8% डीए बढ़ाकर कर्मचारी आंदोलन खत्म कराने की कोशिश, लेकिन पुराने बकाये का कानूनी पेच बरकरार; सरकार की वित्तीय मजबूरी बनाम कर्मचारियों के अधिकार की लड़ाई अब कोर्ट तक

आरके सेठी
चंडीगढ़, 22 सितंबर।
पंजाब में कर्मचारियों और पेंशनरों के लंबित डीए का मामला अब भगवंत मान सरकार के लिए सिर्फ वेतन-भत्ते का मुद्दा नहीं रह गया है। यह मामला सरकार की वित्तीय प्राथमिकताओं, प्रशासनिक जवाबदेही और कर्मचारी संगठनों के साथ उसके रिश्तों की भी परीक्षा बन गया है। हाईकोर्ट के सख्त रुख के बीच चीफ सेक्रेटरी को हाईकोर्ट में तलब करने के स्तर तक मामला पहुंचना इसी बढ़ते दबाव का संकेत है।
टकराव जरूर कम हुआ, लेकिन पुराना बकाया खत्म नहीं हुआ!
18 सितंबर को मुख्यमंत्री भगवंत मान के साथ कर्मचारी और पेंशनर संगठनों की बैठक के बाद सरकार ने डीए में 8 प्रतिशत बढ़ोतरी का ऐलान किया। दो 4-4 प्रतिशत की किस्तों से डीए 50 प्रतिशत हो गया। सरकार के मुताबिक इससे करीब आठ लाख कर्मचारी और पेंशनर प्रभावित होंगे और बढ़ोतरी अक्टूबर से वेतन में दिखाई देगी। इस फैसले के बाद कई सप्ताह से चल रहा कर्मचारी आंदोलन खत्म हुआ।
लेकिन असली विवाद पुराने डीए और डीआर के बकाये का है।
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने 3 अगस्त के फैसले में राज्य सरकार और पीएसपीसीएल को लंबित डीए/डीआर किस्तें ऑल इंडिया सर्विसेज के अधिकारियों को मिल रहे केंद्रीय पैटर्न के अनुरूप जारी करने का निर्देश दिया था। अदालत ने इसके लिए एक पखवाड़े की समयसीमा तय की थी। हाईकोर्ट ने भुगतान में देरी होने पर बकाया राशि पर 6 प्रतिशत सालाना ब्याज का भी निर्देश दिया था।
14,191 करोड़ का आंकड़ा ही इस विवाद को इतना बड़ा बनाता है।
हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक पंजाब कैबिनेट ने फरवरी 2025 में जमा बकाये को चरणबद्ध तरीके से चुकाने के लिए लिक्विडेशन प्लान मंजूर किया था। इसमें संशोधित वेतन-पेंशन के पुराने एरियर और 1 जुलाई 2021 से 31 मार्च 2024 तक के डीए/डीआर बकाये समेत करीब ₹14,191 करोड़ की देनदारी का आकलन था। सरकार ने इसे पांच वित्तीय वर्षों में चुकाने की योजना बनाई थी।
यहीं हाईकोर्ट और सरकार के रुख में मूल टकराव सामने आया
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि इतनी बड़ी राशि को हाईकोर्ट की तय समयसीमा में जारी करना कानूनी और वित्तीय रूप से संभव नहीं है। सरकार की एसएलपी में करीब 14,191 करोड़ की देनदारी का उल्लेख करते हुए वित्तीय और संवैधानिक प्रक्रियाओं का भी हवाला दिया गया है। कर्मचारियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कैविएट भी दाखिल की गई है।
हाईकोर्ट के लिए यह सिर्फ वित्तीय कठिनाई का मामला नहीं है!
3 अगस्त के फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि वित्तीय बोझ अपने आप में पहले से अर्जित कर्मचारी लाभों के भुगतान से बचने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने पंजाब सरकार की अपनी ओर से पेश किए गए वेतन और पेंशन खर्च तथा करीब 14,191 करोड़ की बकाया देनदारी के आंकड़ों को भी फैसले में दर्ज किया।
अब चीफ सेक्रेटरी तक पहुंचा मामला सरकार की प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल खड़ा करता है!
इससे पहले अवमानना याचिका में चीफ सेक्रेटरी केपी सिन्हा, एडिशनल चीफ सेक्रेटरी वित्त अलोक शेखर और अन्य अधिकारियों को पक्ष बनाया गया था। हाईकोर्ट ने चीफ सेक्रेटरी को आदेश के अनुपालन को सुनिश्चित करने और संबंधित हलफनामा दाखिल करने को कहा था।
राजनीतिक तौर पर मान सरकार ने दो अलग मोर्चों पर दो अलग रास्ते अपनाए !
सड़क पर कर्मचारी संगठनों के आंदोलन के दबाव के बीच सरकार ने बातचीत का रास्ता चुना और 8 प्रतिशत डीए बढ़ाकर गतिरोध खत्म किया। दूसरी तरफ पुराने बकाये के मामले में सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। यानी राजनीतिक संवाद और कानूनी लड़ाई दोनों एक साथ चल रहे हैं।
यही विरोधाभास इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है
सरकार ने कर्मचारियों के साथ बातचीत में डीए बढ़ाने का फैसला किया है, लेकिन अदालत में उसका रुख यह है कि पुराने बकाये की पूरी राशि तत्काल जारी करना वित्तीय और कानूनी रूप से संभव नहीं है। कर्मचारी संगठनों की ओर से दूसरी तरफ पुराने बकाये को लेकर न्यायिक लड़ाई जारी है।
कर्मचारी-पेंशनर वर्ग के साथ सरकार का रिश्ता भी इस विवाद से प्रभावित होता है!
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इसका चुनावी असर क्या होगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि राज्य के लाखों कर्मचारी और पेंशनर इस मुद्दे के सीधे पक्षकार हैं और उनका आंदोलन पहले ही राज्यभर के सरकारी दफ्तरों तक पहुंच चुका है।
अब सरकार के सामने असली परीक्षा 8 प्रतिशत डीए देने से आगे की है
सवाल यह है कि हाईकोर्ट के आदेश, सुप्रीम कोर्ट में लंबित चुनौती और करीब 14,191 करोड़ के पुराने बकाये के बीच सरकार आगे क्या रास्ता निकालती है। कर्मचारियों के साथ बातचीत से तत्काल राजनीतिक तनाव कम हुआ है, लेकिन पुराने बकाये का कानूनी और वित्तीय सवाल अभी भी सरकार के सामने खड़ा है। यानी 8% डीए ने आंदोलन को फिलहाल रोक दिया, लेकिन डीए का पूरा विवाद खत्म नहीं किया। हाईकोर्ट में चीफ सेक्रेटरी तक मामला पहुंचना इसी बात का संकेत है कि पंजाब सरकार के लिए अब यह सिर्फ कर्मचारी मांग नहीं, बल्कि कोर्ट के आदेश के अनुपालन और सरकार की वित्तीय नीति- दोनों की परीक्षा बन चुका है।

