चुनावी जंग से पहले पंजाब का ‘सरदार’ बनने की जंग में कांग्रेस की टॉप लीडरशिप जबरदस्त तरीके से एक-दूसरे को पीछे घसीटने में लगी

आरके सेठी
चंडीगढ़, 19 अगस्त।
कांग्रेस पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार और बीजेपी से तो शायद बाद में मुकाबला करेगी, पहले उसे खुद के घर की लड़ाई सुलझानी मुश्किल हो रही है. पार्टी का ‘सरदार’ बनने की जंग में पंजाब कांग्रेस की टॉप लीडरशिप जबरदस्त तरीके से एक-दूसरे को पीछे घसीटने में लगी है कि हाईकमान को भी डरा दिया है. दिल्ली में बैठे पार्टी के सरपरस्तों को हरियाणा के जख्म अभी भूले नहीं हैं. और, अब हालात-ए-पंजाब देखकर भी वो इस कदर घबराये हुए हैं कि खफा किसी भी लीडर को होने नही देना चाहते.
पंजाब कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान अब छिपी हुई बात नहीं रह गई है. पूर्व मुख्यमंत्री और जालंधर से सांसद चरणजीत सिंह चन्नी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के बीच राजनीतिक दूरी पिछले करीब डेढ़ महीने में कई मौकों पर सामने आ चुकी है.
आज, 19 अगस्त को दिल्ली में कांग्रेस वर्किंग कमेटी यानी सीडब्ल्यूसी की बैठक है. चन्नी सीडब्ल्यूसी के सदस्य हैं. लेकिन वह इस मीटिंग में नही पहुँच रहे. पंजाब कांग्रेस के नेताओं के साथ राहुल गांधी की बातचीत भी आज या कल होने की संभावना है. बताया गया है कि चन्नी पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में एमए कर रहे हैं और आज उनका लास्ट पेपर है, इसलिए वो आज दिल्ली नही जायेंगे. लेकिन असली कहानी आज की बैठक से कहीं बड़ी है. दरअसल, चन्नी इस बात से नाराज हैं कि पार्टी हाई कमान ने वडिंग को पंजाब में पार्टी की कमान क्यों सोंप दी. चन्नी खुद को पार्टी की और से मुख्यमंत्री का चेहरा बनाने की उम्मीद रखे हुए हैं.
हाईकमान ने वडिंग को रखा, चन्नी को कैंपेन की कमान
कांग्रेस हाईकमान ने एक जुलाई को पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद पर अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को बरकरार रखा. इसी संगठनात्मक बदलाव में चरणजीत सिंह चन्नी को पार्टी की कैंपेन कमेटी का चेयरमैन बनाया गया, जबकि प्रताप सिंह बाजवा को विधायक दल के नेता के पद पर बरकरार रखा गया. यानी हाईकमान ने एक तरफ संगठन की कमान वडिंग के पास रखी और दूसरी तरफ चुनावी अभियान की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी चन्नी को दी. लेकिन यह संतुलन ज्यादा दिन कायम नहीं रह सका.
चन्नी के घर शक्ति प्रदर्शन, वडिंग को हटाने की मांग
चन्नी के मोरिंडा स्थित आवास पर तीन जुलाई को कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता, पूर्व मंत्री और पूर्व विधायक जुटे. बैठक में चन्नी को पंजाब कांग्रेस की कमान सौंपने और वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग खुलकर सामने आई. रिपोर्टों के मुताबिक यह चन्नी खेमे की ओर से हाईकमान के फैसले के खिलाफ पहला बड़ा सार्वजनिक शक्ति प्रदर्शन था. इसी दिन इस विवाद में बीजेपी का कोण भी जुड़ गया. पंजाब बीजेपी अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने कहा कि अगर कांग्रेस नेता बीजेपी में आते हैं तो उनका स्वागत किया जाएगा. यह बयान चन्नी के सन्दर्भ में दिया गया था.
