1997 की ऐतिहासिक जीत से 2020 के टूटे रिश्ते और 2027 की नई संभावना तक आंकड़े बताते हैं कि साथ आने से दोनों दलों को ताकत मिल सकती है. लेकिन फिलहाल बीजेपी के अकेले लड़ने की “जिद” और शिरोमणि अकाली दल की मिलकर लड़ने की “बेकरारी” के बीच गठबंधन की राह अटकी हुई है!

आरके सेठी
चंडीगढ़,22 अगस्त.
2027 की चुनावी जमीन पर बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल की जरूरतें जिस तरह एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई दे रही हैं, वह पुराने रिश्ते की वापसी की संभावना को महज राजनीतिक अटकल नहीं रहने दे देती. वो बात अलग कि बीजेपी फिलहाल अकेले लड़ने की ‘जिद’ पर है और अकाली दल की मिलकर लड़ने की ‘तड़प’ छिपाए नहीं छिप रही. 1996 के मोगा से शुरू हुई नई राजनीतिक लाइन, 1997 की ऐतिहासिक जीत, 2002 की हार, 2007 और 2012 की सत्ता वापसी, 2017 की करारी शिकस्त, 2020 में किसान कानूनों पर रिश्ते का टूटना, 2022 में अलग-अलग लड़कर दोनों का सिमटना, 2024 में करीब 32 प्रतिशत का संयुक्त लोकसभा वोट और फिर 2025-26 के स्थानीय निकाय चुनावों के ताजा आंकड़े – पूरी कहानी को एक साथ रख दें तो तस्वीर यही बनती है कि बीजेपी के पास जो ताकत है, उसकी जरूरत शिरोमणि अकाली दल को है; और अकाली दल के पास जो ताकत बची है, उसकी जरूरत बीजेपी को है.
पंजाब की राजनीति में अकाली दल और भाजपा के संभावित गठबंधन की चर्चा फिर तेज है. हालांकि, बीजेपी का मौजूदा सार्वजानिक रुख अकेले चुनाव लड़ने का है और अकाली दल बेकरार है. भाजपा के भीतर भी यह साफ संकेत है कि यदि गठबंधन हुआ तो पार्टी पुराने जूनियर पार्टनर वाले फार्मूले को उसी रूप में स्वीकार करने के बजाय अपनी मौजूदा राजनीतिक ताकत के हिसाब से भूमिका चाहेगी. यानी गठबंधन अभी बना नहीं है, लेकिन गठबंधन की राजनीति पंजाब में फिर से चुनावी बहस के केंद्र में आ चुकी है.
मोगा से शुरू हुई वह कहानी, जिसने अकाली दल और भाजपा को एक-दूसरे का चुनावी साथी बना दिया
इस कहानी की शुरुआत सीधे 1997 से करना अधूरा होगा. असली मोड़ 24-25 फरवरी 1996 को मोगा में अकाली दल के 75वें स्थापना वर्ष के सम्मेलन से आया. प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में अकाली दल ने अपनी पुरानी पंथक छवि को व्यापक पंजाबी राजनीतिक पहचान में बदलने की कोशिश की और “पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत” को अपनी नई राजनीतिक लाइन का आधार बनाया. पार्टी ने खुद को सभी पंजाबियों की पार्टी के रूप में पेश किया, धर्म और क्षेत्र से ऊपर पंजाबियत को राजनीतिक आधार बनाने की कोशिश की और इसी बदली हुई राजनीतिक दिशा के बाद भाजपा के साथ चुनावी तालमेल का रास्ता मजबूत हुआ. यही मोगा घोषणा आगे चलकर 1997 के एसएडी-भाजपा गठबंधन की वैचारिक जमीन बनी. यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि अकाली दल की ग्रामीण सिख राजनीति और बीजेपी की शहरी हिंदू राजनीति एक-दूसरे से टकराने के बजाय पहली बार बड़े चुनावी गठजोड़ में पूरक ताकतों की तरह सामने आईं. राजनीतिक जानकार कहते हैं कि मोगा के बाद बनी यह जोड़ी केवल दो पार्टियों का समझौता नहीं थी; यह पंजाब के दो अलग सामाजिक और भौगोलिक चुनावी आधारों को एक साथ खड़ा करने की कोशिश थी.
