उन्हें 2022 में पंजाब से राज्यसभा भेजा था। अप्रैल 2026 में मित्तल ने आप छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। यह बदलाव उस समय हुआ जब उन्हें आप ने राज्यसभा में उपनेता की जिम्मेदारी भी दी थी। एलपीयू हिंसा को लेकर मित्तल से यह भी पूछा गया कि क्या आप छोड़कर भाजपा में जाने के बाद यह राजनीतिक बदले की कार्रवाई हो सकती है। इस पर उनका जवाब था, “अभी इस पर टिप्पणी करना सही नहीं होगा। जब तथ्य सामने आएंगे, तब मैं बोलूंगा।” यानी मित्तल ने इस संभावना को सीधे खारिज भी नहीं किया, लेकिन किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति पर आरोप लगाने से फिलहाल दूरी बनाई।
हिंसा कितनी बड़ी थी? तीन नहीं, अब चार मामले
एलपीयू परिसर में हुए बवाल के बाद पुलिस ने शुरुआत में तीन अलग एफआईआर दर्ज की थीं। इनमें पुलिसकर्मियों पर हमले, तोड़फोड़, लूट, आगजनी और राष्ट्रीय राजमार्ग बाधित करने से जुड़े मामले शामिल थे। एक अलग एफआईआर कथित यौन हमले के संबंध में भी दर्ज की गई थी। एक अक्टूबर को सामने आई जानकारी के मुताबिक हिंसा से जुड़े तीन और मामले दर्ज होने के बाद कुल एफआईआर की संख्या चार तक पहुंच गई है। पुलिस ने यूनिवर्सिटी परिसर, गर्ल्स हॉस्टल-3 और आसपास के इलाकों में जाकर छात्रों, सुरक्षा कर्मचारियों और यूनिवर्सिटी स्टाफ के बयान लिए हैं तथा सीसीटीवी फुटेज जुटाई है। पुलिस ने हिंसा की अलग-अलग घटनाओं की जांच के लिए विशेष टीमें बनाई हैं। एक आठ सदस्यीय एसआईटी का नेतृत्व फगवाड़ा के एसपी मेजर सिंह कर रहे हैं।
हाईकोर्ट ने अब पुलिस से सीधा जवाब मांगा
इस पूरे घटनाक्रम में एक अक्टूबर का सबसे महत्वपूर्ण नया घटनाक्रम पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की कार्रवाई है। हाईकोर्ट ने पंजाब पुलिस से विस्तृत स्थिति रिपोर्ट मांगी है और कहा है कि रिपोर्ट पुलिस कमिश्नर के हस्ताक्षर से दाखिल की जाए। अदालत यह जानना चाहती है कि 26 सितंबर को सोशल मीडिया पर जिस कथित यौन हमले की बात कही गई थी, वह वास्तव में हुआ था या नहीं। साथ ही पुलिस को यह भी बताना है कि हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई और भ्रामक सोशल मीडिया सामग्री के स्रोत तक पहुंचने तथा उसे हटाने के लिए क्या कदम उठाए गए। अगली सुनवाई 8 अक्टूबर को होगी। मामला एक एलपीयू छात्र की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया है। याचिका में पूरी घटना की हाईकोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच की मांग की गई है। वैकल्पिक रूप से पंजाब से बाहर के अधिकारियों वाली एसआईटी बनाने की मांग भी की गई है।
असली सवाल अब सिर्फ एलपीयू का नहीं
एलपीयू हिंसा की कहानी में फिलहाल कई सवालों के जवाब बाकी हैं- सोशल मीडिया पर मूल पोस्ट किसने डाली? उसे किस नेटवर्क ने आगे फैलाया? क्या बाद में हुए व्हाट्सऐप संदेश और फोन कॉल किसी संगठित प्रयास का हिस्सा थे? हिंसा में बाहरी लोगों की भूमिका कितनी थी? नकाबपोश लोग कौन थे? क्या पूर्व छात्रों का कोई संगठित समूह इसमें शामिल था? और सबसे बड़ा सवाल- क्या चितकारा और एलपीयू की घटनाओं के बीच वास्तव में कोई आपराधिक कड़ी थी? इन सवालों का जवाब पुलिस की जांच और हाईकोर्ट में दाखिल होने वाली स्टेटस रिपोर्ट से सामने आना बाकी है। फिलहाल उपलब्ध तथ्यों में दोनों घटनाओं के बीच समान पैटर्न जरूर दर्ज हुआ है, लेकिन एक साझा साजिश का निष्कर्ष अभी स्थापित नहीं है।
अशोक मित्तल ने इस पूरे घटनाक्रम को इससे कहीं बड़े फ्रेम में रख दिया है। उनके लिए सवाल एलपीयू की संपत्ति के नुकसान से आगे पंजाब की छवि, निवेश, रोजगार, सामाजिक सौहार्द और सुरक्षा का है। उनका सबसे बड़ा दावा यही है कि अगर पंजाब में गैंगस्टरवाद, नशे, फिरौती और इस तरह की हिंसक घटनाओं को लेकर डर बढ़ता है तो उसका असर निवेश के फैसलों पर पड़ सकता है।
यह दावा कितना सही है, यह आने वाले दिनों में जांच और उपलब्ध आंकड़ों से ही तय होगा। लेकिन एलपीयू विवाद ने एक बात साफ कर दी है- एक सोशल मीडिया पोस्ट से शुरू हुआ कैंपस विवाद अब पंजाब की कानून-व्यवस्था, राजनीति और इकोनॉमी पर बहस का मुद्दा बन चुका है।