चन्नी और रंधावा महत्वपूर्ण बैठक से दूर
एआईसीसी के पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल ने 7 जुलाई कोपंजाब कांग्रेस की बैठक बुलाई. चरणजीत सिंह चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा दोनों बैठक में मौजूद नहीं थे. उस समय राजा वडिंग ने उनकी गैरहाजिरी को यह कहते हुए हल्का किया कि दोनों नेताओं ने बताया था कि वे बाहर हैं और कुछ दिन बाद उपलब्ध होंगे. दूसरी रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि चन्नी खेमे के नेता संगठनात्मक फैसलों पर अपनी आपत्तियां हाईकमान तक पहुंचा रहे थे. यही वह दौर था जब असहमति सार्वजनिक राजनीतिक टकराव में बदलने लगी.
हाईकमान ने नाराज खेमे से बातचीत की
इसके बाद कांग्रेस नेतृत्व ने चन्नी खेमे के नेताओं से बातचीत की कोशिश की. 10 जुलाई को चन्नी खेमे की भूपेश बघेल से मुलाकात की तैयारी की खबर सामने आई और 11 जुलाई को पंजाब कांग्रेस के नेताओं ने बघेल से बातचीत की. हाईकमान की कोशिश स्पष्ट थी कि नेतृत्व विवाद को चुनाव से पहले नियंत्रित किया जाए. लेकिन वडिंग को हटाने की चन्नी खेमे की मांग पूरी नहीं हुई.
चन्नी का बड़ा बयान – “राहुल गांधी हमारे नेता हैं”
चरणजीत सिंह चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा ने 16 जुलाई को कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल से मुलाकात की. मुलाकात के बाद चन्नी ने कहा कि राहुल गांधी उनके नेता हैं और वह हाईकमान के फैसले का पालन करेंगे. यह बयान महत्वपूर्ण था, क्योंकि इससे एक बात साफ हुई कि चन्नी ने सार्वजनिक तौर पर कांग्रेस नेतृत्व से अलग होने की घोषणा नहीं की थी. उसी समय पार्टी के भीतर यह संकेत भी था कि हाईकमान वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने के पक्ष में नहीं है. यानी चन्नी का संघर्ष कांग्रेस से बाहर जाने का नहीं, कांग्रेस के भीतर अपनी भूमिका और प्रभाव को लेकर दिखाई दे रहा था.
राहुल गांधी के भाषण के दौरान चन्नी पंजाब में
लोकसभा में 30 जुलाई को राहुल गांधी के महत्वपूर्ण भाषण के दौरान पंजाब कांग्रेस के सात सांसदों में से सिर्फ चन्नी मौजूद नहीं थे. उस समय चन्नी फरीदकोट में फार्मेसी ऑफिसर्स की भर्ती परीक्षा में कथित गड़बड़ी के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल थे. लेकिन उनकी गैरहाजिरी को सीधे तौर पर “राहुल गांधी का बहिष्कार” कहना सही नहीं होगा, क्योंकि उनकी अनुपस्थिति का सार्वजनिक कारण फरीदकोट का विरोध प्रदर्शन था. यह अंतर महत्वपूर्ण है.
अगस्त में विवाद और ज्यादा खुलकर सामने आया
“हर बूथ कांग्रेस मजबूत” अभियान के दौरान कई कार्यक्रमों में चन्नी समर्थकों ने उनके समर्थन में नारे लगाए. कुछ जगहों पर चन्नी और वडिंग समर्थकों के बीच नारेबाजी और टकराव की स्थिति भी बनी. पटियाला क्षेत्र के एक कार्यक्रम में वडिंग और भूपेश बघेल की मौजूदगी में चन्नी के समर्थन में नारे लगाए गए. इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी को सार्वजनिक कर दिया. इसके बाद चन्नी को लेकर बीजेपी और आरएसएस से जोड़ने वाले पोस्टर भी सामने आए. वे उनके खिलाफ लगाए गए राजनीतिक पोस्टर थे, न कि उनकी ओर से बीजेपी में जाने की घोषणा.