1997: पहला इम्तिहान और ऐसी जीत जिसने पूरा समीकरण बदल दिया
1997 विधानसभा चुनाव में इस नए प्रयोग का पहला बड़ा परिणाम सामने आया. एसएडी ने 75 सीटें जीतीं और भाजपा ने 18. दोनों के खाते में मिलाकर 93 सीटें आईं. 117 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 59 था, यानी गठबंधन बहुमत से 34 सीट आगे था. दोनों दलों का संयुक्त वोट प्रतिशत करीब 45.97 प्रतिशत रहा. यह जीत सिर्फ सीटों की संख्या नहीं थी. अकाली दल के पास गांव, किसान, सिख और पंथक राजनीति का मजबूत नेटवर्क था, जबकि भाजपा शहरी और हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी जगह बना चुकी थी. मोगा में जिस “पंजाबियत” के जरिए अकाली दल ने अपने राजनीतिक दायरे को व्यापक करने की कोशिश की थी, 1997 में वही विस्तार भाजपा के साथ चुनावी साझेदारी में बदलकर सत्ता तक पहुंचा. यही वह क्षण था जब पंजाब में यह धारणा बनी कि एसएडी और बीजेपी अलग-अलग पार्टियां जरूर हैं, लेकिन चुनावी तौर पर एक-दूसरे की कमियां पूरी कर सकती हैं.
2002: गठबंधन हारा, लेकिन रिश्ता नहीं टूटा
2002 में कांग्रेस ने 62 सीटों के साथ सत्ता में वापसी की. एसएडी 41 और बीजेपी सिर्फ 3 सीटों पर रह गई. दोनों का संयुक्त आंकड़ा 44 सीटों का रहा. लेकिन हार के बाद भी गठबंधन नहीं टूटा. यह इस रिश्ते की दूसरी बड़ी विशेषता थी. सत्ता गई, लेकिन साझेदारी बची रही. दोनों दलों ने यह समझा कि पंजाब में कांग्रेस के खिलाफ उनकी चुनावी ताकत अलग-अलग होने की तुलना में साथ होने पर कहीं ज्यादा प्रभावी है.
2007: वापसी और फिर साबित हुआ कि जोड़ी में दम है
2007 में एसएडी और बीजेपी फिर साथ मैदान में उतरे. एसएडी ने 49 सीटें जीतीं, भाजपा ने 19 और गठबंधन 68 सीटों के साथ सत्ता में लौट आया. दोनों का संयुक्त वोट करीब 45.37 प्रतिशत रहा. यह वापसी महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इसने 1997 की जीत को महज एक राजनीतिक संयोग साबित होने से रोक दिया. दस साल में दूसरी बार दोनों दलों ने दिखाया कि उनका सामाजिक आधार एक-दूसरे को काटने के बजाय जोड़ सकता है. एसएडी का ग्रामीण आधार और बीजेपी की शहरी पकड़ मिलकर कांग्रेस के खिलाफ एक प्रभावी चुनावी मशीन बन सकती थी.
2012: लगातार दूसरी बार सरकार और गठबंधन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक सफलता
2012 में तस्वीर फिर बदली, लेकिन नतीजा गठबंधन के पक्ष में रहा. एसएडी ने 56 सीटें जीतीं और बीजेपी ने 12. कुल 68 सीटें. दोनों का संयुक्त वोट करीब 41.9 प्रतिशत रहा. इस जीत की अहमियत सिर्फ 68 सीटों में नहीं थी. पंजाब में पहली बार किसी सरकार ने लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतकर पूरे दस साल का कार्यकाल पूरा किया. 2007 से 2017 तक एसएडी-बीजेपी गठबंधन सत्ता में रहा. यानी 1997, 2007 और 2012- तीन विधानसभा चुनावों में यह गठबंधन सत्ता तक पहुंचा. लेकिन 2017 ने बता दिया कि कोई भी गठबंधन अपने अतीत के भरोसे हमेशा नहीं जीत सकता.
2017: वही गठबंधन, लेकिन पंजाब का मतदाता बदल चुका था
2017 में कांग्रेस ने 77 सीटें जीतकर सत्ता हासिल की. एसएडी 15 और बीजेपी 3 सीटों पर सिमट गए. दोनों मिलकर सिर्फ 18 सीटें रह गए और उनका संयुक्त वोट करीब 30.6 प्रतिशत था. पांच साल पहले 68 सीटों वाली जोड़ी अब सिर्फ 18 पर थी. यह गिरावट बताती है कि गठबंधन होना और गठबंधन का मतदाता के बीच स्वीकार्य रहना दो अलग बातें हैं. सरकार के खिलाफ नाराजगी, नशे और बेअदबी जैसे मुद्दों की राजनीतिक मार और आम आदमी पार्टी के उभार ने पंजाब की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया. 2017 ने पहला बड़ा सबक दिया – गठबंधन अपने आप चुनाव नहीं जिताता; गठबंधन को समय की राजनीतिक हवा के साथ चलना भी पड़ता है.
2020: किसान आंदोलन और करीब 24 साल पुराने रिश्ते का टूटना
फिर 2020 आया और बीजेपी-एसएडी संबंध का सबसे बड़ा संकट सामने आया. केंद्र के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब में किसान आंदोलन तेज हुआ. एसएडी ने बीजेपी से रिश्ता तोड़ दिया और हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया. 1997 से चला आ रहा औपचारिक गठबंधन समाप्त हो गया. यह सामान्य राजनीतिक मतभेद नहीं था. किसान आंदोलन ने पंजाब की राजनीति में भाजपा के प्रति गहरा असंतोष पैदा किया और एसएडी ने खुद को किसानों के साथ खड़ा किया. इसलिए अगर आज दोनों फिर साथ आने की कोशिश करते हैं तो 2027 में उन्हें सिर्फ सीटों का हिसाब नहीं देना होगा. उन्हें 2020 का राजनीतिक सवाल भी झेलना होगा – जिस मुद्दे पर रास्ते अलग हुए थे, उसी रिश्ते को अब फिर क्यों जोड़ा जाए?
2022: अलग-अलग लड़ने का परिणाम- दोनों मिलकर सिर्फ पांच सीटों पर
2022 विधानसभा चुनाव ने दोनों दलों की कमजोरी और ज्यादा स्पष्ट कर दी. आम आदमी पार्टी ने 92 सीटें जीतकर सरकार बनाई. कांग्रेस 18 पर रही. एसएडी सिर्फ 3 और भाजपा 2 पर. दोनों अलग-अलग लड़ते हुए विधानसभा में मिलकर सिर्फ 5 सीटों तक रह गए. एसएडी को करीब 18.38 प्रतिशत और भाजपा को 6.60 प्रतिशत वोट मिला; दोनों का संयुक्त वोट करीब 24.98 प्रतिशत रहा. यही वह चुनाव था जिसने दोनों दलों के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा किया- क्या अलग-अलग लड़कर वे अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं या एक-दूसरे की ताकत काट रहे हैं?