दिल्ली में चन्नी फिर विपक्षी खेमे के नेताओं के साथ
12 अगस्त तक विवाद समाप्त होने के बजाय नए राजनीतिक समीकरणों की चर्चा होने लगी. सुखजिंदर सिंह रंधावा के दिल्ली आवास पर हुई एक डिनर बैठक में चन्नी, रंधावा, प्रताप सिंह बाजवा और कुछ अन्य कांग्रेस नेता मौजूद थे. इसके बाद बाजवा ने राहुल गांधी से मुलाकात भी की. इससे यह संकेत जरूर मिला कि पंजाब कांग्रेस के कई असंतुष्ट या अलग राय रखने वाले नेता हाईकमान तक अपनी बात पहुंचाने के लिए सक्रिय हैं. 15 अगस्त को इसरू के राजनीतिक सम्मेलन में चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा एक मंच पर दिखाई दिए, जबकि पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष राजा वडिंग इस कार्यक्रम में मौजूद नहीं थे. यह तस्वीर इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि कुछ ही सप्ताह पहले तक चन्नी और वडिंग के बीच संगठनात्मक विवाद चल रहा था और अब दोनों की राजनीतिक गतिविधियां अलग-अलग दिखाई दे रही थीं.
विवाद अब सिर्फ चन्नी-वडिंग तक सीमित नहीं
17 अगस्त तक पंजाब कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान का दायरा और बढ़ गया. राजा वडिंग के “एक परिवार, एक टिकट” फॉर्मूले पर सुखजिंदर सिंह रंधावा समेत दूसरे नेताओं की आपत्तियां सामने आईं. इससे साफ हुआ कि पंजाब कांग्रेस की समस्या केवल चन्नी और वडिंग के बीच नेतृत्व विवाद नहीं है; टिकट वितरण और संगठनात्मक रणनीति को लेकर भी वरिष्ठ नेताओं के बीच मतभेद हैं.
तो फिर चन्नी चाहते क्या हैं?
अब तक के घटनाक्रम को जोड़ने पर चन्नी की सबसे स्पष्ट मांग संगठनात्मक दिखाई देती है. उनके समर्थक चाहते हैं कि पंजाब कांग्रेस की कमान चन्नी को मिले या कम से कम उन्हें 2027 के चुनाव में निर्णायक भूमिका दी जाए. हाईकमान ने उन्हें कैंपेन कमेटी की जिम्मेदारी दी, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष वडिंग ही रहे. चन्नी और उनके समर्थकों की गतिविधियां बताती हैं कि वह अपनी राजनीतिक भूमिका को सिर्फ एक औपचारिक चुनावी समिति तक सीमित रखने के पक्ष में नहीं हैं. लेकिन दूसरी तरफ चन्नी ने 16 जुलाई को खुद कहा कि राहुल गांधी उनके नेता हैं और वह हाईकमान का फैसला मानेंगे. इसलिए फिलहाल यह कहना ज्यादा सही होगा कि चन्नी कांग्रेस से बाहर निकलने की बजाय कांग्रेस के भीतर अपनी राजनीतिक हैसियत और प्रभाव को बनाए रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं.
राहुल गांधी की मुश्किल क्या है?
राहुल गांधी के सामने मामला आसान नहीं है. चन्नी पूर्व मुख्यमंत्री, जालंधर के सांसद और सीडब्ल्यूसी सदस्य हैं. दूसरी तरफ वडिंग प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं. अगर कांग्रेस चन्नी के दबाव में वडिंग को हटा देती है तो यह संदेश जा सकता है कि संगठनात्मक फैसले दबाव में बदले जा सकते हैं. अगर चन्नी को नजरअंदाज करती है तो पंजाब कांग्रेस के भीतर उनके समर्थकों की नाराजगी और बढ़ सकती है. इसीलिए हाईकमान ने दोनों पक्षों को साथ रखने की कोशिश की है. 19 और 20 अगस्त को दिल्ली में पंजाब कांग्रेस के नेताओं के साथ राहुल गांधी की बातचीत की संभावना इसी पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है. फिलहाल यह सिर्फ चन्नी बनाम वडिंग की व्यक्तिगत नाराजगी नहीं रह गई है. यह पंजाब कांग्रेस में नेतृत्व, संगठन, चुनावी भूमिका और 2027 के लिए राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई बन चुकी है. और आज की सीडब्ल्यूसी बैठक के बाद राहुल गांधी और पंजाब कांग्रेस के नेताओं के बीच होने वाली बातचीत इस कहानी का अगला बड़ा अध्याय तय कर सकती है.