2024: दोनों अलग, लेकिन कागज पर फिर करीब 32 प्रतिशत
2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पंजाब की सभी 13 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा और 18.56 प्रतिशत वोट हासिल किया, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी. एसएडी को 13.42 प्रतिशत वोट मिले और सिर्फ एक सीट मिली. दोनों के वोट जोड़ने पर आंकड़ा 31.98 प्रतिशत बनता है. यही आंकड़ा आज संभावित गठबंधन की चर्चा को सबसे ज्यादा वजन देता है. लेकिन यहीं सबसे जरूरी सावधानी भी है- 31.98 प्रतिशत का अर्थ यह नहीं है कि गठबंधन बनने पर 2027 में दोनों को अपने आप 31.98 प्रतिशत वोट मिल जाएंगे. लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग हैं, उम्मीदवार अलग होंगे, मुद्दे अलग होंगे और सबसे महत्वपूर्ण- वोट ट्रांसफर अलग होगा. बीजेपी का मतदाता एसएडी उम्मीदवार को कितनी मजबूती से वोट देगा और एसएडी का मतदाता बीजेपी उम्मीदवार के पीछे कितना खड़ा होगा, यही असली परीक्षा होगी. क्योंकि दो वोट बैंक जोड़ना और दो वोट बैंक का एक-दूसरे के उम्मीदवार को वोट देना, दो अलग बातें हैं.
2025 के ग्रामीण चुनाव: एसएडी की जमीन अभी खत्म नहीं हुई
अगर यह समझना हो कि बीजेपी को एसएडी की जरूरत क्यों पड़ सकती है तो 2025 के ग्रामीण स्थानीय निकाय चुनाव सबसे मजबूत प्रमाण देते हैं. पंजाब की 22 जिला परिषदों के 346 घोषित जोन में आम आदमी पार्टी ने 218 जीते, कांग्रेस ने 62, एसएडी ने 46, बीजेपी ने 7, बीएसपी ने 3 और निर्दलीयों ने 10. यानी एसएडी और बीजेपी को काल्पनिक रूप से जोड़ दें तो 53 जोन होते हैं—कांग्रेस से सिर्फ 9 कम, लेकिन आम आदमी पार्टी से बहुत पीछे. पंचायत समिति के 2,834 घोषित जोन में आम आदमी पार्टी 1,529, कांग्रेस 611, एसएडी 449, बीजेपी 73, बीएसपी 28 और निर्दलीय 144 पर रहे. एसएडी और भाजपा को जोड़ने पर यह संख्या 522 बनती है. इन आंकड़ों की सबसे बड़ी राजनीतिक कहानी यह है कि ग्रामीण पंजाब में एसएडी आज भी भाजपा से कई गुना मजबूत है. बीजेपी के लिए यह आंकड़ा मामूली नहीं है. यदि उसे पंजाब में केवल शहरी पार्टी से आगे बढ़कर पूरे राज्य में गंभीर चुनावी ताकत बनना है तो गांवों में उसके सामने सबसे बड़ी कमी संगठन और स्थानीय नेटवर्क की है- और यही वह जगह है जहां एसएडी अभी भी मौजूद है.
2026 के शहरी चुनाव: बीजेपी अब पहले वाली भाजपा नहीं रही
अब कहानी का दूसरा सिरा देखिए. मई 2026 के शहरी स्थानीय निकाय चुनाव में 1,977 वार्डों के परिणाम सामने आए. आम आदमी पार्टी ने 958 वार्ड जीते, कांग्रेस ने 397, निर्दलीयों ने 251, एसएडी ने 192 और बीजेपी ने 172. केवल काल्पनिक गणित के लिए एसएडी और भाजपा को जोड़ दें तो 364 वार्ड होते हैं- कांग्रेस के 397 से सिर्फ 33 कम. लेकिन आम आदमी पार्टी के 958 से दोनों अभी भी बहुत पीछे हैं. इसलिए 2026 के स्थानीय चुनाव को एसएडी-बीजेपी गठबंधन की जीत का प्रमाण कहना गलत होगा, लेकिन इसे दोनों की संभावित पूरकता का मजबूत संकेत जरूर कहा जा सकता है. सबसे खास बात भाजपा की है. 2021 में उसके 49 वार्ड थे, जो 2026 में बढ़कर 172 हो गए. यानी शहरी और अर्ध-शहरी पंजाब में बीजेपी की मौजूदगी कई गुना बढ़ी है. दूसरी तरफ एसएडी के 192 वार्ड बताते हैं कि पार्टी शहरी राजनीति से पूरी तरह बाहर भी नहीं हुई है.
यहीं से “एक-दूसरे के बिना अधूरे” होने की असली कहानी सामने आती है
अब दोनों दलों को अलग-अलग रखकर देखिए. बीजेपी के पास 2024 में 18.56 प्रतिशत लोकसभा वोट आया, लेकिन एक भी सीट नहीं मिली. 2026 के शहरी चुनाव में उसका वार्ड आधार बढ़ा, लेकिन वह अभी भी राज्यव्यापी संगठन के मामले में आम आदमी पार्टी से काफी पीछे है. ग्रामीण स्थानीय निकाय चुनावों में बीजेपी की कमजोरी और भी साफ दिखी- पंचायत समिति में सिर्फ 73 और जिला परिषद में 7 जोन. दूसरी तरफ एसएडी के पास ग्रामीण जमीन है- 449 पंचायत समिति जोन और 46 जिला परिषद जोन-लेकिन 2022 विधानसभा में सिर्फ 3 सीटें और 2024 लोकसभा में सिर्फ एक सीट. यानी बीजेपी के पास बढ़ता हुआ वोट और शहरी विस्तार है, लेकिन गांवों में संगठनात्मक कमजोरी है; एसएडी के पास गांवों में जड़ें और पंथक पहुंच है, लेकिन राज्यव्यापी चुनावी विस्तार पहले जैसा नहीं रहा. बीजेपी के पास वह है जो एसएडी को चाहिए, और एसएडी के पास वह है जिसकी बीजेपी को जरूरत है.
बीजेपी को एसएडी से क्या मिल सकता है?
भाजपा को ग्रामीण नेटवर्क, स्थानीय कार्यकर्ता, गांव-स्तर की राजनीतिक पहुंच और पंजाब की क्षेत्रीय-पंथक राजनीति में एक स्थापित साझेदार मिल सकता है. भाजपा ने पंजाब में अपना आधार बढ़ाया है, लेकिन 2025 के ग्रामीण चुनाव बताते हैं कि उसका विस्तार अभी शहरों की तुलना में गांवों में बहुत कमजोर है. एसएडी के साथ संभावित गठबंधन बीजेपी को इस कमी को तेजी से भरने का रास्ता दे सकता है. इससे भी बड़ी बात यह कि भाजपा को पंजाब में केवल दिल्ली से चलने वाली राष्ट्रीय पार्टी के बजाय पंजाब की क्षेत्रीय राजनीतिक परंपरा के साथ खड़ी ताकत के रूप में पेश करने में मदद मिल सकती है.
एसएडी को भाजपा से क्या मिल सकता है?
एसएडी को शहरी मतदाता, बीजेपी का बढ़ता हुआ आधार, राष्ट्रीय संगठन, प्रचार और संसाधनों की ताकत तथा नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय प्रभाव का लाभ मिल सकता है. 2024 में भाजपा का 18.56 प्रतिशत लोकसभा वोट यह बताता है कि पंजाब में भाजपा अब केवल पुराने 20-25 विधानसभा क्षेत्रों तक सीमित छोटी सहयोगी नहीं रही. लेकिन यह वोट अभी पर्याप्त रूप से सीटों में नहीं बदल रहा. एसएडी के पास इसके उलट वह संगठनात्मक आधार है जो वोट को सीट में बदलने में मदद कर सकता है. इसलिए एसएडी के लिए बीजेपी के साथ संभावित गठबंधन केवल पुराने रिश्ते की वापसी नहीं, बल्कि राजनीतिक पुनर्जीवन की कोशिश भी हो सकता है. इसे एक लाइन में कहें तो- एसएडी गठबंधन के जरिए वापसी करना चाहता है, भाजपा गठबंधन के जरिए पंजाब में विस्तार करना चाहती है.
लेकिन सबसे बड़ी चुनौती आम आदमी पार्टी है
2025 के ग्रामीण चुनावों और 2026 के शहरी चुनावों में आम आदमी पार्टी सबसे बड़ी ताकत रही. जिला परिषद में 218, पंचायत समिति में 1,529 और शहरी स्थानीय निकायों में 958 वार्ड- ये तीन आंकड़े बताते हैं कि आम आदमी पार्टी के पास सिर्फ सरकार की ताकत नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर भी बड़ा संगठनात्मक आधार है. इसलिए एसएडी-बीजेपी गठबंधन बन भी जाता है तो उसे सिर्फ कांग्रेस से नहीं लड़ना होगा. कई सीटों पर उसकी सबसे बड़ी चुनौती आम आदमी पार्टी का ग्रामीण-शहरी नेटवर्क होगा.
कांग्रेस को गठबंधन से सबसे सीधा नुकसान क्यों हो सकता है?
2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने पंजाब की 13 में से 7 सीटें जीतीं और करीब 26.30 प्रतिशत वोट हासिल किया. लेकिन अगर एसएडी और बीजेपी अलग-अलग लड़ते हैं तो कई सीटों पर दोनों एक-दूसरे का वोट काट सकते हैं. यदि दोनों एक उम्मीदवार के पीछे खड़े हो जाते हैं तो वही वोट एक जगह जमा हो सकता है. ऐसे में कांग्रेस के सामने एक साथ दो विपक्षी ध्रुव खड़े हो सकते हैं- आम आदमी पार्टी और एसएडी-बीजेपी. इसलिए संभावित गठबंधन का सबसे सीधा चुनावी नुकसान कांग्रेस को हो सकता है. लेकिन कांग्रेस को खत्म मान लेना भी गलत होगा; उसके पास अभी भी राज्यव्यापी संगठन और बड़ा वोट आधार मौजूद है.
असली लड़ाई गठबंधन बनने के बाद शुरू होगी
गठबंधन की सबसे बड़ी परीक्षा घोषणा नहीं, सीट बंटवारा होगा. पुराने दौर में भाजपा छोटी साझेदार थी, लेकिन अब भाजपा 2024 के 18.56 प्रतिशत लोकसभा वोट और 2026 के शहरी विस्तार को आधार बनाकर ज्यादा सीटें मांग सकती है. एसएडी दूसरी तरफ ग्रामीण संगठन और विधानसभा की वास्तविक चुनावी क्षमता का तर्क देगा. सवाल होगा- कौन कितनी सीटों पर लड़ेगा? किन सीटों पर बीजेपी और किन पर एसएडी उम्मीदवार उतारेगा? कौन किसके उम्मीदवार के लिए अपने कार्यकर्ताओं को जमीन पर उतारेगा? और सबसे बड़ा सवाल- मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा? अगर इन सवालों पर समझौता हो गया तो गठबंधन की ताकत बढ़ेगी; अगर यहीं टकराव हुआ तो वही गठबंधन बनने से पहले कमजोर भी हो सकता है.
2027 की असली परीक्षा- 31.98 प्रतिशत वोट नहीं, उसका ट्रांसफर
2024 का 31.98 प्रतिशत संयुक्त लोकसभा वोट देखने में बहुत आकर्षक है. लेकिन 2025 के ग्रामीण और 2026 के शहरी स्थानीय निकाय परिणाम यह भी बताते हैं कि यह वोट अभी किसी एक संयुक्त चुनावी मशीन में बदलकर सामने नहीं आया है. इसलिए 2027 के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि एसएडी और बीजेपी के वोट जोड़ने पर कितना प्रतिशत बनता है. असली सवाल है—क्या भाजपा का मतदाता एसएडी उम्मीदवार को वोट देगा और क्या एसएडी का मतदाता बीजेपी उम्मीदवार के पीछे उतनी ही मजबूती से खड़ा होगा? अगर जवाब हां है तो गठबंधन का चुनावी प्रभाव उसके कागजी वोट प्रतिशत से कहीं बड़ा हो सकता है. अगर जवाब नहीं है तो 31.98 प्रतिशत का जोड़ भी कई सीटों पर जीत में नहीं बदल पाएगा.
क्या एसएडी-भाजपा साथ आए तो 2027 में सरकार बन सकती है?
आज की तारीख में यह कहना गलत होगा कि गठबंधन बनते ही सरकार तय हो जाएगी. लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि गठबंधन की सरकार बनाने की कोई संभावना नहीं है. ताजा आंकड़ों को जोड़कर देखें तो तस्वीर साफ है- आम आदमी पार्टी अभी सबसे मजबूत संगठनात्मक ताकत है; कांग्रेस अभी भी बड़ी राज्यव्यापी चुनावी ताकत है; एसएडी ग्रामीण और पंथक राजनीति में अपनी बची हुई जमीन के कारण महत्वपूर्ण है; भाजपा शहरी और अर्ध-शहरी पंजाब में तेजी से बढ़ी है. इन दोनों की ताकतें एक-दूसरे के साथ सफलतापूर्वक जुड़ती हैं तो 2027 का मुकाबला निश्चित रूप से अधिक त्रिकोणीय और अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकता है. लेकिन सरकार तक पहुंचने के लिए पांच बातें निर्णायक होंगी- सही सीट बंटवारा, सही उम्मीदवार, कार्यकर्ताओं का जमीनी तालमेल, 2020 के किसान आंदोलन से जुड़े सवालों का विश्वसनीय जवाब और सबसे बढ़कर वास्तविक वोट ट्रांसफर.
गठबंधन अभी नहीं हुआ, लेकिन जरूरत दोनों तरफ साफ दिखाई देती है
मोगा में 1996 में “पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत” की लाइन से शुरू हुई राजनीतिक यात्रा 1997 में 93 सीटों की ऐतिहासिक जीत तक पहुंची. 2002 में गठबंधन हारा लेकिन टूटा नहीं. 2007 में 68 सीटों के साथ सत्ता में लौटा और 2012 में फिर 68 सीटें लेकर लगातार दूसरी सरकार बनाई. 2017 में 18 सीटों पर सिमटा. 2020 में किसान कानूनों के सवाल पर रास्ते अलग हुए. 2022 में अलग-अलग लड़कर दोनों मिलकर सिर्फ 5 विधानसभा सीटों पर रह गए. 2024 में दोनों का लोकसभा वोट जोड़ने पर 31.98 प्रतिशत का आंकड़ा सामने आया, लेकिन सीट सिर्फ एक मिली. 2025 के ग्रामीण चुनावों में एसएडी ने 449 पंचायत समिति और 46 जिला परिषद जोन जीते, जबकि भाजपा क्रमशः 73 और 7 पर रही. 2026 के शहरी चुनाव में एसएडी 192 और भाजपा 172 वार्ड पर पहुंची, जबकि आम आदमी पार्टी 958 के साथ बहुत आगे रही. इन सारे आंकड़ों को एक साथ रखिए तो निष्कर्ष किसी पार्टी के दावे से नहीं, खुद चुनावी जमीन से निकलता है.
कहने को कोई कुछ कहे, पंजाब में बीजेपी और एसएडी एक-दूसरे के बिना “अधूरे” दिखाई देते हैं. भाजपा के पास बढ़ता हुआ शहर है, एसएडी के पास बचा हुआ गांव. बीजेपी के पास नया विस्तार है, एसएडी के पास पुरानी जड़ें. भाजपा के पास बढ़ता वोट है, एसएडी के पास स्थानीय संगठन. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि गठबंधन अभी हुआ नहीं है और केवल दोनों के आंकड़े जोड़ देने से सरकार नहीं बनती.
2027 की असली कहानी शायद इसी एक सवाल में सिमटेगी- क्या बीजेपी का शहर और अकाली दल का गांव एक ही उम्मीदवार के पीछे खड़ा हो पाएगा? अगर जवाब “हां” हुआ, तो 2027 का पंजाब चुनावी गणित सचमुच बदल सकता है. अगर जवाब “नहीं” हुआ, तो 31.98 प्रतिशत का कागजी जोड़ भी जीत की गारंटी नहीं बनेगा.

